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26/02/09

बचपन के दिन

यह रचना मेरी नही, किसी ?? नाम की लडकी की है, मुझे अच्छी लगी तो इसे यहां आप सब को दिखा रहा हू, अगर किसी कॊ इस से ऎतराज हुआ तो ( इस के मालिक कॊ ) इसे मै हटा दुंगा...
लेकिन तब तक इस रचना के रचियता को इस सुंदर रचना के लिये मेरा धन्यवाद...


बचपन के दुख कितने अच्छे होते थे,
तब तो सिर्फ़ खिलोने टूटा करते थे.
वो खुशिया भी ना जाने केसी खुशिया थी,
तितली के पर नोंच के उछला करते थे.
पांव मार कर खुद बरिस के पानी मै,
अपनी नांव खुद डुवोया करते थे,
अपने जल जाने का भी एहसास भी ना था,
जलते हुये शोलो को छेडा करते थे.
अब तो ईक आंसू भी रुसवा करता है,
बचपन मै जी भर के रोया करते थे.
आईशा..

11/08/08

अर्ज किया हे ??

आप की नजर दो सडे गले शेर पेश करता हु, अच्छे लगे तो पढिये, वरना पतली गली से निकल ले।अजी जाते जाते हमारा आदाबा तो कबुल फ़रमाईये...

तो अर्ज किया हे...
रोक दो मेरे जनाजे को, के मेरे मे जान आ गई हे,
पीछे मुड के देखो जरा, इक दारु की दुकान आ गई हे।

बोतल छुपा दो कफ़न मे मेरे, कब्र मे पिया करुगा,
जब मांगे का हिसाब खुद तो,पेग बना के दिया करुगा।


हम तुम से नजरे केसे मिलाये जानम,
हमारी बायी आंख कानी, आप की दायी आंख कानी.

24/07/08

कुछ ओर शेर सुनाता हु मे...

अजी गोर फ़र्माये.. अर्ज किया हे...
रात होगी तो चांद भी दिखाई देगा,खावो मे तुम्हे वो चेहरा भी दिखाई देगा,
ये मुहब्बत हे जरा सोच के करना,क्योकि एक आंसु भी गिरा तो सुनाई देगा.

चेहरे पे बनावट का गुस्सा, आंखो मे झलकता प्यार भी हे
इस शोंकयऎ अदा को कया कहिये, इकरार भी हे इनकार भी हे.

21/07/08

कुछ शेर सुनाता हु मे......

अजी हम भी सुनाते कुछ शेर,
अर्ज किया हे....
नही लग सकता कभी मय खाने मे ताला.
एक नही, दो नही, सारा शहर हे पीने वाला.

अब के बारिस मे भी क्या बात हे,हर बुंद जेसे इक मुलाकात हे,
भीगा बदन तुम्हारी बांहो को तरसे हे,मुया बादल अनजान बनके बरसे हे.