22/07/17

साध्यबेला. . . सुबह से तीन बार पढ़ चुके ईमेल पर एक बार पुनः देवव्रत की निगाहें दौड़ने लगी थीं. लिखा था- “पापा, कल दीपक चाचा आए थे. उनसे पता चला, पिछले डेढ़ वर्ष से आपने अपने घर में एक पति-पत्नी को किराएदार के रूप में रखा हुआ है और वे दोनों आपका बहुत ख़्याल रखते हैं. आजकल समय बहुत ख़राब है पापा. ज़रा सोचिए, कोई बिना किसी स्वार्थ के एक पराए इंसान की देखभाल भला क्यों करेगा? कहीं आपने उनसे अपने पैसे या प्रॉपर्टी का ज़िक्र तो नहीं किया है? भारत में आए दिन ऐसी घटनाएं सुनने को मिलती हैं कि बुज़ुर्ग को मारकर लोग पैसा लूटकर चले गए. इसलिए ज़्यादा दिनों तक एक ही किराएदार को रखना ठीक नहीं है. लोग घर पर ही कब्ज़ा जमाकर बैठ जाते हैं. इसलिए अब दूसरा किराएदार ढूंढ़ लीजिए. मैं जल्द ही भारत आकर आपके सब प्रॉपर्टी के काम निपटाता हूं. बाकी फिर… आपका अंकित . बार-बार पढ़ने के बाद भी देवव्रत को पूरे मेल में उन संवेदनाओं का एहसास नहीं हुआ, जो एक बेटे के मन में उसके पिता के प्रति होती हैं. अंकित को इस बात का भय तो था कि कहीं किराएदार पापा के मकान पर कब्ज़ा न कर लें, पर इस बात की तसल्ली कतई नहीं थी कि कोई उसके पापा का ख़्याल रख रहा है. क्या वास्तव में दुनिया इतनी स्वार्थपूर्ण हो गई है कि लोग सोचना तक गवारा नहीं करते कि कोई निःस्वार्थ भाव से किसी पराए इंसान की देखभाल कर सकता है. जो फ़र्ज़ अंकित और उसकी पत्नी नेहा को पूरा करना चाहिए, वह फ़र्ज़ रजत और प्रिया पूरा कर रहे हैं. इस पर शर्मिंदा होने की जगह अंकित उनकी नीयत पर शक कर रहा है. क्या यही संस्कार दिए थे उन्होंने अपने पुत्र को? कहते हैं, समय की रेत पर हम जो पदचिह्न छोड़ जाते हैं, आनेवाली पीढ़ी उसी का अनुसरण कर आगे बढ़ती है. लेकिन शायद समय के साथ पुरानी मान्यताएं भी बेअसर हो चुकी हैं, वरना उन्होंने और उनकी पत्नी संध्या ने सदैव अपने माता-पिता की सेवा की थी. तीन भाइयों में वह बीच के थे. अपने दो बेटों से निराश होकर जब मां और पिताजी उनके पास रहने आए, तो उन्होंने कभी अपने पास से उन्हें जाने नहीं दिया. तन-मन से उनकी सेवा की. लेकिन कहीं कोई कमी तो अवश्य रह गई थी. कोई सूत्र हाथ से अवश्य ही छूटा था, वरना अंकित इतना भावनाशून्य कैसे बन गया? सबसे बड़ी बात, जो देवव्रत के हृदय को मथे डाल रही थी, वो यह कि कल संध्या की पुण्यतिथि थी, पर पत्र में इस बात का कहीं कोई ज़िक्र नहीं था. क्या वह अपनी मां को भी भूल गया है. पूरे चार वर्ष होने को आए, जब संध्या उन्हें छोड़कर इस दुनिया से चली गई थी. उसके रहते जीवन में कितना उल्लास था. कितनी जीवंतता थी. हरदम एक नई ऊर्जा से भरे रहते थे वह. पत्नी के साथ उम्र के अंतिम पड़ाव को ज़िंदादिली से गुज़ारने की ख़्वाहिश थी उनकी. किन्तु रिटायरमेंट के बाद तीन वर्ष साथ निभाकर संध्या एक रात सोई, तो सुबह उठी ही नहीं. नींद में ही हार्टफेल हो गया था उसका. देवव्रत की तो दुनिया ही उजड़ गई थी. संध्या के बिना जीवन की कल्पना ही उनके लिए मुश्किल थी. उनका एक ही बेटा था अंकित, जो अमेरिका में सेटल था. मां की मृत्यु पर वह आया था. महीना भर रहा भी. जाने से पहले उसने कहा था, “पापा, कुछ दिनों के लिए आप मेरे साथ चलिए.” किंतु उन्होंने इंकार करते हुए कहा, “नहीं अंकित, अभी मैं यहीं रहना चाहता हूं. इसी घर में. यहां की आबोहवा में तुम्हारी मां की सांसें बसी हुई हैं. उसकी यादों के सहारे बाकी की ज़िंदगी काट देना चाहता हूं.” किंतु अकेले रहना इतना सरल न था. खाने की द़िक्क़त की वजह से उनका स्वास्थ्य दिनोंदिन गिरता जा रहा था. आख़िरकार उन्हें बेटे के पास जाना ही पड़ा. शिकागो में दो माह कब बीत गए, उन्हें पता ही नहीं चला. अंकित और नेहा उनका ध्यान रखते थे. हर वीकेंड पर वे तीनों घूमने निकल जाते. वहां की ख़ूबसूरती और रहन-सहन का ढंग, तिस पर बच्चों का साथ, उन्हें लगा उनकी बाकी की ज़िंदगी आराम से कट जाएगी. एक दिन अंकित से उन्होंने इस संदर्भ में बात की, “तुम यूएस सिटिजन हो, मेरे ग्रीन कार्ड के लिए अप्लाई करोगे, तो जल्द ही मिल जाएगा. मैं चाहता हूं शेष जीवन तुम लोगों के साथ ही गुज़ार दूं.” यह सुनते ही नेहा की भावभंगिमा कठोर हो गई थी. उस दिन के बाद से ही उन दोनों का उनके प्रति व्यवहार बदल गया था. ज़ाहिर था, वे दोनों उन्हें अपने साथ रखना नहीं चाहते थे. उनके ठंडे और उपेक्षित व्यवहार को वे ज़्यादा दिन तक सहन नहीं कर पाए थे और तीन माह शिकागो रहकर वापस भारत लौट आए थे. चार वर्ष गुज़र गए. अंकित ने फिर कभी उन्हें अमेरिका नहीं बुलाया. अमेरिका से लौटकर उन्होंने अपनी देखभाल के लिए एक नौकर रख लिया, पर जल्द ही वह घर में चोरी करके भाग गया. तब उनके एक मित्र ने उन्हें किराएदार रखने की सलाह दी, जो भले ही किराया कम दे, पर उनके खाने, घर की साफ़-सफ़ाई आदि का ख़्याल रखे. इस संदर्भ में पेपर में पढ़कर ही रजत और प्रिया उनके पास आए थे. उनका तीन बेडरूम का फ्लैट था. अपने लिए एक बेडरूम और बालकनी छोड़कर शेष पूरा घर उन्होंने किराए पर उठा दिया था. शुरू-शुरू में वे अपने कमरे में ही रहते थे. बाहर निकलने में उन्हें संकोच होता. नए शादीशुदा जोड़े की प्राइवेसी में दख़ल न हो, यही विचार मन में लिए वह अपने कमरे में ही पड़े रहते. सुबह की चाय रजत कमरे में पहुंचा देता. उसके ऑफिस चले जाने पर नाश्ता, लंच आदि की ज़िम्मेदारी प्रिया की रहती. उस दिन संडे था. बेड टी पीने के बाद वे अपने कमरे में चुपचाप लेटे छत को निहार रहे थे. रजत कमरे में आकर बोला था, “अंकल, आप हमारे पिता के समान हैं. सारा दिन कमरे में अलग-थलग से क्यों पड़े रहते हैं? बाहर आकर हमारे साथ बैठकर बातें किया कीजिए. खाना भी हमारे साथ ही खाया कीजिए.” सुनकर उन्हें अच्छा लगा, पर प्रकट में बोले, “बेटे, मैं नहीं चाहता. तुम दोनों को परेशानी हो.” “इसमें परेशानी की क्या बात है अंकल, बल्कि हमें अच्छा लगेगा.” रजत उनका हाथ पकड़कर नाश्ते की टेबल तक ले आया था. उनकी पलकें भीग उठी थीं. कुछ पुरानी स्मृतियां दिलोदिमाग़ पर उभरने लगी थीं. जिस दिन उन्होंने अंकित से अपने ग्रीन कार्ड की बात की थी, उसी दिन से अंकित और नेहा अलग-थलग से रहने लगे थे. यहां तक कि खाना भी साथ बैठकर नहीं खाते थे. देवव्रत सारा दिन अकेले पड़े रहते. एक शाम अंकित और नेहा के ऑफिस से आने पर वे अपनी चाय लेकर उन दोनों के पास जा बैठे थे, ताकि दो घड़ी बच्चों से बात कर सकें. कुछ अपनी कहें, कुछ उनकी सुनें. लेकिन नेहा को उनका आना नागवार गुज़रा था. चिढ़कर वह अंकित से इस तरह बोली ताकि देवव्रत को सुनाई पड़ जाए. “अंकित, सारा दिन थके हम घर लौटे हैं. अब क्या हमें अपने घर में भी प्राइवेसी नहीं मिलेगी?” देवव्रत उल्टे पांव कमरे से बाहर चले गए थे. उस दिन उन्होंने सोचा, एकांतवास ही करना है, तो क्यों न भारत जाकर अपने घर में संध्या की यादों के साथ रहा जाए और वे लौट आए थे. किंतु अतीत का सुख भी वर्तमान के दुख का कारण बनता है. अकेलेपन से उपजी निराशा ने धीरे-धीरे उनके दिलोदिमाग़ को अपनी गिरफ़्त में ले लिया था. उनका घूमने जाना, दोस्तों से मिलना-जुलना सब छूट गया था. धीरे-धीरे जीने की इच्छा ही समाप्त हो गई थी. क्यों जीएं और किसके लिए? आख़िर उनका अपना है ही कौन? आज जब रजत और प्रिया ने आत्मीयता से अपने पास बैठाकर खाना खिलाया, तो उनकी आंखें भर आईं. न जाने कितने दिनों बाद अपनत्व का एहसास हुआ था. उस दिन के बाद से रजत और प्रिया अपनी हर समस्या उनके साथ शेयर करते और उनसे यथोचित सलाह लेते. उस दिन सुबह प्रिया ने कहा था, “अंकल, बेड टी पीकर आप मॉर्निंग वॉक पर जाया कीजिए, आपने देखा नहीं, चलते समय आपकी टांगें कांपने लगी हैं. यह घर में बैठे रहने का नतीजा है.” किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह उन्होंने प्रिया की बात मानकर घूमने जाना शुरू कर दिया था. एक दिन रजत और प्रिया ने उन पर ज़ोर डाला कि वह अपने सब दोस्तों को चाय पर बुलाएं. ख़ुशी से उनकी आंखों से आंसू बहने लगे थे. ऐसा लग रहा था, जैसे एक बार पुनः वह ज़िंदगी से जुड़ने लगे हों. न जाने कितने वर्षों बाद उस शाम वह खुलकर हंसे थे. रजत और प्रिया के साथ समय कैसे गुज़र गया, पता ही नहीं चला और अब पिछले चार माह से उनकी व्यस्तताएं बढ़ गई हैं. रजत ने उन्हें कंप्यूटर सिखा दिया है और वे उसके बिज़नेस का एकाउंट मेंटेन करने में उसकी मदद करने लगे हैं. अक्सर वह सोचते हैं, रजत और प्रिया के साथ अवश्य ही उनका कोई पिछले जन्म का नाता है, तभी तो दोनों उन्हें इतना स्नेह व मान-सम्मान देते हैं. आज अंकित का पत्र पढ़कर भले ही उनकी भावनाओं को ठेस पहुंची हो, पर एक बात उन्हें अवश्य समझ में आ गई है कि ख़ून के रिश्ते दिल के भी क़रीब हों, यह ज़रूरी नहीं है. अंकित को वे बता देना चाहते हैं कि उनके पास जो भी रुपया-पैसा व प्रॉपर्टी है, वे उन्हें अपने पिता से विरासत में नहीं मिली है, बल्कि उनकी दिन-रात की मेहनत से कमाई हुई है. इसलिए वे उसे जिसे चाहे दें, यह उनकी इच्छा पर निर्भर करता है. उन्होंने और संध्या ने सारी ज़िंदगी मेहनत की, पर स्वयं पर ख़र्च करने में सदैव कोताही बरती, ताकि वे अंकित को पढ़ने के लिए अमेरिका भेज सकें. अपने बुढ़ापे के लिए कुछ जोड़ सकें. लेकिन अब सभी चिंताओं से मुक्त वह बिंदास जीवन जीना चाहते हैं. स्वयं पर ख़र्च करना चाहते हैं. अंकित को लगता है, रजत और प्रिया जो भी कर रहे हैं, उसमें उनका स्वार्थ निहित है. हो सकता है, उसका यह संदेह निराधार न हो, पर आज का सच यही है कि जीवन की इस सांध्यबेला में रजत और प्रिया ने ही उनको न स़िर्फ सहारा दिया है, बल्कि उनकी ज़िंदादिली से जीने की ख़्वाहिश भी पूरी की है. आज अंकित का पत्र पढ़कर उनका यह निश्चय दृढ़ हुआ है कि वह रजत और प्रिया को उनकी सेवा का फल अवश्य देंगे. अपनी वसीयत में अपना यह मकान रजत और प्रिया के नाम करके वह दुनिया को यह संदेश देना चाहते हैं कि सेवा करनेवाले का हक़ सदैव बड़ा होता है. ज़िंदगी का क्या भरोसा, पता नहीं, कल का सूरज देखना नसीब हो या न हो, इसलिए वह उठे और अपनी इस इच्छा को मूर्त रूप देने के लिए अपने वकील के पास चल दिए. Rajni Kapoor

12/07/17

हाउसवाइफ़

Rajni Kapoor हाउसवाइफ़ . प्रज्ञा को रिसेप्शन हॉल में बिठाकर नितिन न जाने किधर गुम हो गए. प्रज्ञा उस डेकोरेटेड हॉल और उसमें विचरती रूपसियों को देखकर चमत्कृत-सी हो रही थी. कहां तो आज अरसे बाद वह थोड़े ढंग से तैयार हुई थी. नीली शिफ़ॉन साड़ी के साथ मैचिंग एक्सेसरीज़ में ख़ुद को दर्पण में देख शरमा-सी गई थी प्रज्ञा. शादी के बीस बरस बाद भी उसमें इतनी कशिश है. वैसे तो उसकी सादगी ही उसकी कमनीयता को बढ़ा देती है. चालीस की उम्र में तीस की नज़र आना वाकई कमाल की बात है. . . घर से निकलते समय टीनएजर बेटी ने प्यारा-सा कॉम्प्लीमेंट उछाल दिया था, “हाय मम्मी! आज तो पार्टी में आप छा जाएंगी.”. . लेकिन यहां तो समीकरण ही उलट गया था. उन आधुनिकाओं से अपनी सादगी की तुलना कर उस एयरकंडीशन्ड हॉल में भी उसके माथे पर पसीने की बूंदें चुहचुहा उठीं. पर्स से रुमाल निकाल कर अभी वह पसीना सुखा ही रही थी कि मेकअप में लिपी-पुती-सी एक मैडम मुस्कुराती हुई उसके सामने प्रकट हुई, “एक्सक्यूज़ मी, आप मिसेज़ नितिन खरे हैं ना?” प्रज्ञा कुछ बोल सकने की स्थिति में नहीं थी. किसी तरह उसने स्वीकारोक्ति में गर्दन हिला दी . “मैं रमोला भारती, केमिस्ट्री डिपार्टमेंट से हूं. सर ने कहा है कि आपको सबसे मिला दूं.” प्रज्ञा उसके साथ यंत्रवत् चलने लगी. “इनसे मिलिए, ये हैं मिसेज़ नितिन खरे!” रमोला ने इस अदा से प्रज्ञा को सभी के सामने मिलाया कि कई जोड़ी निगाहें उसका एक्स-रे करने लगीं. “वैसे आप करती क्या हैं?” खनकदार आवाज़ में उछाले गए प्रश्न के जवाब में प्रज्ञा ज़बरन मुस्कुराई, “मैं हाउसवाइफ़ हूं.” “हाउसवाइफ़! ओह तभी तो इतनी सिंपल हैं.” न चाहते हुए भी प्रज्ञा की नज़रें आवाज़ की दिशा में उठ गईं. एक भारी-भरकम शरीर की महिला, जिसने अपने शरीर को वेस्टर्न ड्रेस में जकड़ रखा था और मेकअप की परतों के बीच अपनी उम्र को छिपाने की नाकाम-सी कोशिश की हुई थी, कुछ अजीब अंदाज़ में मुस्कुरा रही थी. . पता नहीं प्रज्ञा की नज़रों में क्या था कि रमोला सकपका गई, “आप हैं मिसेज़ साक्षी सान्याल, इन्फोसिस में चीफ़ एक्ज़ीक्यूटिव हैं. मिस्टर सान्याल यहां फ़िज़िक्स के हेड ऑफ़ दि डिपार्टमेंट हैं.” फिर बारी-बारी से रमोला ने सबका परिचय कराया. उनमें से आधी से ज़्यादा तो यूनिवर्सिटी की लेक्चरार थीं और बाकी प्रो़फेसर्स की पत्नियां, जो कहीं न कहीं जॉब करती थीं. तभी तो प्रज्ञा का हाउसवाइफ़ होना उन्हें हैरत में डाले हुए था. प्रज्ञा का जी चाह रहा था कि वह चुपचाप उठकर वापस घर चली जाए, लेकिन यह भला कैसे संभव था? पार्टी तो उसी के पति मिस्टर नितिन खरे के सम्मान में हो रही थी. वेटर कोल्ड ड्रिंक लेकर आया तो उसने बेमन से ले लिया. नितिन के लिखे ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ को आज कुलपति के हाथों ‘अकादमी पुरस्कार’ मिलने वाला था और उन्हें ‘रीडर’ की उपाधि से भी नवाज़ा जा रहा था. नितिन के लेक्चरार से रीडर बनने तक के सफ़र में प्रज्ञा ने हर पल उनका साथ दिया था. अब वह इन तितलियों को अपने जॉब न करने की क्या सफ़ाई दे? . एक तो नितिन का स्वभाव ऐसा है कि वे जब तक घर में रहें, प्रज्ञा उनके आसपास होनी चाहिए. दूसरी बात, जो ख़ुद प्रज्ञा को गंवारा नहीं थी, वह यह कि उसके बच्चे आया के भरोसे पलें. उन्हें स्कूल से आकर मां के बदले बंद ताले को देखना पड़े. ख़ैर जो भी हो, लेकिन आज प्रज्ञा कुंठित हो गई थी. हाउसवाइफ़ होना वाकई हीनता का परिचायक है. हाउसवाइफ़ का अपना कोई वजूद नहीं होता. वैसे कभी-कभार प्रज्ञा के मन में अपने हाउसवाइफ़ होने को लेकर हीन ग्रंथि पलने लगती थी, लेकिन उसने आज जैसा अपमान कभी महसूस नहीं किया था. अभी प्रज्ञा न जाने और कितनी देर तक ख़ुद से सवाल करती, अगर रमोला ने टोका न होता, “अरे मैम, आप खाली बोतल लेकर बैठी हैं, दूसरी लाकर दूं?” वाकई उसकी कोल्ड ड्रिंक तो कब की समाप्त हो गई थी. वो ज़बरन मुस्कुराते हुए ‘नो थैंक्स’ कह, उठकर खाली बोतल डस्टबिन के हवाले कर आई. प्रज्ञा की कुंठा उस पर हावी होती जा रही थी. वह सचमुच उठकर जाने की सोच ही रही थी कि स्टेज पर माइक थामे नितिन को देखकर अपनी कुर्सी से चिपक कर रह गई. तालियों की गड़गड़ाहट के बीच नितिन की गंभीर आवाज़ गूंज उठी, . “वैसे तो यह एक घिसा-पिटा डायलॉग है कि हर सफल पुरुष के पीछे एक औरत का योगदान होता है, लेकिन मेरे मामले में यह सौ फ़ीसदी सच है. आज मैं अपनी पत्नी प्रज्ञा की बदौलत ही इस मुक़ाम पर पहुंच सका हूं. मेरी ज़िंदगी में सबसे अहम् बात मेरी पत्नी प्रज्ञा का हाउसवाइफ़ होना है. डबल एम. ए. और गोल्ड मेडलिस्ट होते हुए भी मेरी इच्छा की ख़ातिर प्रज्ञा हाउसवाइफ़ बन कर हर क़दम पर मेरे साथ चलती रही.” प्रज्ञा जैसे नींद से जागी. उसकी कुंठा परत दर परत पिघलने लगी और नितिन का भाषण जारी रहा, “तन-मन से पूरी तरह समर्पित प्रज्ञा ने मुझे घर-बाहर की तमाम ज़िम्मेदारियों से मुक्त नहीं रखा होता, तो मैं इतना बड़ा ग्रंथ नहीं लिख पाता. आज के दौर में औरतों का जॉब करना उनका स्टेटस सिंबल बनता जा रहा है. लेकिन मुझे लगता है कि अगर प्रज्ञा भी कहीं जॉब करके ख़ुद की पहचान तलाश कर रही होती तो शायद मैं आज भी एक साधारण-सा लेक्चरार बना रहता.” . तालियों की गड़गड़ाहट के साथ ही प्रज्ञा की कुंठा पूरी तरह बह गई. उसका एक्स-रे करने वाली निगाहें अब झुकने लगीं. शायद वे रंगे हाथों पकड़ी गई थीं. पति के बराबर, बल्कि ़ज़्यादा कमाने के रौब में वे पति और बच्चों को कितना तवज्जो देती हैं? क्या उनके पति कभी नितिन की तरह सरेआम उनकी प्रशंसा कर सकते हैं? शायद कभी नहीं. नितिन ने प्रज्ञा को कितना ऊंचा उठा दिया था, यह मेहमानों की नज़रों में प्रज्ञा के प्रति उभर आए सम्मान से साफ़ पता चल रहा था. “मैं तो यही जानता हूं कि यह ग्रंथ मैं प्रज्ञा की बदौलत ही पूरा कर सका हूं. इसलिए इस पुरस्कार की असली हक़दार मेरी पत्नी प्रज्ञा है. आय एम प्राउड ऑफ़ माई लवली वाइफ़.” तालियों की गूंज के बीच प्रज्ञा स्टेज पर पहुंची. कुलपति महोदय ने नितिन को मेडल पहनाया तो नितिन ने उसे प्रज्ञा के गले में डाल दिया. प्रज्ञा का चेहरा अलौकिक तेज़ से चमक उठा. अपने पति के एक वाक्य ‘आय एम प्राउड ऑफ़ माई वाइ़फ ’ ने एक हाउसवाइफ़ को अपने हाउसवाइफ़ होने के गर्व से अभिभूत कर दिया. Rajni Kapoor

06/07/17

दिशाविहीन रिश्ते

Rajni Kapoor . देशी घी की खुशबू धीरेधीरे पूरे घर में फैल गई. पूर्णिमा पसीने को पोंछते हुए बैठक में आ कर बैठ गई. ‘‘क्या बात है पूर्णि, बहुत बढि़याबढि़या पकवान बना रही हो. काम खत्म हो गया है या कुछ और बनाने वाली हो?’’ ‘‘सब खत्म हुआ समझो, थोड़ी सी कचौड़ी और बनानी हैं, बस. उन्हें भी बना लूं.’’ ‘‘मुझे एक कप चाय मिलेगी? बेटा व बहू के आने की खुशी में मुझे भूल गईं?’’ प्रोफैसर रमाकांतजी ने पत्नी को व्यंग्यात्मक लहजे में छेड़ा. ‘‘मेरा मजाक उड़ाए बिना तुम्हें चैन कहां मिलेगा,’’ हंसते हुए पूर्णिमा अंदर चाय बनाने चली गई. 65 साल के रमाकांतजी जयपुर के एक प्राइवेट कालेज में हिंदी के प्रोफैसर थे. पत्नी पूर्णिमा उन से 6 साल छोटी थी. उन का इकलौता बेटा भरत, कंप्यूटर इंजीनियरिंग के बाद न्यूयार्क में नौकरी कर लाखों कमा रहा था. भरत छुटपन से ही महत्त्वाकांक्षी व होशियार था. परिवार की सामान्य स्थिति को देख उसे एहसास हो गया था कि उस के अच्छा कमाने से ही परिवार की हालत सुधर सकती है. यह सोच कर हमेशा पढ़ाई में जुटा रहता था. उस की मेहनत का ही नतीजा था कि 12वीं में अपने स्कूल में प्रथम और प्रदेश में तीसरा स्थान प्राप्त किया. रमाकांतजी की माली हालत कोई खास अच्छी न थी. भरत को कालेज में भरती करवाने के लिए बैंक से लोन लिया था, पर किताबें, खानापीना दूसरे खर्चे इतने थे कि उन्हें और भी कई जगह से कर्जा लेना पड़ा. एक छोटा सा मकान था, उसे आखिरकार बेच कर किसी तरह कर्जे के भार से मुक्त हुए. भरत ने अच्छे अंकों से इंजीनियरिंग पास कर ली. फिर जयपुर में ही 2 वर्ष की टे्रनिंग के बाद उसे कंपनी वालों ने न्यूयार्क भेज दिया. विदेश में बेटे को खानेपीने की तकलीफ न हो, सोच कर जल्दी से गरीब घर की लड़की देख बिना दानदहेज के साधारण ढंग से उस की शादी कर दी. तुरंत शादी करने के कारण अब तक जो थोड़ी सी जमा पूंजी थी, शादी में खर्च हो गई. बहू इंदू, गरीब घर की थी. उस के पिता एक होटल में रसोइए का काम करते थे. इंदू सिर्फ 12वीं तक पढ़ी थी और एक छोटी सी संस्था में नौकरी करती थी. उस की 3 बहनें और थीं जो पढ़ रही थीं. रमाकांतजी व उन की पत्नी की सिर्फ यही इच्छा थी कि एक गरीब लड़की का ही हमें उद्धार करना है. उन्हें दानदहेज की कोई इच्छा न थी. उन्होंने साधारण शादी कर दी. शादी होते ही अगले हफ्ते दोनों न्यूयार्क चले गए. शुरूशुरू में फोन से बेटाबहू बात करते थे फिर महीने में, फिर 6 महीने में एक बार बात हो जाती. बेटे की आवाज सुन, उस की खैरियत जान उन्हें तसल्ली हो जाती. न्यूयार्क जाने के बाद भरत ने एक बार भी घर रुपए नहीं भेजे. पहले महीने पगार मिलते ही फोन पर बोला, ‘‘बाबूजी, यहां घर के फर्नीचर लेने आदि में बहुत खर्चा हो गया है. यहां बिना कार के रह नहीं सकते. 1-2 महीने बाद आप को पैसे भेजूंगा.’’ इस पर रमाकांतजी बोले, ‘‘बेटा, तुम्हें वहां जो चाहिए उसे ले लो. यहां हमें पैसों की जरूरत ही क्या है. हम 2 जनों का थोड़े में अच्छा गुजारा हो जाता है. हमारी फिक्र मत कर.’’ उस के बाद भरत से पैसे की कोई बात हुई ही नहीं. रमाकांत व पूर्णिमा दोनों को ही इस बात का कोई गिलाशिकवा नहीं था कि बेटे ने पैसे नहीं भेजे. बेटा खुश रहे, यही उन्हें चाहिए था. थोड़े में ही वे गुजारा कर लेते थे. 2 साल बाद बेटे ने ‘मैं जयपुर आऊंगा’ फोन पर बताया तो पूर्णिमा की खुशी का ठिकाना न रहा. पूर्णिमा से फोन पर भरत अकसर यह बात कहता था, ‘अम्मा, यह जगह बहुत अच्छी है. बड़ा घर है. बगीचा है. बरतन मांजने व कपड़े धोने की मशीन है. आप और बाबूजी दोनों आ कर हमारे साथ ही रहो. वहां क्या है?’ ‘तुम्हारे बाबूजी ने यहां सेवानिवृत्त होने के बाद जयपुर में एक अपना हिंदी सिखाने का केंद्र खोल रखा है. जिस में विदेशी और गैरहिंदीभाषी लोग हिंदी सीखते हैं. उसे छोड़ कर बाबूजी आएंगे, मुझे नहीं लगता. तुम जयपुर आओ तो इस बारे में सोचेंगे,’ अकसर पूर्णिमा का यही जवाब होता था. बेटे के बारबार कहने पर पूर्णिमा के मन में बेटे के पास जाने की इच्छा जाग्रत हुई. अब वे हमेशा पति से इस बारे में कहने लगीं कि 1 महीना तो कम से कम हमें भी बेटे के पास जाना चाहिए. अब जब बेटे के आने का समाचार मिला, खुशी के चलते उन के हाथपैर ही नहीं चलते थे. हमेशा एक ही बात मन में रहती, ‘बेटा आ कर कब ले जाएगा.’ भरत जिस दिन आने वाला था उस दिन उसे हवाई अड्डे जा कर ले कर आने की पूर्णिमा की बहुत इच्छा थी. परंतु भरत ने कहा, ‘मां, आप परेशान मत हों. क्लियरैंस के होने में बहुत समय लगेगा, इसलिए हम खुद ही आ जाएंगे,’ उस के ऐसे कहने के कारण पूर्णिमा उस का इंतजार करते घर में अंदरबाहर चक्कर लगा रही थीं. सुबह से ही बिना खाएपिए दोनों को इंतजार करतेकरते शाम हो गई. शाम 4 बजे करीब भरत व बहू आए. आरती कर बच्चों को अंदर ले आए. पूर्णिमा की खुशी का ठिकाना नहीं था. बेटाबहू अब और भी गोरे, सुंदर दिख रहे थे. रमाकांतजी बोले, ‘‘सुबह से अम्मा बिना खाए तुम्हारा इंतजार कर रही हैं. आओ बेटा, पहले थोड़ा सा खाना खा लें.’’ ‘‘नहीं, बाबूजी, हम इंदू के घर से खा कर आ रहे हैं. अम्मा, आप अपने हाथ से मुझे अदरक की चाय बना दो. वही बहुत है.’’ तब दोनों का ध्यान गया कि उन के साथ में सामान वगैरह कुछ नहीं है. इंदू ने अपने हाथ में पकड़े कपड़े के थैले को सास को दिए. उस में कुछ चौकलेट, एक साड़ी, ब्लाउज, कपड़े के टुकड़े थे. पूर्णिमा का दिल बुझ गया. बड़े चाव से बनाया गया खाना यों ही ढका पड़ा था. चाय पी कर थोड़ी देर बाद भरत बोला, ‘‘ठीक है बाबूजी, हम कल फिर आते हैं. हम इंदू के घर ही ठहरे हैं. एक महीने की छुट्टी है,’’ कहते हुए चलने के लिए खड़ा हुआ भरत तो इंदू शब्दों में शहद घोलते हुए बोली, ‘‘मांजी आप ने हमारे लिए इतने प्यार से खाना बनाया, फिर भला कैसे न खाएं. फिलहाल भूख नहीं है. पैक कर साथ ले जाती हूं.’’ और सास के बनाए हुए पकवानों को समेट कर बड़े अधिकार के साथ पैक कर दोनों मेहमानों की तरह चले गए. रमाकांतजी और पूर्णिमा एकदूसरे का मुंह ताकते रह गए. रमाकांतजी पत्नी के सामने अपना दुख जाहिर नहीं करना चाहते थे. पर पूर्णिमा तो उन के जाते ही मन के टूटने से बड़बड़ाती रहीं, ‘कितने लाड़प्यार से पाला था बेटे को, क्या इसी दिन के लिए. ऐसा आया जैसे कोई बाहर का आदमी आ कर आधा घंटा बैठ कर चला जाता है,’ कहते हुए पूर्णिमा के आंसू बह निकले. रमाकांतजी पूर्णिमा के सिर पर हाथ फेरते हुए उसे तसल्ली देने की कोशिश करने लगे. दिल में भरे दर्द से उन की आंखें गीली हो गई थीं लेकिन अपना दर्द जबान से व्यक्त कर पूर्णिमा को और दुखी नहीं करना चाहते थे. रमाकांतजी ने पत्नी को कई तरह से आश्वासन दे कर मुश्किल से खाना खिलाया. 2 दिन बाद भरत फिर आया. उस दिन पूर्णिमा जब उस के लिए चाय बनाने रसोई में गई तब अकेले में बाबूजी से बोला, ‘‘बाबूजी, इंदू को अपनी मां को न्यूयार्क ले जा कर साथ रखने की इच्छा है. उस की मां ने छोटी उम्र से परिवारबच्चों में ही रह कर बड़े कष्ट पाए हैं. इसलिए अब हम उन्हें अपने साथ न्यूयार्क ले कर जा रहे हैं. आप सब बातें अच्छी तरह समझते हैं, इसलिए मैं आप को बता रहा हूं. अम्मा को समझाना अब आप की जिम्मेदारी है. ‘‘फिर, इंदू को न्यूयार्क में अकेले रहने की आदत हो गई है. आप व मां वहां हमेशा रह नहीं सकते. इंदू को अपनी प्राइवेसी चाहिए. अम्मा व इंदू साथ नहीं रह सकते, बाबूजी. आप वहां आए तो कहीं इंदू के साथ आप दोनों की नहीं बने, इस का मुझे डर है. इसीलिए आप दोनों को मैं अपने साथ रखने में हिचक रहा हूं. बाबूजी, आप मेरी स्थिति अच्छी तरह समझ गए होंगे,’’ वह बोला. ‘‘बेटा, मैं हर बात समझ रहा हूं, देख रहा हूं. तुम्हें मुझे कुछ समझाने की जरूरत नहीं है. रही बात तुम्हारी मां की, तो उसे कैसे समझाना है, अच्छी तरह जानता हूं,’’ बोलते हुए आज रमाकांतजी को सारे रिश्ते बेमानी से लग रहे थे. इस के बाद जिस दिन भरत और इंदू न्यूयार्क को रवाना होने वाले थे उस दिन 5 मिनट के लिए विदा लेने आए. उस रात पूर्णिमा रमाकांतजी के कंधे से लग खूब रोई थी, ‘‘क्योंजी, क्या हमें कोई हक नहीं है अपने बेटे के साथ सुख के कुछ दिन बताएं. बेटे से कुछ आशा रखना क्या मातापिता का अधिकार नहीं. ‘‘क्या मैं ने आप से शादी करने के बाद किसी भी बात की इच्छा जाहिर की, परंतु अपने बेटे के विदेश जाने के बाद, सिर्फ 1 महीना वहां जा कर रहूं, यही इच्छा थी, वह भी पूरी न हुई...’’ पूर्णिमा रोतेरोते बोलती जा रही थी और रमाकांतजी यही सोच अपने मन को तसल्ली दे रहे थे कि शायद उन के ही प्यार में, परवरिश में कोई कमी रह गई होगी, वरना भरत थोड़ा तो उन के बारे में सोचता. मां के प्यार का कुछ तो प्रतिकार देता. इस बात को 2 महीने बीत चुके थे. इस बीच इंदू ने भरत को बताया, आज मैं डाक्टर के पास गई थी. डाक्टर ने कहा तुम गर्भवती हो.’’ अभी भरत कुछ बोलने की कोशिश ही कर रहा था कि इंदू फिर बोली कि शायद इसीलिए कुछ दिनों से मुझे तरहतरह का खाना खाने की बहुत इच्छा हो रही है. इधर, मेरी अम्मा कहती हैं, ‘मैं 1 महीना तुम्हारे पास रही, अब बहनों व पिता को छोड़ कर और नहीं रह सकती. मुझे तो तरहतरह के व्यंजन बनाने नहीं आते. अब क्या करें?’’ ‘‘तो हम एक खाना बनाने वाली रख लेते हैं.’’ ‘‘यहां राजस्थानी खाना बनाने वाली तो मिलेगी नहीं. तुम्हारी मां को बुला लेते हैं. प्रसव होने तक यहीं रह कर वे मेरी पसंद का खाना बना कर खिला देंगी.’’ ‘‘पिताजी 1 महीने के लिए तो आ सकते हैं. उन्होंने जो छोटा सा हिंदी सिखाने का केंद्र खोल रखा है वहां किसी दूसरे आदमी को रख कर परंतु...’’ उसे बात पूरी नहीं करने दी इंदू ने, ‘‘उन्हें यहां आने की क्या जरूरत है? आप की मां ही आएं तो ठीक है.’’ ‘‘तुम्हीं ने तो कहा था, हमें प्राइवेसी चाहिए, वे यहां आए तो...ठीक नहीं रहेगा. अब वैसे भी उन से किस मुंह से आने के लिए कहूंगा.’’ ‘‘वह सब ठीक है. लेकिन तुम्हारी मां को यहां आने की बहुत इच्छा है. आप फोन करो, मैं बात करती हूं.’’ इंदू की बातें भरत को बिलकुल भी पसंद नहीं आईं, बोला, ‘‘ठीक है, डाक्टर ने एक अच्छी खबर दी है. चलो, हम बाहर खाना खाने चलते हैं, फिर इस समस्या का हल सोचेंगे.’’ वे लोग एक रैस्टोरैंट में गए. वहां थोड़ी भीड़ थी, तो वे सामने के बगीचे में जा कर घूमने लगे. उन्होंने देखा कि बैंच पर एक बुजुर्ग बैठे हैं. दूर से भरत को वे अपने बाबूजी जैसे लगे. अच्छी तरह देखा. देख कर दंग रह गया भरत, ‘ये तो वे ही हैं.’ ‘‘बाबूजी,’’ उस के मुंह से आवाज निकली. ‘‘रमाकांतजी ने पीछे मुड़ कर देखा तो एक बारी तो वे भी हैरान रह गए. ‘‘अरे भरत, बेटा तुम.’’ ‘‘बाबूजी, आप यहां. कुछ समझ नहीं आ रहा.’’ बाबूजी बोले, ‘‘देखो, वहां अपना क्वार्टर है. आओ, चलें,’’ रमाकांतजी आगे चले, पीछे वे दोनों बिना बोले चल दिए. घर का दरवाजा पूर्णिमा ने खोला. रमाकांतजी के पीछे खड़े भरत और इंदू को देख वह हैरान रह गई. फिर खुशी से भरत को गले से लगा लिया. दोनों का खुशी से स्वागत किया पूर्णिमा ने. ‘‘जयपुर में तुम्हारे पिताजी ने जो केंद्र हिंदी सिखाने के लिए खोल रखा है वहां इन के एक विदेशी शिष्य ने न्यूयार्क में ही हिंदी सिखाने के लिए कह कर हम लोगों को यहां ले आया. यह संस्था उसी शिष्य ने खोली है. सब सुविधाएं भी दीं. तुम्हारे बाबूजी ने वहां के केंद्र को अपने जयपुर के एक शिष्य को सौंप दिया. ‘‘तुम्हारे बाबूजी ने भी कहा कि हमारा जयपुर में कौन है, यह काम कहीं से भी करो, ऐसा सोच कर हम यहां आ गए. यहां तुम्हारे बाबूजी को 1 लाख रुपए महीना मिलेगा,’’ जल्दीजल्दी सबकुछ कह दिया पूर्णिमा ने. ‘‘अम्मा, तुम्हारी बहू गर्भवती है. उस की नईनई चीजें खाने की इच्छा होती है. अब उस की मां यहां नहीं आएगी. आप दोनों प्रसव तक हमारे साथ रहो तो अच्छा है.’’ ‘‘वह तो नहीं हो सकता बेटा. बाबूजी का यह केंद्र सुबह व शाम खुलेगा. उस के लिए यहां रहना ही सुविधाजनक होगा.’’ ‘‘अम्मा, बाबूजी नहीं आएं तो कोई बात नहीं, आप तो आइएगा.’’ ‘‘नहीं बेटा, उन की उम्र हो चली है. इन को देखना ही मेरा पहला कर्तव्य है. यही नहीं, मैं भी भारतीय व्यंजन बना कर केंद्र के बच्चों को देती हूं. इस का मुझे लाभ तो मिलता ही है. साथ में, बच्चों के बीच में रहने से आत्मसंतुष्टि भी मिलती है. चाहो तो तुम दोनों यहां आ कर रहो. तुम्हें जो चाहिए, मैं बना दूंगी.’’ ‘‘नहीं मां, यहां का क्वार्टर छोटा है,’’ भरत खीजने लगा. ‘‘हां, ठीक है. यहां तुम्हें प्राइवेसी नहीं मिलेगी. वहीं... उसे मैं भूल गई. ठीक है बेटा, मैं रोज इस की पसंद का खाना बना दूंगी. तुम आ कर ले जाना.’’ ‘‘नहीं अम्मा, मेरा औफिस एक तरफ, मेरा घर दूसरी तरफ, तीसरी तरफ यह केंद्र है. रोज नहीं आ सकते. अम्मा, बहुत मुश्किल है.’’ ‘‘भरत, अब तक हम दोनों तुम्हारे लिए ही जिए, पेट काट कर रह कर तुम्हें बड़ा किया, अच्छी स्थिति में लाए. पर शादी होते ही हम तुम्हारे लिए बेगाने हो गए,’’ रमाकांतजी ने कहा, ‘‘खून के रिश्ते से दुखी हुए हम तो क्या हुआ? हालात ने नए रिश्ते बना दिए. अब इस रिश्ते को हम नहीं छोड़ सकते. पर तुम जब चाहो तब आ सकते हो. हम से जो बन पड़ेगा, तुम्हारे लिए करेंगे.’’ ‘‘तुम्हें जो सहूलियत हो वह करो. खाना तैयार है, अपनेआप ले कर खा लो. मुझे आने में आधा घंटा लगेगा,’’ कह कर पूर्णिमा एक दुकान की तरफ चली गई. मांबाप के प्रेम को महसूस न कर, पत्नी के स्वार्थीपन के आगे झुक कर, उन की अवहेलना की. अब प्रेम के लिए तड़पने वाले भरत को आरामकुरसी में लेटे हुए पिताजी को आंख उठा कर देखने में भी शर्म आ रही थी. इंदू भी शर्मसार सी खड़ी थी. दोनों भारी मन के साथ घर से बाहर निकलने लगे. रमाकांतजी एक बारी भरत से कुछ कहने की चाह से उठने लगे थे लेकिन उन की आंखों के आगे चलचित्र की तरह पुरानी सारी बातें तैरने लगीं. पैर वहीं थम गए. भरत ने पीछे मुड़ कर देखा, शायद बाबूजी अपना फैसला बदल कर उस से कुछ कहेंगे लेकिन आज उन की आंखें कुछ और ही कह रही थीं. इस सब के लिए कुसूरवार वह खुद था. भरत का गला रुंध गया. बाबूजी के पैर पकड़ कर उन से माफी मांगने के भी काबिल नहीं रहा था.