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31/05/12

कलयुग आ गया ?

बहुत दिनो के बाद आज मन ने कहा चलो आज कुछ लिखे, तो सोचा क्या लिखूं? तभी मन ने कहा जो तुम इस दुनिया मे देखते हे वोही लिखो....यह कोई कहानी नही एक सच्ची घटना हे, जो आज मै आप सब के सामने रख रहा हुं कुछ आंखॊ देखी तो कुछ कानो सुनी... पिछली बार जब अपने शहर गया तो देखा कि बिल्लो भाभी(बदला हुआ नाम) जो उम्र मे हम से बहुत बडी थी, अपनी कोठी के गेट पर भिखारियो की तरह बेठी थी, बाल बिखरे हुये, लगता था शायद कई दिनो से नहाई ना हो,शरीर बहुत कमजोर सा,आंखे धंसी हुयी सी,तभी कोठी का गेट खुला ओर एक नोकर एक अखबार मे रात का बचा हुआ खाना भाभी के सामने रख गया, मुझे बहुत अजीब सा लगा, अजीब इस लिये कि कभी इस भाभी की आवाज ही इस घर का कानून होती थी, जो कह दिया सो कह दिया....ओर आज..... मैने भाभी को राम राम कही ओर उन के पांव छुये,थोडी देर तो मुझे ताकती रही फ़िर बोली राज तू कब आया, मैने कहा अभी अभी.... फ़िर भाभी खुब रोने लगी ओर अपने लडको को खुब कोसे ओर कहने लगी कि राज देख कलयुग आ गया हे, मैने इन बच्चो के लिये क्या कुछ नही किया ओर इन कमीनो ने अपनी बीबियो के कहने पर मेरा हाल क्या कर दिया....भाभी के पास से बहुत बदबू भी आ रही थी, मै कुछ देर बेठा ओर फ़िर अपने घर वापिस आ गया. फ़िर भाभी की बाते कि राज **कलयुग आ गया हे*** मेरे कानो मे गुजने लगी, मुझे वो दिन याद आये जब एक दिन अचानक मे भाभी के घर गया तो देखा था कि उस की सास घर मे झाडू पोंछे लगा रही थी, ओर भाभी आराम से ए सी रुम मे बेठी थी, जब की सास को गठिया रोग होने के कारण ऊठना भी कठिन था, लेकिन वो फ़िर भी चूतडो के बल घिस घिस कर पोंछे लगा रही थी, एक दिन भाभी के घर से बहुत जोर जोर से रोने की आवाज आई, हम सब पडोसी भागे गये तो देखा कि बुढिया सास गर्म पानी के कारण जल गई थी ओर चीख रही थी... जब हम सब गये ओर भाभी सफ़ाई देने लगी कि मेरे हाथ से गर्म पानी की बाल्टी गिर गई हे, ओर बुढिया बोली देख झुठ मत बोल मैने तुझे नहाने के लिये पानी मांगा तो तुने ठंडा बर्फ़ जैसा पानी दे दिया, जब मैने गर्म पानी देने को बोला तो तुने कहा ले मर नहा गर्म पानी से ओर सारी बालटी गर्म पानी की मेरे ऊपर उडेल दी....., एक दिन भाई घर पर था, किसी काम से जाना हुआ तो मां अपने लडके के पास बेठी थी, मैने पांव छुये तो बुढिया ने हजारो आशिर्वाद दिये, तभी भाई ने कहा कि चाल पियोगे, ओर हमारे मना करने पर भी हमारे लिये चाय ओर बिस्किट आ गये, हम ने वो बिस्किट ओर चाय के लिये बुढिया मां से पूछा तो उन्होने मना कर दिया, फ़िर मैने उस भाई से मां के बारे बाते शुरु कि तो पता चला कि मां को खाना भाभी की मर्जी से ही दिया जाता हे, बाद मे पडोसियो ने बतलाया कि दो दो दिन बुढिया भुखी रहती हे, ओर बचा हुआ खाना इसे दे दिया जाता हे, जब यह अपने लडको को कहती हे तो भाभी बीच मे बोल पडती थी कि मां की यादास्त खो गई हे यह खाना खा कर भुल जाती हे, मै तो इसे सही समय पर ही खाना देती हुं.... वगेरा वगेरा.... ओर भी बहुत सी बाते ऎसी ही थी,एक दिन भाभी ने बहुत सारा खाना बनाया ओर उस दिन बुढिया को नया सूट पहनाया अपने हाथो से नहालाया, एक सप्ताह तक यह नाटक चला, तो आसपडोस वालो ने सोचा शायद बहूं सुधर गई..... बाद मे पता चला कि कोठी अब बहू के नाम हो गई हे. कुछ दिनो बाद बुढिया कोठी के गेट पर टुटी हुयी खाट पर ओर कई साल तडप तडप के एक दिन उस ने उसी जगह दम तोड दिया जहां आज भाभी बेठी थी, यह सब बाते जो मैने यहां लिखी बहुत कम हे, पता नही उस बुढिया पर क्या कुछ बीता होगा, लेकिन दुसरे दिन मै भाभी के पास गया ओर वो फ़िर से कोसने लगी अपने बच्चो को तो मैने उसे एहसास करवाया कि भाभी इस जगह तुम्हारी सास कितने साल तडपी थी ओर उस के साथ क्या क्या हुआ था, उसे याद करो आप का समय गुजर जायेगा, हां भाभी..**कलयुग आ गया हे*** ओर इसे तुम ले कर आई थी अपने साथ..... ओर भाभी एक टक मेरी तरफ़ देखने लगी...... फ़िर दुर कही आसमान की तरफ़ देखने लगी..

13/12/11

आ रहा हुं मेरे वतन मै...

यह मेरी पोस्ट उस समय प्रकाशित होगी जब मे उडन खिटोले पर बेठ कर वापिस अपने देश की ओर आ रहा हुंगा, जब भी कभी ऎसे गीत सुनता हुं तो मुझे अपना बचपन, अपने बचपन के साथी ओर वो हर जगह याद आ जाती हे, यानि अपना देश याद आ जाता हे, चलिये आप सब को मेरी तरफ़ से नमस्ते, अगर आप क पास समय हो तो एक बार सांपला ब्लाग मिलन पर जरुर आये, वही आप सब से दिल भर कर बाते होंगी, कुछ आप लोगो की सुनेगे तो कुछ अपनी सुनायेगे, सांपला ब्लाग मिलन का समय ओर पता आप को मेरे अन्य ब्लाग पर*मुझे शिकायत हे* पर मिल जायेगा.... तब तक सब को राम राम.... ओर लिजिये इस सुंदर गीत का मजा...

24/10/11

दिपावली की शुभकामनाऎ...


आप सभी मित्रो को दिपावली की बहुत बहुत शुभकामनाऎ, यह वर्ष आप सब के लिये खुशहाली ले कर आये, ओर आप हर कदम पर तरक्की करे, आप सब के परिवार मे सब राजी खुशी रहे, आप सब को परिवार समेत दिपावली की शुभकानाऎ, बधाई....

08/08/11

आप सभी का धन्यवाद ओर नमस्कार

आप सभी के मेल, टिपण्णियां मुझे समय समय पर मिलती रहती हे, ओर जबाब देने मे मै थोडी आलस कर लेता हुं, ओर टिपण्णियां भी मै कभी कभार किसी किसी ब्लाग पर कर लेता हुं, मै नराज किसी से नही हुं, ओर ना ही ब्लाग जगत से अभी गया हुं, रोजाना आप सब के ब्लाग पढता हुं, पहले काफ़ी दिनो तक दिल की वजह से मेरी तबियत खराब रही, जिस का मुझे पता नही चला, ओर मै समझता रहा की शायद मोसम के कारण यह सब हो रहा हे, फ़िर अचानक एक दिन तबीयत बहुत खराब हुयी तो, मुझे अस्पताल जाना पडा, फ़िर दो दिन एमर्जेंसी मे बिताये, ओर फ़िर घर आ गया, ओर आराम की सलाह डा० ने दी, सारा दिन आप लोगो के ब्लाग पढता, लेकिन टिपण्णी देने की हिम्मत ना होती थी थकावट की वजह से,शरिरिक थकावट के अलावा दिमागी थाकवट भी बहुत हो गई थी, कुछ दिन पहले थो॑डा ठीक हुआ.


तो सुबह जल्दी उठा ओर सोचा कि आज से फ़िर कुछ लिखूं ओर आप सब को टिपण्णियां भी दुं, सुबह चाय पी ओर कुछ समाचार पत्र देखे जब ऊठा तो कमर मे झटका लगा, ओर वो दर्द आज तक बना हे, इंजेक्शन यहां डा० मुझे लगाते नही, क्योकि मै खुन पतला करने के लिये गोलिया खाता हुं , तेज दवा ले नही सकता, इस लिये फ़िर से आप  सभी को टिपण्णियां नही लिख पा रहा, ओर ना ही कोई लेख लिख पा रहा हुं, कल बेटे को बोला कि मेरी टांगे पेरो से पकड कर बारी बारी झटका मार कर खींचो( ऎसा मैने बचपन मे देखा था) सो बेटे ने तीन चार बार पेर पकड कर झटका मारा, तब से ६०% आराम हे, लेकिन दर्द अभी भी बना हुआ हे, थोडा कम हे, शायद इस सप्ताह ठीक हो जाये.

वैसे तो मै परवाह नही करता, लेकिन जब शरीर मे दुख हो तो मन किसी बात  मे नही लगता, ओर मै करीब दो महीने से घर पर ही बेठा हुं, आराम ओर सिर्फ़ आराम शायद १६ से फ़िर से अपनी दिन चर्या शुरु करुं, तभी आप लोगो के बलाग पर टिपण्णियां भी जरुर दुंगा, वैसे पढाता बहुत से ब्लाग हुं, पुरानो के संग नये ब्लाग भी, तो सा्थियो अगर भगवान ने चाहा तो बहुत जल्द आप सब के बीच आऊंगा, तब तक सब को हाथ जोड कर नमस्ते, सलाम, राम राम

07/06/11

भाई कुछ दिनो बाद आऊंगा...

आज कल अपने देश की खबरे देख सुन कर दिमाग खराब होता हे, कहां हम विदेशो मे देखते हे, ओर सोचते हे हम तो इन से ज्यादा मेहनती हे, ओर हमारे देश मे सब कुछ होता हे, ओर हमारे देश मे शिक्षा की भी कमी नही, फ़िर क्यो हम एक एक रोटी को तरसते हे, मै कुछ लोगो की बात नही करता, कुछ लोगो के पास तो इतना हे कि अगर वो दोनो हाथो से लुटाये तो भी खत्म ना हो, मै तो आम भारतिया की बात कर रहा हुं.
अब पिछले दिनो जो देखा सुना, इन सब बातो से दिमाग सुन्न हो गया, अगर ऎसे नेता विदेश मे होते तो कभी के माफ़ी मांग कर सारा धन वापिस कर के कही  शर्म से मुंह छुपे होते, लेकिन हमारे यहां तो एक चोरी फ़िर सीना जोरी.... यह सब देख कर आजकल मन बेचैन हे, इस लिये कुछ समय मै ब्लाग से दुर ही रहना  चाहता हुं, क्योकि हर किसी के अपने अपने विचार हे, ओर मै नही चाहता कि मेरा किसी से विचारो मे टकराव हो, जब मुड ठीक होगा वापिस आऊंगा,  राम राम

03/06/11

क्रिकेट मेच का जब हमने अपने दोस्तो के संग देखा...

यह पोस्ट मैने बहुत पहले लिखी थी, किसी कारण यह नजरो मे नही पडी यानि आंख बचा कर छुप गई थी आज इसे मिटने लगा तो सोचा अरे नही इस पोस्ट ही कर देता हू; तो लिजिये....

 इस बार मेरे यहां मेच का लाईफ़ प्रसारण आ रहा था, ओर मैने इस बार भारत के कई मेच देखे, आस्ट्रेलिया को हराया, फ़िर पाकिस्तान को रोंदा यह सब देखा धडकते दिल से, हमारे बुजुर्ग हे ग्याणेशवर दयाल गुप्ता जी, लेकिन सब उन्हे इज्जत से दयाल जी कहते हे,जब हमारा मेच पाकिस्तान से था उस वाले दिन उस का फ़ोन बार बार आये कि हाय हम तो हार रहे हे... जब कि मै उन्हे बार बार कह रहा था, द्याल जी होसल्ला रखे, जब जीत गये तो मैने उन्हे बताया, कि मै तो टी वी पर देख रहा हुं. फ़िर तय हुआ कि कुछ परिवार जिन के पास मेच लाईव नही आ रहा, मै उन्हे अपने घर आने का निमत्रण दुं,

फ़िर मैने सब से पहले दयाल जी को बीबी समेत आने का निमत्रंण दिया, फ़िर ड्रा० नरेश जी को जो क्रिकेट के दीवाने भी हे, ओर हमारी बीबी ने दुसरे दिन के खाने के लिये सब्जियां बगेरा सब बना ली, ओर मैने मेच के दोरान खाने का समान पहले ही तेयार कर लिया, (पिस्त्ता, काजू, कार्नफ़लेक्स, दाल भुजिया ओर पान)

सुबह जल्दी उठे ओर बीबी ने अपनी रोजाना की पुजा पाठ कि, मै भी आज सुबह सवेरे नहा लिया, ओर फ़िर तंगडा नाश्ता किया, इतने मे कब दस बजे पता ही ना चला, फ़िर टी वी चालू किया, मेदान मे काफ़ी लोग इधर उधर घुम रहे थे, थोडी देर मे ही कार्य कर्म शुरु हो गया, जब दुसरी बार टास हुआ तो द्याल जी सपत्निक आ गये, ओर फ़िर दोनो देशो का राष्ट्रिया गान शुरु हुआ, टास हारने से दिल को एक झटका सा लगा,

फ़िर सभी खिलाडियो ने अपना अपना स्थान सम्भाल लिया,ओर अभी दो बाल ही खेले थे कि इतनी देर मे ड्रा० नरेश सपत्निक ओर अपने छोटे बेटे के संग आ गये, सब ने जल्दी जल्दी अपनी जाकेट बगेरा मुझे पकडाई ओर टीवी के सामने बेठ गये,ओर श्री लंका-भारत का खेल देखते रहे, पुरा खेल ठीक रहा लेकिन अंत मे जब लंका ने काफ़ी रन बटोरे तो हम सब प्राथना करने लगे कि यह सब आऊट हो जाये, क्योकि हम सब ने पहले ही आंदाज लगाया था २४०-५०.... चलिये राम का नाम ले कर खेल खत्म हुआ, हमारे यहां शायद २ या २,३० बज गये थे, हमारी बीबी ओर मिसेज दयाल जी ने मिल कर झट पट रोटिया बनाई, सब ने मिल कर खाना खाया, ओर मैने जल्दी जल्दी बरतन मशीन मे डाले दिये, इतनी देर मे मेच भी शुरु होने वाला हो गया, दयाल जी को फ़िक्र हो रही थी कि कही मेच हार ना जाये, लेकिन हम ने कहा दयाल जी हमारे शॆर भी जीतना चाहते हे, बेफ़िक्र रहे...

अब भारत का खेल शुरु.... पहली बाल , फ़िर मालिंगा ने दुसरी बाल फ़ेंकी... ओर एक जबर दस्त झटका... दयाल जी को पहले तो पता ही नही लगा, जब हम ने बताया कि सहवाग गया तो बोले हम  गये... इतना बडा स्कोर ओर  टाप के खिलाडी.आऊट.., तभी गंभीर  आये खेल कुछ आगे बढा उन का पावर पले साफ़ लिखा था, तभी ६ ऒवर की पहली गेंद पर सचिन जी गये.... अब तो यह झटका पहले से ज्यादा लगा, लेकिन हम ने सोचा अभी हे हमारे ओर भी अच्छॆ खिलाडी, लेकिन दिल मे डर ओर दयाल जी बीच बीच मे बोल कर हमे ओर भी डरा दे, चलो अब तो हार गये  , हम दयाज जी को बार बार बोले रहे थे... दयाल जी ऎसे ना बोले...

अब गंभीर का साथ देने आये बिराट कोहली जी, अंदर से मै भी ओर बाकी सब देखने वाले थोडा डर तो गये, लेकिन कही दिल से आवाज आई कि आज तो हमी जीतेगे, ओर ड्रा० नरेश यही कह रहे थे कि इन की जोडी जम जाये, दयाल जी बार बार कहते अरे बडी धीरे धीरे रन बना रहे हे, यह चोके छीके क्यो नही मार रहे, अगर ऎसे ही खेलते रहे तो हम हार जायेगे, तो ड्रा० नरेश जी ने समझाया कि दयाल जी देखो हमारा रन रेट श्री लंका से अच्छा हे, यह दोनो सही खेल रहे हे, अगर ऎसे भी खेले ओर जम जाये तो हम जीत सकते हे,

खेल थोडा जम गया ओर हम सब मे जान आई, चेहरो पर थोडी चमक, अभी २१ ओवर ओर तीन बाल ही खेले थे, यह ऒवर दिल शान का चल रहा था, ओर अगली बाल पर ही उस ने अपना बदला ले लिया, यानि गंभीर आऊट, अब हम सब को बेचेनी हुयी, कि कही सच मे ही आज शर्मनाक हार ना हो जाये, अब तो दयाल जी ने भी कह दिया कि अब तो अच्छॆ खिलाडी गये, धोनी ने इस बार अच्छा नही खेला, अब तो जरुर हार जायेगे, मैने ड्रा० नारेश ओर उन की बीबी की ओर देखा फ़िर मैने कहा नही दयाल जी आज तो हम जरुर जीतेगे, आप हिम्मत ना हारे.

 फ़िर धोनी जनाब आये, लेकिन हम लोगो को धोनी से उम्मीद कम ही थी, लेकिन अच्छा खिलाडी हे इस लिये नाउम्मीद भी नही हुये, अब ड्रा० नरेश कहने लगे अब इस जोडी को जमना चाहिये, ओर उन की बात सही निकली, ओर यह जोडी जम गई, अब मलिंगा या कलिंगा को लेने के देने पड गये, ओर उस के सारे उपाय बेकार, अब हम लोगो के चेहरे पर बहुत चमक आ गई कि अब जीत करीब आ रही हे, दयाल जी फ़िर बोले कि यह रन धीरे धीरे बना रहे हे, इन्हे चोकै छक्के मारने चाहिये अभी अभी ४१ ऒवर शुरु हुआ, केप्टन धोनी ने गंभीर से कुछ कहा, ओर गंभीर के ९७ रन थे, हमे उम्मीद थी की यह शतक जरुर बना लेगा, लेकिन ४१वे ऒवर की दुसरी गेंद पर.....गम्भीर भाई आऊट, लेकिन अब डर थोडा कम हो गया था हार का, लेकिन फ़िर भी थोडा डर था, उम्मीद थी तो अभी युवराज , रेना, भज्जी पर.

तभी युवराज आये ओर उन्होने अंत तक धोनी का साथ निभाया, अब स्क्रीन पर गेंद ओर रनो का अंतर दिखा रहे थे, दयाल जी बार बार बोल रहे थे कि गेंदे कम हे ओर रन ज्यादा, तो हम उन्हे कह रहे थे कि दयाल जी ज्यादा अंतर नही, यह आखरी पांच ऒवरो मे कवर कर लेगे, ओर फ़िर धीरे धीरे अंतर खत्म अब बराबर बराबर थे बाल ओर रन... फ़िर धीरे धीरे बाल ज्यादा होगी ओर रन कम ओर फ़िर जब अंत मे धोनी ने छक्का मार कर जीत हासिल की तो कमरे मे बेठे सभी लोगो ने बहुत जोर से हल्ला मचाया जरुर हम सब की आवाज पुरे गांव मे सुनाई दी होगी, तभी ड्रा नरेश ने कहा अगर शहर मे होते तो अभी तक पुलिस आ गई होती, फ़िर मैने सब मे मिठ्ठाई बांटी( यह मिठ्ठाई ड्रा नरेश जी ले कर आये थे, अब रात के ७,३० होने वाले थे, बीबी ने जल्दी जल्दी चाय काफ़ी बनाई समोसे गर्म किये केक काटा ओर सब ने मिल कर खाया, ओर फ़िर सब रात ९ बजे अपने अपने घर चलेगे, हां भारत जीतते ही भारत से सभी को बहुत फ़ोन आये, अब द्याल जी को भी समझ आ गई कि अगर भारतिया टीम जल्द वाजी मे खेलती तो रजल्ट कुछ ओर होना था, हमारी टीम ने आराम से खेला ओर रन रेट कम नही होने दिया, कोई जल्द वाजी नही दिखाई, जब की श्री लंका की टीम दिन मे भी ओर दोपहर बाद भी साफ़ दबाब मे दिख रही  थी,चलिये अब मेच खत्म, आप लोगो ने देखने  समय क्या महसुस किया जरुर लिखे

17/05/11

बुरी नज़र वाले......

बुरी नज़र वाले, तेरा मुंह काला “रिश्ते में लगता तू साला,
बुरी नज़र वाले तेरा मुंह काला.”

“बुरी नज़र वाले, तेरे बच्चे जियें, बड़े होकर, देसी शराब पियें”
“छोटा परिवार, सुखी परिवार एक या दो, बस “

शेर दो हों मगर सलीके के, घर को ऐसी ग़ज़ल बनाना है
“चल हट, कोई देख लेगा"

“देखो मगर प्यार से"
“दुल्हन वही जो पिया मन भाये, गाड़ी वही जो नोट कमाए"
“काला कुरता, काला चश्मा, काला रंग कढाई का, एक तो तेरी याद सताए, दूजा सोच कमाई का."
“चलती है गाड़ी, उड़ती है धूल, निकलता है पसीना, बिखरते हैं फूल"
“अमीरों की ज़िन्दगी, बिस्किट और केक पर, ड्राईवर की ज़िन्दगी, क्लच और ब्रेक पर.
" बीवी रहे टिपटॉप दो के बाद फुल स्टॉप
बुरी नज़र वाले तू जिए, और तेरा बेटा बड़ा होकर तेरा खून पिए

03/04/11

मस्ती मस्ती ओर मस्ती.....

भाई हम कई दिनो से मस्ती के मुड मे थे... लेकिन बहाना नही मिल रहा था, कि कैसे आप सब को छोड कर जाये, फ़िर यह क्रिकेट आ गया, जिसे मै बिलकुल पसंद नही करता, लेकिन पिछली बार जब आस्ट्रेलिया से हमारा मेच था तो मुझे एक भारतिया होने के नाते इस देश की करतूतो से इस देश से खूंदक थी, तो सोचा चलो अपने देश को जीताये... फ़िर पाकिस्तान आ गया, यह तो उस से भी बडी खुंदक इसे भी जीता दिया.... बाप रे अब सामने कप दिखा तो इसे भी तो घर ले कर आना था, तो सारा जोर इसे लाने पर लगा दिया, फ़िर मस्ती ही मस्ती.. ..
ओर अब  सोचा थोडे दिन इस ब्लागिंग से दुर रहे, ओर मस्ती करे..... तो आप सब को राम राम मिलते हे ब्रेक के बाद... ओर हां नीचे कुछ टिपण्णियां छोड रहा हुं, जिसे चाहिये वो इज्जत से इसे ले कर मेरी तरफ़ से अपने ब्लाग पर मेरे नाम से लगा सकते हे... राम राम

१ बहुत सुंदर
२अति सुंदर
३बहुत सुंदर प्रसुति
४अति सुंदर प्रसुति
सुंदर ओर भावुक रचना
सुंदर ओर भावुक लेख
वाह वाह मेरी मन की बात लिख दी
आप के लेख से सहमत हे
क्या बात हे
आप के लेख ने मन के तार छु लिये
वगेरा वगेरा...
ओर आप सब को भारत की जीत की बहुत बहुत बधाई..
मिलते हे ब्रेक के बाद कभी किसी मोड पर.......

10/03/11

कुछ कुछ होता था?

आज के दिन  शाम से ही हमारे दिल मे कुछ कुछ हो रहा था, पता नही क्या हो रहा था? फ़िर घर वाले  सारी बिरादरी ओर जानपहचान वालो को ले कर हमारे संग दिल्ली की ओर चल पडे, रास्ते मे चाय पानी पिया, फ़िर दिल्ली मे पुरानी सब्जी मंडी के पास सब इकट्ठे हुये , ओर मित्र रिशते दार भी आ गये, सभी बहुत ही तेश मे थे, जेसे कही हमला करना हो.... कुछ लोग जोश लाने के लिये पेग पर पेग पी रहे थे, एक हमी हेरान परेशान से खडे थे.

तभी पता चला कि कुछ नोजवानो ने ज्यादा पी ली हे, ओर वो अपनॊ अपनी कमीजो से बाहर आना चाहते हे, हम ने झट से संगीत का कार्य क्रम बना दिया ओर वो सब अपना अपना नशा वहां जा कर उतारने लगे, कुछ अंजान लोग हमे बार बार आ कर तंग करते थे, कि आप ठंडा पी ले, चाय पी ले, काफ़ी पी ले..... अब हमे तो अच्छी तरह से लपेट रखा था, यानि एक तरह से केद कर रखा था, चेहरा भी खुब  ढका हुआ था.

फ़िर हमे किस बडी सी जगह पर ले जाया गया, बाप रे..... वहां पहुच कर हमे पता चला कि यह लडकियां भी किसी से कम नही होती, अजी कोई आये इधर से चुटकी मार कर खिल खिला कर हंस पडे कोई उधर से, सच कहे तो हमे लाल टमाटर सा पिल पिला कर दिया होगा, पता नही कितने घंटॆ यह सब चलता रहा.

 तभी कही धमाको की आवाजे आई, जेसे कोई दुर आतिशबाजी छोड रहा हो, फ़िर हमारे मुंह मे अलग अलग लडकियो ने खाना ढुंसा, पता नही केसे आधी रात हो ही गई, फ़िर हमे लोगो ने ऎसे घेरा जेसे बलि के बकरे को घेरते हे, कि कही भाग ही ना जाये, ओर हमे एक खास जगह ले आये, भाग भी नही सकते थे, चारो ओर से मोटे ताजे मर्दो ओर ओर्तओ ने जो घेर रखा था, फ़िर हमे एक बहुत मोटे ताजे आदमी के सामने बेठने को बोला गया, हम चुपचाप बेठ गये, अब भला बलि के बकरे से भी कोई पुछता थोडे हे, ओर बकरा भी चुप रहता हे.

ओर वो मोटू पता नही हमे घुर घुर कर देख रहा था, साथ मे पता नही क्या क्या बोल रहा था, फ़िर उस ने हमे हुकम दिया कि हमारे पीछे पीछे तुम भी बोलो, अब हमे समझ तो नही आ रही थी, लेकिन उस के पहले शब्द को बोल कर बाकी हम भी भुभुभु भु कर रहे थे, वहां बेठे सभी लोग हेरान थे कि यह बकरा तो बहुत ग्यानी हे, कुछ समय बाद एक कन्या को हमारे पास बिठा दिया, हम थोडा सुकचाये सिमटे, तभी दुसरी तरफ़ बेठी एक अति सुंदरी ने फ़िर से हमे जोर से चुटकी मारी.

अरे यह कया उस मोटे ने इस कन्या को हमारे पल्लू से बांध दिया, ओर आज तक हमारी हिम्मत नही हुयी उस गांठ को खोल सके, अब हम जहां भी जाते हे, यह कन्या भी हमारे साथ साथ रहती हे, फ़िर इस गांठ को पक्का करने के लिये दो प्रमाण पत्र भी हमारे घर आ गये,यानि आज के दिन ११ मार्च १९८७ को हमारी आजादी हलाल हो गई थी, उस दिन को हम अकसर भुल जाते हे, इस बार आज ही हमे याद दिलाई गई हे इस दिन की, पता नही केसे मनाते हे, बाहर खाना तो मै खाता नही ....जेसे भी मना मना ही लेगे, वेसे दो दिन से हल्का सा जुकाम भी हो रहा हे

09/02/11

ज्ञानोदय

आईये आज आप को एक मित्र( सुशील गुप्ता जी ) से मिलवाये, मुझे इन से मिलवाया था अंतर जी ने, ओर यह काम करते हे शाली मार बाग मे, तो मुझे एक दिन अंतर जी ने जब मे दिल्ली गया तो पूछा की इन मित्र की मदद कर सकते हे, हिन्दी का टूल इंस्टाल कर दे इन के पी सी पर, मैने कभी भी दुसरे पीसी पर हाथ नही चलाया, लेकिन इन के पीसी पर थोडी बहुत अडचन आई लेकिन टूल (बारहा) इंस्टाल नही हुआ,

फ़िर इन्होने ने पूछा कि अगर आप के पास समय हो तो मेरे लिये भी एक ब्लाग बना दे, अजी हम ने उस समय तो काम चलाऊ सा ब्लाग बना दिया, लेकिन दिल मे यही कसक थी कि  यार ब्लाग किसी भी तरह से बने बनाना चाहिये था, ओर इन्हे ज्यादा समझा भी नही सका, फ़िर अंतर ने इन्होको एक हिंदी का टूल ईस्टाल कर दिया, इन्होने एक दो  फ़िर चार पांच पोस्टे लिखे, लेकिन पढे कोन? जब कि इन्हे कोई जानता भी नही, ओर किसी एग्रिगेटर मे भी शामिल नही हे.

अब इन की एक नयी पोस्ट आई मुझे बहुत अच्छी लगी, लेकिन पता नही इन्होने खुद लिखी हे या कही से कापी पेस्ट की हे, जो भी हो हम सब को इन्हो का होस्सला बढाना चाहिये, तो चलिये इन के सुंदर विचार को पढे ओर अपने विचार इन्हे खुद इन के ब्लाग पर दे, धन्यवाद, नीचे इन की पोस्ट का कुछ हिस्सा..

जय श्री राम                  ज्ञानोदय           जय श्री राम                                       

हमने जरूर कुछ ऐसा किया है या कर रहे हैं जिसके कारण हम दुखी हैं।  परमात्मा कभी भूल नहीं करते, प्रकृति कभी गलत नहीं करती।  हम अपनी जिन्दगी को देखें, हमने जो भी कुछ दिया है, वही मिल रहा हैबाकी पढने के लिये यहां जाये ओर इन का होस्स्ला बढाए

31/01/11

वो सब क्या था....

चलिये आज आप को हम भारत ले चले, एक बात बताने ओर पुछने के लिये....
अभी नवम्बर मे जब मै भारत आया, तो मोसम बहुत अच्छा था, ओर मै इस बार कुछ ज्यादा समय के लिये आया था, काम तो कोई खास नही था, बस युही मन बनाया ओर आ गया, कई बार सोचा कि चलो कही घुम आये, लेकिन बच्चो के बिना कहां मजा  घुमने का, फ़िर दोस्तो ने दिल्ली से कहा, ओर ससुराल वालो ने भी कहा कि अरे कहां होटलो का खाना खाओगे, हमारे यहां दिल्ली मे ही रह लो,लेकिन हम ने मुंडी हिला कर मुस्कुरा कर सब को मना कर दिया,ओर बता दिया कि इस बार खाना तो हम घर पर ही बनवायेगे ओर घर पर ही सोयेगे.

दुसरे दिन हम रोहतक पहुच गये, रास्ते मे अन्तर सोहिल जी मिल गये, ओर यह सारा दिन उन के संग रोहतक मे बिताया, रात को वो चलेगये, तो हम भी सोने  चलेगये, फ़िर दुसरे दिन नाशते मे सिर्फ़ ब्रेड ओर अंडे ही खाये फ़िर खाने का जुगाड ओर खाना बनाने वाली को ढुढा,

अब कोई काम तो था नही घुमे, खाया घुमे फ़िर खाया फ़िर घुमे... या फ़िर हम अपने बारमदे मे बेठ कर हर आते जाते को देख लेते, जो भी आता जाता हमे नमस्ते करता हम भी हाथ जोड कर जबाब दे देते, पहचानाने के लिये हमे समय लगता था, ओर जिसे पहचान गये उन से चार बाते कर लेते, एक दिन हम बारमदे मे बेठे धुप सेक रहे थे, तभी एक तरफ़ से दो स्कुटर आये, जिस पर दो लडकियां बेठी थी, पुरा मुहं ढ्के ओर ऊपर से सर को भी पुरी तरह से ढक रखा था,बिलकुल सुलताना डाकू की तरह से.

हम ने तो ऎसी नारिया अपनी जिन्दगी मे पहली बार देखी थी, फ़िर हमारे पास समय ही समय था, ओर हमारी रुचि उन सुंदरियो मे बढी, ओर हमारी नजर उन का पीछा करने लगी, (हमारी सडक मे एक तरफ़ सात ही मकान हे, दुसरी तरफ़ भी सात ही मकान हे, ओर हमारा घर बिलकुल बीच वाला हे यानि तीन इधर तीन उधर)
 अब वो लडकियां सडक के दुसरे कोने से थोडा पहले ही रुक गई,  ओर वही स्कूटर को स्टार्ट रख के खडी हो गई, हम भी उन्हे देख रहे हे चोरी चोरी, तभी देखा कि कोने वाले मकान से एक नोजवान आया ओर कार का दरवाजा खोल कर(लांक) चला गया, फ़िर एक लडकी अपने स्कुटर से नीचे उतरी, स्कुटर को बन्द किया सर से ओर मुंह से दुपटा हटाया ओर कार मे जा कर बेठ गई, थोडी देर बादएक अन्य नोजवान आया ओर उस स्कुटर को ले कर चला गया, फ़िर एक पहले वाला नोजवान आया ओर कार को ले कर वहां से निकला ओर फ़िर वापिस मेरे घर के सामने से चल गया, अब लडकी ने मुंह पर रुमाल रख लिया था,  यह सब देखा तो मुझे अजीब लगा....

उसी दिन शाम को करीब ४,५ घंटो के बाद मै अपनी मोसी के घर बेठा था, भाभी चाय बना कर लाई, तो मैने उन से युही बाते कर रहा था, कि तभी वो कार दिखाई दी, मैने भाभी से कहा कि यह कार अब वहां जा कर रुकेगी, फ़िर इस मै से एक लडका निकल कर जायेगा, फ़िर एक दुसरा लडका स्कूटर ले कर आयेगा, फ़िर इस कार से एक लडकी निकलेगी, ओर अपना मुंह डाकू की तरह से ढक लेगी, फ़िर उस स्कूटर पर बेठ कर हमारे सामने से जायेगी, फ़िर पहले वाला लडका उस कार को बंद करने आये गा, मेरी बाते सुन कर भाभी बोली तुझे केसे पता.... तो मैने कहा अब पहले देखो, तो वो कार दो चक्कर मार कर अपनी जगह रुकी.... ओर वही सब जो मैने भाभी को बताया हुआ, अब भाई ने पुछा कि तुझे यह सब केसे पता था? तो मेने बताया कि मैने इन्हे दोपहर को देखा था.... अब यह सब क्या था? मुझे नही पता, ओर मेने वहां कोई पंगा भी नही लिया

15/01/11

हमारे बचपन की स्कूल की फ़ोटो ओर दो अन्य फ़ोटो

यह चित्र तो मैने बस युही मजाक मे डाल दिया था, लेकिन आप सब ने इसे पहेली बना दिया, ओर मुझे भी बहुत रोचक लगा, अब मै बताता हुं मै कहां बेठा हुं, ओर साथ मे अपने बचपने के दो चित्र भी दे रहा हुं...

नीचे चित्र मे देखे, नीचे से दुसरी लाईन मे एक बच्चा सलाम या सेलूट मार रहा हे इसी लाईन मे आगे चले यानि इस  से आगे एक बच्चा छोड कर, जिस बच्चे ने बन्द गले का स्वेटर पहन रखा हे या इसी लाईन मे तीसरा बच्चा, अब सबूत के तॊर पर आप को अपने दो अन्य चित्र भी साथ मे दे रहा हुं, एक मे लडकियो की तरह दिखाई देता हुं( इसी लिये मुझे लडकियो से बहुत प्यार हे :) ) दुसरे मे एक सरदार सा दिखाई दे रहा हू.



फ़ोटो को बडा करने के लिये फ़ोटो पर किल्क करे









अब बहुत से साथियो ने सही पहचाना , जेसे... ज्ञानचंद मर्मज्ञ जी ने कहा नीचे से दूसरी पंक्ति में बांये से तीसरे !
फ़िर जबाब आया anshumala  जी का उन्होने कहा कि...नीचे से दूसरी लाइन में जिस तरफ बच्चा सलामी ठोक रहा है उस तरफ से तीसरे | पर ये बताइये की सही बताया तो मिलेगा क्या | आप जो कहे मै दुंगा!!
फ़िर जबाब आया   दर्शन लाल बवेजा  जी का उन्होने भी कहा नीचे से दूसरी पंक्ति में बांये से तीसरे !
ऎसा था हमारा बचपन, मैने अपना बचपन कई शहरो मे बिताया हे पंजाब के होशियार पुर मे जन्मा, फ़िर हिमाचल मे एक गांव निग्गी मे , फ़िर दिल्ली, फ़िर आगरा, फ़िर नेपाल, फ़िर दिल्ली, फ़िर रोहतक ओर भी  कई शहरो मे रहा, यानि हम जन्म से ही विदेशी थे, ओर होशियार पुर कभी दोवारा नही गया.
आप सभी का धन्यवाद मेरे चित्र को देखने ओर दाद देने ओर पहचानने के लिये, ओर बताईये यह दो नये चित्र केसे लगे,

13/01/11

बचपन की एक फ़ोटो...

यह नीचे दिया चित्र  मेरे बचपन के समय का हे, अगर किसी के पास ऎसा चित्र हो या, वो खुद इस चित्र मे हो तो मुझे जरुर बतलाये, यह चित्र हे दिल्ली का, जब हम शादी पुर डिपो के पास रहते थे, शायद उस जगह को शास्त्री नगर कहते हे, ओर यह स्कूल शादी पुर मे थोडा आगे जा कर एक लम्बी सी गली से गुजर कर था, सारा मुझे याद नही, सन भी याद नही कलास भी याद नही, सन शायद १९६०,६१,६२ हो सकता हे, कलास पहली हो सकती हे, ओर स्कुल का नाम भी याद नही, हां हो सकता हे जब मै वहां जाऊ तो गलियो से गुजर कर इस स्कुल तक पहुच जाऊ, लेकिन इस फ़ोटो के सिवा कुछ याद नही.

तो आप इस चित्र को ध्यान से देखे, अगर आप मे से कोई इस चित्र मे हो तो जरुर बतलाये, यह शादी पुर  का उस समय का फ़ोटो हे, जब वहां चारो ओर जंगल ही जंगल था, तो ध्यान से इस चित्र को देखे ओर बतालाऎ कि हम कहां हे इस चित्र मे:)


चित्र पर दो बार किल्क करने से यह दो गुणा बडा हो जायेगा, फ़िर देखे ओर बतलाये
इतवार को हम बतयेगे कि हम कहां हे इस चित्र मे

 नमस्कार यह रहा एक बडा हिंट, इसे देख कर ढुढे ऊपर वाली फ़ोटो मे मेरी फ़ोटो, हमारे परिवार मे लडकियां बहुत कम थी, इस लिये मेरी मां मुझे तरह तरह से सजाती संवारती थी, आज भी हमारे परिवार मे जब लडकी पेदा होती हे तो सब को बहुत खुशी होती हे, देखा मेरे बाल कितने लम्बे थे, चलिये अब जल्दी से ऊपर वाली फ़ोटो मे मुझे ढुढे

08/01/11

कुछ फ़ोटो ब्लाग मिलन के...

रोहतक मेरा शहर नही, लेकिन मैने जिन्दगी के कुछ साल यहां बिताये हे, ६,७ साल, मेरे माता पिता जी ने यही घर बना लिया,मै उस घर मे  कई साल  रहा, फ़िर यहां आ गया, लेकिन उस समय इस घर को बनाने मे जो मेहनत हम सब को करनी पडी वो मेरे सामने हुयी थी, मेरे दादा जी ने मुहुरत के समय सब से पहले एक ईंट रखी थी, जिस की चर्चा मेरे पिता जी हमेशा करते थे, कि मकान की पहली ईंट किस स्थान पर रखी हे, तो मै झट से बता देता था कि उस कोने पर, ओर पिता जी की आंखो मै आंसू आ जाते थे.....

फ़िर पिता जी ने मेरे हाथ पकड कर कहा कि जब तक हो सके तब तक इस मकान को बेचना नही, इस मे हमारी मेहनत ओर प्यार बसा हे, फ़िर पिता जी चले गये, कुछ समय बाद मां भी चली गई...... भाई ओर उस की बीबी ने इसे बेचना चाहा, जब मुझे पता चला तो मैने उन्हे रोका, ओर अब वहां पुरा ध्यान रख रहा हुं.


यह सब इस लिये लिखा हे, कि आप को उस ब्लाग मिलन की फ़ोटो दिखाने से पहले यह बता दुं, कि यह मकान जहां मै ओर अन्य ब्लागर एक दो राते रुके, मै तो करीब आठ राते रुका, जहां कोई कुर्सी नही थी, कोई बेड या चारपाई नही थी, कोई बरतन नही था, यानि घर मे कुछ नही था, लेकिन मुझे वहां रुक कर जितना आनंद आया मै इस लेख मे लिख नही सकता, मुझे ऎसा लगा कि मै अपने मां बाप की गोद मे रहा, जिन्दगी के वो आठ दिन मेरी जिन्दगी के सब से सुंदर दिन थे, बिना गद्दे के भी मुझे बहुत अच्छी नींद आई, घर का हर कोना मुझे अपना सा लगा.

ओर हां अंतर भाई ने कहा था कि उन की एक भी फ़ोटो ब्लाग मिलन मे नही आई, मेरे पास उन की बहुत सी फ़ोटो हे, केमरा मेरे भाई के बेटे के पास था,शायद उसे फ़ोटो खिचनी नही आती थी, इस लिये ३०० फ़ोटो मे से मुश्किल से मैने कुछ फ़ोटो ही निकाली हे, ओर यह भी साफ़ नही, लेकिन फ़िर भी चलेगी.... तो देखिये....

किसी भी चित्र को बडा कर के देख सकते हे, बडा करने के लिये चित्र पर किल्क करे

































                                                                                                                               


चलिये अब मिलेगे अगले ब्लाग मिलन मे, अगर समय ने साथ दिया तो

25/12/10

भारत जाते समय के किस्से..

इस बार जब भारत गया तो बेटा मुझे एक घंटा पहले ही एयर पोर्ट पर छोड आया था,सब कुछ तो मैने घर से ही कर लिया था, बस समान दिया ओर चेकिंग से गुजर कर वेटींग हाल मे पहुच गया, कुछ समय बाद ही हम जहाज मे बेठ गये, पेरिस तक की यात्रा थी करीब ४५ मिंट की बाकी आधा घंटा उतरने चढने मै लगा, घर से सिर्फ़ चाय पी कर निकला था, ओर जहाज मे भी सिर्फ़ एक छोटा सा बिस्किट मिला ओर एक संतरे का जुस.जहाज खुब भरा था, मेरे साथ दो ओर बेठे थे, सभी बापू के बंदर की तरह से चुप रहे.

पेरिस पहुचते ही मैने अगले टर्मिनल की तरफ़ कूच किया, मेरे पास सिर्फ़ एक घंटा ही था, ओर सारी चेकिंग बगेरा अभी होनी बाकी थी, जल्द बाजी मे मै कब बाहर निकल गया पता ही ना चला, लेकिन बाहर आ कर मुझे लाभ हुया, बीच से जाता तो काफ़ी चलना पडता, बाहर से गया तो दो मिंट मै पहुच गया अपने ट्रमिनल पर. वहां फ़िर से चेकिंग हुयी, ओर फ़िर से पासपोर्ट चेक हुया( इमिग्रेशन) फ़िर जब वेटिंग रुम की तरफ़ पहुचा तो लोग जहाज मे घुस रहे थे, हम भी लाईन मै लग गये,

जहाज मै अपनी सीट सम्भाली खिडकी के संग, ओर वेल्ट बांध कर तेयार हो गये, एक सीट छोड कर एक गोरे सज्जन बेठे थे, मेरे साथ वाली सीट अभी खाली ही थी, तभी एक बुजुर्ग से दिखने वाले एक सज्जन आये ओर नम्बर मिलाया, फ़िर एयर होस्टेज के पास गये, हुया यु कि उन की सीट मेरे साथ थी, ओर उन की बीबी की सीट आगे थी, अब एयर होस्टेज ने हमे इशारे से पुछा तो हम ने कहा कि हमे तो खिडकी वाली सीट चहिये, गोरे ने भी मना कर दिया,अब सज्ज्न ने हमे पुछा कि भाई आप तो अपने लगते हे, तो सीट बदल लो ना, ओर हम ने बेमन से उन से सीट बदल ली, अब हम दो गोरो के बीच फ़ंस कर बेठ गये, एक तरफ़ फ़्रासिसि था, तो दुसरी तरफ़ एक अमेरिकन महिला, जब हम सीट बदल रहे थे तो हमारा हाथ इन महिला के सर से थोडा टच हुआ था, उस समय इन्होने अपना शक्ति प्रदर्शन हमे दिखा दिया था, ओर हम ही ही कर के चुप रहे थे, ओर फ़िर चुप चाप बेठ गये उस सीट पर.

जनाब अब जहाज उडा, खाना आया, सब ने खाया, अभी दिन के ग्यारहा ही बजे थे, नींद कहां आये, हमारे साथ वाले ने अपनी मेक बुक निकाली ओर फ़टा फ़ट उस पर इधर उधर हाथ मारने लगा, मैने चोर आंख से देखा तो वो अपनी फ़ोटो पर युही मजे ले रहा था, फ़िर हमारे साथ बाली अमेरिकन को भी दोरा पडा, उस ने भी हमारी तरफ़ मुस्कुरा कर देखा, हम भी मुस्कुराये फ़िर सीट पर चढी, हम उसी तरफ़ पहले से देख रहे थे, तो जनाब हम ने शरमा कर आंखे नीची कर ली, जब वो ऊपर से नीचे उतरी तो, उन के हाथ मै भी मेक बुक थी, उन्होने एक बार उन सज्जन की तरफ़ देखा, फ़िर एक बार मेरी तरफ़ देखा ओर अपनी मेक बुक को चलाया,अब हम ने एक बार चोर नजर से उन्हे भी देखा, तो उन्हे समझ नही आ रहा था कि क्या करुं, कभी दो लाईन लिखती ओर उसे मिटा देती, फ़िर लिखती, फ़िर मिटा देती......

अब तक सुबह का नाशता पच गया था, हम ने एक मसाला चाय( भारतिया चाय) मंगवाई ओर मजे से पी, समाने पडी मेगजींन को भी दस बर उलटा पुलटा, अब क्या करे? तभी वो महिला उठी तो हम भी उस के साथ ऊठ पडे, ओर अपना लेपटाप नीचे ऊतार लिया,ओर अपनी सीट पर जम गये, ओर लेपटाप को पैरो के पास नीचे रख दिया, तभी वो महिला लोट के अपनी सीट पर बेठ गई, कुछ समय बाद वो महिला जोर जोर से चीखने लगी, जब मैने ध्यान दिया तो एक आदमी अगली तरफ़ जा रहा था, शायद उस का हाथ उसे लग गया,ऎसा इस महिला से एक दो बार पहले भी किसी अन्य यात्री से हुआ था, ओर सब मेरी तरह ही ही ओर सॊरी कर के चुप हो गये थे, लेकिन वो आदमी चुप नही रहा ओर वो भी इसे बुरी तरह से डांट रहा था, इधर से यह महिला बोल रही थी, वो आदमी बोल कर ओर डांट कर अपनी सीट पर बेठ गया, ओर यह महिला बोले जा रही थी, कि एयर होस्टेज ने इसे समझा कर बिठाया ओर चुप करवाया, मै ओर मेरे साथ वाला एक दुसरे को देख कर मुस्कुरा दिये.

तभी दोपहर का खाना आया, हम ने तो पहले ही भारतिया शाका हारी खाना बुक कर रखा था, ओर यह अमेरिकन महिला हमारे खाने की खुशबु से बहुत खुश हुयी, ओर ललचाई नजरो से देख रही थी, हमारी ओर, हमे किसी ने खाने की शुभकामनऎं नही दी, हमने चुपचाप अपना खाना खा लिया, ओर वो अमेरिकन हमे देखती रही.जिन का खाना पहले से बुक होता हे उन्हे पहले मिल जाता हे फ़िर बाकी सब को मिलता हे.

अब जब सब को खाना मिलने लगा तो उस महिला ने हमारे वाला भारतिया शाका हारी खाना ही मंगवाया,उस दुसरे आदमी ने युरोपियन खाना लिया,हम ने दोनो कॊ काने की शुभकामनाऎ दी, यानि बोन अपेतीत, अब हम बीच मे बेठे कभी चोर नजरो से इन्हे तो कभी उन्हे देख रहे थे, भारतिया खाने मै हमे आचार भी मिलता हे जो काफ़ी मिर्ची वाला होता हे, उस महिला ने पहले तो कुछ चावल खाये सब्जी के संग, फ़िर छोटी छोटी रोटिया मिलती हे पुडी से भी छोटी, तो उस ने आधी रोटी के संग आचार की पुरी डिब्बी सब्जी की तरह से लगा कर मुंह मे डाली यह देख कर पहले मै उसे रोकने लगा लेकिन अब तो काफ़ी देर हो गई थी, ओर जब उस ने दो चार बार उस रोटी को चबाया तो उस की शकल देखने की थी, कुछ देर तो वो मुंह बन्द किये बेठी रही, फ़िर जल्दी से उस कोर को अंदर निगल लिया,उस के बाद उस का बेठना मुश्किल हो गया, ओर बेचारी सी सी करती कभी बाथ रुम मे भागे तो कभी मुंह मै नेपकिन डाले, फ़िर मैने उसे बताया कि यह दुध वाली खीर को खायो मुंह कि जलन कम होगी, फ़िर मेने उसे कुछ टाफ़ियां दी ओर उसे बताया कि इसे जीभ पर रख कर चूसो.... फ़िर मैने उसे बताया कि जब भी भारत मे खाना खाओ किसी भी होटल मे तो इस आचार को बहुत कम लगाते हे, ओर हरी मिर्च को कभी मत छुना, अब वो काफ़ी ढीली पड गई ओर दोस्ताना आंदाज मे बात करने लगी थी.लेकिन अब हमारे पास समय नही था उस के लिये, कुछ बाते बता कर हम ने अपने बर्तन वापिस दे दिये, एक बार फ़िर मसाला चाय पी.

ओर फ़िर हम ने अपना लेपटाप निकाला....... बाप रे उन दोनो की मेकबुक से भी डबल था मेरा लेपटाओ १७,३, अब उसे खोल तो लिया लेकिन वो सीट पर बेठ कर( कम जगह के कारण सेट ना हो, मैने उसे नांव की तरह से गोद मै रखा, ओर हिन्दी मे एक पोस्ट लिखी, लेकिन बहुत तंग हो कर, पता नही यह दोनो भी चोर आंखॊ से देख रहे होगे, मुझे क्या देखे.... उन्हे हिन्दी समझ आये तब ना,करीब एक घंटा मैने अपना लेपटाप चलाया, लेकिन मजा नही आया, जब लिखता था तो लेपटाप का स्क्रीन साफ़ नही दिखता, अगर मोनीटर को सेट करू तो लिखू केसे, लेकिन किसी तरह से मैने उन के मेक बुक का सामना किया.वो पोस्ट भी मेरी मेरे उस लेपटाप के संग डेंगू की शिकार हो गई,फ़िर मैने अपना लेपटाप रख दिया ऊपर बेग मे, मैरे साथ उन दोनो का बुखार भी उतर गया.

अब क्या करे, तभी उस महिला को भारतिया समय का ख्याल आया ओर एयर होस्टेज से पूछने लगी भारतिया समय, ओर एयर होस्टेज को भी कहां मालूम था भारतिया समय, जनाब हम ने तो घर से ही सेट कर रखा था भारतिया समय, बस हम छा गये, हम ने अकड कर बताया कि हमे मालुम हे ओर इस समय भारत मे यह समय हुआ हे, फ़िर बीच बीच मे जलपान चलता रहा, मै एक घंटा खडा रहा जहाज मे ओर थोडी कसरत कि ताकि टांगे सीधी रहे, इधर उधर घुमा, फ़िर चाय बगेरा पी, थोडी देर मै रात का खाना भी आ गया, उसे भी खतम किया.

कुछ देर बाद हम दिल्ली उतरे ओर थोडी देर मै हम बाहर आ गये, वहां से टेकसी पकड कर शाली मार पहुचे. चलिये आज इतना ही सही , ओर ब्लांग मिलन कॊ फ़ोटो साफ़ नही आई क्यो कि केमरा मेने अपने भाई के लडके को दिया था, सोचा इसे खींचनी आती होंगी, लेकिन उस ने एक फ़ोटो भी साफ़ नही खींची,शायद कुछ फ़ोटो जोमैने या किसी ओर ने खींची होगी साफ़ हो उन्हे अगले दिनो जरुर दुंगा, वर्ना आई एम सॊरी

13/12/10

घर की ओर वापिस.. एक बिटिया के संग..Delhi to San Francisco California

मै २२/११ को दिल्ली आ गया, शाम हो गई थी, दो दिन युही दिल्ली मे रहा, मन तो कब का बच्चो की ओर था,फ़िर आई २५ तारीख, ओर मैने शुक्र किया,पेकिंग तो पहले ही हो गई थी, सीट भी मैने नेट से बुक कर दी थी, ओर चेंक इन भी मैने नेट से ही कर दिया, अब बस समान देना बाकी था, ओर सारा दिन मैने घडी देख कर बिताया.

 रात का खाना भी मुझे अच्छा नही लगा, फ़िर वादे के अनुसार आज मुझे गोलगप्पे, चाट, आईस क्रीम ओर भी पता नही क्या क्या खिलाया बच्चो ने, वेसे मै इन सब चीजो से दुर रहता हुं भारत आ कर, फ़िर रात के दस बजे टेक्सी आ गई, ओर हम पहुच गये एयर पोर्ट पर, समान बगेरा दो मिंट मे दे दिया, फ़िर इमिग्रेशन पर पहुचे बाप रे यहां तो पहले से भी ज्यादा भीड थी, हम भी एक विदेशियो की लाईन मै लग गये, लेकिन तभी एक नया काऊंटर खुला** पी आई ओ** के लिये तो हमारा ना० भी झट से आ गया, फ़िर हमारे हेंड बेग की ओर हमारी चेकिंग हुयी, ओर हम चल पडे अपनी बेलगाडी की ओर....

एयर पोर्ट देख कर खुशी हुयी, लेकिन कुछ कमियां रह गई जो इस खुब सुरती पर एक दाग दिखती हे, जेसे जहां भी देखो सफ़ाई कर्मचारी अपने साधारण कपडो मे दिखे, अरे इन्हे कम से कम दो तीन जोडी वर्दी तो दो, फ़िर कलीन देख कर मन खिन्न हुआ, यह जल्द ही गंदा होगा, वेसे भी अच्छा नही लगा, साधारण फ़र्श होता तो बहुत अच्छा लगता ओर सफ़ाई भी खुब रहती, वेसे सफ़ाई तो अब भी बहुत थी, हम अपनी मजिंल कॊ ओर जा रहे थे, चेन से, तभी एक लडकी अपने बेग को उठाये हाफ़ंती हुयी दिखाई दी, कुछ घबराई सी.

मेरे पास आ कर बोली क्या यह रास्ता ७ बी की तरफ़ ही जा रहा हे? मैने मुस्कुरा कर कहा आप को बुरी तरह सांस चढी हे पहले आप आराम से खडी हो कर सांस ले, अरे इस बेग को नीचे रख दे..... फ़िर मैने उस से कहा आप पेरिस जा रही हे ना, तो अभी तो बहुत समय हे फ़लाईट का मस्ती से चलो मैने भी ए एफ़ २२५ से ही जाना हे, तो वो लडकी बोली कि मै पहली बार जहाज मे बेठ रही हुयी, ओर बहुत घवराई हुयी हुं, इतनी देर मै हम बाते करते करते कब वेटिंग रुम मै पहुच गये पता ही नही चला.

फ़िर मैने उस की सीट ना० देखी ओर उसे बताया कि आप की सीट काफ़ी पीछे हे, ओर थोडी बहुत ओर बाते बताई, कि घबराना नही, ओर भी अन्य बाते, फ़िर मै बेमतलब युही इधर उधर घुमता रहा,ओर थोडी देर मै बोर्डिंग का समय हो गया, ओर सब धीरे धीरे अपनी अपनी सीटॊ पर बेठ गये,जाते समय मैने उस लडकी से कहा कोई भी काम हो तो मुझे या साथ वाले से पुछ लेना सभी मदद करेगे.

मेरे साथ वाली दो सीट खाली थी, ओर जहाज के दरवाजे बंद हो गये थे, तो मै मन मे बहुत खुश हुया कि चलो आज भी सोते जायेगे, लेकिन तभी पीछे से एक गोरी ने आ कर एक सीट पर कब्जा कर लिया, ओर अपने पति से बोली तुम आराम से सो जाना, फ़िर अपनी सहेली को बुलाया कि एक सीट ओर खाली हे तुम भी...... तभी मैने उसे जर्मन भाषा मे कहां मादाम यह सीट खाली नही, यहां मेरी दोस्त आने वाली हे, ओर वो लगी एयर होस्टेज को बुलाने.... तो मै चला गया उस लडकी को बुलाने, वो बेचारी जहाज के अंत वाली सीट पर विराज मान थी, मैने उसे अपने साथ वाली सीट पर बेठने का न्योता दिया, तो वो बहुत खुश हुयी, ओर मैने कहा अभी समान यही रहने दो बाद मे उठ लेगे, अभी चलो.

अब उस गोरी मादाम का चेहरा देखने लायक था,लेकिन बोली कुछ नही ओर कोई हाव भाव भी नही आने दिया चेहरे पर, फ़िर बातो बातो मे पता चला कि वो लडकी करनाल से हे, ओर पंजाबी  भी बोलती हे, तो मैने उसे बताया कि मै भी पंजाबी ही हुं, पंजाब से, फ़िर हमारा जहाज करीब डेढ , दो घंटे लेट हो गया, ओर बेठे बेठे सभी बोर होने लगे, फ़िर कुछ हरकत हुयी ओर हम चल पडे अपनी मंजिल की ओर यानि अब जहाज रेंगता हुआ रनवे की ओर चल पडा, वो लडकी काफ़ी डरी हुयी थी, ओर आंखे बंद कर के पता नही अपने भगवान को याद कर रही थी या रो रही थी, जब जहाज रनवे पर आया तो मैने उसे टोक कर समझाया कि डरो मत सब ठीक होगा, ओर अगर तबीयत खराब हो तो भी घबराना नही यह आप के लिये ही पडा हे ऊलटी इस मे करना, अपने आस पास वालो पर नही ओर हमारी परवाह भी मत करना, कभी कभी यह सब होता हे, बस अब मस्ती से देखो यह तुम्हारी पहली उडान हे इसे हमेशा याद रखोगी, डरो नही, ओर फ़िर कुछ पल के बाद ही जहाज ने जमीन छॊड दी.

करीब दस पंद्रहा मिंट के बाद लडकी की आवाज सुनाई दी कि मेरे कान बंद हो गये हे, तो मैने उसे बताया कि ऎसे सांस लो कान खुल जायेगे, फ़िर मैने बीयर मंगवाई, ओर लडकी ने शायद ओरेंज जूस, फ़िर खाना आ गया, मैने तो सब चट कर दिया, लडकी को मैने पहले ही कह दिया था कि तुम भारतिया खाना ही लेना, युरोपियन खाना तुम अभी नही खा पाओगी, फ़िर खाना आने पर लडकी ने पुछा क्या खत्म करना जरुरी हे, मैने कहा अरे नही  जरुरी नही जितना खाना खाओ, ओर उस बेचारी ने शायद कुछ नही खाया.

फ़िर पता नही कब मेरी आंख लग गई, ओर एक दो घंटे के बाद ऊठा तो लडकी ने कहा कि बाथरुम जाना हे, मैने उसे समझाया ओर बताया कि वहां जाओ, फ़िर मै भी टांगे सीधी करने के लिये उठ गया, मादाम सो रही थी बेचारी को जागना पडा, करीब एक घंटे के बाद मै वापिस आया,अब लडकी को अगली फ़लाईट के बारे समझाया, उस ने सेन फ़्रासिस्को जाना था, ओर मैने मुनिख, मैरे पास समय भी कम था, मैने उसे बडे प्यार से समझाया कि अब डरो मत, तुम्हे आगे भी सभी यात्री मदद करने वाले ही मिलेगे, वो चाहे किसी भी देश के हो, ओर मै चाहता हुं कि तुम्हे भारतिया साथी ही मिले, लेकिन आगे कि यात्रा के लिये डरो मत सब सफ़ल होगा.

फ़िर हमारा जहाज पेरिस एयर पोर्ट पर उतर गया, ओर जब मै अपनी मंजिल की ओर बढा तो लगा कोई मुझे देख रहा हे, मुड कर देखा तो वो लडकी मासूम ओर उदास नजरो से मेरी ओर देख रही थी,मै वापिस आया ओर उसे कहा कि मुझे उस के साथ सफ़र करके बहुत मजा आया, ओर बहुत अच्छा लगा,अब तुम घबराओ नही तुम्हे आगे मुझ से भी अच्छा साथी मिलेगा,जाओ...... अरे अरे अपना नाम तो बताती जाओ, उस ने रुआसीं आवाज मे अपना नाम बताया, लेकिन मुझे सिर्फ़ कोर समझ मै आया, ओर मुझे लगा कि अगर मै ओर रुका तो यह रो ना पडे, मैने उसे अपना नाम बताया शुभ्कामनाये दी ओर मुड कर अपनी मंजिल की ओर चल पडा.

बाद मे मुझे भी वहां दो तीन घंटे बेठना पडा, घर आ कर बीबी को बताया कि मुझे एक मासुम सी भोली भाली ओर जवान लडकी मिली, ओर बहुत डरी हुयी थी, मुझे अपनी बिटिया की तरह लगी, दिल चाहता था उसे बच्चो की तरह सीने से लगा कर समझाऊ, लेकिन कर नही पाया, ओर अंत मे उस की मासुम शकल देख कर समझ गया कि उसे भी बहुत दुख हुया..... लेकिन यह जिन्दगी कुछ ऎसे ही चलती हे, बीबी ने पुछा उस के बारे तो मैने इतना ही कहा कि मै तो उसे होस्स्ला ही देता रहा, कोन हे कहां किस के पास जाना हे मैने यह सब नही पूछा, शायद घर वालो से भी पहली बार बिछडी होगी तभी गुम थी, मेरे साथ भी पहली बार यही हुया था,

जहां भी हो खुश रहे,ओर अगर सेन फ़्रासिसको मे वो बच्ची यह लेख पढे तो, जरुर अपना पुरा नाम बताये, बच्ची मै कह रहा हुं, वो शायद २०, २५ के बीच की होगी, बिलकुल मेरे बच्चो की तरह, ओर मुझे सारे रास्ते ऎसा लगा जेसे मेरी बेटी पहली बार प्लेन मे मेरे संग बेठी हो ,दिल्ली से पेरिस, फ़िर पेरिस से सेन फ़्रासिसको २६/११ फ़्रांस एयर लाईन, ना० AF 225.सब को राम राम

12/12/10

तिलियार झील पर पहुच कर ....

तो जनाब फ़िर हम तलियार झील पहुच गये, फ़िर धीरे धीरे लोगो का आना शुरु हो गया, ओर रोनक बढती रही, बहुत सी बाते हुयी, बहुत से साथियो ने अपनी अपनी रचनाये सुनाई, सब के संग हमे भी चाय पीने को मिल गई, फ़िर सभी ने अपने अपने विचार रखे, अपनी अपनी कमजोरियां भी बताई, अपना अपना परिचय भी दिया, फ़ोटो भी खींचे गये, विडियो फ़िल्म भी बनाई गई.

फ़िर चाय पानी का दोर भी साथ साथ चलता रहा, फ़िर दोपहर के खाने का समय कब आया पता ना चला,खाने के बाद गजलो ओर कविताओ का दोर भी खुब चला, किताबो का आदान प्रदान हुया, लोगो ने एक दुसरे से फ़ोन ना०, ई मेल ओर ब्लांग के लिंक लिये, सभी आपस मै ऎसे मिल रहे थे जेसे हम सब एक दुसरे को बहुत पहले से जानते हो,ढेरो बाते हुयी, फ़िर एक दोर चाय काफ़ी का चला, ओर फ़िर धीरे धीरे विदाई का समय आने लगा, तो सब बे मन से एक दुसरे को विदा कर रहे थे, सभी चाहते थे कि अभी सब ओर रुके, अभी ओर बाते करे....

लेकिन समय कहा रुकता हे धीरे धीरे काफ़ी लोग चले गये,  ओर बचे तो केवल राम जी, नीरज जाट, ललित जी ओर अल्बेला खत्री, थोडी देर मै अमित जी ने भी मेरी बात मान ली ओर कुछ समय के लिये वो भी रुके, घर आ कर शाम के खाने की फ़िक्र हुयी तो मैने फ़िर रेखा को फ़ोन लगाया ओर उस से कहा कि आज का खाना भी बनाना हे, वो कुछ समय बाद आई ओर खाना बना कर चली गई, ललित जी की तबियत खराब थी, उन्होने कुछ दवा ओर अजवायन ली पानी के संग, फ़िर चला सब की रचनाओ का दोर, हर किसी को शोक था कि मै अपनी कविता, अपनी गजल, या अपनी कोई कहानी सुनाऊ, लेकिन हमारे ललित जी किसी को मोका ही नही दे रहे थे.

एक हल्का सा दोर चला पेंग शेंग का,साथ मे खाना भी चला, दो दिन से नींद नही आई थी, इस लिये मै तो एक दो बजे सॊने चला गया, लेकिन ललित जी जोर दे रहे थे अरे भाटिया जी बस एक कविता ओर एक कविता ओर.... तो जनाब मै भी आंख बचा कर दुसरे कमरे मै चला गया, ओर लेटा लेटा ही वाह वाह ओर हां हां करता रहा, जाने कब आंख लग गई, जब भी आंख खुलती तो वाह वाह कह देता, लेकिन महफ़िल पुरे जोरो पर थी, ओर सुबह पांच बजे तक सब से खुब लाभ उठाया मोके का, फ़िर सभी सो गये.

फ़िर सुबह सवेरे सात बजे मै उठ गया, कारण हमारे घर के पास से रेल जाती हे हर एक घंटे के बाद, ओर उस के ड्राईवर को पता नही कहा से पता चल गया कि मै आया हुं, इस लिये जब भी वहा से गुजरता है भोपू की पुरी आवाज छोडता हे, ओर मै उठ कर उसे गालिया देता था,तभी अलबेला जी भी उठ गये, ओर मुझे कहने लगे कि रात के बरतन मै साफ़ कर देता हुं, लेकिन मैने ऎसा ना करने दिया, तो ललित जी ने मोके का फ़ायदा उठाया ओर झट से पोस्ट लिख दी, फ़िर चाय बनाई गई, मै बिना दांत साफ़ किये पानी तक नही पीता, ओर चाय पता नही किस ने बनाई मै दांत साफ़ करने गया था, वापिसी पर चाय छानी ढुढ रहे थे तो मैने बिना छाननी के चाय कपो मे डाली, ललित जी ने यहां भी मोका नही छोडा.फ़िर नीरज जाट जी ने एक चाय का दोर चलाया.

आज रेखा के बेटे का चेक अप था इस लिये उस ने नही आना था, तो सब चले एक होटल मे नाशता करने, जहां सब ने गर्मा गर्म परोंठे खाये, लस्सी पी, चाय पी, फ़िर घर आये, ललित जी ने थोडीदेर इंतजार किया कार का ओर फ़िर चल पडे,उन्हे ओर केवल राम जी को विदाई दी लेकिन मन से नही, दिल चाहता था वो ओर रुके... लेकिन सब के अपने अपने काम थे ओर जाना भी जरुरी था,

फ़िर नीरज जाट ओर अलबेला जी ने भी विदाई ली,  पहले तो मन था कि एक दिन बाद जाऊं, लेकिन अब मन बहुत उदास हो गया था ओर फ़िर इन  के जाते ही मैने बिस्तर बगेरा वापिस किये, ओर निश्चय किया कि मै भी आज ही निकल जाऊ, लेकिन जाऊ केसे? मुझे तो किसी टेक्सी वाले का भी नही पता, ओर बस मै इतना समान ले जा नही सकता, तभी मुझे अमित जी का ख्याल आया, ओर मैने झट से फ़ोन लगाया कि भाई मेरे लिये किसी टेक्सी का इंतजाम तो करो, उन्होने पूछा क्या ललित जी गये तो मैने कहा हां सब गये, अब मेरा मन यहा नही लग रहा, तो उन्होने कहा अभी बात कर के बताता हुं. मैने फ़ोन रखा ही था कि अमित जी का ड्राईवर कार ले कर आ गया, ओर बोला चलिये किस ने रिवाडी चलना हे, मैने फ़िर अमित को फ़ोन लगाया तो पता चला कि यह कार ललित जी के लिये आई हे, तो मैने कहा कि अमित जी, ललित जी तो काफ़ी समय पहले चले गये हे,फ़िर मैने झिझकते हुये पुछा कि क्या इस कार से मै दिल्ली चला जाऊ ? अमित जी ने कहा कि मैने तो तीन दिन के लिये यह कार ललित जी को दी है, अब वो चले गये तो आप ले जा सकते हे, अब मेरे मन मे ख्याल आया कि नीरज ने भी दिल्ली ही जाना हे, तो अमित जी ने नीरज को फ़ोन लगाया,लेकिन बात नही हो पाई, मैने नीरज को फ़ोन लगाया बात नही हो पाई, सोचा वो भी गया, थोडी देर मै मन मे विचार आया कि एक बार अलबेला जी से फ़ोन पर बात कि जाये, फ़ोन लगाया तो पता चल कि वो तो पहले ही घर  वापिस आ रहे हे,

अब मैने कार मे ड्राईवर के संग मिल कर समान रखना चाहा तो सारा समान उस बडी कार मै नही समा रहा था, तभी ध्यान आया कि अरे अभी अलबेला जी, ओर नीरज जाट जी आ रहे हे, उन्हे कहां बिठाऊंगा, ओर कहा उन का समान रखूंगा, ( यहां मुझ से गलती हो गई, मुझे अमित जी से कह कर मेटा डोर जेसी मिनी बस मंगवा लेता तो सब आराम से चले जाते) लेकिन यह बात दिमाग मै नही आई, लेकिन अलबेला जी ने सारा समान सेट कर दिया, ओर नीतर्ज जी को सेट कर के खुद भी बेठ गये.

फ़िर दिल्ली जा कर दुसरी गलती हमारे से यह हुयी की अलबेला जी को पंजाबी बाग छोड दिया, इस पार अगर यहां भी दिमाग काम करता तो उन्हे दुसरी तरफ़ ही छोड कर आना चाहिये था, इन सब बातो का बाद मे बहुत पछतावा हुआ, कि अलबेला जी कितनी दुर से चल कर आये ओर हम गल्ती पर गलती करते रहे, अगली बार मिलेगे तो उन से क्षमा मांग लेगे.

हां एक बात यहां जरुर लिखूंगा कि अलबेला जी सच मे अलबेले हे, रेखा जो मेरा खाना बनाती थी, मेरा बहुत ख्याल रखती थी, जेसे एक छोटी बहन रखती हे, उस के लडके का अप्रेशन होना हे, तो अलबेला जी ने उसे उस अप्रेशन पर होने वाले खर्च ओर दवाओ के सारे खर्च के बारे कहा कि वो यह सब समभाल लेगे, अगर दिल्ली या बम्बे अप्रेशन करवाना हो तो उस का खर्च भी वो समभाल लेगे, यह सच्ची पुजा नही तो क्या हे ? एक अंजान, बेसहारा, ओर मजबुर गरीब ऒरत की मदद बिना किसी लालच के आज के युग मे कोन करता हे? अजी करते हे अलबेला जेसे लोग करते हे, मै सलाम करता हुं इन की भावनाओ को.
अगली पोस्ट मे अपनी वापसी यात्रा के बारे लिखू गां जहां मुझे एक भोली भाली जवान लडकी मिली.

28/11/10

हम लोटे अपने गांव सब को राम राम ...... गंगा राम की....

करीब करीब दो सप्ताह के बाद २६/११ को मैने वापिस घर का रुख किया, प्लेन भारत से ही लेट चला इस कारण आगे भी फ़लाईट छुट गई, ओर देर से घर पहुचां, वो तो  मोबाईल के कारण घर वालो को पहले ही बता दिया कि मै इस समय पहुच जाऊंगा, इस लिये बेकार की लम्बी इंतजार से बच गये, मुझे लेने पुरा परिवार आया था, बर्फ़ बारी खुब हो रही थी, प्लेन से उतर कर बाहर आया ओर फ़िर खुद ही ड्राईविंग कर के घर आया.

थकावट के वाजूद भी घर पर सब ने घेर लिया, इसी बीच बीबी गर्मा गर्म चाय बना लाई ओर फ़िर सिलसिला शुरु हुया, पूछ ताछ का सब को जान कारी चाहिये, यह केसा हे वो केसा हे, वो कितना लम्बा होगया, यह कोन सी कलास मे पहुच गई, फ़िर बच्चो ने मेरा समान खोलना शुरु किया, ओर अटेची बेग खाली कर के बाहर रखे ताकि कुछ ताजी हवा लगे ओर फ़िर रख दे. फ़िर सब ने ब्लांग मिलन के बारे बाते पुछी.इसी बीच बीबी ने खाना बनाया ओर मैने काफ़ी दिनो के बाद घर का खाना खाया.

अब बच्चे अपने कमरो मे पढने चले गये, तो मैने भी थोडा आराम किया, फ़िर लेटे लेटे भारत मे बिताये वो पल याद आये जोसब ब्लांगर साथियो के संग बीते थे, ब्लांग मिलन मे  कम लोग आ पाये लेकिन जो आये वो दिलो दिमाग पर छा गये सब से अपना पन मिला, मान सम्मान मिला, बहुत कुछ मिला सब साथियो से, बिछुडते समय भी ओर अब फ़िर से कह रहा हुं कि अगर मेरे से कोई गलती हुयी हो, आप सब की सेवा मे कोई कमी रह गई हो तो छोटा समझ कर नादान समझ कर माफ़ कर दे.

जब १२/११ की रात को दिल्ली पहुचा तो टेक्सी पकड कर सीधा ससुराल गया, वहां आधी रात को मेरा इंतजार मेरी साली का छोटा लडका कर रहा था, क्योकि किसी को नही पता था कि मै आ रहा हुं, फ़िर हम बाते करते रहे हमारी आवाज सुन कर बडा आया ओर आंखे फ़ाडे मुझे देख रहा था, मैने उसे चुप रहने के लिये बोला, फ़िर रात को हम एक ही कमरे मै सॊ गये, सुबह उठने पर खुब मजा आया सब को यकीन नही हुया, फ़िर बातो का सिलसिला चला, अब एक दिन की केद हमे हमारी साली ने सुनाई, यानि एक दिन हमे वहां रुकना पडा,दुसरे दिन सुबह नाशता बगेरा कर के मैने वहां से टेक्सी मंगवाई ओर रास्ते से अमित जी को पकडा ओर रोहतक पहुच गये, फ़िर घर की सफ़ाई वगेरा के लिये किसी को बोला ओर हम निकल लिये ब्लांग मिलन की जगह तलाशने, ओर दोपहर का खाना भी हम ने अमित जी के मित्र के यहां किया, खुब डट के खाया, पांच सात घंटे के बाद जब घर आये तो घर साफ़ मिला, तो हम ने बिस्तरो का इंतजाम किया, फ़िर अमित जी खाने के बारे विचार करने लगे कि खाने का क्या किया जाये, दो चार फ़ोन किये, ओर अंत मै मुझे एक ना० दिया,साथ मे ठंडी ठंडी बीयर का मजा लिया, ओर खाना खाया ओर फ़िर अमित जी चलेगये,

दुसरे दिन् सुबह सुबह मेरी आंख खुली तो देखा की साथ वाले घर से कोई बुला रहा हे, देख कर मेरी चिंता दुर हो गई, अरे वो रेखा थी, जो काफ़ी समय से हमारे घर पर खाना बनाती रही थी, अब कुछ समय से नही, तो मैने उस से पुछा कि रेखा क्या तुम मेरा खाना बना दोगी तो उस ने छुटते ही कहा हाम भाईया क्यो नही, तो जनाब हम ने इस दिन भी गर्मा गर्म परोठे खाये, ओर खाने का झंझट भी खत्म.

फ़िर आई २० तरीख इस दिन हमारे घर पधारे ललित जी ओर योगेंदर जी ओर भी कई लोगो ने आना था लेकिन आ नही पाये किसी कारण, फ़िर मेने अमित जी को भी फ़ोन कर के बुला लिया, खुब बाते हुयी, शाम तक चाय का दोर चला, कुछ बिस्तर ओर मंगवायेगे, फ़िर पेग शेग भी चले, खाना रेखा ने बना दिया( जब भी रेखा खाना बनाने आती तो मैने उसे पहले ही कह दिया कि मेरे खाने के साथ साथ अपना ओर बच्चो का खाना यही बना लेना,ओर तुम चाहो तो यही खाना खा लेना या साथ ले जाना फ़िर उस के साथ मै भी खाना खा लेता था लेकिन आज रेखा अपना खाना साथ ले गई ) हम ने भी उस के जाते ही खाना खाया ओर फ़िर चला बातो का सिलसिला. खुब ठहके भी चले, रात को १२ बजे अमित जी चले गये.

मुझे भी करीब रात दो बजे नींद ने घेर लिया, ओर हम तीनो नीचे फ़र्श पर बिस्तर लगा कर लेट गये, अब जनाब बिस्तर पर लेटते ही ललित जी ओर योगेंदर जी तो झट से सो गये, मुझे नींद ना आये, अरे बाबा इतने लम्बे ओर जोर दार खराटे........ हम ने तो बोरी बिस्तर उठाया ओर दुसरे कमरे मै जा कर लेट गये दो चार घंटे सोये, ओर फ़िर सुबह सवेरे जग गये, बरतन तो रेखा साफ़ कर गई थी, मैने बिना शोर किये अपनी दिन चर्या शुरु की जब चाय बनाने लगा तो एक रजाई से आवाज आई भाटिया जी चाय मै अदरक जरुर डाल ले, तभी दुसरी रजाई से आवाज आई एक कप हमारे लिये भी, तो हम ने सब ने मिल कर चाय पी, थोडी देर बाद ललित जी ने चाय बनाई बहुत मजे दार, सच्ची कहुं मेरी चाय मेरी बीबी मेरे बच्चे नही पीते थे क्योकि मुझे बनानी ही नही आती, लेकिन यहां सब ने बहुत तारीफ़ की, फ़िर सब मे काफ़ी ओर कापुचिनो का मजा भी लिया, फ़िर अमित जी भी पहुच गये, ओर फ़िर इन की कार से हम सब ओर मेरे भाई का लडका भी हमारे साथ चल पडा तलिया झील की तरफ़... रेखा आई तो मैने उसे आज दोपहर के खाने के लिये मना कर दिया,
बाकी बाते तलियार झील की अगली पोस्ट मे..... अरे हां मेरा लेपटाप कुछ दिनो के लिये वापिस डीलर के पास जा रहा हे, कल इस मै कुछ गडबड हो गई हे, भारत मै य्ह चल नही पाया, जिस के कारण मै नेट भी नही ले पाया, अब या तो वो इसे ठीक कर के वापिस भेजेगे या नया भेजेगे, या मेरे पेसे वापिस देगे, इस की दो साल की गारंटी हे, तो इस बीच्मै बच्चो के लेपटाप से या पीसी से कुछ समय ही नेट पर आ पाऊंगा इस लिये अगली पोस्ट पता नही कब लिख पांऊ, तब तक नमस्ते.वेसे कुछ लोगो को बता दुं कि मेरी हर पोस्ट के नीचे लिखा आता हे आप की राय ओर उस के नीचे लिखा आता हे रचना के बारे अब इस का कोई क्या अर्थ लगता हे ? बस इतना ही कहुंगा कि भडकाऊ लोगो से साबधान

07/11/10

चलो अब मिलने ओर बिछडने की तेयारी करे..

आज से मै कुछ दिनो के लिये ब्लांग से दुर ओर अपने परिवार के ज्यादा पास रहुंगा, इस लिये आप सब के दर्शन नही कर पाऊंगा, यानि आप के ब्लांग पर नही पहुचं पाऊंगा,लेकिन कईयो से मिलने का अवसर जरुर मिलेगा,तो अब आप सब से कुछ दिनो के लिये इजाजत ले रहा हुं, हां भारत मै कभी कभार आप के ब्लांग पर आप की रचना पढने आऊंगा अगर मुझे वहां इंट्रनेट कनेकशन मिला तो.

अभी परिवार से बिछुड रहा हुं तो कुछ उदासी हे घर पर.... इस लिये यह चार पांच दिन याद गार बना लेते हे, आप सब को राम राम, मिलते हे बरेक के बाद, अरे हां १४/११ की पोस्ट का ध्यान रखे, ब्लांग मिलन की पुरी जानकारी उसी मे होगी, यह पोस्ट मेरे यहां से ओर अंतर सोहिल जी के ब्लांग से प्रकाशित होगी. तब तक के लिये सब को राम राम

27/10/10

ब्लांग मिलन का दिवस

नमस्कार आप सब को , मैने अपना सारा प्रोगराम देख कर यह दिन ब्लांग मिलन के लिये निश्चित किया हे, आशा करता हुं आप सब को पसंद भी आयेगा, २१/११/२०१० रविवार, समय ११,०० बजे से शाम तक, जगह अभी पता नही वो तो मै १४/११ को ही बता पाऊंगा, दिन ओर तारीख इस लिये पहले बता दी कि आप सब सही समय पर अपनी सीट रेलवे मे रिजर्व करवा ले. धन्यवाद.

ओर नीचे दिल्ली से रोहतक ओर रोहतक से दिल्ली का ट्रेन का समय ट्रेन ना० दिया गया हे जो मुझे हमारे सब के प्यारे घुम्मकड जी नीरज जाट जी ने बना कर भेजा हे, ओर अगर आप दिल्ली के आलावा कही ओर से आ रहे हे तो उस के बारे भी टिपण्णी मे या नीरज जाट जी से पूछ सकते हे.
सब से पहले दिल्ली से रोहतक तक की ट्रेन....
आप इन चित्रो को बढा कर के भी पढ सकते हे, बस एक किल्क करे हर चित्र पर
फ़िर रोहतक से दिल्ली की रेल का समय




फ़िर किराया रोहतक से दिल्ली ओर दिल्ली से रोहतक तक का अलग अलग श्रेणियो का. भुल चुक का जिम्मे दार हमारा नीरज जाट होगा :) ओर धन्यवाद नीरज जाट  जी का

अभी तक मेरी लिस्ट मे २८ लोगो का नाम ही आया हे, आप भी आना चाहे तो जरुर बताये आप सब का स्वागत हे, बाकी जानकारी आप अमित जी ओर ललित जी से ले सकते हे, कोई राय देनी हो तो जरुर दे, आप की राय का स्वागत हे