06/10/08

चिंतन असली ओर नकली सम्पति

चिंतन आज का विचार
हम अपनी कोठी, बगंले पर अपनी कार पर ,पेसे पर कितना अभिमान करते हे, लेकिन यह सब क्या झुठे हे?
तो पढिये आज का विचार
एक साधु बाबा थे, उनका नाम था कणाद,जब किसान अपनी फ़सल काट लेते तो वो उस जमीन से बाकी बचे कण चुन लेते ओर उसी से अपना गुजर बसर करते, अब साधु बाबा पहुचे हुये थे,उन का नाम भी बहुत था, लेकिन अकड या घंमण्ड बिलकुअल नही था, एक बार राजा को यह बात पता चली तो राजा ने बहुत सा धन साधु बाबा को भेजा, बाबा ने कहा मेरे पास बहुत हे इन्हे जरुरत मन्दो को बाटं दो,राजा ने फ़िर से दो गुना ज्यादा धन भेजा तो बाबा ने कहा मेरे पास बहुत धन हे इसे जरुरत मन्दॊ मे बांट दो, तीसरी बार राजा आप आये ओर साधु को देखा तन पर कपडे भी फ़टे हे लेकिन बाबा ने इस बार भी कहा नही जरुरत ,आप इसे जरुरत मंदो मे बांट दो,
अब राजा ने प्रणाम किया साधु बाबा को ओर वपिस महल मे आ गया ओर रानी से बात की, दुसरे दिन राजा साधु बाबा के पास गया ओर बोला आप सच मे राजा हे मे तो नकली राजा हू, लेकिन आप आत्मा से राजा है.
ऎसे विचारो से हम यह नही कहते की आप अपना सब कुछ बेच कर ओर सब कुछ दान करके इन साधु बाबा जेसे बन जाओ, लेकिन हमे लालच मे आ कर गलत ढंग से पेसा अर्जित नही करना चाहिये , सिर्फ़ अपने लिये ही नही सोचना चाहिये, कुछ अन्य लोगो के बारे भी हमे ध्यान करना चाहिये, हमारे ग्रांथो मे लिखा हे कि गलत ढंग से कमाया पेसा कभी भी तीन पीढीयो से आगे नही जाता, ओर जिस घर मे गलत ढग से पेसा आता हे, वह अपने साथ बहुत सी बुराईयां भी साथ लाता हे, ओर जाते समय तबाही भी लाता हे , जेसे बाढ का पानी जब आता हे तो पानी ही पानी होता हे ओर दुख साथ मे लाता हे ओर जब जाता हे तो ....

22 comments:

श्रीकांत पाराशर said...

Sahi kaha aapne. paisa achhe dhang se bhi kamaya ja sakta hai. jo galat dhang se dhan kamate hain ve sukhi nahin rahte. unki santane nikkami ho jati hain aur yah kahna chahiye ki teen peedhi bigad jati hain. aajkal vaise sadhu baba bhi kahan hain. aajkal to sadhu inkar karne ki bajay vyakti ki tijori par hath saaf kar dete hain. jamana badal gaya hai bhatiaji. ek achhi bodh katha ke liye dhanywad.

seema gupta said...

ग्रांथो मे लिखा हे कि गलत ढंग से कमाया पेसा कभी भी तीन पीढीयो से आगे नही जाता, ओर जिस घर मे गलत ढग से पेसा आता हे, वह अपने साथ बहुत सी बुराईयां भी साथ लाता हे, ओर जाते समय तबाही भी लाता हे , जेसे बाढ का पानी जब आता हे तो पानी ही पानी होता हे ओर दुख साथ मे लाता हे ओर जब जाता हे तो ....

"very pure real and true thoughts, to be understood and implement in our real life'

regards

रंजन said...

सही कहा "हमें केवल अपने लिये ही नहीं सोचना चाहीये".. काश हम सभी एसा सोचें..

mamta said...

बहुत सच्ची बात कही है कि काश लोग आत्मा के धनी हो जाए ।

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत प्रेरणादायक कणाद ऋषी की कहानी सुनाई आपने ! धन्यवाद !

Gyandutt Pandey said...

कणाद ब्राह्मणत्व के आदर्श हैं। अपरिग्रह का संदेश उनसे बेहतर किसी पौराणिक पात्र में नहीं मिलता।

Richa Joshi said...

आपकी प्रस्‍तुतियां हमेशा ही प्रेरणादायक होती हैं। सच बात है कि जैसा खाए अन्‍न, वैसा हो मन। गलत तरीके से अर्जित पैसा पीढि़यों को दूषित करता है।

neeshoo said...

सर जी बहुत सुन्दर लिखा आपने ।पढ़कर अच्छा लगा।बहुत प्रेरणा दायक रहा आपका यह लेखन । कणाद ऋषी पर

भूतनाथ said...

अत्यन्त सुंदर कहानी ! इसके लिए धन्यवाद !

दीपक "तिवारी साहब" said...

कणाद ऋषि की अति प्रेरणास्पद आलेख के लिए तिवारी साहब का सलाम इन ब्रह्मरिशी को और आपको धन्यवाद !

ज़ाकिर हुसैन said...

आत्मा जगाने वाले इस प्रेरणा भरे प्रसंग से रु-ब-रु कराने के लिए शुक्रिया.

Nitish Raj said...

बहुत ही अच्छे विचार और साथ ही गलत ढ़ंग से पैसे कमाने वालों को सोचना चाहिए। और सच में राजा तो वो ही होता है।

सतीश सक्सेना said...

बहुत अच्छे राज भाई ! शुभकामनायें !

Udan Tashtari said...

आभार इन सदविचारों के लिये.

डॉ .अनुराग said...

सौ फीसदी सहमत हूँ राज जी आपसे

Alag saa said...

एक ऐसा सच जो सबके सामने है पर सब उस तरफ से आंखें मुंदे रहते हैं।
कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो सिर्फ सौ साल में सारी मानव जाति बदल जाती है। पर फिर भी लगे रहते हैं, मेरा-मेरा करने में।

निरन्तर - महेंद्र मिश्रा said...

बहुत सुंदर अभिव्यक्तिपूर्ण आलेख जिससे प्रेरणा मिलाती है . आभार

रश्मि प्रभा said...

in vichaaron ka main tahe dil se samman karti hun
bahut hi prernadayak hai

कुन्नू सिंह said...

एक दम सही लीखे हैं। और आपके हर लेख प्रभावीत करते रहते हैं मूझे।

"मेने आज सुबह भी एक टिपण्णी दी थी वो कहा गई????"
सुबह की टीप्पडी नही मीली। सायद blogspot मे कोई दिक्कत होगा।

और ई-मेल मे भी नही दीया है।

Anil Pusadkar said...

्क्या बात कही है भाटिया जी,बहुत सही।

दीपक said...

पैसा खाने मे नमक की तरह है भाटिया जी ज्यादा हो तब भी मुश्कील कम हो तब भी मुश्कील!!

अशोक पाण्डेय said...

कणाद ऋषि की यह प्रेरणादायक कथा सुनाने के लिए आभार। आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूं। गलत तरीके से अर्जित धन कभी भी स्‍थायी सुख शांति नहीं दे सकता।