18/02/09

आज का विचार, चिंतन, मोक्ष

आज का चिंतन, हम सब मन की खुशी, शान्ति के लिये , पुजा पाठ, तन्त्र मंत्र, वर्त, मन्नते मानते है ओर बहुत सी तीर्थ यात्राऎ करते है, शायद भगवान हमारे मन को शान्ति प्रदान कर दे.... तो आज का यह चिंतन यानि आज का यह विचार विचारे शायद यह विचार किसी एक की मदद कर सके.....

एक महान संत, जिस ने बचपन से ही घरवार छोड कर सन्यांस ले लिया था, उस ने बाल ब्रह्माचारी रह कर घोर तपस्या की, ओर घरेलू जीवन को जो बंधन मानता था, सारा दिन भगवान की तपस्या मे गुजारता, ओर जो भी दान दक्षिणा मे मिलता, उसे ही भगवान का प्रसाद समझ कर ग्रहण करता.
एक दिन उस सन्यांसी ने अपने प्राण त्याग दिये, ओर उस के प्राण यम दुत ले कर सीधे चित्र गुप्त के पास पहुये,

थोडी देर बाद इंतजार खत्म हुआ तो इस सन्यासी जी की बहीखाता देख कर चित्रगुप्त जी बोले, आप को दोबारा फ़िर से पृथ्वी पर जन्म लेना होगा, अब जाईये.... सन्यासी बोला महाराज आप गलती कर रहे है जरा ध्यान से देखे मेरे कर्मो का बहीखाता,क्योकि मेने तो पुरी जिन्दगी मै, मेने मोह माया, लोभ, अहंकार, घृणा ओर काम को अपने से दुर रखा ओर शुद्ध मन से हर पल भगवान की पुजा की है, ओर पुजा के सिवाय मैने जिन्दगी भर कुछ नही किया,इसी कामना से कि मुझे दोबारा इस भुमि पर फ़िर से ना जन्म लेना पडे, ओर मुझे मोक्ष मिले,यह सब सुन कर चित्र गुप्त जी बोले वत्स‘ !! यह सब बाते ठीक है कि तुम ने मोह माया, लोभ, काम, अहंकार ओर घृणा, ओर मान को त्याग कर सच्चे मन से भगवान की पुजा की, ओर किसी को दुख नही दिया, लेकिन फ़िर भी तुम्हे मोक्ष नही मिल सकता.

सन्यांसी ने पुछा , लेकिन क्यो ? चित्रगुप्त ने कहा कि इस क्यो ? का जबाब तो सिर्फ़ धर्मराज ही दे सकते है, ओर यमदुत उन्हे धर्मराज के दरवार मै लेगया, तो धर्मराज ने उस का बहीखाता देख कर कहा वत्स* चित्रगुप्त का निर्णय बिलकुल सही है,आप को मोक्ष नही मिल सकता, सन्यासी ने कहा हे धर्मराज यह तो अन्याय है, तो धर्म रज ने कहा वत्स यहा किसी के साथ अन्याय नही होता, सभी ओर उचित न्याय ही मिलता है, तो सन्यासी ने कहा तो मुझे मोक्ष क्यो नही मिल रहा हे धर्मराज !! मै यह जानना चाहता हुं,कि मेरी तपस्या मै कहां कमी रह गई, ताकि अगले जन्म मै मै उसे फ़िर से पुरी कर पाऊ.ताकि मुझे फ़िर मोक्ष मिल सके, वो कोन सी कमी है, जिस के कारण मुझे इस जन्म मै मोक्ष से बंचित किया गया है?

तो धर्मराज बोले वत्स ! इस पृथ्वी पर जितने भी प्राणी जन्म लेते है, चाहे मनुष्या योनि मै हो या अन्य योनि मै, उन सब का कुछ ना कुछ कर्तब्य बनता है अपने समाज के प्रति भी , ओर मनुष्या योनि मे जन्म लेने वले हर व्यक्ति का सब से पहला धर्म यह है कि वो अपने समाज की, मानवता की सेवा करे, उन के दुख दर्द मै काम आये, अपने कामो से लोगो को सुखी बनाये, लेकिन आप ने तो इन मै से एक भी काम नही किया, आप ने तो हमेशा अपने बारे मै सोचा, अपने मोक्ष के बारे, आप का तो जन्म भी व्यर्थ गया, आप को एक मोका ओर दिया जाता है,दोबारा पृथ्वी पर जाये ओर सारे काम मानवता की भलाई के कर के आये,


Chhod De Sari Duni...

38 comments:

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सुंदर शिक्षाप्रद कहानी. इसिलिये हम ब्लाग लिख कर लोगो को बिगाडने का परम पुनीत कार्य कर रहे हैं कि बाद मे कहीं धर्मराज और चित्रगुप्त हमें वापस ना भेज सके. :)

खैर मजाक अलग बात है पर अपना कर्तव्य करना भले ही वो कुछ भी करता हो, परम आवश्यक है.
बहुत धन्यवाद.

रामराम.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

बडी सच्ची शिक्षा दी आपकी कहानी ने राज भाई !
- लावण्या

Anil Pusadkar said...

काश ये बात हर किसी के समझ मे आ जाती।सोलह आने खरी शिक्षा दी है आपने भाटिया जी।मेरी कोशिश यही रहती है कि किसी के काम आ सकूं और हमेशा ऐसा ही करने की कोशिश करता रहूंगा।आभार आपका ।

Anil Pusadkar said...

काश ये बात हर किसी के समझ मे आ जाती।सोलह आने खरी शिक्षा दी है आपने भाटिया जी।मेरी कोशिश यही रहती है कि किसी के काम आ सकूं और हमेशा ऐसा ही करने की कोशिश करता रहूंगा।आभार आपका ।

P.N. Subramanian said...

हमें यह शिक्षा मिलती है की हम अपने परिवार और समाज के प्रति कर्तव्यों का निर्वहन करें.इनसे मुह मोड़ कर पूजा पाठ में लगे रहने से उद्धार नहीं होने वाला. अच्छी शिक्षाप्रद पोस्ट. आभार. .

seema gupta said...

ओर मनुष्या योनि मे जन्म लेने वले हर व्यक्ति का सब से पहला धर्म यह है कि वो अपने समाज की, मानवता की सेवा करे, उन के दुख दर्द मै काम आये, अपने कामो से लोगो को सुखी बनाये..
" बहुत सुंदर और सत्य विचार......इनका पालन करने से ही सुख और शान्ति का सुखद एहसास होगा.."

Regards

अल्पना वर्मा said...

subah subah bahut achchee baten padhne ko milin.

shukriya.

geet bhi bahut hi pyara sunwaya hai.

रश्मि प्रभा said...

सच में तभी मुक्ति है.......दया,प्रेम,करुणा से अलग सिर्फ भजन का कोई अर्थ नहीं,सच्ची भक्ति सेवा है..........बहुत अच्छा लगा

Arvind Mishra said...

बिल्कुल सद्विचार -परहित सरिस धर्म नहीं भाई !

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर प्रेरक कथा है।आभार।

ज्ञानदत्त । GD Pandey said...

सही है - तभी राजा जनक को आदर्श माना गया है।

Abhishek said...

प्रेरक है यह कथा भी आपकी.

varsha said...

sahi hai..apne hisse ka karm kiye bina moksh praapti ki ummeed!! aise vyakti ka to janm lena na lena baraabar hai..

नरेश सिह राठौङ said...

यही तो जिन्दगी कि सच्चाई है जिससे सब मुंह मोडते है । सच्चाई को कहानी का जामा पहनाया है । बहुत अच्छा लगा । धन्यवाद

शोभा said...

बहुत अच्छी कहानी सुनाई आपने। ऐसे विचारों की महती आवश्यकता है।

Shastri said...

प्रिय भाटिया जी, टिप्पणी तो रात को जोड रहा हूँ, लेकिन यह मेरा आज सुबह का पहला वाचन था. ऐसा प्रोत्साहन मिला कि कुछ न कहिये.

ऐसे ही प्रोत्साहित करने वाले आलेख देते रहें!!

सस्नेह -- शास्त्री

HEY PRABHU YEH TERA PATH said...

"उन सब का कुछ ना कुछ कर्तब्य बनता है अपने समाज के प्रति भी , ओर मनुष्या योनि मे जन्म लेने वले हर व्यक्ति का सब से पहला धर्म यह है कि वो अपने समाज की, मानवता की सेवा करे, उन के दुख दर्द मै काम आये, अपने कामो से लोगो को सुखी बनाये,'
कहानी ने बहुत ही खास सीख दी है।
राज भाई बहुत ही प्रेणास्पद बाते है जो हमारे जिवन को सफल बनाने के लिये आवश्यक है।

Dr. Amar Jyoti said...

बहुत ही प्रेरक।

G M Rajesh said...

raj ji
aapne yam aur chitrgupt likhaa
to yaad aayaa kahin yam smhita agar aap dhoondh saken to
mujhe nadi ke paat ke niyam ka sutr yaani shlok jaroor bhej deve kafi dino se talaash me hun

सिटिजन said...

बहुत सुंदर शिक्षाप्रद कहानी..

योगेन्द्र मौदगिल said...

प्रेरक व प्रासंगिक चिंतन... साधुवाद..

प्रदीप मानोरिया said...

आपके अध्यात्मिक विचार भी श्रेष्ठ और सुलझे हुए है बहुत सुंदर
मेरे ब्लॉग पर आकर "सुख" kee paribhasha पढ़ें

Harkirat Haqeer said...

वत्स ! इस पृथ्वी पर जितने भी प्राणी जन्म लेते है, चाहे मनुष्या योनि मै हो या अन्य योनि मै, उन सब का कुछ ना कुछ कर्तब्य बनता है अपने समाज के प्रति भी , ओर मनुष्या योनि मे जन्म लेने वले हर व्यक्ति का सब से पहला धर्म यह है कि वो अपने समाज की, मानवता की सेवा करे, उन के दुख दर्द मै काम आये, अपने कामो से लोगो को सुखी बनाये, लेकिन आप ने तो इन मै से एक भी काम नही किया, आप ने तो हमेशा अपने बारे मै सोचा, अपने मोक्ष के बारे, आप का तो जन्म भी व्यर्थ गया....... ji Raj ji magar hum samaj me to kya apne apne ghron me bhi apna kartavya aur jimmedariyan nahi nibhate.....!!

Science Bloggers Association said...

प्रेरक कथा है।आभार।

Dev said...

Bahut achchi kahani aur bahut hi prerak, es tarah ki kahainiyan prerit karti hai manusya ko manav banane ke liye...
Regards

अनुपम अग्रवाल said...

प्रेरक कथा .
हम सभी इस तरह की शिक्षाप्रद कथा के लिये आपके आभारी हैं

COMMON MAN said...

शिक्षाप्रद कहानी, अच्छी लगी,वास्तव में हम लोग समाज के प्रति अपने दायित्वों को नहीं निभा पा रहे.

समयचक्र said...

समयचक्र: चिठ्ठी चर्चा : चिठ्ठी लेकर आया हूँ कोई देख तो नही रहा हैबहुत अच्छा जी
आपके चिठ्ठे की चर्चा चिठ्ठीचर्चा "समयचक्र" में
महेन्द्र मिश्र

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

बहुत प्यारी कथा है. आभार.

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

सचमुच अगर इन्सान समाज एवं परिवार के प्रति अपने कर्तव्यों का पूरी ईमानदारी से पालन करे तो धरती पर ही स्वर्ग की अनुभूती की जा सकती है.
बहुत ही प्रेरणादायक कथा सुनाई आपने....आभार

Vijay Kumar Sappatti said...

Bhatiya ji ,

is lekh ko padhkar , ek sikhsa mili .. bahut sundar rachana , man ko bha gayi ..

maza aa gaya padhkar

aapko shivraatri ki shubkaamnaayen ..

Maine bhi kuch likha hai @ www.poemsofvijay.blogspot.com par, pls padhiyenga aur apne comments ke dwara utsaah badhayen..

Hari Joshi said...

राज जी,
मुझसे पहले आए पाठक अपनी प्रतिक्रियाओं में सब कुछ कह चुके हैं। अच्‍छी पोस्‍ट के लिए आभार।

pallavi trivedi said...

prerak katha...thanx

sandhyagupta said...

Is katha ke madhyam se gehri baat kahi aapne..

महामंत्री - तस्लीम said...

प्रेरक कथा कही है आपने। आभार।

Mrs. Asha Joglekar said...

सही दर्शन सही विचार ।
संसार से भाग कर मोक्ष कहाँ मिलेगा ।

RAJ SINH said...

RAJ JEE !

'MAA' BLOG PE AAKE 'MAA TUJHE SALAM' KO SALAAM KAH GAYE ,AAPKO SALAM !! BAHUT UTSAH BADH GAYA.

IS LEKH NE MUJHE EK AATM MANTHAAN KARNE AUR 'KARTAVYA'KYA HAI FIR SE SOCHNE PE VIVAS KAR DIYA HAI .

VAHEE KAR RAHA HOON.

IS RAJ KEE GRHRAYEE KO NAMAN !

''ANYONAASTI '' {अन्योनास्ति} said...

सर्वश्रेष्ठ तप गृहस्थ का तप होता है , स्वामी जी तो पलायन वादी निकले , इसी पलायन वाद और स्व-केन्द्रित विचार धारा के ही कारण ही ,बौद्धों का पतन हुआ था