04/04/09

चिंतन....जीवन की कीमत

आज का विचार, हम जीव हत्या, आज हम मै से कितने लोग मांस खाते है, किस लिये ? सिर्फ़ जीभ के स्बाद के लिये, क्योकि ताकत के लिये मांस ? एक मरे हुये प्राणी का मांस, पता नही उस जानवर ने क्या क्या खाया होगा, फ़िर मोत को सामने देख कर उस पर क्या बीती होगी, कभी आप ने मोत का सामना किया है ? तो पता होगा, फ़िर किसी को मार कर खाना....

चलिये ज्यादा बात ना कर के सीधे चलते है आज के चिंतन की ओर...


बात बहुत पुरानी है, एक बार मगध राज्य मै अकाल पडा किसी तरह से राजा ने खाने का इन्तजाम कर दिया, लेकिन फ़िर से यह स्थिति ना आये इस से बचने के लिये राजा ने सभा बुलाई, ओर पुछा की दुनिया मै सब से सस्ता खाने का क्या है ? ओर जो हमेशा रहे ? सभी लोग सोच मै पड गये.
चावल , गेहूं,अन्य आनाज, फ़ल सब्जियां तो बहुत मेहनत के बाद मिलती है, ओर अगर अकाल पड जाये तो यह भी मुश्किल से मिलती है, सभी सोच रहे थे, तो एक मत्री ने अचानक कहा महाराज मासं , हम शिकार कर के मासं कॊ खा सकते है, जो बिलकुल मुफ़त भी है, ओर बहुत स्वादिषट भी, इस के साथ सभी मंत्री हां जी हां जी कहने लगे, सिर्फ़ एक प्रधानमंत्री कॊ छोड कर.
राजा ने प्रधानमंत्री से उस के चुप होने का कारण पुछा तो प्रधान मंत्री ने अपनी असमती जताई ओर कहा कि मांस सब से सस्ता है यह गलत है, कल मै आप को यह सिद्ध कर दुगां
आधी रात का समय था,प्रधान मंत्री ने एक मंत्री के घर का दरवाजा खटखटाया, जब मंत्री ने प्रधान मंत्री कॊ देखा तो हेरान रह गया, ओर बोला आप इस समय यहां सब कुशल मंगल तो है, प्रधान मंत्री ने कहा नही आज रात को राजा की तबियत अचानक बहुत खराब हो गई है बेदध ने उन्हे किसी के दिन का दो ग्राम मांस दवा के संग खाने को कहा है ,वरना जान बचना कठिन है यह लो दो लाख मोहरे, ओर अपने दिल का दो ग्राम मांस दे दो, मंत्री ने सोचा जब दो गराम मांस दिल से निकले गा तो मेरा मरना निशचित है, ओर मंत्री अन्दर गया ओर दो लाख मोहरे ओर ला कर प्रधान मंत्री को दी, ओर वहा से हाथ जोड कर टाल दिया.
प्रधान मंत्री सारी रात सभी मंत्रियो के यहा गया ओर करोडो मोहरे जमा कर ली, दुसरे दिन सुबह ही दरवार मे राजा ने सारी मोहरे राजा के आगे रख दी जब राजा ने पुछा यह क्या गुस्ताखी, तो प्रधान मंत्री ने सारी बात बताई ओर कहा की मासं की कीमत अब इन मंत्रियो से पुछे, जेसे इन्हे अपनी जान प्यारी है वेसे ही जनावरो को भी अपनी जान प्यारी होती है, हमे कोई हक नही कि किसी की जान ले सिर्फ़ अपना पेट भरने के लिये अपने स्वाद के लिये.
धन्यवाद

अगली बार जब भी आप मुर्गा खाये,बकरे का कबाब खाये, एक बार जरुर सोचे मरने से पहले , मोत को सामने देख कर इन पर क्या बीती होगी, ओर जब यह आप की पलेट मै सज कर आये , ओर आप इन्हे मजे से खा एरहे होगे तो अगर आत्मा नाम की कोई वस्तु है तो वो क्या सोचती होगी, आप को अपन मीट खाते देख कर, क्योकि इस जानवार की हत्या आप के लिये ही तो की गई है, आप भी जिम्मेदार है इस हत्या के,

29 comments:

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत ज्ञान की बात बताई आपने. मांस भक्षण से ना सिर्फ़ जानवरों की हत्या ही होती है बल्कि अनेकों बीमारियों से भी बचा जा सकता है.

रामराम.

ताऊ रामपुरिया said...

मैं भी सभी से निवेदन करना चाहुंगा की जहां तक हो सके मांस के भक्षण से बचे तो यह स्वास्थ्य के लिये भी अत्यंत अच्छा है. आगे आपकी मर्जी के मालिक आप खुद हैं.

रामराम.

mehek said...

bahut hi achhi baat kahi hai,har jeev ko apni jaan pyari hai,ishwar ki banayi har zindagi kimati hai.

नरेश सिह राठौङ said...

भाटिया अंकल आपने बहुत ही अच्छी और ज्ञान वाली बात बतायी । ब्राह्मण दो होते है एक जाती से दूसरा कर्म से , मै कर्म से ब्राह्मण हू । इस लिये इस जन्म मे तो क्या अगले सात जन्म मे भी मांस मदिरा का सेवन नही करूंगा ।

शोभा said...

सच कहा आपने। जब अपने पर पड़ती है तभी दर्द मालूम पड़ता है।

Abhishek Mishra said...

इससे सरल शब्दों में शाकाहार का महत्व क्या समझाया जाए!

संगीता पुरी said...

बहुत अच्‍छी बात बतायी आपने ... मै तो शाकाहारी ठहरी ... आपकी बातों से पूर्ण सहमत हूं।

P.N. Subramanian said...

अरे कमाल है राज भाई हम तो सोचते थे कि आप भी nut bolt खाने वाले ही होंगे. हमें तो अण्डों से भी परहेज है. सुना है आजकल पश्चिमी देशों में भी शाखाहार बहुत ही पसंद किया जाता है.

डॉ. मनोज मिश्र said...

बकरी पाती खात है ताकी काढी खाल
जो नर बकरी खात हैं ताकी कौन हवाल .
अब शायद कुछ और कहने को बचा नहीं .

दर्पण साह 'दर्शन' said...

main shakhari hoon !! aur aap?

aur is baat ko garv se kehta hoon
khud hi dekh lijiyea:

http://darpansah.blogspot.com

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

भाटिया जी, एक सुन्दर कथा के माध्यम से आपने बहुत ही बढिया बात समझाने का प्रयास किया है....सचमुच किसी भी जीव में आत्मा हमारी तरह ही होती है,उसे भी दुख/पीडा/कष्ट की अनुभूती होती है.......अगर हम किसी को जीवन दे नहीं सकते तो हमें जीवन लेने का भी कोई अधिकार नहीं है..अगर मांस भक्षण किया जाए तो विचार भी तो पशुओं तुल्य ही होंगे.
"जैसा खाए अन्न,वैसा होय मन"

Gagagn Sharma, Kuchh Alag sa said...

हद तो तब हो जाती है जब खाने के बाद खाने वाला कहता है कि आज स्वाद नहीं आया।

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

मेरे जैसा शाकाहारी क्या कहे? इतनी मांस की दुकाने खुल रही हैं कि सड़क पर गुजरते मुंह फेरना/आंख बन्द करना होता है। कुछ तो नियम होना चाहिये कि मांस प्रदर्शित हो कर न बेचा जाये।

सुशील कुमार छौक्कर said...

गहरा चिंतन ।

Udan Tashtari said...

सहमत होकर भी कुछ कह नहीं पा रहे हैं.

रश्मि प्रभा said...

baat sahi hai......

Vidhu said...

हम भी शाकाहारी है ...और घर के पालतू पशुओं को भी शाका हार बनाया है ...ख़ास कर मैंने.....अच्छा लेख...इस श्रंखला को बढाया जाय तो बेहतर होगा

योगेन्द्र मौदगिल said...

भाटिया जी, इस प्रेरक प्रसंग के लिये साधुवाद. अपन तो सपरिवार अंडा तक नहीं खाते. मांस तो बहुत दूर की बात है. मेरा सोलह वर्षीय बेटा दिवाकर अपने प्यारे सैम (पामेरियन कुत्ता) के बीमार होने पर उसे वेटरनरी डाक्टर पर लेगया, तो डाक्टर ने सैम को अंडा खिलाने के लिये कहा.. बेटा बहुत असमंजस में रहा. मन मार कर अंडा ले आया और सैम को डाल दिया. मैं, मेरी पत्नी और बेटी दूर खड़े हो सैम को खाते देखते रहे. बेटे को अंडा हाथ में लेने की ग्लानि से उल्टीनुमा उबकाईयां आने लगी. आश्चर्य तो तब जब आधे घंटे बाद सैम ने भी उल्टी कर दी और दोबारा अंडा नहीं खाया. सैम भी हमारे साथ रह कर शाकाहारी हो गया.

जितेन्द़ भगत said...

मॉस भक्‍क्षि‍यों में वि‍तृष्‍णा पैदा करनेवाला एक सार्थक लेख।

Poonam Agrawal said...

aapka ye lekh mans khane valo ki aatma ko jhakjorne ke liye kafi hoga.....dhanyavaad....

Praney ! said...

Badia Hai. Nice story.

I read other comments also, everyone here is veggi. Wish some non-veggi should have made their points too.

Your post clicked a past incident in my mind, may be will write about in my post. Thanks sir ji.

Hari Joshi said...

माननीय समीर भाई (उड़नतश्‍तरी) ने टिप्‍पणीं में शाकाहार पर सह‍मति जताते हुए कहा है कि वह सहमत हैं लेकिन कुछ कह नहीं पा रहे हैं।...मुझे समीर जी में गांधी के दर्शन हुए। गांधी जी का एक प्रसंग-
एक महिला अपने बेटे के साथ गांधी जी के पास पंहुची और शिकायत की कि ये गुड़ बहुत खाता है; मानता नहीं है; आप की बात कोई नहीं टालता; इसलिए आप इसे गुड़ खाने के लिए मना कर दीजिए। गांधी जी ने उस महिला की बात गौर से सुनी और बोले कि वह बच्‍च्‍े को फिर किसी दिन अच्‍छे से समझा देंगे।
कुछ दिन बाद वह महिला फिर गांधी जी के पास पंहुची और कहा कि उसका बेटा और ज्‍यादा गुड़ खाने लगा है। इसलिए इस बार आप इसे स्‍पष्‍ट समझा दीजिए। गांधी जी चिंतित हो गए और बोले कि आज तो वह नहीं समझा पाएंगे लेकिन अगले हफ्ते वह जरुर ऐसा करेंगे।
महिला अगले हफ्ते फिर आई और गांधी जी ने उसे फिर दो दिन बाद आने को कहा।
महिला फिर पंहुची और गांधी जी से फिर निवेदन किया। गांधी जी ने बेटे को अपने पास बुलाया और सिर पर हाथ फेरते हुए कहा कि बेटा गुड़ मत खाया करो। मां अगर किसी चीज को मना करती है तो उसे छोड़ दो।
महिला को थोड़ा गुस्‍सा आया लेकिन गांधी जी तो बापू थे; इसलिए संयत होकर कहा कि बापू इतनी सी बात तो आप पहले दिन भी कह सकते थे।
गांधी जी कुछ सेकेंड के लिए मौन हो गए। और फिर बोले कि मां दरअसल गुड़ मुझे भी पसंद था। मैं भी बहुत खाता था। नैतिक तौर पर मना करने से पहले मैने गुड़ खाना छोड़ा। अगर मैं गुड़ खाते हुए बेटे को मना करता तो ये न्‍यायसंगत नहीं होता।
..शायद समीर भाई भी इसलिए फिलहाल ज्‍यादा कुछ नहीं कह पा रहे हैं। आशा है कुछ दिन में कहेंगे।

राज भाटिय़ा said...

मेरा चिंतन किसी के विरुध नही है , आप कया खाते है, कया नही खाते मुझे इस से कोई मतलब नही. इस लिये इस चिंतन को आप सब एक लेख के तोर पर ही देखे, मै शाका हरी हुं, इस का मतलब यह नही कि सब को अपनी नजरो से ही देखूं,अगर मेरे इस लेख से किसी को ठेस पहुचे तो माफ़ी का हक दार हुं.
धन्यवाद

Mumukshh Ki Rachanain said...

भाटिया जी,

विचार सिर्फ विचार होते है, कोई माने न माने यह उसकी श्रद्धा , अतः इसमें खेद व्यक्त करने जैसी बात ही नहीं,जब खाने वाले को ही "जियो और जीने दो" का अहसास नहीं तो आपको क्यों?

आने तो केवल समझाया भर है.................

सुविचारों का स्वागत ही परम धर्म है.

चन्द्र मोहन गुप्त.

दीपक "तिवारी साहब" said...

बहुत उत्तम सीख दी आपने.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

bhatia ji, aapne bilkul theek likha hai, lekin log to haivan ho chuke hain, jo embryo tak kha lete hain.

Dev said...

Bahut sahi bat batayi aapne. Yadi ham maans khana chhod de to kitne jiven sukhi ho jeeye..

Harkirat Haqeer said...

राज जी ,
आपकी पोस्ट तो एक अच्छा सन्देश देती ही है टिप्पणियां उस से भी अधिक छू जातीं है मौदगिल की ,समीर जी की और हरी जोशी की टिप्पणियां बहुत ही प्रेरणादायक लगीं ....मनोज जी ने तो दो पंक्तिओं में सबकुछ कह दिया ...haan main bhi shakahari hun....!!

दिलीप कवठेकर said...

अरे ये क्या? आप माफ़ी क्यों मांग रहे हैं? आपने अपनी बात बडी शालीनता से रख दी है, तर्क भी उच्च कोटि का दिया है.दुनिया के हर कोने में शाकाहार को मान्यता मिल रही है.

कल अगर आप सिगरेट या शराब के बारे में लिखकर माफ़ी मांगेंगे. आपका किसी की लाईफ़स्टाईल पर तो कोई आक्षेप नही है, मात्र युनिवर्सल अपील ही तो है.

विश्वास किजिये, मांसाहारी मनुष्यों में से १०% ही ऐसे होते है, जो सिर्फ़ आदत के लिये खाते है, वरना वो छोड देते. बाकियों ने अभी ध्यान नही दिया होगा.