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28/04/11

पैसा पैसा हाय पैसा

कुछ दिन पहले एक नामी गिरामी बाबा चल बसे, अब यह कैसे बाबा थे, जो आदमी की जेब देख कर ही दर्शन देते थे, अब जब मर गये तो अपने पीछे आकूत दोलत छोड गये, उस दोलत के लिये  उसी के बंदे जो उस के धंधे मे शामिल थे लड रहे हे, सभी को अपनी अपनी पडी हे, यानि वह दोलत जो उस बाबा ने जादू दिखा कर लुटी, भोले भाले लोगो से, लालची लोगो से, दुसरो को लुटने वालो से, इन नेताओ से, वगेरा वगेरा...इस आकूत दोलत मे से एक पैसा भी बाबा के संग नही गया, बस उस बाबा के कर्म ही उस के संग गये हे, ओर इस खेल को मै रोजाना समाचार पत्रो मे पढ रहा हुं, आज एक विचार आया मन मे सो आप सब से बांटना चाहा, हम आराम से अगर रोजाना मजदुरी कर के जितना कमा लेते हे, वो हमारे लिये ओर हमारे परिवर के लिये काफ़ी होता हे,हम उस मे किसी का हक भी नही मारते, फ़िर हमे अच्छॆ कर्म करने की जरुरत भी नही होगी, क्योकि हम पापो से तो दुर ही हे,अगर सभी हमारी तरह से सोचे तो इस भारत क्या पुरी दुनिया मे कोई भुखा ना सोये.

इस बाबा ने तडप तडप कर ही अपने प्राण छोडे हे, उस की आकूत दोलत भी उस के पराण नही बचा पाई, उस की भक्ति भी उसे नही बचा पाई, बाल्कि भगवान भी उसे सबक देना चाहता था, उस के संग हम सब को भी एक सबक इस बाबा की मृत्यु से लेना चाहिये कि हमारे संग कुछ नही जाना, तो क्यो हम दुसरो का हक मार मार कर बेंक बेलेंस बढाने पर लगे हे, क्यो खुद भी सुख से नही रहते ओर हजारो लाखो की वद दुआ भी लेते हे, यह अरब पति, करोड पति, लखपति क्या मेहनत से ईमानदारी से बने हे, यह नेतओ ने जो काला धन स्विस बेंक या अपने रिशते दारो के नाम से जमा कर रखा हे, क्या इस धन से यह आसान मोत मरेगे? या स्वर्ग मे जायेगे? या मरने के बाद अपने परिवार को सुख शांति दे पायेगे? तो क्यो यह दुसरो के मुंह से निवाला छीन कर दुसरो को दुखी करते हे, अपने चंद पल खुशी मे बिताने के लिये क्यो यह लाखॊ अरबो की बद दुयाऎ... नन्हे नन्हे बच्चो के मुंह से दुध छीन कर यह अपने पेग पीते हे, क्या यह सब सुखी रहेगे? कई लोग कुत्तो की तरह से भीख मांग कर खाते हे इन की वजह से, क्या यह अपने परिवार को सुख शांति दे पायेगे,

हम सब की जिन्दगी कितने बरस की हे, ओर उस दोरान हम इस समाज को इस दुनिया को क्या दे रहे हे? जो दे रहे हे, वो तो हम एक कर्ज दे रहे हे, कल को ब्याज के संग हमे वापिस तो मिलेगा ही, उस समय जब हम एक एक सांस के लिये तडपेगे तब पशछताने से क्या लाभ, जानवर भी सदियो के लिये खाना जमा कर के नही रखते, चुहे, ओर चींटिया भी ३, ४ महीने का खाना ही जमा रखती हे, ओर हमारा बस चले तो हम अपनी बीस ्पिढियंओ के लिये जमा रखे, जब कि हमे पता नही हमारी अगली पिढी भी आयेगी जा नही,ओर अगर आई तो वो केसी निकलेगी? कोकि कोई भी हराम की कमाई खा कर हलाल का काम नही करेगा.

हाय पैसा हाय पैसा कया करेगे यह इतने पैसो का, अपने कुछ साल तो ’ऎश मै बिता लेगे, बाकी परिवार इन के जाते हे आपस मे लडेगा; भाई भाई दुशमन बन जाते हे, अपनी जिन्दगी के कुछ साल ऎश मे बीताने के लिये क्यो हजारो लाखॊ को दुखी करते हे,कितने लोग भुख से मरते हे, कितने बच्चे बिना दुध के बिना दवा के मरते हे, उन सब के जिम्मेदार यही लोग हे जो पैसा पैसा करते हे... सीखॊ इस बाबा के अंत से कुछ अब भी सुधर जाओ

05/05/10

अच्छाई ओर बुराई

आज बहुत समय बाद चिंतन ले कर आया हुं, आशा करता हुं आप सब को पसंद आयेगा...
हम सब इसी समाज से जुडे है, हम सब मै बहुत सी अच्छाईयां भी है ओर बुराईयां भी, लेकिन अगर हम इन दोनो के फ़र्क को समझ जाये तो कितना अच्छा हो... हम जब बुराई करते है बुरी बाते करते है तो हमे आंनद मिलता है जो कुछ पल का ही होता है, लेकिन जब अच्छाई करते है तो मन को शांति मिलती है, तो चले आज के चिंतन की ओर.....

सच कहुं तो अच्छाईयां करने के लिये हमे बहुत मेहनत करनी पडती है, ओर बुराईयां तो हमे अपने आप ही घेर लेती है, बुरे सस्कांर तो हम सब को जन्म जन्मांतरो से ही आसपास देखने को मिल जाते है, परन्तु अच्छॆ संस्कारो को करने के लिये हमे हिम्मत ओर पुरुषार्थ की जरुरत पडती है हमे जागृत होना पडता है, छाया दार ओर फ़ल दार पेड लगाने के लिये हमे वर्षो अथक मेहनत करनी पडती है, लेकिन बेशर्म के झाड तो हर जगह बिना मेहनत के ही हमारे चारो ओर उग आते है, तभी तो इन का नाम बेशर्म पडा है, ओर बुराईयां भी हमारे मन मै हमारे चेतना की पवित्र भूमि पर इन बेशर्म के पोधॊ की तरह ही उगती जा रही है, ओर फ़िर धीरे धीरे हमारे चित की, हमारे मन की भुमि पर इन बेशर्म के पोधो रुपी बुरईयां छा जाती है, ओर फ़िर हमे यह बुराईयां ही अच्छी लगती है, इन्हे उखाड फ़ेकने से कोई लाभ नही, क्योकि इन्हे बार बार काटने से भी यह बार बार ऊग आती है, तो क्यो ना इन्हे जड से ही हमेशा के लिये हटा दे, इन की जड को ही उखाडा जाये, तभी इन बेशर्म रुपी बुराई के झाड का नाश होगा, ओर जो जड शेष रह जाये उस मै मीठा डाल कर चीटिंयो से बिलकुल जड साफ़ कर दो.

जेसे हमे बुराई को हटाने के लिये जागरुक होना पडा है मेहनत करनी पडी है, उसी प्रकार हमे अच्छाई रुपी पोधै को लगाने के लिये भी मेहनत करनी पडती है, भुमि मै पहले अच्छाई के बीज डालने पडते है, फ़िर उस मै अच्छे संस्कारो रुपी पानी से सींचना पडता है, उस की काट छांट करनी पडती है, उसे बेशर्म के झाड से बचाना पडता है....
तो आओ आज हम प्रण करे कि हम अपने आने वाली पीढी के लिये बेशर्क का झाड नही अच्छाई रुपी छाया दार ओर फ़ल दार पेड लगाये.
धन्यवाद, यह चिंतन बचपन मै मेरे पिता जी ने मुझे सुनाया था

17/09/09

असली सुख

आज का चिंतन, मेने बहुत पहले बचपन मै किसी बाबा के मुख से सुना था, ओर ऎसे चिंतन मै अकसर अपने बच्चो को कहानी के रुप मे सुनाता रहता हुं, पता नही ठीक है या गलत....
चलिये आप को भी यह चिंतन एक कहानी के रुप मै सुनाता हुं, कल ओर शनि वार को मेरे पास समय ना के बराबर होगा, ओर मै कुछ ही समय आप के चिट्टे पढ पाऊंगा.
तो लिजिये आज का चिंतन....

बहुत समय पहले एक सेठ कही जा रहा था, सेठ बहुत अच्छा ओर दयालू था, उसे आगे जा कर एक साधू मिला, फ़िर दोनो साथ साथ चल पडे,बातो बातो मे सेठ ने अपने मन कि बात साधू बाबा को बतलाई कि बाबा मै सब सुख होते भी अंदर से सुखी नही, मेरे पास धन दोलत की कमी नही, लेकिन मुझे असली सुख कि तलाश है, कोई मेरा आधे से ज्यादा धन ले कर भी मुझे असली सुख दे दे तो मै उसे अपना आधा धन खुशी खुशी देने को तेयार हु,

साधू बाबा काफ़ी देर से देख रहे थे कि सेठ अपने हाथ मे पकडी पोटली को बार बार छुपने कि कोशिश कर रहे थे, लेकिन उसे खोने के डर से हाथ मै ही रखे थे, कि कही रख दी ओर मेरी आंख लग गई तो ... ओर तब मोका देख कर साधू बाबा सेठ की पोटली झपट कर जंगल की तरफ़ भाग गया, पीछे पीछे सेठ भी शोर मचाता भागा, साधू बाबा तो पतले थे सो फ़ुर्ती से भाग गये, सेठ थोडी दुर भागा, फ़िर थक कर बेठ गया, ओर साधू को तो कभी अपने आप को कोसने लग गया, ओर बहुत दुखी हुया कि मेरे तो काफ़ी सारे हीरे जवहरात तो यह साधू ले भागा, ओर सर झुका कर बेठ गया.
तभी सेठ की झोली मे उस के हीरो की पोटली आ कर गिरी, सेठ ने झट से पोटली उठा कर छाती से लगई, ओर फ़िर पोटली खोल कर देखा सब ठीक ठाक है, तभी उसे साधू बाबा की आवाज आई कि सेठ जी आप को सुख मिला ? सेठ ने कहा हां अब मेरी पोटली मुझे मिल गई अब मै बहुत खुश हुं, मुझे इस पोटली के मिलने से बहुत सुख मिला, बाबा ने कहा, लेकिन इस पोटली के खोने से पहले भी तो तुम ने ही कहा था कि तुम्हे असली सुख चाहिये, सेठ अभी भी नही समझे यह धन दोलत तो नकली सुख है, अगर तुम्हे असली सुख चाहिये तो तुम्हे त्याग, सेवा का धन इकट्टा करना पडेगा, इस धन की जरुरत फ़िर नही पडेगी, यह धन तो दुख का भंडार है, ओर तुम दुख के घर मे रह कर सुख की आस केसे कर सकते हो.....

17/06/09

चिंतन जात पात

मै अकसर समाचार पत्रो मे,टी वी पर सुनता हू कि फ़ंला मंदिर, मस्जिद मै आछुत जा दुसरे धर्म के लोगो के आने से उन का धर्म स्थल गंदा हो गया, ओर फ़िर उसे दोबारा से पबित्र करने के लिये उसे पवित्र जल से, गंगा जल से धोया जाता है, ओर कही कही तो दुध से भी धोया जाता है, लेकिन इन मंदिरो ओर मस्जिदो को तो इंसान ने बनाया है, इसी लिये अपवित्र हो जाते है,अगर इन मै भगवान सच मै रहते हो तो कोई केसे इन्हे आपवित्र कर सकता है.
लेकिन कभी सुना है कि एक पेड की छाया अपवित्र हुयी, कोई नदी, झरना अपवित्र हुये... क्योकि वो सब तो उस कुदरत ने बानये है, तो आज का चिंतन भी इसी बात पर ताकि हम हर इंसान को इंसान की तरह्ही समझे, जात पात से दुर, क्योकि य सब जात पात तो हम ने बनाई है, फ़िर उस भगवान से केसा प्रतिशोध, उस के बनाये इंसानो से केसा दुवेष..चलिये अब उस विचार कि ओर....
एक दिन सुबह सुबह दो ब्राह्माण गगां के घाट स्नान करने गये, ओर वो जल्दी मे लोटा लाना भुल गये, ओर गंगा का बहाव बहुत तेज था, दोनो बहुत परेशान हुये, कुछ दुरी पर ही कबीर जी भी स्नान कर रहे थे, उन्होने स्नान किया ओर देखा कि दोनो ब्राह्माण कुछ चिंतित है माजरा भांपा ओर अपना लोटा उन ब्राह्माणॊ कि तरफ़ बढाया ओर बोले महात्मन आप इस लोटे से स्नान कर ले...... लेकिन कबीर को देख कर उन ब्राह्माणो ने लोटा नही पकडा, क्योकि उन की नजर मै तो कबीर एक आछूत ओर गेर धर्मी थे, ओर कबीर दास जी समझ गये, उन्होने उस लोटे को तीन बार वहां पडी रेत से खुब रगड कर साफ़ किया ओर लोटा उन ब्राह्माणो को दे दिया, अब वो ब्राह्माण उस लोटे को ले कर चल दिये ताकि थोडी दुर जा कर स्नान कर सके, तभी उन्हे पीछे से कबीर जी की आवाज आई .....लेकिन महात्माओ आप से पहले तो मै इन गंगा मै डुबकी भी लगा चुका, अब इस सारी गंगा को ओर इस सारी रेत को केसे पवित्र करु ? इतना सुनते ही उन ब्राह्माणो को अपनी भुल का एहसास हुया ओर उन्होने कबीर जी से माफ़ी मांग ली.
इस लिये हमे अन्य इंसानो को उस के कर्मो से देखना, हमारे कर्म अच्छॆ बुरे हो सकते है, लेकिन हम सब कि जात तो एक ही है, फ़िर क्यो जात पात का झगडा

03/06/09

जड ओर उस की महत्वता

आज जब भी भारत मै आता हुं, तो अपने उस भारत को वेसा नही पाता जेसा हम लोगो के विचारो मै होना चाहिये, एक पबित्र सा, मासुम सा, बहुत सुंदर, भोलेभाले लोग, जिन्हे दुनिया नमन करे,
ओर वेसा भी नही पाता कि आधुनिक हो, लोग आजाद हो, अपनी भाषा मे खुल कर बात करे,अपने पहरावे को अधिक प्यार करे, अपने त्योहारो को वेसे ही मनाये जेसे पहले मनाते थे, हर किसी के दुख सुख मै भाग ले, यह सब भी नही !!
तो फ़िर हम किस ओर जा रहे है हम मै से बहुत कम लोगो ने सोचा है, बच्चो को हम लोगो ने इतनी आजादी दे दी कि बडे होने पर सब से पहले वो अपने मां बाप को ही ठिकाने लगाते है,इन बच्चो को कुछ पता ही नही किस से केसे बात करनी है, नारी आजादी के नाम पर भी कुछ खास नही क्योकि हम ना तो अपनी संस्कृति को ही सहेज पाये, ओर ना ही उस संस्कृति को अपना पाये जिस के पिछे भाग रहे है।
आज का विचार इसी बात पर है, शायद मै अपनी बात कुछ इस रुप से समझा सकूं, तो लिजिये आज का चिंतन.....

आज हम सब आधुनिकता की ओर भाग रहे है, लेकिन आंखे मुंदे हुये, बस दुसरो की देखा देखी... एक तरह से बन्दर दोड ही लगती है, जिस पश्चिम को लोगो ने देखा ही नही समझा ही नही, बस हमे उन की हर बात अच्छी लगती है, उन का पहरावा, उन की भाषा, उन की आजादी, ओर हम मै से कोई भी अपने आप को पिछडा नही कहलाना चाहता, शायद यही कारण है कि हम अपने संस्करो से, अपनी जडो से कटते जा रहे है.
लेकिन अपनी जडो से कट कर, अपनी संस्कारो से अलग हो कर कोई भी आज तक सफ़ल नही हो पाया, बल्कि हम पश्चिम कि नकल भी करते है तो आधी अधुरी, हमे पता ही नही आजादी का मतलब असल मै है कया, क्या सडको पर बेवकुफ़ो की तरह से गन्दगी फ़ेलाने को आजादी कहते है,ऎसा पहरावा जिस मै सारा जिस्म नंगा दिखे क्या उसे पहनने को ही आजादी कहते है, सभ्य कहते है?,क्या कोई विदेशी भाषा को गलत मलत बोल लेने को आजादी कहते है? क्या अपने बुजुर्गो को उन की ही नजरो से उन्हे गिरा कर जीने की अदा को आजादी कहते है?
हम अपनी जडो से तो कट ही रहे है, लेकिन दुसरी कोई जड हमे मिली ही नही, तो हम कहा तक आधुनि ओर सभ्य बन पाये गे? जो भी सभ्यत अपनी जडो से कटती है वो हमेशा तबाह ही हुयी है,सभ्यता कया जो भी संसार की वस्तू अपनी जडो से कटी कभी नही फ़ुली फ़ली, उदाहारण के तोर पर ....जापान मै कई ऎसे चीड ओर देवदार के पेड मिलते है जो तीन सॊ चार सॊ साल पुराने है, लेकिन उन की उचाई मात्र आधा मिटर या इस से भी कम होगी? पता चला कि वह लोग इन पेडो की जडो ओर पत्तो को समय समय पर काटते रहते है, ओर जब जडे ही जमीन को नही पकडेगी, गहराई मै नही जायेगी ओर ऊपर भी इन्हे बढने से रोका जा रहा है तो य्ह चाहे हजार साल के हो जाये, उतने के उतने ही रहेगे.
वही हाल अब हमारा भी हो रहा है, हम अपनी जडो से कट रहे है, अपने संस्कारो से कट रहे है, ओर यह संस्कार ही हमारी अपनी गहराई है जिसे पकडे बिना हम कभी सफ़ल नही हो सकते, कभी फ़ल फ़ुल नही सकते, हां गुलाम तो हो सकते है, जेसे यह जापान के चीड ओर देवदार के पेड, हमारा अपना पहरावा, हमारी अपनी भाषा, हमारी अपनी संस्कति ही हमारी जडे है, ओर आजादी को सही समझे यह किस चिडिया का नाम है, अगर हम अपनी आजादी चाहते है तो पहले हमे दुसरो के बारे सोचना पडेगा, हमे कोई हक नही दुसरो की आजादी मे खलल डाले, ओर जब हम दुसरो की आजादी मे खलल नही डाले गे तो हमे हमारी आजादी खुदवाखुद मिल जाये गई.
आओ ओर इन जडो का महत्व समझे.

04/04/09

चिंतन....जीवन की कीमत

आज का विचार, हम जीव हत्या, आज हम मै से कितने लोग मांस खाते है, किस लिये ? सिर्फ़ जीभ के स्बाद के लिये, क्योकि ताकत के लिये मांस ? एक मरे हुये प्राणी का मांस, पता नही उस जानवर ने क्या क्या खाया होगा, फ़िर मोत को सामने देख कर उस पर क्या बीती होगी, कभी आप ने मोत का सामना किया है ? तो पता होगा, फ़िर किसी को मार कर खाना....

चलिये ज्यादा बात ना कर के सीधे चलते है आज के चिंतन की ओर...


बात बहुत पुरानी है, एक बार मगध राज्य मै अकाल पडा किसी तरह से राजा ने खाने का इन्तजाम कर दिया, लेकिन फ़िर से यह स्थिति ना आये इस से बचने के लिये राजा ने सभा बुलाई, ओर पुछा की दुनिया मै सब से सस्ता खाने का क्या है ? ओर जो हमेशा रहे ? सभी लोग सोच मै पड गये.
चावल , गेहूं,अन्य आनाज, फ़ल सब्जियां तो बहुत मेहनत के बाद मिलती है, ओर अगर अकाल पड जाये तो यह भी मुश्किल से मिलती है, सभी सोच रहे थे, तो एक मत्री ने अचानक कहा महाराज मासं , हम शिकार कर के मासं कॊ खा सकते है, जो बिलकुल मुफ़त भी है, ओर बहुत स्वादिषट भी, इस के साथ सभी मंत्री हां जी हां जी कहने लगे, सिर्फ़ एक प्रधानमंत्री कॊ छोड कर.
राजा ने प्रधानमंत्री से उस के चुप होने का कारण पुछा तो प्रधान मंत्री ने अपनी असमती जताई ओर कहा कि मांस सब से सस्ता है यह गलत है, कल मै आप को यह सिद्ध कर दुगां
आधी रात का समय था,प्रधान मंत्री ने एक मंत्री के घर का दरवाजा खटखटाया, जब मंत्री ने प्रधान मंत्री कॊ देखा तो हेरान रह गया, ओर बोला आप इस समय यहां सब कुशल मंगल तो है, प्रधान मंत्री ने कहा नही आज रात को राजा की तबियत अचानक बहुत खराब हो गई है बेदध ने उन्हे किसी के दिन का दो ग्राम मांस दवा के संग खाने को कहा है ,वरना जान बचना कठिन है यह लो दो लाख मोहरे, ओर अपने दिल का दो ग्राम मांस दे दो, मंत्री ने सोचा जब दो गराम मांस दिल से निकले गा तो मेरा मरना निशचित है, ओर मंत्री अन्दर गया ओर दो लाख मोहरे ओर ला कर प्रधान मंत्री को दी, ओर वहा से हाथ जोड कर टाल दिया.
प्रधान मंत्री सारी रात सभी मंत्रियो के यहा गया ओर करोडो मोहरे जमा कर ली, दुसरे दिन सुबह ही दरवार मे राजा ने सारी मोहरे राजा के आगे रख दी जब राजा ने पुछा यह क्या गुस्ताखी, तो प्रधान मंत्री ने सारी बात बताई ओर कहा की मासं की कीमत अब इन मंत्रियो से पुछे, जेसे इन्हे अपनी जान प्यारी है वेसे ही जनावरो को भी अपनी जान प्यारी होती है, हमे कोई हक नही कि किसी की जान ले सिर्फ़ अपना पेट भरने के लिये अपने स्वाद के लिये.
धन्यवाद

अगली बार जब भी आप मुर्गा खाये,बकरे का कबाब खाये, एक बार जरुर सोचे मरने से पहले , मोत को सामने देख कर इन पर क्या बीती होगी, ओर जब यह आप की पलेट मै सज कर आये , ओर आप इन्हे मजे से खा एरहे होगे तो अगर आत्मा नाम की कोई वस्तु है तो वो क्या सोचती होगी, आप को अपन मीट खाते देख कर, क्योकि इस जानवार की हत्या आप के लिये ही तो की गई है, आप भी जिम्मेदार है इस हत्या के,

03/03/09

चिंतन अंहकार

आज का विचार, कहते है इंसान गलतियो का पुतला है, लेकिन अगर हमे अपनी गलतियां पता लगे, अपनी बुराईया पता लगे तो उन्हे दुर करना हमारा सब का फ़र्ज है, ओर हम यह करते भी है, कई बार हम सोचते है कि हमारे मै अंहकार नही रहा, ओर हम सब से बहुत प्यार से बोलते है, सब के काम भी आते है, लेकिन अनजाने मै ही हम अपने अंदर इस अंहकार को पाल लेते है. तो आज इस छोटी सी कहानी से ही हमे अपनी इस भुल का एहसास हो सकता है....

एक बार नारद मुनि जी ने भगवान विष्णु जी से पुछा, हे भगवन आप का इस समय सब से प्रिया भगत कोन है?, अब विष्णु तो भगवान है, सो झट से समझ गये अपने भगत नराद मुनि की बात, ओर मुस्कुरा कर वोले ! मेरा सब से प्रिया भगत उस गांव का एक मामुली किसान है, यह सुन कर नारद मुनि जी थोडा निराश हुये, ओर फ़िर से एक प्रशन किया, हे भगवान आप का बडा भगत तो मै हुं, तो फ़िर सब से प्रिया क्यो नही??
भगवान विष्णु जी ने नारद मुनि जी से कहा, इस का जबाब तो तुम खुद ही दो गे, जाओ एक दिन उस के घर रहो ओर फ़िर सारी बात मुझे बताना,नारद मुनि जी सुबह सवेरे मुंह अंधेर उस किसान के घर पहुच गये, देखा अभी अभी किसान जागा है, ओर उस ने अब से पहले अपने जानवरो को चारा बगेरा दिया, फ़िर मुंह हाथ थोऎ, देनिक कार्यो से निवर्त हुया, जल्दी जल्दी भगवान का नाम लिया, रुखी सूखी रोटी खा कर जल्दी जल्दी अपने खेतो पर चला गया, सारा दिन खेतो मे काम किया.
ओर शाम को वापिस घर आया जानवरो को अपनी अपनी जगह बांधा, उन्हे चारा पानी डाला, हाथ पांओ धोये, कुल्ला किया, फ़िर थोडी देर भगवान का नाम लिया, फ़िर परिवर के संग बेठ कर खाना खाया, ओर कुछ बाते की ओर फ़िर सो गया.
अब सारा दिन यह सब देख कर नारद मुनि जी, भगवान विष्णु के पास वापिस आये, ओर बोले भगवन मै आज सारा दिन उस किसान के संग रहा, लेकिन वो तो ढंग से आप का नाम भी नही ले सकता, उस ने थोडी देर सुबह थोडी देर शाम को ओर वो भी जल्दी जल्दी आप का ध्यान किया, ओर मे तो चोबीस घंटे सिर्फ़ आप का ही नाम जपता हुं, क्या अब भी आप का सब से प्रिय भगत वो गरीब किसान ही है, भगवान विष्णु जी ने नारद की बात सुन कर कहा, अब इस का जबाब भी तुम मुझे खुद ही देना.

ओर भगवान विष्णु जी ने एक कलश अमृत से भरा नारद मुनि को थमाया, ओर बोले इस कलश को ले कर तुम तीनो लोको की परिकिरमा कर के आओ, लेकिन ध्यान रहे अगर एक बुंद भी अमृत नीचे गिरा तो तुम्हारी सारी भगती ओर पुन्य नष्ट हो जाये गे, नारद मुनि तीनो लोको की परिक्र्मा कर के जब भगवान विष्णु के पास वापिस आये तो , खुश हो कर बोले भगवान मेने एक बुंद भी अमृत नीचे नही गिरने दिया, विष्णु भगवान ने पुछा ओर इस दोराना तुम ने मेरा नाम कितनी बार लिया?मेरा स्मरण कितनी बार किया ? तो नारद बोले अरे भगवान जी मेरा तो सारा ध्यान इस अमृत पर था, फ़िर आप का ध्यान केसे करता.
भगवान विष्णु ने कहा, हे नारद देखो उस किसान को वो अपना कर्म करते हुये भी नियमत रुप से मेरा स्मरण करता है, क्यो कि जो अपना कर्म करते हुये भी मेरा जाप करे वो ही मेरा सब से प्रिया भगत हुआ, तुम तो सार दिन खाली बेठे ही जप करते हो, ओर जब तुम्हे कर्म दिया तो मेरे लिये तुम्हारे पास समय ही नही था, तो नारद मुनि सब समझ गये ओर भगवान के चरण पकड कर बोले हे भगवन आप ने मेरा अंहकार तोड दिया, आप धन्य है

18/02/09

आज का विचार, चिंतन, मोक्ष

आज का चिंतन, हम सब मन की खुशी, शान्ति के लिये , पुजा पाठ, तन्त्र मंत्र, वर्त, मन्नते मानते है ओर बहुत सी तीर्थ यात्राऎ करते है, शायद भगवान हमारे मन को शान्ति प्रदान कर दे.... तो आज का यह चिंतन यानि आज का यह विचार विचारे शायद यह विचार किसी एक की मदद कर सके.....

एक महान संत, जिस ने बचपन से ही घरवार छोड कर सन्यांस ले लिया था, उस ने बाल ब्रह्माचारी रह कर घोर तपस्या की, ओर घरेलू जीवन को जो बंधन मानता था, सारा दिन भगवान की तपस्या मे गुजारता, ओर जो भी दान दक्षिणा मे मिलता, उसे ही भगवान का प्रसाद समझ कर ग्रहण करता.
एक दिन उस सन्यांसी ने अपने प्राण त्याग दिये, ओर उस के प्राण यम दुत ले कर सीधे चित्र गुप्त के पास पहुये,

थोडी देर बाद इंतजार खत्म हुआ तो इस सन्यासी जी की बहीखाता देख कर चित्रगुप्त जी बोले, आप को दोबारा फ़िर से पृथ्वी पर जन्म लेना होगा, अब जाईये.... सन्यासी बोला महाराज आप गलती कर रहे है जरा ध्यान से देखे मेरे कर्मो का बहीखाता,क्योकि मेने तो पुरी जिन्दगी मै, मेने मोह माया, लोभ, अहंकार, घृणा ओर काम को अपने से दुर रखा ओर शुद्ध मन से हर पल भगवान की पुजा की है, ओर पुजा के सिवाय मैने जिन्दगी भर कुछ नही किया,इसी कामना से कि मुझे दोबारा इस भुमि पर फ़िर से ना जन्म लेना पडे, ओर मुझे मोक्ष मिले,यह सब सुन कर चित्र गुप्त जी बोले वत्स‘ !! यह सब बाते ठीक है कि तुम ने मोह माया, लोभ, काम, अहंकार ओर घृणा, ओर मान को त्याग कर सच्चे मन से भगवान की पुजा की, ओर किसी को दुख नही दिया, लेकिन फ़िर भी तुम्हे मोक्ष नही मिल सकता.

सन्यांसी ने पुछा , लेकिन क्यो ? चित्रगुप्त ने कहा कि इस क्यो ? का जबाब तो सिर्फ़ धर्मराज ही दे सकते है, ओर यमदुत उन्हे धर्मराज के दरवार मै लेगया, तो धर्मराज ने उस का बहीखाता देख कर कहा वत्स* चित्रगुप्त का निर्णय बिलकुल सही है,आप को मोक्ष नही मिल सकता, सन्यासी ने कहा हे धर्मराज यह तो अन्याय है, तो धर्म रज ने कहा वत्स यहा किसी के साथ अन्याय नही होता, सभी ओर उचित न्याय ही मिलता है, तो सन्यासी ने कहा तो मुझे मोक्ष क्यो नही मिल रहा हे धर्मराज !! मै यह जानना चाहता हुं,कि मेरी तपस्या मै कहां कमी रह गई, ताकि अगले जन्म मै मै उसे फ़िर से पुरी कर पाऊ.ताकि मुझे फ़िर मोक्ष मिल सके, वो कोन सी कमी है, जिस के कारण मुझे इस जन्म मै मोक्ष से बंचित किया गया है?

तो धर्मराज बोले वत्स ! इस पृथ्वी पर जितने भी प्राणी जन्म लेते है, चाहे मनुष्या योनि मै हो या अन्य योनि मै, उन सब का कुछ ना कुछ कर्तब्य बनता है अपने समाज के प्रति भी , ओर मनुष्या योनि मे जन्म लेने वले हर व्यक्ति का सब से पहला धर्म यह है कि वो अपने समाज की, मानवता की सेवा करे, उन के दुख दर्द मै काम आये, अपने कामो से लोगो को सुखी बनाये, लेकिन आप ने तो इन मै से एक भी काम नही किया, आप ने तो हमेशा अपने बारे मै सोचा, अपने मोक्ष के बारे, आप का तो जन्म भी व्यर्थ गया, आप को एक मोका ओर दिया जाता है,दोबारा पृथ्वी पर जाये ओर सारे काम मानवता की भलाई के कर के आये,


Chhod De Sari Duni...

04/02/09

चिंतन, सांसारिकता

आज का विचार,आज का विचार बहुत ही आसान है, लेकिन इस पर अमल करना बहुत ही कठिन है, अगर हम इस विचार पर सही रुप मे अमल करे तो हमे पुजा पाठ तीर्थ, गंगा स्नान इन सब की कोई जरुरत नही, ओर अगर हम सब इसे माने तो यह जमीन सच मे स्वर्ग बन जाये......

एक बार एक भगत एक बहुत ही पहुये हुये सन्यांसी के पास गया, ओर प्राणाम कर के बोला हे!! प्रभु मुझे अपने चरणो मे स्थान देवे, मै इस संसार से दुर रहना चाहता हुं, मुझे मोक्ष चाहिये, आप मेरी मदद करे,मुझे ग्याण दे, ताकि मे इस मतलबी संसार से दुर रहूं. ओर मुझे मोक्ष मिले, अब आप ही कोई उपाय बताये.

सन्यांसी जी आज कल के सन्यांसी तो थे नही कि मुर्गा आया है लुट लो कुछ उपदेश दे कर, वो सन्यांसी थे बहुत पहुचे हुये, ओर पहचान गये अपने भगत को, ओर बोले वत्स !! तुम्हारी इच्छा जरुर पुरी होगी, लेकिन पहले मेरे एक प्रशन का जबाब दो.

भगत बोला, स्वामी मै तो अब आप का दास बन गया पुछिये क्या सवाल है ?
सन्यांसी बोले बेटा मोक्ष लेने से पहले मुझे बस एक सवाल का जवाव दो कि तुम ने कभी किसी से प्यार किया है?
भगत बोला, नही स्वामी मै तो बेरागी हो गया हुं, सन्यासी ने फ़िर पुछा बच्चा सोचो... कभी भी किसी नारी से, किसी भी रुप मे मां से बहिन से प्रेमिका से ? भगत बोला नही स्वामी जी मै तो मन ओर तन से बेरागी हो चुका हुं.
सन्यांसी ने फ़िर पुछा, बच्चा एक बार फ़िर सोच लो.... कभी किसी जानवर से, किसी अन्य प्राणि से,किसी पेड पोधे से, किसी सुंदर चीज से, किसी भी संसारिक वस्तु से जिसे भगवान ने बनाया हो, कभी तुम्हारे मन मै थोडा सा भी प्यार जागा हो इन सब के बारे, कभी विचार आया हो प्यार का??
भगत बहुत ही प्यार से बोला नही स्वामी जी कभी नही, मै तो बचपन से ही बेरागी हो गया हुं.

तो सन्यांसी जी ने कहा बेटा जब तुम उस भगवान की बनाई चीजो को प्यार नही कर सकते, उन्हे नही चाहते, उन से पीछा छुडा कर, अपने कर्ताब्या से भाग रहे हो तो तुम्हे कहा मोक्ष मिलेगा, हमे पहले उस भगवान की बनाई दुनिया को प्यार करना चाहिये, उस ने नदी नाले, पहाड, जंगल, ओर पेड पोधे बनाये, इंसान बनाये, जानवर बनाये अगर सभी तुम्हारी तरह से बेराग मांगने लगे तो उस भगवान को यह सारी दुनिया बनाने का क्या लाभ, जाओ वापिस उस भगवान की बनाई सुंदर दुनियां को ओर सुंदर बनाओ, भागो मत, उस भगवान का अपमान मत करो, उस की बनाई दुनिया से प्यार करो, जाओ तुमे वही मोक्ष मिलेगा.
हम सब को भी चाहिये कि अपने हित को छोड कर इस दुनिया को ओर सुंदर बनाये, ताकि हम उस भगवान कि इस काम मै मदद करे, ओर अपना जीवन सफ़ल बनाये.
ओर आज पहली बार मै चिंतन के साथ एक गीत ( भजन ) के रुप मै दे रहा हुं, आशा करता हुं आप सब को पसंद आयेगा. धन्यवाद

Sansar se bhaage p...

26/01/09

चिंतन अपना अपना विचार

आज का विचार, हम सब किसी भी घटना को देखते है, या कोई अच्छा बुरा देखते है तो हम सब के अपने अपने विचार होते है, कोई पढ लिख कर डाक्टर बन गया , लेकिन एक ही साथ पढे लिखे एक ही प्रोफ़ेसर से पढे लिखे डाक्टर भी अलग अलग सोच रखते है, तो आज का विचार कुछ ऎसा ही है. तो चले आज के विचार की ओर...

दो लडके किसी स्कूल मे पढते थे, दोनो मे बहुत अच्छी दोस्ती थी, लेकिन दोनो के ख्याल अलग अलग थे, एक दिन पिक निक पर सारे स्कुल के बच्चे गये, यह दोनो भी साथ मे गये, सभी बच्चे खेल कर दोपहर खा भोजन करने के लिये एक पेड के नीचे बेठे थे.

सामने ही एक आम का बडा सा पेड था, वहा कुछ बच्चे बाहर से आये ओर ले डंडा ऊठा कर पेड पर मारा, तो पेड से दो तीन आम नीचे गिरे, यह सब स्कुल के बच्चे देख रहे थे, तभी हिन्दी के मास्टर जी ने पूछा बच्चो बतओ तुम ने जो देखा उस से क्या शिक्षा ली, अब यह दोनो दोस्त भी इसे देख रहे थे, तभी मास्टर जी ने पहले दोस्त से पूछा रामू तुम बताओ तुम ने इस घटना से क्या सीखा.

तो रामू बोला मास्टर जि जेसे पेड डंडा खा कर ही फ़ल देता है, वेसे ही इंसान भी बिना दवाव के बिना डर के काम करने वाला नही, इस लिये यह द्दश्य एक बहुत ही महत्वपूर्ण सामजिक सच की ओर लेजाता है, यानि यह दुनिया डर के बिना मनाने वाली नही.
अब मास्टर जी ने दुसरे बच्चे से पुछां हा भाई तुम ने क्या सीखा, तो राधे ने कहा मास्टर जी मुझे तो कुछ ओर ही लगा, मेने तो यही इस पेड से सीखा जेसे पेड चुपचाप डंडा खाने पर भी मीठे मीठे आम दे रहा है, वेसे ही हमे भी खुद दुख सह कर दूसरो को सुख देना चाहिये, अगर कोई हमारा अपमान भी करे तो वदले मै हमे उस का उपकार ही करना चाहिये, यही हमारा धर्म है, यही सब धर्मिक किताबो मे लिखा है, ओर यह कह कर राधे भी चुप हो गया.

मास्टर जी मुस्कुरये ओर बोले देखो हम सब के जीवन मै हमारी द्दष्टि ही बहुत महत्व पुर्ण है,यहां घटना सिर्फ़ एक है, ओर तुम दोनो ने इसे अलग अलग ग्रहण किया, क्योकि तुम दोनो की द्दष्टि मै फ़र्क है, इंसान अपनी नजरो से जो देखता है, वेसा ही अपने जीवन को ढालता है, वेसा ही सोचता है, वेसा हि कार्य करता है, ओर उसी के अनुसार फ़ल भी भोगता है.
इंसान की द्दष्टि से हि उस के स्व्भाव का पता चलता है, रामू से कहा कि तुम सब कुछ आधिकार से पाना चाहते हो, जब कि राधे तुम प्रेम से सब कुछ प्राप्त करना चाहते हो.

19/01/09

चिंतन सहनुभूति

आज का विचार हम सब कब किस मुसिबत मै फ़स जाये किसी को नही पता, इस लिये हम सब को मुसिबत मे फ़ंसे हर इंसान की मदद जरुर करनी चाहिये, बिना भेद भाव के... तो चलिये चिंतन की ओर चले......


एक बार भगवान बुद्ध एक कस्वे मै ठहरे हुये थे, उस साल भी बरसात ना हुयी थी, भयंकर अकाल पडा हुआ था, लोग भुखे मर रहे थे,कोई भी किसी की मदद नही कर रहा था,

यह सब देख कर बुद्ध ने नगर के सभी सेठॊ ओर धनिक लोगो को एक जगह बुलाया, ओर उन गरीब लोगो को भी बुलाया,ओर उन धनिक ओर अमीर लोगो से बुद्ध ने प्राथना की, कि हे सज्जनॊ आप सब से राज्य की, इन गरीबो की समस्या छुपी नही, यह भी तुम्हारे ही भाई है,तुम्हारे ही बच्चे है,आओ तुम सब मिल कर इन कि मदद करो इस समय !! लेकिन कोई भी धनवान इन अकाल पीडित गरीब लोगो की मदद के लिये आगे ना आया.



इन्ही नगर सेठो के बीच मै एक बालिका भी बेठी थी, उस बालिका को भगवान बुद्ध की दयानीया बाणी ने ओर उन पीडितॊ की हालात ने अन्दर तक झक्झोर दिया, वह अपने स्थान से उठी ओर बुद्ध के सामने जा कर प्रणाम किया,ओर बोली हे देव आप मुझे आशीर्वाद देवे ताकि मै लोगॊ के इस दुख कॊ बांट सकूं.इस नन्ही सी लडकी को देख कर सभी लोग बहुत हेरान हुये.
बुद्ध देव भी इस नन्ही सी बच्ची को देख कर बोले बेटी जब इस सभा मै इतने बडे बडे लोग बेठे है वो कुछ नही कर सकते तो तुम , तुम तो अभि बहुत छोटी हो ओर तुम्हारे पास तो अभी कुछ भी नही है, तुम क्या कर पाओगी, ओर ... बुद्ध कुछ ओर बोलते उस से पहले ही बच्ची बोल पडी, बाबा आप मुझे बस अपना आशिर्वाद ही देदे, मै अभी से घर घर भीख मांग कर मुट्ठी , आधा मुट्ठी जितना भी मुझे सारे दिन मे अनाज मिला उस अनाज से सारे नही दो चार लोगो का तो पेट भर ही दुंगी, अगर मै दो चार लोगो की जान ही बचा लूं, तो भी कुछ तो बच जायेगे, ओर यह कह कर बालिका फ़ुट फ़ुट कर रो पडी.

भगवान बुद्ध एक टक उस बालिका को देख रहे थे, कितना दर्द है इस बालिका के दिल मे इन लोगो के लिये, तभी फ़िर उस बच्ची की आवाज बुद्ध कॊ सुनाई दी, जो सुबकते सुबकते कह रही थी की हे देव अगर यह सभी लोग रोजाना एक एक मुट्ठी अनाज भी दान मे दे तो इन का कुछ नही घटने वाला, लेकिन उस अनाज से इन सब को जीवन दान जरुर मिल जायेगा, कोई भी इस भुख से नही मरेगा, हे देव जेसे बूंद बूंद से सागर भर जाता है वेसे ही सब के दान से इन गरीबो का पेट भी भर जायेगा.

अगर यह लोग दान नही देते तो कोई बात नही मे दुसरे गांव मे जाऊगी, दुसरे शहर मे जाऊंगी, जितना हो सका मे इन आफ़त मै फ़ंसे लोगो की मदद करुंगी, ओर इस नन्ही सी बच्ची की बाते सुन कर वहा बेठे सेठो का दिल उन्हे धिधकार्ने लगा, ओर उन मे सोया इंसान जाग गया, ओर सभी ने अपने अपने खजाने से, गोदाम से सभी दुखियो को दिल खोल के दिया, ओर अकाल समस्या खत्म हो गई, ओर फ़िर उस साल वर्षा भी खूब हुयी , ओर सभी ने उस साल खुब मेहनत कर के खुब आनाज पेदा किया, ओर सेठो के गोदाम फ़िर से भर गये.

05/01/09

चिंतन भगवान का सहारा

आज का चिंतन जब हम बहुत छोटे थे तो पिता जी ने कहानी के रुप मे सुनाया था, ओर मेने अपने बच्चो को भी यही संस्कार, ऎसी कहानियो के रुप मै दिये है... तो लिजिये आप भी पढिये इस चिंतन रुपी कहानी को...
उस ऊपर वाले के सहारे
सर्दियो के दिन थे, इस लिये शाम जल्दी हो जाती थी, यानि जल्दी अंधेरा हो जाता है, एक दिन मोसम बडा खराब था, ओर आसमान मै दोपहर से ही बादल छाये हुये थे, लगता था अन्धेरी ओर तुफ़ान बहुत घिर से आयेगे, सभी पशु पक्षी अपने अपने सुरक्षित स्थानो पर पहुच गये थे, एक कोयल अपना घर भुल गई, क्योकि एक तो काफ़ी अंधेर हो गया था, दुसरा वो बेचारी घवरा गई थी.

सामाने ही उसे एक नीम का बडा सा पेड दिखाई दिया, कोयल ने सोचा चलो आज रात यही गुजार लुगी, ओर जेसे ही वह उस नीम के पेड पर बेठी, वहा बेठे कोव्वो ने कांव कांव कर के उसे भगाना चाहा, कोयल नै कहा भाईयो मै आज अपना घर भुल गई हुं, बस आज की इस तुफ़ानी रात मै मुझे किसी एक कोने मै पडी रहने दो, कल सुबह ही मै यहा से चली जाऊगीं,लेकिन कोंवे कहा मानाने वाले थे, ओर वह सब उस कोयल को खुब गालिया निकालने लगे , तो कोयल ने कहा भाईयो मै तो तुम्हारी बहिन जेसी हूं, कृप्या मेरे ऊपर दया करे अब तो आंधी भी शुरु हो गई है, मै गरीब कहा जाऊगी, आज की रात बस आज की रात मुझे यहां रहने दो....

लेकिन कोवें तो स्वभाव से ही लडाके होते है, वो कोयल तो क्या अपिस मै भी बहुत लडते है, ओर खुब शोर भी तो मचाते है, अब सारे कोवे कोयल को मारने की सोचने लगे, तो कोयल ने, वहा से जाने की सोची, तो कोवे बोले अरे कोयल तुम तो भगवान को बहुत मानती हो फ़िर उसी भगवान के सहारे किसी दुसरे पेड पर चली क्यो नही जाती, जा दफ़ा हो यहां से वरना हम तेरे पर नोचं डालेगे.

कोयल वहा से उड कर सामने एक आम के पॆड पर बेठ गई, तभी उसे एक कोटर( ऎक डाल डुडने से बना एक छेद) सी दिखाई दी, ओर कोयल डरते डरते उस मै चली गई, वहा पहले से ही कबुतर, गोरेया,तोता ओर कई अन्य पक्षी बेठे थे, उन सब ने मिल कर कोयल को भी जगह देदी.

फ़िर तो खुब जोर से बारिस हुयी, खुब मोटे मोटे ओले भी पडे, उन ओलो से कई कोवे वेचारे मर गये, कई बुरी तरह से घायल भी हो गये, सारी रात बरसात होती रही, दुसरे दिन जब सुर्य देवता निकले तो मोसम भी साफ़ हो गया, ओर बादल भी छटक गये, तो उस कोटर से सारे पक्षी एक दुसरे को राम राम कर के आसमान मै उड चले... अब कोय़ल को देख कर कई घायल कोवे जमीन पर गिरे पहचान कर बोले अरे कोय़ल बहिन तुम केसे बच गई... कोयल बोली उस ऊपर वाले के सहारे से

29/12/08

'काँच की बरनी और दो कप चाय'

यह चिंतन रुपी लेख मुझे अभिषेक ऒझा जी ने, e mail से भेजा है, आज कल लगता है वो बहुत व्यस्त है काम मे, इस लेख के साथ ही उन्होने आप सब को नमस्ते भी कहा है, तो लिजिये यह सुंदर लेख एक अच्छे चिंतन के रुप मै...

जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी-जल्दी करने की इच्छा होती है,सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है , और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं, उस समय ये बोध कथा, 'काँच की बरनी और दो कप चाय' हमें याद आती है ।



दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं...उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी़ बरनी (जार) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची... उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ... आवाज आई...फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे-छोटे कंकर उसमें भरने शुरु कियेh धीरे-धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी , समा गये,



फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्या अब बरनी भर गई है, छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ...कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले-हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया, वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई, अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे... फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ.. अब तो पूरी भर गई है.. सभी ने एक स्वर में कहा..सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली, चाय भी रेत के बीच स्थित थोडी़ सी जगह में सोख ली गई...प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया – इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो.... टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान, परिवार, बच्चे, मित्र, स्वास्थ्य और शौक हैं,छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी, कार, बडा़ मकान आदि हैं, और रेत का मतलब और भी छोटी-छोटी बेकार सी बातें, मनमुटाव, झगडे़ है.. अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती, या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते, रेत जरूर आ सकती थी...ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है...यदि तुम छोटी-छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा... मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है । अपने बच्चों के साथ खेलो, बगीचे में पानी डालो , सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ, घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको, मेडिकल चेक- अप करवाओ...टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो, वही महत्वपूर्ण है... पहले तय करो कि क्या जरूरी है... बाकी सब तो रेत है..छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे.. अचानक एक ने पूछा, सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि 'चाय के दो कप' क्या हैं ? प्रोफ़ेसर मुस्कुराये, बोले.. मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया... इसका उत्तर यह है कि, जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे, लेकिन अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये ।

22/12/08

चिंतन पहले तोल फ़िर बोल

आज का विचार, हम सब कई बार गुस्से मै, लडाई मै, किसी के लेख पर, या किसी ओर बात पर दुसरो को बहुत गलत बोल देते है, बिन सोचे बिन समझे कि जो गलती दुसरे ने की, वोही गलती मै भी कर रहा हूं, उस के शव्दो से मुझे कितना कष्ट पहुचा तो क्या मेरे शव्दो से उसे नही कष्ट पहुचेगा, ओर बाद मै हम अपने किये पर पछताते है...
तो लिजिये आज का विचार...
एक आदमी का किसी बात को ले कर अपने घर वालो से झगडा हो गया, ओर उस ने अपने भाईयो को खुब गन्दी गन्दी गालिया दे दी, रात को जब उस का गुस्सा उतरा तो उसे अपनी गलती का आहसास हुआ, ओर वह सुबह सुबह अपने पिता के पास गया ओर बोला की कल घर पर मैने अपने भाईयो को खुब गन्दी गन्दी गालिया दी है अब माफ़ी मांगना चाहाता हूं.

पिता ने कहा बेटा ऎसा करो अन्दर जा कर थोडा सा नमक ले आओ, वह आदमी अन्दर गया ओर घर से थोडा सा नमक ले आया, फ़िर पिता ने कहा अब इस नमक को घर की छत से चारो ओर बिखेर दो पिसा हुया नमक लडके ने छत से चारो ओर नीचे फ़ेक दिया ? पिता बोले जायो अब सारा नमक ले आओ, लडका जब गया नमक लेने तो वह सब तो मिट्टी मै मिल चुका था.

तो पिता ने समझाया कि जिस परकार अब नमक को इकट्टा करना नामुमकिन हे उसी परकार मुह से निकले शव्दॊ को वापिस लेना मुस्किल है, इस लिये जब भी किसी को बोलो सोच समझ कर बोलो

24/11/08

चिंतन, दान देने का फ़ल

आज का चिंतन,हमे हमेशा जरुरत मांगने वालॊ की मदद करनी चाहिये , धन से ,ताकत से, ओर बुद्धि से, जेसे भी हो, क्योकि मदद करना भी एक तरह से भगवान की पुजा ही है, लेकिन जो मदद फ़ल की इच्छा रख कर करी जाये, या अहंकार मै भरकर की जाये वो बेकार है, इसी बात से मुझे एक कहानी जो मेने बचपन मे सुनी थी याद आ गई, जो चिंतन के रुप मे आप के आगे रख रहा हुं, आशा करता हुं आप सब को पंसद आयेगा.

किसी नगर मै एक भिखारी रोज सुबह भीख मांगने जाता था,अब अंधविश्च्वाश के कारण वह घर से निकलने समय अपनी ही झोली मै दो मुठी चावल डाल लेता था, शायद उसे लगता था की खाली झोली से भीख कम मिलती है. आज भी ओर दिनो की तरह से भिखारी घर से निकला ओर अपनी झोली मे दो मुठ्ठी चावल डाल कर चल पडा,
आज त्योहार का दिन था, भिखारी ने सोचा की आज तो खुब भीख मिलेगी,ओर अपने ही ख्यालो मै खोया जा रहा था कि, तभी उसे सामने से एक सज्जन आते दिखाई दिये, पहरावे से कोई बहुत बडा सेठ लगता था, लेकिन यह कया जब वह आदमी भिखारी के पास आया तो अपनी झोली फ़ेला कर भिखारी से ही भीख मांगने लगा, भिखारी ने अनमने मन से उसे कुछ दाने चावल के भीख मै दे दिये,

आज भिखारी को उम्मीद से भी ज्यादा भीख मिली, लेकिन उस का मन सारा दिन उन कुछ चावल के दानो मै उलझा रहा, जो उस ने पहली बार किसी को भीख मै दिये थे. घर आ कर जब भिखारी ने अपनी झोली खाली की तो हेरान रह गया कि जितने दाने उस ने भीख मे दिये थे, उस की झोली मै उतने ही दाने सोने के बन गये थे, अब भिखारी पश्चता रहा था कि उस ने ज्यादा दाने क्यो नही उस आदमी को दिये.
इस कहानी से यही शिक्षा मिलती है की हमे जरुरत मंद को दान के रुप मे मदद जरुर करनी चाहिये, दान से हमारा धन कम नही होता, लेकिन दान उचित ओर सही लोगो को ही देना चाहिये

03/11/08

चिंतन जगत जननी मां

आज का विचार मां पर, जो हम सब के जीवन को जेसा चाहे बनाये, क्योकि बाप तो सुबह का निकला शाम को ही घर आता है, मां बच्चे के साथ रहने के अलावा दिल ओर आत्मा से भी जुडी है, यही मां बच्चे को डाकू बना सकती है, एक निर्दयी बना सकती है ओर यही मां एक बच्चे को देश का राजा बना सकती है, तो चलिये आज के विचारो का मंथन करते है....

एक किसी नगर मै कोई सेठ गरीबो को कपडे बाट रहा था, ओर वहा पर बहुत लोग कपडे लेने के लिये एक दुसरे को पीछे धकेल कर पहले खुद कपडे लेना चाहते थे, सेठ के नोकरो ने कई बार उन्हे लाईन मै लगवाया, ओर कहा की सब को कपडे जरुर मिलेगे,

तभी उस सेठ की नजर एक १०, १२ साल की लडकी पर गई, जो इस भीड से थोडी दुर खडी सर्दी से ठिठुरती हुयी इस सारे तमाशे को देख रही थी, थोडी देर बाद सेठ ने देखा कि वह लडकी वही खडी है, ओर जब सब को कपडे दे दिये तो सब लोग धन्यवाद कर के अपने अपने घर की ओर जाने लगे , तो सेठ से उस बच्ची को प्यार से अपने पास बुलाया, ओर पुछा बेटे तुम्हे सर्दी लग रही है यह लो कम्बल, तुम इतनी देर से खडी हो पहले क्यो नही आई।

उस १०, १२ साल की बच्ची ने सर्दी से ठिठुरते हुये भी कम्बल लेने से मना कर दिया, तो सेठ ने पुछा बेटा तुम्हे मेरा यह कम्बल पंसद नही आया तो दुसरा लेलो, तो लडकी ने कहा नही सेठ जी ऎसी बात नही लेकिन मेरी मां ने मुझे भीख लेना ओर हाथ फ़ेलाना नही सिखाया, मां कहती है जो चीज हम मेहनत करके कमाये उसी पर हमारा हक है, मै ऎसे ही ठीक हु।

इतनी छोटी सी लडकी के मुहं से यह बात सुन कर सेठ बहुत हेरान हुया, ओर बोला बेटा मै तुम्हारी मां से मिलना चाहता हूं, तो वह बच्ची उस सेठ को अपने झोपडे पर ले गई, सेठ ने देखा झोपडे के सामने एक गरीब ओरत अपने घर के काम कर रही है, लेकिन उस के चेहरे पर एक अलग सी चमक है, तो सेठ ने सारी बात उस महिला से कही, तो वह महिला वोली सेठ जी आप ने बिलकुल सही सुना मेने अपनी बच्ची को यही शिक्षा, यही संस्कार दिये है, क्योकि मेरा मनाना है आदमी को अपने चरित्र ओर संस्कार का धनी होना चाहिये, बाकी यह संसारिक माया तो आनी जानी है, लेकिन संस्कार ओर चरित्र बचपन मै ही जेसे वो दिये बच्चे मै, वही पनपते है, फ़िर उन्हे नही बदला जा सकता।

सेठ ने कहा बहिन आप सच मै महान है, इतने दुखो मे भी तुम ने अपने संस्कार बच्ची मै डाले धन्य है आप, आप जेसी मां ही देश को बडे बडे महात्मा, ओर बडे बडे महान लोग देती है बहिन तुम्हे मेरा प्राणाम।
हम भी बना सकते है अपने बच्चो को इस तरह से चरित्रवान ओर संस्कारी, लेकिन पहले हमे बनाना पडेगा ????

27/10/08

चिंतन मन मन्दिर

चिंतन मन मन्दिर
हम सभी हर धर्म को मानने वाले, हिन्दु, मुस्लिम, सिख, इसाई ओर अन्य धर्म, हम सब के अपने अपने इष्ट देव है, अपने अपने ढग से उस ऊपर वाले को मानते है, उसे चारो ओर ढुढते है, लेकिन हमे कभी नही मिलता, हम साधु संतो, सुफ़ी मोला ओर फ़कीरो के दर पर भटकते है लेकिन .... ओर युही भटकते भटकते मर जाते है,ओर आज तक वह किसी को नही मिला, किसी ने उसे महसुसु नही किया,अगर आप मिलना चाहते ....... तो चलिये आज का चिंतन इस विषय पर ही एक कहानी के रुप मै.
बहुत समय पहले किसी गाव मे एक परिवार रहता था,पति पत्नि ओर उन का जवान बेटा साथ मे बेटे की बहू , बहु का नाम था सुखी, ओर सुखी को भगवान से आटुट प्यार था, सुखी उठते बेठते हर समय भगवान का नाम जपती ओर घर के काम ढंग से ना कर पाती, सास नास्तिक तो ना थी लेकिन वह मंदिर ओर हर समय भजन करना भी उचित ना समझती, इस कारण वह कई बार सुखी को डांट देती,सुखी अपने घर मे बहुत ही सुखी थी इस बात के सिवा उसे कोई अन्य दुख ना था, हां उस के मन मे एक इच्छा जरुर थी की वह ऊपर पहाडी पे बने मंदिर मै भगवान के दर्शन कर के अपना जीवन सफ़ल बना ले ओर यह उस की पहली ओर आखरी इच्छा थी.
लेकिन अपनी इस सासु से जो इन सब को ऊचित नही मानती थी उस से इजाजत केसे लै, उस से इजाजत मागने का सवाल ही नही पेदा होता था,एक बार सुखी के पति व्यापार करने दुसरे देश गये, अब सुखी समय बीताने के लिये घर का काम भी करे साथ मे भजन भी मन ही मन करे.
एक दिन सुखी उस मंदिर मै जाने के लिये भगवान से प्राथना के रुप मे भजन मे इतनी मगन हो गई की घर का कोई काम सही नही किया, सास ने जब देखा तो उसे बहुत गुस्सा आया, ओर सास ने उसे एक पेड से बांध दिया ओर कहा जा अपने भगवान से कह तुझे खोल दे, सुखी थी तो पक्की भगत सो वह मन ही मन भ्गवान को याद करने लगी, कहते है भगवान भी अपने भगतो को दुखी देख कर दुखी हो जाते है,
भगवान को अब दया आई तो वह सुखी के पति का रुप धारण करके सुखी के सामने आये, हाल चाल पुछा ओर पुछा मां ने तुम्हे यह सजा क्यो दी, तो सुखी ने सारी बात बताई की मै मंदिर मे भगवान के दर्शन करना चाहती हुं, ओर वह भुल गई की पति कई दिनो बाद आये है इन की सेवा पहले करु, तो भगवान के भेस मे पति ने कहा तुम जाओ मंदिर मै ओर अपने भगवान के दर्शन कर आओ, सुखी बोली लेकिन मां को पता चल गया तो, तो भगवान रुपी पति बोले डरो मत मै तुम्हारा रुप्धारण करके तुम्हारी जगह खडा हो जाऊगा.
अब सुखी आजाद थी, ओर चली गई पहाडी वाले मंदिर की ओर, घर मे सास सुखी को जली कटी सुना रही है, ओर भगवान चुपचाप सुन रहै है ओर मन ही मन मुस्कुरा रहै है, उधर सुखी मंदिर मै पहुची पत्थर की बडी सी मुर्ति के सामने माथा टेका लेकिन उसे कही भी भगवान का एहसास नही हुआ काफ़ी देर बेठी लेकिन उसे तो सामने एक पत्थर ही नजर आया कही भी भगवान या उस के होने का एहसास नही हुआ, ओर बुझे मन से घर की ओर चल पडी, अब गाव वालो ने जब सुखी की सास को बताया की उन्होने सुखी को मंदिर मे देखा है, तो सास झट से घर आई , अरे सुखी तो यहा बंधी है मंदिर मै कैसे हो सकती है, अब गाव बालो को भी कुछ समझ ना आया, उन्होने वहां भी सुखी को देखा ओर यहा भी सुखी ???
दो दो सुखी केसे हो सकती है, तभी सुखी वहा पहुचती है, अब सब फ़िर से दो दो सुखी सामाने देख कर हेरान थे, ओर सुखी जब भगवान बने पति के सामने पहुची तो पति बोले देख लिया अपने भगवान को, सुखी बोली नही वहां तो बस एक पत्थर की मुर्ति है, मुझे वहां भगवान नही मिले ओर साथ ही वह भगवान को पहचान गई ओर फ़िर भगाव्न से बोली मै कितनी पागल हू आप को कहा कहा खोज रही हु, आप तो हर प्राणी के मन मै बसे है, लेकिन प्राणी मन मै नही झांकता.तभी तो कहते है मन मंदिर
सुखी के साथ साथ उस की सास ने ओर गाव बालो ने भी भगवान के दर्शन कर लिये.
**ऎसी कथा सिर्फ़ अच्छी सीख देने के लिये होती है, ओर कलप्निक होती है, लेकिन लेने वाले तो एक सेब के गिरने से भी सबक ले लेते है.

20/10/08

चिंतन मृग तत्रिष्णा

चिंतन मृग तत्रिष्णा
आज के विचारो का मंथन यानि एक चिंतन, भारत क्या आज पुरी दुनिया मै लोग अन्दर से दुखी है, वह चाहै कोई करोड पति है,या फ़िर कलर्क, ओर जो सुखी है वह अपने मै मस्त है, है ऎसे भी लोग, लेकिन बहुत कम, मानव दुखी है केसे पता चलता है, अरे मंदिरो मे गिरजाघरो मे , मस्जिद मे लोग क्या मागंते है....? भारत मे यह बाबा लोग जो कल तक जेब कतरे थे अपनी दुकान इन्ही दुखी लोगो के कारण तो चमक रहै है,ओर हम जाते है, भटकते हैयहां वहां, लेकिन सुख चेन, मन की शांति हम से उतनी ही दुर भागती है
अगर हम अपने मन की गहराई मे जा कर , इस बात का मनन करे, अपने आप से पुछे कि हे ! मानव तुझे किस वस्तु की तालाश है ? तो हम सब के दिल से एक ही जबाब आयेगा कि सुख ओर शांति की तलाश है! ओर फ़िर हम सोचते है, मै ज्यादा से ज्यादा धन कमा लू तो सुखी होजाऊगां फ़िर मुझे मेरे धन के कारण बहुत यश मिलेगा तो मे ओर भी सुखी हो जाऊगा !लेकिन... इतना कुछ जो अब हमारे पास है कमा कर भी सुख ओर शांति कोसो दुर है, तो सोचता है कही मेरी मेहनत मै कमी रह गई, थोडा ओर कमा लू फ़िर तो सुख ओर शांति मेरे कदमो मै होगी, ओर इसी धुन मे एक मृग तत्रिष्णा की तरह से धन कमाने मे लगा रहता है,लेकिन उसे सुख शांति मिलनी तो क्या उस से ओर दुर होती जाती है.
क्योकि इन सब मै तो सुख शांति है ही नही, सांसारिक मोह माया तो केवल एक तरह का धोखा है, अगर हम मन से सुखी है, तो हमे रेगिस्तान भी गुलिस्थान लगेगा,ओर अगर दुखी है तो गुलिस्थान भी कब्रिस्थान लगेगा, सुखी को चिलचिलाती धुप भी अच्छी लगेगी, दुखी को बसंत भी पतझड सा लगेगा,
क्योकि जेसा हम भीतर से महसुस करते है इस दुनिया को वेसा ही देखते भी है, यहां एक बात तो सिद्ध हो गई की सुख ओर शांति हमारे अंदर से आता है, यानि हमारे अंदर ही है,इस संसार से नही, जेसे हम सो कर उठते है,तो अपने आप को ताजा महसुस करते है, एक नयी स्फ़ुर्ति होती है हमारे अन्दर धन कमाने की,यश मान कमाने की, ओर यह यात्रा ऊर्जा जो कमाने की है यह है बहियात्रा ओर नींद ऊर्जा जो है यह है अंतयात्रा, बाहर जितना बडा ब्रह्रामंड है, उतना बडा ब्रह्रामांड हमारे अंदर भी है, ओर हम बीच मै खडे है,बाहर की तरफ़ यात्रा करेगे तो बस हम चलते ही जायेगे बस यात्रा ओर यात्रा कभी भी मंजिल पर नही पहुच पायेगे, क्योकि हमारा रास्ता बाहर कि तरफ़ नही अन्दर की तरफ़ है, बाहर वाला रास्ता तो गलत है,फ़िर हम सोचते है कि हम सुख की तलाश मे भटक रहै है, यह भी गलत है, हमे सुख नही आनंद की तलाश मे भटकना चाहिये क्योकि हमारा पंचभूतो से बना शरीर इंद्रियो से जुडा है इसलिये हम उसे ही सुख समझते है, यह शरीर तो मात्र एक वस्त्र की तरह है, लेकिन जेसे ही हमारी भीतर की यात्रा शुरु होती है वैसे वैसे बाहर की परते छुटती जाती है ओर हम अपने स्वरुप को पहचानने लगते है.ओर फ़िर हमारी मंजिल हमे मिल जाती है.

13/10/08

चिंतन दुख

चिंतन दुख
आज का चिंतन कुछ अलग सा है, अगर आप को कोई गाली देदै तो आप क्या करे गै??बहुत से भाई तो वापिस गालिया देदेगे, कुछ हाथो से काम लेगे, आप भी यही करेगे जो दुसरे करते है, या आप उसे वेव्कुफ़ या पागल समझ कर बडबडाते निकल जाये गे, ठीक ना, सोचो गे क्या बद दिमाग के मुंह लगना, यही ना, तो लिजिये आज का चिंतन .
गोतम बुद्ध किसी बाग मे आराम कर रहै थै,ओर एकांत देख कर थोडा चिंतन कर रहै थै, वह बाग आमो का था, ओर सभी पेडो पर कच्चे ओर पक्के आम लगे थै, तभी कही से बच्चो का एक झुंड कही से आया, महात्मा उन बच्चो को मुस्कुरा कर देखते रहै, ओर बच्चे जमीन से पत्थर मार मार कर आम तोडने की कोशिश कर रहै थे,तभी त्क पत्थर गोतम बुद्ध जी के माथे पर लगा, ओर खुन बहने लगा,यह सब देख कर बच्चे बहुत डर गये, कुछ बच्चे रोने लगे तो कुछ बच्चो ने महात्मा जी के पाव पकड कर क्षमा मांगी, कि हमारी गलती से आप को चोट आई ओर आप को हम सब ने रुला दिया, बाबा आप हमे माफ़ कर दे.
इस पर बुद्ध ने सभी बच्चो को गले लगा लिया, ओर बोले मै तो दुखी इस बात से हुं कि जब तुम ने पेड को पत्थर मारा तो पेड ने तुम्हे आम दिये, ओर जब मुझे तुम्हारा पत्थर लगा तो मै तुम्हे सिर्फ़ डर ही दे सका, इसी लिये मेरे आंसु निकले बच्चो.
आप का धन्यवाद इस चिंतन को पढने के लिये

06/10/08

चिंतन असली ओर नकली सम्पति

चिंतन आज का विचार
हम अपनी कोठी, बगंले पर अपनी कार पर ,पेसे पर कितना अभिमान करते हे, लेकिन यह सब क्या झुठे हे?
तो पढिये आज का विचार
एक साधु बाबा थे, उनका नाम था कणाद,जब किसान अपनी फ़सल काट लेते तो वो उस जमीन से बाकी बचे कण चुन लेते ओर उसी से अपना गुजर बसर करते, अब साधु बाबा पहुचे हुये थे,उन का नाम भी बहुत था, लेकिन अकड या घंमण्ड बिलकुअल नही था, एक बार राजा को यह बात पता चली तो राजा ने बहुत सा धन साधु बाबा को भेजा, बाबा ने कहा मेरे पास बहुत हे इन्हे जरुरत मन्दो को बाटं दो,राजा ने फ़िर से दो गुना ज्यादा धन भेजा तो बाबा ने कहा मेरे पास बहुत धन हे इसे जरुरत मन्दॊ मे बांट दो, तीसरी बार राजा आप आये ओर साधु को देखा तन पर कपडे भी फ़टे हे लेकिन बाबा ने इस बार भी कहा नही जरुरत ,आप इसे जरुरत मंदो मे बांट दो,
अब राजा ने प्रणाम किया साधु बाबा को ओर वपिस महल मे आ गया ओर रानी से बात की, दुसरे दिन राजा साधु बाबा के पास गया ओर बोला आप सच मे राजा हे मे तो नकली राजा हू, लेकिन आप आत्मा से राजा है.
ऎसे विचारो से हम यह नही कहते की आप अपना सब कुछ बेच कर ओर सब कुछ दान करके इन साधु बाबा जेसे बन जाओ, लेकिन हमे लालच मे आ कर गलत ढंग से पेसा अर्जित नही करना चाहिये , सिर्फ़ अपने लिये ही नही सोचना चाहिये, कुछ अन्य लोगो के बारे भी हमे ध्यान करना चाहिये, हमारे ग्रांथो मे लिखा हे कि गलत ढंग से कमाया पेसा कभी भी तीन पीढीयो से आगे नही जाता, ओर जिस घर मे गलत ढग से पेसा आता हे, वह अपने साथ बहुत सी बुराईयां भी साथ लाता हे, ओर जाते समय तबाही भी लाता हे , जेसे बाढ का पानी जब आता हे तो पानी ही पानी होता हे ओर दुख साथ मे लाता हे ओर जब जाता हे तो ....