03/03/09

चिंतन अंहकार

आज का विचार, कहते है इंसान गलतियो का पुतला है, लेकिन अगर हमे अपनी गलतियां पता लगे, अपनी बुराईया पता लगे तो उन्हे दुर करना हमारा सब का फ़र्ज है, ओर हम यह करते भी है, कई बार हम सोचते है कि हमारे मै अंहकार नही रहा, ओर हम सब से बहुत प्यार से बोलते है, सब के काम भी आते है, लेकिन अनजाने मै ही हम अपने अंदर इस अंहकार को पाल लेते है. तो आज इस छोटी सी कहानी से ही हमे अपनी इस भुल का एहसास हो सकता है....

एक बार नारद मुनि जी ने भगवान विष्णु जी से पुछा, हे भगवन आप का इस समय सब से प्रिया भगत कोन है?, अब विष्णु तो भगवान है, सो झट से समझ गये अपने भगत नराद मुनि की बात, ओर मुस्कुरा कर वोले ! मेरा सब से प्रिया भगत उस गांव का एक मामुली किसान है, यह सुन कर नारद मुनि जी थोडा निराश हुये, ओर फ़िर से एक प्रशन किया, हे भगवान आप का बडा भगत तो मै हुं, तो फ़िर सब से प्रिया क्यो नही??
भगवान विष्णु जी ने नारद मुनि जी से कहा, इस का जबाब तो तुम खुद ही दो गे, जाओ एक दिन उस के घर रहो ओर फ़िर सारी बात मुझे बताना,नारद मुनि जी सुबह सवेरे मुंह अंधेर उस किसान के घर पहुच गये, देखा अभी अभी किसान जागा है, ओर उस ने अब से पहले अपने जानवरो को चारा बगेरा दिया, फ़िर मुंह हाथ थोऎ, देनिक कार्यो से निवर्त हुया, जल्दी जल्दी भगवान का नाम लिया, रुखी सूखी रोटी खा कर जल्दी जल्दी अपने खेतो पर चला गया, सारा दिन खेतो मे काम किया.
ओर शाम को वापिस घर आया जानवरो को अपनी अपनी जगह बांधा, उन्हे चारा पानी डाला, हाथ पांओ धोये, कुल्ला किया, फ़िर थोडी देर भगवान का नाम लिया, फ़िर परिवर के संग बेठ कर खाना खाया, ओर कुछ बाते की ओर फ़िर सो गया.
अब सारा दिन यह सब देख कर नारद मुनि जी, भगवान विष्णु के पास वापिस आये, ओर बोले भगवन मै आज सारा दिन उस किसान के संग रहा, लेकिन वो तो ढंग से आप का नाम भी नही ले सकता, उस ने थोडी देर सुबह थोडी देर शाम को ओर वो भी जल्दी जल्दी आप का ध्यान किया, ओर मे तो चोबीस घंटे सिर्फ़ आप का ही नाम जपता हुं, क्या अब भी आप का सब से प्रिय भगत वो गरीब किसान ही है, भगवान विष्णु जी ने नारद की बात सुन कर कहा, अब इस का जबाब भी तुम मुझे खुद ही देना.

ओर भगवान विष्णु जी ने एक कलश अमृत से भरा नारद मुनि को थमाया, ओर बोले इस कलश को ले कर तुम तीनो लोको की परिकिरमा कर के आओ, लेकिन ध्यान रहे अगर एक बुंद भी अमृत नीचे गिरा तो तुम्हारी सारी भगती ओर पुन्य नष्ट हो जाये गे, नारद मुनि तीनो लोको की परिक्र्मा कर के जब भगवान विष्णु के पास वापिस आये तो , खुश हो कर बोले भगवान मेने एक बुंद भी अमृत नीचे नही गिरने दिया, विष्णु भगवान ने पुछा ओर इस दोराना तुम ने मेरा नाम कितनी बार लिया?मेरा स्मरण कितनी बार किया ? तो नारद बोले अरे भगवान जी मेरा तो सारा ध्यान इस अमृत पर था, फ़िर आप का ध्यान केसे करता.
भगवान विष्णु ने कहा, हे नारद देखो उस किसान को वो अपना कर्म करते हुये भी नियमत रुप से मेरा स्मरण करता है, क्यो कि जो अपना कर्म करते हुये भी मेरा जाप करे वो ही मेरा सब से प्रिया भगत हुआ, तुम तो सार दिन खाली बेठे ही जप करते हो, ओर जब तुम्हे कर्म दिया तो मेरे लिये तुम्हारे पास समय ही नही था, तो नारद मुनि सब समझ गये ओर भगवान के चरण पकड कर बोले हे भगवन आप ने मेरा अंहकार तोड दिया, आप धन्य है

40 comments:

अल्पना वर्मा said...

इंसान गलतियो का पुतला है, लेकिन अगर हमे अपनी गलतियां पता लगे, अपनी बुराईया पता लगे तो उन्हे दुर करना हमारा सब का फ़र्ज है'-


-सत्य वचन!

Dr. Amar Jyoti said...

सही कहा है। कर्म ही पूजा है।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आप ने सही कहा।

ताऊ रामपुरिया said...

bahut sahI kahaa aapane.

raamaraam.

mehek said...

bahut sahi sundar baat kahi.

Arvind Mishra said...

अच्छी उदबोध कथा !

Shikha Deepak said...

सुंदर सारगर्भित कथा।

P.N. Subramanian said...

कर्म ही पूजा है. सुन्दर मार्गदर्शन.

seema gupta said...

कई बार हम सोचते है कि हमारे मै अंहकार नही रहा, ओर हम सब से बहुत प्यार से बोलते है, सब के काम भी आते है, लेकिन अनजाने मै ही हम अपने अंदर इस अंहकार को पाल लेते "

अहंकार हमेशा से ही विनाश का कारण बना है.....बहुत ही प्रेरक कहानी

Regards

Abhishek said...

अंहकार की निरर्थकता को व्यक्त करती प्रेरक कहानी.

(gandhivichar.blogspot.com)

neeshoo said...

बहुत ही अच्छा आलेख सर जी ।

आलोक सिंह said...

जोहार
"कई बार हम सोचते है कि हमारे मै अंहकार नही रहा, ओर हम सब से बहुत प्यार से बोलते है, सब के काम भी आते है, लेकिन अनजाने मै ही हम अपने अंदर इस अंहकार को पाल लेते है."
एकदम सत्य बात कही आप ने हम सोचते है की हमरे अन्दर अंहकार नहीं है पर वास्तव में वो सोच ही अंहकार के कारण होती है . बहुत अच्छी कहानी .

सुशील कुमार छौक्कर said...

अच्छी और सच्ची बात कह दी आपने जी।

ज्ञानदत्त । GD Pandey said...

यह सुन्दर बोध कथा याद दिलाने को धन्यवाद भाटिया जी!

Shastri said...

प्रिय भाटिया जी,

आप को ईश्वर ने विशेष कला दी है कि आप अपनी बात लोगों को इस तरह सुना सकें कि वे उसे सुनने में रम जाये.

आज आपकी कहानी पढ रहा था तो मैं एकदम से भावनाओं में खो गया. कहानी का अंत आया तो उसके नैतिक पाठ ने एकदम मन में काम किया. एकदम गहराई तक स्पर्श कर गया.

आज के भोगविलासवादी संस्कृति में आप जैसे लोगों की बहुत जरूरत है जो लोगों के दिल में उतर कर उन से नैतिक-आत्मिक चर्चा कर सके.

लिखते रहें. हम आपके पाठक अधीरता से बैठे हैं कि आपकी स्वर्ण तूलिका से मधु की अगली बूंद टपके जिसका हम पान कर सकें!!

सस्नेह -- शास्त्री

डा० अमर कुमार said...


सत्य तो यही है, भाटिया जी,
पर अचानक मोबाइल बज गया,
शायद डील पक्की हो गई है, चलता हूँ..
भगवान कौन से भागे जा रहे हैं :)

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

सचमुच कर्म से बढकर कुछ भी नहीं......इतनी सुन्दर बोध कथा के लिए आभार

रश्मि प्रभा said...

bahut hi badhiyaa kahani,prernadaya..........

Mired Mirage said...

बहुत सुन्दर कहानी है। बचपन में पिताजी यह और ऐसी ही न जाने कितनी कहानियाँ सुनाते थे। वह समय याद आ गया।
घुघूती बासूती

potpourrii said...

राज जी नमस्कार और धन्यवाद । आपका मेरे ब्लॉग पर आना और प्रेरणा देना अच्छा लगा। मैं समय के अभाव से ज्यादा कुछ लिख नही पति हूँ। मुझे तो आश्चर्य होता हैं की आप किस तरह समय निकल पातें हैं ? आपके ब्लोग्स मुझे बहुत भाते हैं। मैं कोशिस करूँगीं की ज्यादा से जयादा लिख सकू और वो भी हिन्दी में। आपको होली की शुभ कामनाएं ।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

प्रेरणादायक (कसौटी वाली नहीं) कथा.

मोहन वशिष्‍ठ said...

गलतियां तो हर किसी से होती हैं और लेकिन सही मायनों में इन्‍सान वो होता है जो अपनी गलतियों से सीखे
इसलिए गलतियां ज्‍यादा से ज्‍यादा करो और जिंदगी का आनंद लो

G M Rajesh said...

raaj ji aapne meri post par tippani dekar yahi kiyaa shaayad jo aapne kathaanak me likhaa.

mujh bevkuf ko kisi kaa parichit bataakar kya?
ya holi ki dhoon aapko bhi ......

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र said...

अच्छी उदबोध कथा

Vijay Kumar Sappatti said...

Raj ji

sorry for late arrival , i was on tour.

aaj aapka likha ye lekh padhkar man ko bada sakun mila, is aapa dhapi ki zindagi me , prabhu ka smaran bhi ek bahut badi baat hai ..

main bhi kuch likha hai , jarur padhiyenga pls : www.poemsofvijay.blogspot.com

Mrs. Asha Joglekar said...

बहुत अच्छी कथा सुनाई राज साहाब । सच ही है कि हम इसी बात का अहंकार कर सकते हैं कि हम में बिलकुल अहंकार नही है ।

Harkirat Haqeer said...

भगवान विष्णु जी ने एक कलश अमृत से भरा नारद मुनि को थमाया, ओर बोले इस कलश को ले कर तुम तीनो लोको की परिकिरमा कर के आओ, लेकिन ध्यान रहे अगर एक बुंद भी अमृत नीचे गिरा तो तुम्हारी सारी भगती ओर पुन्य नष्ट हो जाये गे, नारद मुनि तीनो लोको की परिक्र्मा कर के जब भगवान विष्णु के पास वापिस आये तो , खुश हो कर बोले भगवान मेने एक बुंद भी अमृत नीचे नही गिरने दिया, विष्णु भगवान ने पुछा ओर इस दोराना तुम ने मेरा नाम कितनी बार लिया?मेरा स्मरण कितनी बार किया ? तो नारद बोले अरे भगवान जी मेरा तो सारा ध्यान इस अमृत पर था, फ़िर आप का ध्यान केसे करता.
भगवान विष्णु ने कहा, हे नारद देखो उस किसान को वो अपना कर्म करते हुये भी नियमत रुप से मेरा स्मरण करता है, क्यो कि जो अपना कर्म करते हुये भी मेरा जाप करे वो ही मेरा सब से प्रिया भगत हुआ...

Raj ji isi tarah sikcha prad khaniyon se hmara marg darshn karte rahen.....!!

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर ... होली की ढेरो शुभकामनाएं।

Archana said...

राज जी ,मैने भी अपनी दादी से ये कहानी सुनी थी। कभी -कभी हम अपने स्वार्थ के लिये झुठी दिलासा देकर अपने मन को बहला लेते है। जैसे-- आज काम करने मे देर हो गई तो पुजा/प्रार्थना नही हो पाई,भला १२ बजे के बाद भी कोई पुजा का टाईम होता है,या आज नहाना नही हुआ तो पुजा नही की। दरअसल ऐसा सोचकर हम अपनी गलतियों से बचना चाहते हैं। अगर ईश्वर हर कही,हर जगह हर किसी मे है तो उसे हर समय याद किया जा सकता है।

HEY PRABHU YEH TERA PATH said...

आपको एवम आपके सपरिवार को हे प्रभु के पुरे परिवार, कि तरफ से भारतीय सस्कृति मे रचा- बसा, "होली" पर्व पर घणी ने घणी शुभकामनाऐ :)(: )(::
(आज क्षमा करे विषय पर टिपणी न देने के लिये)
[मजाक भरे होलियाना त्योहार पर कुछ मस्ती आपके साथ]



जय हो कि ताल पे ये बार होली है, गुलाल है, जिसको देखो वो ईच लाल है,जो नही है, वो अपनी लाल करने मे लगा बेहाल
है। पएला होली पे दुसरे कू लाल करते थे लोक। पन अबी ये बार खुद कि ईच लाल कर रएले है लोक।

टेशन नही लेणेका बाबा, टेशण देणे का। अभी अपुण आपको होलि का झकास मुबारकबाद दे रहेला है, चुप चाप लेणेका और वटक जाने का ॥ क्या ? बोले तो होली मुबारक॥॥। मेरे यार॥॥

sandhyagupta said...

होली की हार्दिक शुभकामनाएँ .

ताऊ रामपुरिया said...

शादी की और होली की आपको डबल बधाई और घणी शुभकामनाएं.

रामराम.

आदर्श राठौर said...

होली की शुभकामनाएं....
आपका लेखन हमेशा से पसंद आता है।

आदर्श राठौर said...

होली की शुभकामनाएं....
आपका लेखन हमेशा से पसंद आता है।

योगेन्द्र मौदगिल said...

होली की अनंत असीम व रंगीन शुभकामनाएं....

G M Rajesh said...

webduniya मुख पृष्ठ>>फोटो गैलरी>>धर्म संसार>>त्योहार>> होली के रंग भगोरिया के संग ! (Holi - Bhagoriya Festival Photogallery)
log on kare aur
bhagoriyaa ke drushyo se avgat ho le

समीर सृज़न said...

इस तरह के आलेख ब्लॉग पर ढूँढने से कम ही मिलते है..वाकई आपने बिलकुल सही फ़रमाया जब तक हम अपने आप को नहीं समझ सकते तब तक दूसरे को समझना मुश्किल है..
ज्ञानवर्धन के लिए शुक्रिया...

shelley said...

katha achchi hai. main to sochti hu aap kitna achchha karte hain aisi bodh kathan de kar. isi bahane humlog padh lete hain.

मा पलायनम ! said...

बहुत सुन्दर पोस्ट | दरअसल अंहकार विनाश का कारण बनता है यह बात कई लोंगों को पता है लेकिन समय पर वे भी अंहकार
के अधीन हो जातें हैं .आपकी पोस्ट में तमाम प्रेरक बातें हैं जो की वाकई सही जीवन जीने के प्रति सजग करती रहतीं हैं |

अनुपम अग्रवाल said...

सुन्दर बात और सीख .

बहुत अच्छी बातेँ आप बहुत अच्छी तरह से सिखा रहे हैँ .

बधाई