03/06/09

जड ओर उस की महत्वता

आज जब भी भारत मै आता हुं, तो अपने उस भारत को वेसा नही पाता जेसा हम लोगो के विचारो मै होना चाहिये, एक पबित्र सा, मासुम सा, बहुत सुंदर, भोलेभाले लोग, जिन्हे दुनिया नमन करे,
ओर वेसा भी नही पाता कि आधुनिक हो, लोग आजाद हो, अपनी भाषा मे खुल कर बात करे,अपने पहरावे को अधिक प्यार करे, अपने त्योहारो को वेसे ही मनाये जेसे पहले मनाते थे, हर किसी के दुख सुख मै भाग ले, यह सब भी नही !!
तो फ़िर हम किस ओर जा रहे है हम मै से बहुत कम लोगो ने सोचा है, बच्चो को हम लोगो ने इतनी आजादी दे दी कि बडे होने पर सब से पहले वो अपने मां बाप को ही ठिकाने लगाते है,इन बच्चो को कुछ पता ही नही किस से केसे बात करनी है, नारी आजादी के नाम पर भी कुछ खास नही क्योकि हम ना तो अपनी संस्कृति को ही सहेज पाये, ओर ना ही उस संस्कृति को अपना पाये जिस के पिछे भाग रहे है।
आज का विचार इसी बात पर है, शायद मै अपनी बात कुछ इस रुप से समझा सकूं, तो लिजिये आज का चिंतन.....

आज हम सब आधुनिकता की ओर भाग रहे है, लेकिन आंखे मुंदे हुये, बस दुसरो की देखा देखी... एक तरह से बन्दर दोड ही लगती है, जिस पश्चिम को लोगो ने देखा ही नही समझा ही नही, बस हमे उन की हर बात अच्छी लगती है, उन का पहरावा, उन की भाषा, उन की आजादी, ओर हम मै से कोई भी अपने आप को पिछडा नही कहलाना चाहता, शायद यही कारण है कि हम अपने संस्करो से, अपनी जडो से कटते जा रहे है.
लेकिन अपनी जडो से कट कर, अपनी संस्कारो से अलग हो कर कोई भी आज तक सफ़ल नही हो पाया, बल्कि हम पश्चिम कि नकल भी करते है तो आधी अधुरी, हमे पता ही नही आजादी का मतलब असल मै है कया, क्या सडको पर बेवकुफ़ो की तरह से गन्दगी फ़ेलाने को आजादी कहते है,ऎसा पहरावा जिस मै सारा जिस्म नंगा दिखे क्या उसे पहनने को ही आजादी कहते है, सभ्य कहते है?,क्या कोई विदेशी भाषा को गलत मलत बोल लेने को आजादी कहते है? क्या अपने बुजुर्गो को उन की ही नजरो से उन्हे गिरा कर जीने की अदा को आजादी कहते है?
हम अपनी जडो से तो कट ही रहे है, लेकिन दुसरी कोई जड हमे मिली ही नही, तो हम कहा तक आधुनि ओर सभ्य बन पाये गे? जो भी सभ्यत अपनी जडो से कटती है वो हमेशा तबाह ही हुयी है,सभ्यता कया जो भी संसार की वस्तू अपनी जडो से कटी कभी नही फ़ुली फ़ली, उदाहारण के तोर पर ....जापान मै कई ऎसे चीड ओर देवदार के पेड मिलते है जो तीन सॊ चार सॊ साल पुराने है, लेकिन उन की उचाई मात्र आधा मिटर या इस से भी कम होगी? पता चला कि वह लोग इन पेडो की जडो ओर पत्तो को समय समय पर काटते रहते है, ओर जब जडे ही जमीन को नही पकडेगी, गहराई मै नही जायेगी ओर ऊपर भी इन्हे बढने से रोका जा रहा है तो य्ह चाहे हजार साल के हो जाये, उतने के उतने ही रहेगे.
वही हाल अब हमारा भी हो रहा है, हम अपनी जडो से कट रहे है, अपने संस्कारो से कट रहे है, ओर यह संस्कार ही हमारी अपनी गहराई है जिसे पकडे बिना हम कभी सफ़ल नही हो सकते, कभी फ़ल फ़ुल नही सकते, हां गुलाम तो हो सकते है, जेसे यह जापान के चीड ओर देवदार के पेड, हमारा अपना पहरावा, हमारी अपनी भाषा, हमारी अपनी संस्कति ही हमारी जडे है, ओर आजादी को सही समझे यह किस चिडिया का नाम है, अगर हम अपनी आजादी चाहते है तो पहले हमे दुसरो के बारे सोचना पडेगा, हमे कोई हक नही दुसरो की आजादी मे खलल डाले, ओर जब हम दुसरो की आजादी मे खलल नही डाले गे तो हमे हमारी आजादी खुदवाखुद मिल जाये गई.
आओ ओर इन जडो का महत्व समझे.

24 comments:

P.N. Subramanian said...

हम भी परदेश में ही रहते हैं.भले ही भारत में ही हों.(भारत वास्तव में एक बहु राष्ट्रीय संस्कृति है) हमने पाया कि जड़ों से कट जाने से न तो हम उधर के हुए न इधर के. इसलिए आवश्यक है कि हम अपनी जड़ों को सींचते रहें.

मोहन वशिष्‍ठ said...

बिल्‍कुल सच लिखा है आपने भाटिया जी। हालांकि आपने मुझसे कहीं ज्‍यादा बसंत देखे हैं भारत में लेकिन फिर भी जबसे मैंने होश संभाला है उस समय में और आज के समय में जमीन आसमान का अंतर है। पहले जब हम छोटे हुआ करते थे तो गर्मियों में शाम के समय टयूबबैलों पर नहाने जाते थे और वहां की भीड दिल खुश कर देती है लेकिन आज के समय में किसी को पता ही नहीं है कि टयूबबैल भी है यहां पर कोई पहले सर्दियों में अलाव हर नुक्‍कड पर लगी रहती थी बडे बुजुर्ग आस पास बैठे रहते थे और अब ना ही सर्दी रही ना ही वो अलाव रही पहले सावन में झूला झूलते थे सभी बडे बडे पेड होते थे लेकिन अब झूला घर के कमरे में सिमट कर रह गए हैं पेड तो बेचारे जवानी भी नही देख पाते

आपने बहुत ही अच्‍छा लिखा है इसे पढकर महसूस होता है कि हां हम सच में अपनी संस्‍कृति को भूल गए हैं

अन्तर सोहिल said...

"जो भी संसार की वस्तू अपनी जडो से कटी कभी नही फ़ुली फ़ली"
सच है जी
नमस्कार स्वीकार करें

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

भाटिया जी, बिल्कुल सोलह आने खरी बात कही आपने.....लेकिन यहा तो वो हाल है कि "भैस के आगे बीन बजाए और भैस खडी पगुराए"। आप चाहे लाख किसी को समझा लीजिए लेकिन सब चिकने घडे है।

रश्मि प्रभा... said...

भारतीय संस्कृति की अपनी विशेषता है,रही,परन्तु पाश्चात्य संस्कृति ने इसे अजीबोगरीब बना दिया ....
बहुत सही लिखा है आपने

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सही कहा आपने. शुभकामनाएं.

रामराम.

Gagan Sharma, Kuchh Alag sa said...

कभी-कभार पंजाब जाना होता था, तीन-चार सालों में। हर बार पहले के देखे, याद रखे संस्मरणों की धज्जियां उड़ जाती थीं अगली बार जाने पर। शहरीकरण ने चप्पा-चप्पा बदल के रख दिया।

रंजना said...

आपकी चिंता निरापद नहीं...
यह मुझे भी बड़ा कष्ट देती है...
सच पूछिए तो देश से बाहर रह रहे भारतीय भाषा संस्कृति और संस्कारों के प्रति जितने सजग हैं और जिस तरह उसके प्रति श्रद्धा भाव रखते हैं तथा उसे सहेज कर रखते हैं,देश में रहने वाले अधिकाँश लोग उतनी ही निर्दयता से इसे नष्ट कर रहे हैं....

लेकिन कोई बात नहीं ,हमारी संस्कृति इतनी कमजोर नहीं की कोई उसे सहज ही नष्ट कर सके....भारतीय न सही पश्चिमी संस्कृति से थके ऊबे पश्चिम के लोग इसकी अहमियत को समझ इसे जरूर सहेज लेंगे और तब हमारे ही देश में लोग उनका अनुसरण करने लगेंगे..

Abhishek Mishra said...

Vakai jadon se kisi ka bhi vajood hai.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

विषय हमारा जाना पहचाना है उस पर चिँतन लिये यह लेख बहुत पसँद आया राज भाई साहब
- लावण्या

KK Yadav said...

बहुत सही और समसामयिक परिप्रेक्ष्य में लिखा आपने..साधुवाद !!
__________________________________
विश्व पर्यावरण दिवस(५ जून) पर "शब्द-सृजन की ओर" पर मेरी कविता "ई- पार्क" का आनंद उठायें और अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराएँ !!

डॉ .अनुराग said...

सब ओर यही हल है राज जी.....दरअसल समाज ओर इन्सान का ह्रास हुआ है....देश का नहीं.

Shastri said...

भाटिया जी, बोन्साई का उदाहरण देकर आपने मामला एकदम ऐसा स्पश्ट कर दिया है कि हर कोई समझ जायगा कि आप क्या कह रहे हैं एवं उसकी महत्ता क्या है.

जिन हाथों ने जडों को काटने की आदत डाल ली है उनको रोकने के लिये प्रयास होना चाहिये.

सस्नेह -- शास्त्री

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info

अभिषेक ओझा said...

ना इधर के हुए ना उधर के वाले हालत हैं जी ! बिलकुल सही कह रहे हैं आप.

योगेन्द्र मौदगिल said...

एकदम सटीक..... वाह..

परमजीत बाली said...

बहुत सही कहा आपने।अपनी जड़ से कट कर कोई फल फूल नही सकता।

G M Rajesh said...

bhulne do
shayad aapko wo kahaani yad ho jisme aam ke ped par patthar ki barish kar jab kisi ne aam tode the aur is baare me aasman ne ped se puchaa tha kya tum yah bardast kar paate ho ?
ped ne kaha tha maine namrataa seeki hai so namta hu
unhone jo seekha unki ve jaane

Nirmla Kapila said...

raj ji aapne bahut sahi baat kahi hai magar logon ko ghar ki murgi daal barabar lagti hai iski keemat tabhee pata chalti hai jab aadmi apno se door desh me jata hai bharat jesi sanskriti kaa koi jod dunia me nahin hai is sunder lekh ke liye dhanyvad

varsha said...

भाटिया जी, सबसे पहले तो आप ही दौडे पश्चिम की ओर! मज़ाक कर रहे हैं, पर मासूम भारतीय लोग तो वही देखेंगे जो उन्हें दिखाया जाएगा, यह तो आपके व हमारे जैसे जागरूक व शिक्षित भारतीयों का फ़र्ज़ है की उन्हें सही दृश्य दिखाएँ।आप भी फुर्सत निकालिए। यकीन मानिए, अब भी भीतर कहीं वही भारत बसता है आपके सपनो का , बस थोड़ा दिग्भ्रमित है।

जितेन्द़ भगत said...

आपकी बातों से सहमत।

sandhyagupta said...

Aapka lekh sochne ko majboor karta hai.

रविकांत पाण्डेय said...

बिना जड़ के शाखा कहां हो सकती है और शाखा के बिना फूलों की बात तो सोची भी न जा सकती है। इसलिये जो जड़ों से कट गये हैं उनके जीवन में न तो फूलों की सुगंध मिलती है न ही उनकी जीवनशाखा हरी-भरी मिलती है। कोई कहीं भी रहे यदि सत्य, प्रेम जैसे दिव्य गुणों में आस्था रखता है तो उसकी जड़ें भारत में हैं और इसके विपरीत भाववाले लोग भारत में रहें तो भी उनकी जड़ें भारत में नहीं हैं। दिनकर जी ने कहा है-"भारत नहीं स्थान का वाचक, गुण-विशेष नर का है" आपने जड़ों के महत्त्व को जिस चिंतन के साथ प्रस्तुत किया है वो सुंदर है और सुंदर की प्रशंसा स्वाभाविक है।

Chintan - चिन्तन said...

बहुत ही कडवा सच !! लेकिन जिम्मेदार अगर नयी पीढी हैं तो हम भी कम नही !! कही शिक्षा देने मे ही चूक हो गयी । धर्म का वास्तिवक अर्थ सिर्फ़ कर्मकाडॊं तक ही तो सीमित रह गया है , मूल शिक्षा से हम कट गये और फ़लार्थ यही होना था ।

Mahesh Sinha said...

समय के चौराहे में खड़े सब दिग्भ्रमित है, कुछ उम्मीद है जो कि होती है युवा वर्ग से, आस्था हमारा एक केंद्र रहा है ओर युवा आस्थावान हो रहे हैं