एक महान संत, जिस ने बचपन से ही घरवार छोड कर सन्यांस ले लिया था, उस ने बाल ब्रह्माचारी रह कर घोर तपस्या की, ओर घरेलू जीवन को जो बंधन मानता था, सारा दिन भगवान की तपस्या मे गुजारता, ओर जो भी दान दक्षिणा मे मिलता, उसे ही भगवान का प्रसाद समझ कर ग्रहण करता.
एक दिन उस सन्यांसी ने अपने प्राण त्याग दिये, ओर उस के प्राण यम दुत ले कर सीधे चित्र गुप्त के पास पहुये,
थोडी देर बाद इंतजार खत्म हुआ तो इस सन्यासी जी की बहीखाता देख कर चित्रगुप्त जी बोले, आप को दोबारा फ़िर से पृथ्वी पर जन्म लेना होगा, अब जाईये.... सन्यासी बोला महाराज आप गलती कर रहे है जरा ध्यान से देखे मेरे कर्मो का बहीखाता,क्योकि मेने तो पुरी जिन्दगी मै, मेने मोह माया, लोभ, अहंकार, घृणा ओर काम को अपने से दुर रखा ओर शुद्ध मन से हर पल भगवान की पुजा की है, ओर पुजा के सिवाय मैने जिन्दगी भर कुछ नही किया,इसी कामना से कि मुझे दोबारा इस भुमि पर फ़िर से ना जन्म लेना पडे, ओर मुझे मोक्ष मिले,यह सब सुन कर चित्र गुप्त जी बोले वत्स‘ !! यह सब बाते ठीक है कि तुम ने मोह माया, लोभ, काम, अहंकार ओर घृणा, ओर मान को त्याग कर सच्चे मन से भगवान की पुजा की, ओर किसी को दुख नही दिया, लेकिन फ़िर भी तुम्हे मोक्ष नही मिल सकता.
सन्यांसी ने पुछा , लेकिन क्यो ? चित्रगुप्त ने कहा कि इस क्यो ? का जबाब तो सिर्फ़ धर्मराज ही दे सकते है, ओर यमदुत उन्हे धर्मराज के दरवार मै लेगया, तो धर्मराज ने उस का बहीखाता देख कर कहा वत्स* चित्रगुप्त का निर्णय बिलकुल सही है,आप को मोक्ष नही मिल सकता, सन्यासी ने कहा हे धर्मराज यह तो अन्याय है, तो धर्म रज ने कहा वत्स यहा किसी के साथ अन्याय नही होता, सभी ओर उचित न्याय ही मिलता है, तो सन्यासी ने कहा तो मुझे मोक्ष क्यो नही मिल रहा हे धर्मराज !! मै यह जानना चाहता हुं,कि मेरी तपस्या मै कहां कमी रह गई, ताकि अगले जन्म मै मै उसे फ़िर से पुरी कर पाऊ.ताकि मुझे फ़िर मोक्ष मिल सके, वो कोन सी कमी है, जिस के कारण मुझे इस जन्म मै मोक्ष से बंचित किया गया है?
तो धर्मराज बोले वत्स ! इस पृथ्वी पर जितने भी प्राणी जन्म लेते है, चाहे मनुष्या योनि मै हो या अन्य योनि मै, उन सब का कुछ ना कुछ कर्तब्य बनता है अपने समाज के प्रति भी , ओर मनुष्या योनि मे जन्म लेने वले हर व्यक्ति का सब से पहला धर्म यह है कि वो अपने समाज की, मानवता की सेवा करे, उन के दुख दर्द मै काम आये, अपने कामो से लोगो को सुखी बनाये, लेकिन आप ने तो इन मै से एक भी काम नही किया, आप ने तो हमेशा अपने बारे मै सोचा, अपने मोक्ष के बारे, आप का तो जन्म भी व्यर्थ गया, आप को एक मोका ओर दिया जाता है,दोबारा पृथ्वी पर जाये ओर सारे काम मानवता की भलाई के कर के आये,
Chhod De Sari Duni... |
बहुत सुंदर शिक्षाप्रद कहानी. इसिलिये हम ब्लाग लिख कर लोगो को बिगाडने का परम पुनीत कार्य कर रहे हैं कि बाद मे कहीं धर्मराज और चित्रगुप्त हमें वापस ना भेज सके. :)
ReplyDeleteखैर मजाक अलग बात है पर अपना कर्तव्य करना भले ही वो कुछ भी करता हो, परम आवश्यक है.
बहुत धन्यवाद.
रामराम.
बडी सच्ची शिक्षा दी आपकी कहानी ने राज भाई !
ReplyDelete- लावण्या
काश ये बात हर किसी के समझ मे आ जाती।सोलह आने खरी शिक्षा दी है आपने भाटिया जी।मेरी कोशिश यही रहती है कि किसी के काम आ सकूं और हमेशा ऐसा ही करने की कोशिश करता रहूंगा।आभार आपका ।
ReplyDeleteकाश ये बात हर किसी के समझ मे आ जाती।सोलह आने खरी शिक्षा दी है आपने भाटिया जी।मेरी कोशिश यही रहती है कि किसी के काम आ सकूं और हमेशा ऐसा ही करने की कोशिश करता रहूंगा।आभार आपका ।
ReplyDeleteहमें यह शिक्षा मिलती है की हम अपने परिवार और समाज के प्रति कर्तव्यों का निर्वहन करें.इनसे मुह मोड़ कर पूजा पाठ में लगे रहने से उद्धार नहीं होने वाला. अच्छी शिक्षाप्रद पोस्ट. आभार. .
ReplyDeleteओर मनुष्या योनि मे जन्म लेने वले हर व्यक्ति का सब से पहला धर्म यह है कि वो अपने समाज की, मानवता की सेवा करे, उन के दुख दर्द मै काम आये, अपने कामो से लोगो को सुखी बनाये..
ReplyDelete" बहुत सुंदर और सत्य विचार......इनका पालन करने से ही सुख और शान्ति का सुखद एहसास होगा.."
Regards
subah subah bahut achchee baten padhne ko milin.
ReplyDeleteshukriya.
geet bhi bahut hi pyara sunwaya hai.
सच में तभी मुक्ति है.......दया,प्रेम,करुणा से अलग सिर्फ भजन का कोई अर्थ नहीं,सच्ची भक्ति सेवा है..........बहुत अच्छा लगा
ReplyDeleteबिल्कुल सद्विचार -परहित सरिस धर्म नहीं भाई !
ReplyDeleteबहुत सुन्दर प्रेरक कथा है।आभार।
ReplyDeleteसही है - तभी राजा जनक को आदर्श माना गया है।
ReplyDeleteप्रेरक है यह कथा भी आपकी.
ReplyDeletesahi hai..apne hisse ka karm kiye bina moksh praapti ki ummeed!! aise vyakti ka to janm lena na lena baraabar hai..
ReplyDeleteयही तो जिन्दगी कि सच्चाई है जिससे सब मुंह मोडते है । सच्चाई को कहानी का जामा पहनाया है । बहुत अच्छा लगा । धन्यवाद
ReplyDeleteबहुत अच्छी कहानी सुनाई आपने। ऐसे विचारों की महती आवश्यकता है।
ReplyDeleteप्रिय भाटिया जी, टिप्पणी तो रात को जोड रहा हूँ, लेकिन यह मेरा आज सुबह का पहला वाचन था. ऐसा प्रोत्साहन मिला कि कुछ न कहिये.
ReplyDeleteऐसे ही प्रोत्साहित करने वाले आलेख देते रहें!!
सस्नेह -- शास्त्री
"उन सब का कुछ ना कुछ कर्तब्य बनता है अपने समाज के प्रति भी , ओर मनुष्या योनि मे जन्म लेने वले हर व्यक्ति का सब से पहला धर्म यह है कि वो अपने समाज की, मानवता की सेवा करे, उन के दुख दर्द मै काम आये, अपने कामो से लोगो को सुखी बनाये,'
ReplyDeleteकहानी ने बहुत ही खास सीख दी है।
राज भाई बहुत ही प्रेणास्पद बाते है जो हमारे जिवन को सफल बनाने के लिये आवश्यक है।
बहुत ही प्रेरक।
ReplyDeleteraj ji
ReplyDeleteaapne yam aur chitrgupt likhaa
to yaad aayaa kahin yam smhita agar aap dhoondh saken to
mujhe nadi ke paat ke niyam ka sutr yaani shlok jaroor bhej deve kafi dino se talaash me hun
बहुत सुंदर शिक्षाप्रद कहानी..
ReplyDeleteप्रेरक व प्रासंगिक चिंतन... साधुवाद..
ReplyDeleteआपके अध्यात्मिक विचार भी श्रेष्ठ और सुलझे हुए है बहुत सुंदर
ReplyDeleteमेरे ब्लॉग पर आकर "सुख" kee paribhasha पढ़ें
वत्स ! इस पृथ्वी पर जितने भी प्राणी जन्म लेते है, चाहे मनुष्या योनि मै हो या अन्य योनि मै, उन सब का कुछ ना कुछ कर्तब्य बनता है अपने समाज के प्रति भी , ओर मनुष्या योनि मे जन्म लेने वले हर व्यक्ति का सब से पहला धर्म यह है कि वो अपने समाज की, मानवता की सेवा करे, उन के दुख दर्द मै काम आये, अपने कामो से लोगो को सुखी बनाये, लेकिन आप ने तो इन मै से एक भी काम नही किया, आप ने तो हमेशा अपने बारे मै सोचा, अपने मोक्ष के बारे, आप का तो जन्म भी व्यर्थ गया....... ji Raj ji magar hum samaj me to kya apne apne ghron me bhi apna kartavya aur jimmedariyan nahi nibhate.....!!
ReplyDeleteप्रेरक कथा है।आभार।
ReplyDeleteBahut achchi kahani aur bahut hi prerak, es tarah ki kahainiyan prerit karti hai manusya ko manav banane ke liye...
ReplyDeleteRegards
प्रेरक कथा .
ReplyDeleteहम सभी इस तरह की शिक्षाप्रद कथा के लिये आपके आभारी हैं
शिक्षाप्रद कहानी, अच्छी लगी,वास्तव में हम लोग समाज के प्रति अपने दायित्वों को नहीं निभा पा रहे.
ReplyDeleteबहुत प्यारी कथा है. आभार.
ReplyDeleteसचमुच अगर इन्सान समाज एवं परिवार के प्रति अपने कर्तव्यों का पूरी ईमानदारी से पालन करे तो धरती पर ही स्वर्ग की अनुभूती की जा सकती है.
ReplyDeleteबहुत ही प्रेरणादायक कथा सुनाई आपने....आभार
Bhatiya ji ,
ReplyDeleteis lekh ko padhkar , ek sikhsa mili .. bahut sundar rachana , man ko bha gayi ..
maza aa gaya padhkar
aapko shivraatri ki shubkaamnaayen ..
Maine bhi kuch likha hai @ www.poemsofvijay.blogspot.com par, pls padhiyenga aur apne comments ke dwara utsaah badhayen..
राज जी,
ReplyDeleteमुझसे पहले आए पाठक अपनी प्रतिक्रियाओं में सब कुछ कह चुके हैं। अच्छी पोस्ट के लिए आभार।
prerak katha...thanx
ReplyDeleteIs katha ke madhyam se gehri baat kahi aapne..
ReplyDeleteप्रेरक कथा कही है आपने। आभार।
ReplyDeleteसही दर्शन सही विचार ।
ReplyDeleteसंसार से भाग कर मोक्ष कहाँ मिलेगा ।
RAJ JEE !
ReplyDelete'MAA' BLOG PE AAKE 'MAA TUJHE SALAM' KO SALAAM KAH GAYE ,AAPKO SALAM !! BAHUT UTSAH BADH GAYA.
IS LEKH NE MUJHE EK AATM MANTHAAN KARNE AUR 'KARTAVYA'KYA HAI FIR SE SOCHNE PE VIVAS KAR DIYA HAI .
VAHEE KAR RAHA HOON.
IS RAJ KEE GRHRAYEE KO NAMAN !
सर्वश्रेष्ठ तप गृहस्थ का तप होता है , स्वामी जी तो पलायन वादी निकले , इसी पलायन वाद और स्व-केन्द्रित विचार धारा के ही कारण ही ,बौद्धों का पतन हुआ था
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