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30/12/08

काम की बाते...

हमे अपने गलत कामों को, गलतियो को, पापो को स्वीकार करने मै कभी भी शर्म नही करनी चाहिये, क्योकि यही वो काम है जो हमे दुसरो से, अपने ईश्बर से, अपनो से दुर ले जाते है, अपनी गलती मनाना मेल मिलाप का ही संस्कार है, यानि जब हम अपनी गलती अपना पाप स्वीकार करते है, तो हमारे बिछुडे, हमारा ईश्बर हमे माफ़ कर देता है, ओर हमे सद्ध मार्ग पर वापिस लाता है.

आस्था का दामन है कभी भी नही छोडना चाहिये.... कई बार हम असफ़ल होते है ओर हताश हो कर आस्था का दामन छोड बेठते है, यही हमारी बहुत बडी भुल होती है, हम मंजिल के करीब पहुच कर भटक जाते है, आस्था मै बहुत शक्ति है जिस की कल्पना भी नही की जा सकती, इस लिये हमे इस चमत्कारी आस्था का दामन कभी नही छोडना चाहिये,

यह लेख इस साल का अन्तिम लेख है, आओ मनन करे इस साल मै हम ने क्या पाया क्या खोया,
कोन कोन सी गल्तिया की, ओर उन गलतियो को इस साल के साथ ही छोड कर, नये साल मे साफ़ मन से प्रवेश करे, ओर अपना ओर अपने देश का नाम ऊचा करेम बुराईयो को इस साल के साथ दफ़न कर के नये साल मै अच्छाईयो को अपना प्रतीक बनाये.... जय हिन्द जय भारत.
नये साल की पहली सुर्य किरण से साथ मै अपना पहला लेख ले कर हाजिर होऊगां, ओर नये साल की बधाईयां भी तभी दुगां
अलविदा मेरी ,तुम्हारी हम सब की जिन्दगी का यह एक साल, इसे प्यार से अलविदा कहते है, ओर नये साल के स्वागत की तेयारियां करते है.
धन्यवाद

06/12/08

काम की बाते

हम सब को यह बात हमेशा याद रखनी चाहिये कि परिवार, समाज ओर यह सारी दुनिया हम सब के आपसी सहयोग ओर भाईचारे की भावना से ही चल रही है, मुस्बित, दुख ओर बुरा समय किसी पर भी आ सकता है, चाहे वो कितना भी लायक हो, अमीर हो, राजा हो. ऎसे समय मे हम सब को सहायता की जरुरत होती है,होसल्ले की जरुरत होती है, सहायता ओर होसल्ला मिल जाने से, मन को तस्स्ली होती है, ओर दुख, कष्ट ओर मुस्बित थोडी कम लगती है, इस कारण हमे बिना भेदभाव के बिना जातपात के ,बिना धर्म का भेदभाव के सब के काम आना चाहिये, आज किसी ओर पर दुख है..... कल हम पर भी आ सकता है.
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आओ ज्ञानी बने, आओ सुखी बने
क्योकि ज्ञानी मनुष्य का मन बिलकुल साफ़ होता है, जिस मे अहंकार का अंधेरा नही होता, यानि वह निर्हंकारी होता है,ओर यह एक बहुत ही बडा गुण है,ज्ञानी मनुष्य बहुत मेहनत करता है,
कई अच्छे काम करता है, लोगो की मदद करता है, लेकिन उस मै कभी अहंकार नही आता, कि यह काम मेने किया है, या फ़िर मेरे बिना यह काम कभी पुरा नही होता, या फ़िर अगर मै उस की मदद ना करता तो वो आज तक कुछ ना होता, ओर यह **मै** अहंकार है, इस अहंकार को खत्म कर दो आप सुखी हो जाओगे.

17/11/08

काम की बाते

सहन शील....
इतने भी सहन शील ना बनो की दुशमन अपनी दुष्टा से आप को दुख देता जाये,
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भगवान की प्राप्ति...
हमे भगवान की प्राप्ति के लिये वन वन घुमने , या तपस्या करने की जरुरत नही, बस हमारा मन बिलकुल शुद्ध होना चाहिये..... रविदास जी।
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भगवान के हाथ देने के लिये हमेशा खुले है, लेने के लिये हमे मेहनत तो करनी ही होगी.... गुरु नानक देव जी

23/04/08

माता सीता जी से एक शिक्षा १४

क्रमश से आगे....
'हे अग्निदेव !इस प्रकार सीता की शुद्धि आवश्यक थी, मे यों ही ग्रहण कर लेता तो लोग कहते कि दशरथ पुत्र राम मूर्ख ओर कामी हे, (कुछ लोग सीता के शील पर शकं भी करते जिससे उस का गोरव घटता,आज इस अग्नि परीक्षा सीता ओर मेरा दोनों का मुख उज्जवल हो गया हे) मे जानता हूं कि जनक नन्दिनी सीता अन्न्यह्र्गया ओर सर्वदा मेरे इच्छानुसार चलने वाली हे, जेसे समुन्द्र अपनी मर्यादा त्याग नहीं सकता, उसी प्रकार यह भी अपने तेज से मर्यादा मे रहने वाली हे, दुष्टात्मा रावण प्रदीप्त अग्नि ज्वाला के समान अप्राप्त इस सीता स्पर्श नहीं कर सकता था,सुर्या- कान्ति-सदृश सीता मुझसे अभिन्न हे, जेसी आत्मवान पुरुष र्कीर्ति का त्याग नही कर सकता.
इतना कह कर भगवान श्रीराम प्रिया सती सीता को ग्रहण कर आनन्द मे निमग्र हो गये, इस प्रसांग से यह सीख्ना चाहिये कि स्त्री किसी भी हालत मे पति पर नाराज ना हो ओर उसे संतोष कराने के लिये न्याययुक्त उचित चेष्टा करे,
गृहस्थ धर्म....
सीता अपने स्वामी ओर देवर के साथ आयोध्या लोट आती हे, बडी बुढी स्त्रियो ओर सभी सासुओं के चरणॊ मे प्रणाम करती हे, सब ओर सुख छा जाता हे,अब सीता अपनी सासुओ की सेवा मे लगती हे ओर उन्कि सेवा मन से करती हेकि सब को मुग्ध हो जाना पडता हे, सीता जी गृहस्थ का सारा काम सुवारुरुप से करती हे जिससे सभी सन्तुष्ट हे, इससे यह शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये कि विदेश से लोटते ही सास ओर सभी बडी बुढी स्त्रियो को प्रणाम करन चाहिये ओए सास आदि की सच्चे मन से सेवा करनी चहिये,एवं घर का का काम सुचारु रुप से करना चहिये.
समान व्यवहार...
श्रीसीता जी भरत , लक्षमण ओर शत्रुघण इन देवरो के साथ पुत्रवत बर्ताव करती थी ओर खानपान आदि मे किसी प्रकार का भी भेद नही रखती थीं,स्वामी राम के लिये जेसा भोजन बनता था ठीक वेसा ही सीता अपने देवरो के लिये बनाती थी,देखने मे यह बात छोटी सी मालुम होती हे , किन्तु इन्ही छोटी छोटी बातो के कारण आज भारत मे लाखो परिवार बुरी दशा मे हे, सीता जी के इस बर्तव से स्त्रियो को खान-पान मे समान व्यवहार रखनए की शिक्षा लेनी चाहिये ,
सीता परित्याग...
एक समय भगवान राम गुप्तचरो के दुवारा सीत के सम्बन्ध मे लोका पवाद सुन कर बहुत ही शोक करते हुये लक्षमण से कहने लगे कि भाई ! मे जानता हू कि सीता पबित्र ओर यशस्विनी हे,लकां मे उसने तेरे सामने जलती हुई अग्नि मे प्रवेश करके अपनी परीक्षा दी थी ओर सर्वलोक- साक्षी अग्निदेव ने स्वयं प्रकट हो कर समस्त देवता ओर ऋषियों के सामने सीता के पाप रहित होने की घोषणा की थी,तथापि इस लोकापवाद के कारण मेने सीता के त्याग का निश्चय कर लिया हे,इसलिये तू कल प्रात: काल ही सुमन्त सारथी के रथ मे बेठा कर सीत को गगां के उस पार तमसा नदीं के तीर पर महातमा वाल्मीकि के आश्रम के पास निर्जन वन मे छोडकर चला आना, तुझे मेरे चरणॊ की ओर जीवन की शपथ हे, इस सम्बन्ध मे तू मुझ से कुछ भी ना कहना, सीता से भी अभी कुछ न कहना, लक्षमण ने दु;ख भरे ह्र्दय से मोन होकर आग्या स्वीकार की ओर प्रात: काल ही सुमन्त से कहकर रथ जुडवा लिया.
क्रमश...
४,५ किश्ते ओर बची हे

21/04/08

माता सीता जी से एक शिक्षा १३

क्रमश से आगे...
यथा मे ह्रदयं नित्यं नापसर्प्ति राघवात ,
तथा ळोकरुप साक्षी मां सर्वत: पातु पावक.
यथा मां शुद्धचारित्रां दुष्टां जानाति राघव,
तथा ळोकस्य साक्षी मां सर्वत:पातु पावक.
’ हे अग्रिदेव ! यदि मेरा मन कभी भी श्रीराम चन्द्र से चलायमान न हुआ हो तो तुम मेरी सब प्रकार से रक्षा करो, श्रीरघुनाथ जी महाराज मुझ शुद्ध चरित्रवाली या दुष्टा को जिस प्रकार याथार्थ जान सकें वेसे ही मेरी सब प्रकार से रक्षा करो, क्योकि तुम सब ळोकों के साक्षी हो, इतना कहकर अग्रिकी प्रदक्षिणा कर सीता नि:शक ह्रदय से अग्रिमे प्रवेश कर गयी, सब ओर हाहाकार मच गया, ब्रह्मा, शिव, कुबेर,इन्द्र,यमराज ओर वरुण आदि देवता आकर श्रीराम को समझाने लगे,ब्रह्मा जी ने बहुत कुछ रहस्य की बाते कहीं.
इतने मे सर्वळोको के साक्षी भगवान अग्रिदेव सीता को गोद मे लेकर अकस्मात प्रकट हो गये ओर वॆदेही को श्रीराम के प्रति अर्पण करते हुये बोले....
एषा ते राम वॆदेही पापमस्यां न विद्दाते,
नॆव वाचा न मनसा नॆव बुद्धचा ना चक्षुषा.
सुवृत्ता वृत्तशॊटीर्य न त्वामत्यचरच्छुभा,
रावणेनापनीतॆषा वीर्योत्सिक्तेन रक्षसा.
त्वया विरहिता दीना विवशा निर्जने सती,
रुद्धा चान्त:पुरे गुप्ता त्वच्चित्त त्यत्परायाण.
रक्षित राक्षसीभिक्ष्च घोराभिघोंरबुद्धिभि.
प्रळोभ्यमाना विविधं तजर्यमाना च मेथिली.
नाचिन्तयत तद्रक्षस्त्व दूतेनान्तरात्मना.
विशुद्धभावां निष्पापां प्रतिगृह्रीष्ट मेथिलीम,
न किक्ष्चिदभिघातव्या अहमाज्ञापयामि ते.
( वा० रा० ६/११८ १५-१० )
राम ! इस अपनी वॆदही सीता को ग्रहण करो,इस्मे कोई भी पाप नहीं हे, हे चारित्राभिमानी राम! इस शुभलक्षणा सीता ने वाणी, मन, बुद्धि या नेत्रों से कभी तुम्हारा उल्लंघन नही किया, निर्जन वन मे जब तुम इसके पास नहीं थे तब यह बेचारी निरुपाय ओर विवश थी, इसी से बलगर्वित राबण इसे बलात हर ले गया था, यद्धपि इसको अन्त:पुर मे रखा गया था ओर क्रूर से क्रूर स्वभाव वाली राक्षसियां पहरा देती थी, अनेक प्रकार के प्रलोभन दिये जाते थे ओर तिरस्कार भी किया जाता था.परन्तु तुम्हारे मन लगाने वाली, तुम्हारे परयाण हुई सीता ने तुम्हारे सिवा दुसरे कामन से विचार ही नही किया, इसका अन्त:करण शुद्ध हे,यह निष्पाप हे, मे तुम्हे आज्ञा देता हुं, तुम किसी प्रकार की भी शंका न करके इसको ग्रहण करो,अग्रिदेव के वचन सुनकर मर्यादा-पुरुषोत्त्म भगवान श्रीराम बहुत प्रसन्न हुये,उनके नेत्र हर्ष से भर आये ओर उन्होंने कहा....
क्रमश.....

20/04/08

माता सीता जी से एक शिक्षा १२

क्रमश से आगे....
अग्नि परीक्षा
रावण का वध हो गया, प्रभु श्रीराम जी की आज्ञा से सीता को स्नान करवा कर ओर वस्राभूषण पहना कर विभीषण श्रीराम के पास लाते हे,बहुत दिनो के बाद प्रिय पति श्रीराम श्रीरघुवीर के पूर्णिमा के चन्द्र्सदृश मुख को देख कर सीता का सारा दुख नाश हो गया ओर उस का मुख निर्मल चन्द्रमा की भातिं चमक उठा, परन्तु श्रीराम ने यह स्पष्ट कह दिया - मेने अपने कर्तव्या का पालन किया, रावण का वध कर तुझ को दुष्ट के चुंगल से छुडाया, परन्तु तू रावण के घर मे रह चुकी हे, रावण ने तुझे बुरी नजर से देखा हे, अतएव अब मुझे तेरी आवश्यकता नहीं, तू अपने इच्छानुसार चाहे जहां चली जा , मे तुझे ग्रहण नहीं कर सकता.
नास्ति में त्वय्यभिष्वड्गों यथेष्टं गम्यतामिति.
(वा० रा० ६/११५/२१ )
श्रीराम के इन अश्रुतपूर्व कठोर ओर भयंकर वचनॊं को सुन कर दिव्य सती सीता की जो दशा हुई उसका वर्णन नही हो सकता, स्वामी के वचन-बाणो से सीता के समस्त अगों मे भीषण घाव हो गये,वह फ़ूट फ़ूट कर रोने लगी, फ़िर करुणा को भी करुण सागर मे डुबो देने वाले शव्दो मे उसने धीरे धीरे गदद बाणी से कहा.....
‘ हे स्वामी ! आप साधारण मनुष्यों की भातिं मुझे क्यो ऎसे कठोर ओर अनुचित शव्द कहते हे, मे अपने शील की शपथ कर क्र कहती हूं कि आप मुझ पर विश्रवास रखें, हे प्राणनाथ ! रावण हरण करने के समय जब मेरे शरीर क स्पर्श किया था, तब मे परवश थी,इस्मे तो देव का ही दोष हे,यदि आप को यही करना था , तो हनुमान को जब मेरे पास भेजा था तभी मेरा त्याग कर दिये होते तो अबतक मे अपने प्राण ही छोड देती,! श्री सीता जी ने बहुत सी बाते कही, परन्तु श्रीराम ने कोईजबाव नही दिया, तब वे दीनता ओर चिन्ता से भरे हुये लक्षमण से बोली- हे सॊ मित्रे ! ऎसे मिथ्यापवाद से कल्कितं होकर जीना नही चाहती, मेरे दुख की निवृति ब्के लिये तुम यहीं अग्रि-चिता तेयार कर दो , मेरे प्रिया पत ने मेरे गुणो से अप्रसन्न हो कर जनसमुह के मध्यम मेरा त्याग किय हे, अब मे अग्रिअप्रवेश करके इस जीवन का अन्त करना चाहाती हुं, वॆदेही सीता के वचन सुनकर लक्षमण ने कोप भरी लाल- लाल आखंओ से एक बार श्री राम चन्द्र की ओर देखा, परन्तु राम की रुचि के अधीन रहने वाले लक्षमण ने आकार ओर सकेंत से श्री राम की रुख समझ कर उनके इच्छानुसार चिंता तेयार कर दी, सीता ने प्रज्वलित अग्रि के पास जा कर देवता ओर ब्राहमणो को प्रणाम कर दोनो हाथ जोड कर कहा..
क्रमश....

19/04/08

माता सीता जी से एक शिक्षा ११

क्रमश से आगे...
आदित्य भॊ ळोककृताकृतज्ञ ळोक्स्य सत्यानृतकर्मसक्षिन,
मम प्रिया सा क्र गता ह्र्ता वा शंसस्व मे शोकहतस्य सर्वम.
ळोकेषु सर्वेष न नास्ति किश्रिधतें न नित्यं विदितं भवेत्तत,
शंसस्व वायो कुलपालिनी तां मृता ह्र्ता वा पथि वर्तते वा.
वा० रा० ३/६३/१६-१७
ळोकों के कृत्याकृत्य को जानने वाले हे सुर्यादेव ! तू सत्य ओर असत्य कर्मो का साक्षी हे, मेरी प्रिया को कोई हर ळे गया हे या वह कहीं चली गयी हे, इस बात को तू भली भातिं जानता हे, अतएव मुझ शोक पीडित को सारा हाळ बतळा, हे वायु देव ! तीनो ळोकॊ मे तुझे से कुछ भी छिपा नही हे,तेरी सर्वत्र गति हे, हमारे कुल की मर्यादा की रक्षा करने वाली सीता मर गयी, हरी गयी,या कहीं मार्ग भटक रही हे, जो कुछ हो सो याथार्थ कह.
हा गुन खानि जानकी सीता,
रुप सील ब्रत नेम पुनीता.
ळक्षिमन समुझाए बहू भांती,
पूछत चले ळता तरु पांती.
हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी
तुम देखी सीता मृग नॆनी.
+ + + + + + +
एहि बिधि खोजत बिळखत स्वामी,
मनहूं महा बिरही अति कामी.
इस से यह नही समझना चहिये कि भगवान श्री राम ‘महाविरही ओर अतिकामी’ थे, सीता जी का श्रीराम के प्रति इतना प्रेम था ओर वह उनके ळिये इतनी व्याकुल थी कि श्रीराम को भी वॆसा ही बर्ताव करना पडा,भगवान का यह प्रण हॆ-...
ये यथा मां प्रपधन्ते तांस्तथॆव भजाम्यहम. (गीता ४/११ )
श्रीराम ने ’महाविरही ओर अतिकामी’ के सदृश ळीळा कर इस सिद्धान्त को चरितार्थ कर दिया, इससे यह शिक्षा ळेनी चहिये कि यदि हम् भगवान को पाने के लिये व्याकुल होंगे तो भगवान भी हमारे लिये वॆसे ही व्याकुल होंगे,अतएव हम सब को परमात्मा के लिये इसी प्रकार व्याकुल होना चाहिये.
क्रमश...

15/04/08

माता सीता जी से एक शिक्षा १०

क्रमश से आगे...
दुष्ट रावाण ने बलात हरण करने के समय मुझ को स्पर्श किया था, उस समय तो मे परधीन थी,मेरा कुछ भी बस नही चलता था,अब तो श्रीराम स्वंय यहां आवें ओर राक्ष्सों सहित रावण का वध करके मुझे अपने साथ ले जाये, तभी उनकी ज्वलन्त कीर्ति की शोभा हे.
भला विचारीये , हनुमान-सरीखा सेवक , जो सीता जी को सच्चे ह्र्दय से माता से बढकर समझता हे ओर सीता राम की भक्ति करना ही अपने जीवन् का परम ध्येय मानता हे ,सीता पतिव्रत्य धर्म की रक्षा के लिये, इतने घोर विपत्तिकाल मे अपने स्वामी के पास जाने के लिये भी उसका स्पर्श नही करना चाहती. केसा अद्भुत धर्म का आग्रह हे, इस से सीखना चाहिये की भारी विपाति के समय भी स्त्री को यथासाध्य पर पुरुष के अंगो का स्पर्श नही करना चहिये.
वियोग मे व्याकुलता..
भगवान श्रीराम मे सीता का कितना प्रेम था ओर मिलने के लिये उनके दिल मे कितनी अधिक व्याकुलता थी,इस बात का कुछ पता हरण के समय से ले कर लकां विजय तक के सीता जी के विविध वचनो से लगता हे,उस प्रसंग को पढते पढते ऎसा कोन हे जिसका मन करुणा से ना भर जाय ? परन्तु सीता जी की सच्ची व्याकुलता का सबसे बढकर प्रमाण तो यह हे,कि श्रीरघुनाथ जी महाराज उनके लिये विरह्व्याकुल स्त्रेण मनुष्य की भांतिविह्लल हो कर उन्मत्वत रोते ओर विलाप करते हुये ऋषिकुमारो, सुर्य, पवन,पशु पक्षी ओर जड वृक्षलताओ से सीता का पत्ता पुछते फ़िरते हे
क्रमश...

14/04/08

माता सीता जी से एक शिक्षा ९

क्रमश...
बचनु न आव नयन भरे बारी,
अहह नाथ हॊं निपट बिसारी.
इसके बाद हनुमानजी ने जब श्रीराम का प्रेम सन्देश सुनाते हुये यह कहा कि माता ! श्रीराम क प्रेम तुम से दुगुना हे, उन्होंने कहल्वाया हॆ.
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा.
जानत प्रिया एकु मनु मोरा.
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं,
जानु प्रीति रसु एत्नेहि माहीं.
यह सुन कर सीता बहुत खुश हो जाती हे,श्री सीता राम का परस्पर कॆसा आदर्श प्रेम हॆ.जगत के स्त्री-पुरुष यदि इस प्रेम को आदर्श बना कर परस्पर ऎसा ही प्रेम करने लगें तो गृहस्थ सुखमय बन जाय.
पर पुरुष से परहेज..
सीता जी ने जयन्त की घटना याद दिलाते हुये कहा हे कपिवर !तु ही बता, मे इस अवस्था मे केसे जी सकती हुं ? शत्रु को तपाने वाले श्रीराम-लक्ष्मण समर्थ होने पर भी मेरी सुधि नही लेते, इससे मालूम होता हे अभी मेरा दु:खभोग शेष नहीं हुया हॆ. यो कहते कहते जब सीता के नेत्रो से आसुंयों की धारा बहने लगी तब हनुमान ने उन्हे आश्र्वासन देते हुये कहा कि माता ! कुछ धीरज रखो, शत्रुयओ के संहार करने वाले कृतात्मा श्रीराम ओर लक्ष्मण थोडे ही समय मे यहां आ कर रावण का वधकर तुम्हे अवध्पुरी ले जाये गे,तुम चिन्ता ना करो,यदि तुम्हारी बिशेष इच्छा हो ओर मुझे आज्ञा दो तो मॆ भगवान श्रीराम की ओर तुम्हारी दया से रावण का वध कर ओर लकां को नष्ट कर तुमको प्रभू श्रीराम चन्दर के समीप ले जा सकता हुं, अथवा हे देवी !तुम मेरी पीठ पर बेठ जाओ, मॆ आकाश मार्ग से हो कर महासागर को लाघं जाऊंगा.यहां के राक्षस मुझे पकड नहीं सकेगे, मे शीघ्र ही तुम्हे प्रभु श्रीरामचन्द्र जी के पास ले जाउगा;हनुमान के वचन सुन कर उनके बल-पराक्रम की परीक्षा लेने के बाद सीता कहने लगी हे वानर श्रेष्ट ,पतिभक्त्ति का सम्यकू पालन करने वाली मे अपने स्वामी श्रीरामचन्द्र को छोड कर स्वेच्छा से किसी भी अन्य पुरुष के अंग का स्पर्श करना नही चाहती
भर्तुभर्क्ति पुरस्कृत्य रामादन्यस्य वानर,
नाहं स्प्रष्टंउ स्व्तो गात्र्मिच्छेयं वानरोत्तम.
वा० रा ० ५/३७/६२
क्रमश...

13/04/08

माता सीता जी से एक शिक्षा ८

क्रमश से आगे...
धर्म के लिये प्राण त्याग की तेयारी
विपत्ति मे पद कर भी कभी भी धर्म का त्याग नही करना चहिये, इस विषय मे सीता का उदाहरण सर्वोत्तम हे, लकां की आशोक-वाटिका मे सीता का धर्म नष्ट करने के लिये दुष्ट रावण की ओर से कम चेष्टाएं नहीं हुई, राक्षसियो ने सीता जी को भय ओर प्रलोभन दिखाकर बहुत ही तगं किया, परन्तु सीता तो सीता ही थी,धर्म त्याग का प्रश्र तो वहां ऊठ ही नही सकता, सीता ने तो छल से भी अपने बाहरी बर्ताव मे भी विपत्ति से बचने हेतु कभी दोष नही आने दिया, उसके निर्मल ओर धर्म से परिपूर्ण मन मे कभी बुरी स्फ़ुरणा ही नही आ सकी, अपने धर्म पर अटल रहती हुई सीता दुष्ट रावण का सदा तीव्र ओर नितियुक्त्त शब्दो मे तिरस्कार हि करती रही, एक बार रावण के वाग्बाणो को न सह सकने के समय ओर रावण के दुआरा माया से श्रीराम-लक्ष्मण को मरे हुये दिखला देने के कारण वह मरने को तेयार हो गयी,परन्तु धर्म से डिगने की भावना स्वप्रमे भी कभी उसके मनमे नहीं उठी,वह दिन रात भगवान श्रीराम के चरणो के ध्यान मे लगी रहती थी, सीता जी ने हनुमान के दुवारा जो सन्देश कहलाया, उससे पता लग सकता हे कि उन की केसी पवित्र सिथति थी.
नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट,
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट.
इससे स्त्रियों को यह शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये कि पति के वियोग मे भीषण आपत्तियां आने पर भी पति के चरणॊ का ध्यान रहे, मन मे भगवान के बल पर पूरी वीरता,धीरताओर तेज रहे,स्वधर्म पालन मे प्राणो कीभी आहुति देने को सदा तॆयार रहे,धर्म त्याग कर प्राण रहने मे कोई लाभ नही,प्ररन्तु प्राण त्याग कर धरम मे रहने मे ही कल्याण हे.
स्वधमें निधनं श्रेय: (गीता ३ ३५ )
सावधानी:
सीता जी की सावधानी देखिये, जब हनुमान जी आशोक वाटिका मे सीता के पास जाते हे तब सीता अपने बुद्धिकॊशल से सब प्रकार उन की परीक्षा करती हे. जब तक उसे यह विश्रास नही हो जाता कि हनुमान वास्तव मे श्रीरामचन्द्र के दुत हे, शाक्तिसम्पन्न हे ओर मेरी खोज मे ही यहां आये हे, तब तक खुल कर बात नहीं करती हे.
दाम्पत्य प्रेम
जब पुरा विश्रास हो जाता हे तो स्वामी ओर देवर की कुशलता पूछती हे,फ़िर आसुं बहाती हुई करुणापूर्ण शब्दो मे कहती हे-हनुमन ! रघुनाथ जी का चित्त तो बडा कोमल हे, कृपा करना तो उन का स्वभाव ही हे,फ़िर मुझ से वह इतनी निष्ठुरता क्यो कर रहे हे,वह तो स्वभाव से ही सेवक को सुख देने वाले हे, फ़िर मुझे उन्होने क्यो बिसार दिया हे,क्या श्री रघुनाथजी कभी मुझे याद भी करते हे ?हे भाई ! कभी उस श्याम सुन्दर के कोमल मुख कमल को देख कर मेरी ये आखें शीतल होंगी ?अहॊ ! नाथ ने मुझ को बिलकुल भुला दिया ! इतना कह्कर सीता रोने लगी, उस की बाणी रुक गई!!
क्रमश...

12/04/08

माता सीता जी से एक शिक्षा ७

क्रमश से आगे...
गुरुजन सेवा ओर मर्यादा
बडॊं की सेवा ओर मर्यादा मे सीता का मन कितना लगा रहता था, इसे समझनेके लिये महराज चित्रकुट यात्रा के प्रसंग को याद कीजिये, भरत के व जाने पर राजा जनक भी राम से मिलने के लिये चित्रकुट पहुंचते हे, सीता की माता श्रीराम की माताओ से सीता की सासुओं से मिलती हे ओर सीता को साथ ले कर अपने डेरे पर आती हे, सीता को तपस्विनी के वेष मे देख कर सब को विषाद होता हे,पर महाराज जनक अपनी पुत्री के इस आचरण पर बडे ही सन्तुष्ट होते हे ओर कहते हे...
पुत्रि पबित्र किए कुल दोऊ,
सुजस धवळ जगु कह सबु कोऊ.
माता पिता बडे प्रेम से ह्र्दय से लगा कर अनेक प्रकार की सीख ओर असीस देते हे, बात करते करते रात अधिक हो जाती हे, सीता मन मे सोचती हे कि सासुओं की सेवा छोड कर इस अवस्था मे रात यहां रहना अनुचित हे, किन्तु स्वभाव से ही लज्जाशीला सीता संकोचवस मन की बात मां बाप से कह नही सकती.
कहित न सीय सकुचि मनमाहीं,
इहां बसब रजनी भल नाहीं.
चतुर माता सीता के मन का भाव जान लेती हे ओर सीता के शील स्वभाव की मन ही मन सराहना करते हुए माता पिता सीता को कोसल्या के डेरे मे भेज देते हे, इस प्रसंग से भी स्त्रियों को सेवा ओर मर्यादा की शिक्षा लेनी चहिये.
निर्भयता
सीता का तेज ओर उस की निर्भयता देखिये, जिस दुद्रांत रावण का नाम सुन कर देवता भी कपंते थे,रावण के हाथो मे पडी हुई सीता अति क्रोध से उसका तिरस्कार करती हुई कहती हे-अरे दुष्ट निशाचर,तेरी आयु पूरी हो गयी हे, अरे मुर्ख ! तू श्रीरामचन्द्र जी की सह धर्मिणी को हरण कर प्र्ज्वलिज़ अग्रिन के साथ कपडा बाधं कर चलना चाहता हे, तुझ मे ओर राम्चन्दर जी मे उतना ही फ़र्क हे जितना सिंह ओर सयार मे हे,समुन्द्र ओर नाले मे,अमृत ओर कांजी मे, सोने ओर लोहे मे ,चन्दन ओर कीचड मे, हाथी ओर बिलाव मे,गरुड ओर कोवें मे,हंस ओर गीध मे होता हे,मेरे अमित प्रभाव वाले स्वामी के रहते तू मुझे हरण क्रेगा तो जेसे मकखी घी पीते ही मृत्यु के वश हो जाती हे , वेसे हीतू भी काल के गाल मे चला जायेगा,ओर हमे सीखना चहीये की अपने ईशवर के होते हमे कभी भी किसी भी अवस्था मे डरना नही चहिये,अन्याय का निर्भीक समाना करना चहिये, ओर उस ईश्वर के विश्वास पर भारोसा कर के जेसे भगवान ने रावण का वध कर के सीता को उस से छुडवाये हमे भी विपत्ति से छुडा लेगें.
क्रमश...

10/04/08

माता सीता जी से एक शिक्षा ५

क्रमश से आगे...
सीता जी के प्रेम की विजय हुई,श्रीराम उन्हें साथ ले चलना स्वीकर किया, इस कथा से यह सिद्ध होता हे कि पत्री को पति सेवा के लिये-अपने सुख के लिये नही-पति की आज्ञा को दुहराने का अधिकार हे,वह प्रेम से पति सुख के लिये ऎसा कर सकती हे,सीता जी ने यहां तक ह दिया था " यदि आप आज्ञा नहीं देंगे तब भी मॆ तो साथ चलूंगी,सीता जी के इस प्रेमाग्रह कि आज तक कोई भी निन्दा नहीं करता,क्योकि सीताजी केवल पति प्रेम ओर सेवा ही के लिये समस्त सुखों कों तिळाअजंलि देकर वन जाने को तॆयार हुई थी,किसी ईन्द्र्य सुखरुप स्वार्थ साधन के लिये नही,इस से यह नहीं समझना चाहिये कि सीताजी का व्यवहार अनुचित या पतिव्रत धर्म से विरुद्ध था,स्त्री को धर्म के लिये ऎसा व्यवहार करने का अधिकार हे,इस से पुरुष को भी यह शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये कि सहधर्मिणी पतिव्रता पत्रीं की बिना इच्छा उसे त्याग कर अन्यत्र चले जाना अनुचित हे, इसी प्रकार स्त्री को भी पति सेवा ऒर पति सुख के लिये उस्के साथ ही रहना चाहिये,पति के बिरोध करने पर भी कष्ट ऒर आपत्ति के समय पति सेवा के लिये स्त्री को पति के साथ रहना उचित हे, अवश्य ही अवस्था देख कर कार्य करना चाहिये,सभी स्थितियो मे सब के लिये एक सी व्यवस्था नही हो सकती,सीता जी ने भी अपनी साधुता के कारण सभी समय इस अधिकार क उपयोग्नहीं किया था.
पति सेवा मे सुख
वन मे जा कर सीताजी पति सेवा मे सब कुछ भुल कर सब तरह सुखी रहती हे,उसे राजपाट, महल-बगीचे,धन दोलत ओर दास-दासियो की कुछ भी स्मृति नहीं होती,राम को वन मे छोड कर ळोटा हुया सुमन्त सीता जी के लिये विलाप करती हुई माता कॊसल्या से कहता हॆ ’सीता निर्जन वन मे घर की भांति निर्भय होकर रहती हे,वह श्रीराम मे मन लगा कर उनका प्रेम प्राप्त कर रही हे,वनवास से सीता जी को कोई भी दुख नही हुया, मुझे तो ऎसा प्रतीत होता हे कि (श्रीराम के साथ ) सीता जी वनवास के सर्वथा योग्या हे,चन्द्रानना सती सीता जॆसे पहले यहां बगीचों मे जा कर खेलती थी, वॆसे ही वहां निर्जन वन मे भी वह श्रीराम के साथ बालिका के समान खेलती हे, सीता क मन राम मे हे,उसका जीवन श्रीराम के अधीन हे,अतएव श्रीराम के साथ सीता के लिये वन ही अयोध्या हे ऒर श्रीराम के बिना अयॊध्या ही वन हॆ,धन्य ! पातिव्रत्य ! धन्य !
क्रमश...

09/04/08

माता सीता जी से एक शिक्षा ४

क्रमश से आगे...


वन के नाना क्लेशों ओर कुटुम्ब के साथ रहने के नाना प्रलोभनों को सुन कर भी सीता अपने निश्चक्ष्य पर अडिग रहती हे,वह प्ति-सेवा के सामने सब कुछ तुच्छ समझती हे.


नाथ सकल सुख साथ तुम्हारे,सरद बिमल बिधु बदनु निहारे.


यहां पर यह सिद्ध होता हॆ कि सीता जी ने एक बार प्राप्त हुई पति-आज्ञा को बदला कर दुसरी बार अपने मनोनुकूल आज्ञा प्राप्त करने के लिये प्रेमाग्रह किया,यहां तक कि जब भगवान श्रीराम किसी प्रकार भी नहीं माने तो हदय विदीर्ण हो जाने तक का सकेत कर दिया.

ऎसेउ बचन कठोर सुनि जॊ न हदय बिलगान,

तॊ प्रभु बिषम बियोग दुख सहिह्हिं पावंर प्रान.

अध्यात्मरामायण के अनुसार तो श्री सीता जी ने यहां तक स्पष्ट कह दिया कि....

रामायणानि बहुश: श्रुतानि बहुभिर्द्विजॆ,

सीतां विना वनं रामो गत: किं कुत्रचिद्वद.

अतस्त्वया गमिष्यामि सर्वथा त्वत्सहायिनी.

यदि गच्छसि मां त्यक्त्वा प्राणांस्त्यक्ष्यामि.

मॆने भी ब्राह्मणो के दुआरा रामायण की अनेक कथाएं सुनी हे, कहीं भी ऎसा कहा गया हो तो बतलाइये कि किसी रामावतार मे श्रीराम सीता कॊ अयोध्या मे छोड कर वन गये हे.इस बार यह नयी बात क्यो होती हे? मॆ आप की सेविका बन कर साथ चलुगी, यदि किसी भी प्रकार आप मुझे साथ वन मे नही ले जाओ गे तो मेआप के सामने प्राण त्याग दुगी.पति सेवा की भावना से सीता ने स्पष्ट रुप से अवतार विषयक अपनी बडंआई के शब्द भी कह डाले.

बाल्मीकि रामायण के अनुसार सीता जी के अनेक रोने,गिडगिडाने,विविध प्रार्थना करने ओर प्राणत्याग पूर्वक परलोक मे पुन: मिलन होने का निश्च्च्य बतलाने पर भी जब श्रीराम उन्हे साथ ले जाने को राजी नही हुये तब उअन्को बडा दुख हुया ऒर वे प्रेमकोप मे आंखो से गर्म गर्म आंसुओ की धारा बहाती हुई नीति के नाते इस प्रकार कुछ कठोर वचन भी कह गयी कि- हे देव ! आप सरीखे आर्य पुरुष मुझ जेसी अनुरक्त, भक्त,दीन ओर सुख दुख को समान समझने वाली सहधर्मिणी को अकेली छोड कर जाने का विचार करें यह आप को शोभा नही देता,मेरे पिता जी ने आपको पराक्रमी ओर मेरी रक्षा करने मे समर्थ समझ कर ही अपना दामाद बनाया था,इस कथन से यह सिद्ध होता हे कि श्रीराम लडकपन से अत्यन्त श्रेष्ठ पराक्र्मी समझे जाते थे,इस प्रषंग से मे श्री वाक्मीकिजी ओर गोस्वामी तुलसी दास जी ने सीता- राम के संवाद मे जो कुछ कहा हे सो सभी स्त्रि- पुरुष के ध्यान पूवक पढने ओर मनन करने योग्या हे.

क्रमश..

08/04/08

माता सीता जी से एक शिक्षा ३

क्रमश से आगे..

माता पिता का आज्ञा का पालन..

सीता अपने माता पिता की आज्ञा पालन करने मे कभी नही चुकती थी,माता-पिता से उसे जो भी शिक्षा मिलती .उस पर बडा अमल करती थी,मिथिला से विदा होते समय ओर चित्रकूट मे सीता जी को माता-पिता से जो शिक्षा मिली हे,वह स्त्रीमात्र के लिये पालनीय हे.

होएहु संतत पियहि पिआरी, चिरु अहिबात असीस हमारी,

सासु ससुर गुर सेवा करेहू, पति रुख लखि आयसु अनुसरेहू.

पति सेवा के लिये प्रेमाग्रह...

श्रीराम को राज्यभिषेक के बदले यकायक वनवास हो गया, सीता जी ने यह समाचार सुनते ही तुरन्त अपना कर्तव्या निश्चया कर लिया, नॆहर-ससुराल, गहने-कपडे,राज्य-प्रिवार,महल-बाग,दास दासी,ओर भोग-राग आदि से कुछ मतलब नही ,छाया की तरह पति के साथ रहना ही पत्नी का एकमात्र कर्तव्य हॆ, इस निश्चयपर आकर सीता ने श्रीराम के साथ वनगमन के लिये जॆसा कुछ व्यवहार किया हॆ,वह परम उज्जवल ओर अनुकरणीय हॆ, श्रीसीता जी ने प्रेमपुर्ण विनय ओर हठ से वनगमन के लिये पूरी कोशिश की,साम ,दाम,नीति सभी वॆध उपायो का अवलम्बन किया ओर अन्त मे वह अपने प्रयत्न मे सफ़ल हुई, सीता जी काअ ध्येय था किसी भी उपाय से वन मे पति के साथ रह कर पति की सेवा करना,इसी को वह अपना परम धर्म समझती थी, इसी से उन्हे परम आनन्द की प्राप्ति होती थी, वह कहती थी...

मातु पिता भगिनी प्रिया भाई,प्रिय परिवारु सुह्र्द समुदाई,

सासु-ससुर गुरु सजन सहाई,सुत सुंदर सुसील सुखदाई.

जहॆ लगि नाथ नेह अरु नाते,पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते,

तनु धनु धामु धरनि पुर राजु,पति बिहीन सबु सोक समाजू.

भोग रोग सम भूषन, जम जातना सरिस संसारु

07/04/08

माता सीता जी से एक शिक्षा २

क्रमश से आगे...
जनक पुर मे पिता के घर सीता जी का सब के साथ बडे प्रेम का बर्ताव था,छोटे बडे सभी स्त्री पुरुष सीता जी की हदया से,प्रेम भाव सेआदर करते थे,सीता जी शुरु से ही सलज्जा थी,ओर लज्जा ही स्त्रीयो का आभुषण हे,वे प्रतिदिन माता पिता के चरणो मे प्रणाम करती थी, ओर घर के सभी नोकर चाकर उन के व्याव्हार से प्रसन्न थे, सीता जी के प्रेम के बर्ताव क कुछ दिग्दर्शन उस समय के वर्णन से मिलता हे,जिस समय वह ससुराल के लिये विदा हो रही हे,
पुनि धीरजु धरि कुंआरि हंकारीं , बार बार भेटहिं महतारी.
पहुंचावहिं फ़िरि मिलहिं बहोरी ,बढी परस्पर प्रीति न थोरी..
पुनि पुनि मिलत सखिन्ह बिलगाई, बाल बच्छ जिमि धेनु लवाई.
प्रेमबिबस नर नारि सब सखिन्ह सहित रनिवासु,
मानहुं कीन्ह बिदेहपुर करुनां बिरहें निवासु.
सुक सारिका जानकी ज्याए, कनक पिंजरन्हि राखि पढाए,
ब्याकुल कहहिं कहां बॆदेही, सुनि धीरजु परिहरई न केही.
भए बिकल खग मृग एहि भांती, मनुज दसा कॆसे कहि जाती,
बंधु समेत जनकु तब आए, प्रेम उमिग लोचन जल छाए.
सीय बिलोकि धीरता भागी , रहे कहावत परम बिरागी,
लीन्हि रायं उर लाइ जानकी, मिटी महामरजाद ग्यान की.
जहां ज्ञानियो के आचार्य जनक के ज्ञान की मर्यादा मिट जाती हे ओर पिंजरे के पखेरु तथा पशु-पक्षी भी ‘ सीता ! सीता !! पुकारकर व्याकुल हो उठते हॆ वहां कितना प्रेम हॆ. इस बात का अनुमान पाठक कर ले, सीता जी के इस चरित्र से स्त्रियो को यह शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये कि स्त्री को नॆहर मे छोटे बडे सभी के साथ ऎसा बर्ताव करना उचित हे जो सभी को प्रिया हो.
क्रमश...
मेरी कोई भी गलती हो तो आप इस ओर मेरा ध्यान दिलाये ओर क्षमा करे, ओर मुझे यह शव्द लिखना नही आता कोई मेरी मदद करे ** ज्ञ ** यह शव्द तो मेने कापी किया हे कही से .

06/04/08

माता सीता जी से एक शिक्षा

हमारे यहां हिन्दी भाषा बोलने वाला नही मिलता तो, हिन्दी की किताबे कहां से मिलेगी,लेकिन जब भी भारत आता हु तो पिता जी कोई ना कोई अच्छी किताब देदेते हे,ओर जब भी मुझे थोडा बहुत समय मिलता हे तो वो किताबे मे पढ लेता हु, कल एक किताब मे ऎसा ही कुछ पढा, मन हुया यह विचार आप से भी बाटं लु, यह लेख माता सीता जी के जीवन से हे ओर स्त्री के रुप मे सीता के चरित्र से एक आदर्श शिक्षा हे..
यह कहना गलत नही होगा की पुरी दुनिया के स्त्री चरित्रो मे रामप्रिया जगजन्नी जानकी जी का चरित्र सबसे उत्तम हे,रामायण के सभी स्त्री-चरित्रो मे तो सीता जी का चरित्र सव्रोत्तम,सवर्था आदर्श ओर पद पद पर अनुकरण करने योग्य हे,भारत-ललनाओ के लिये सीता जी का चरित्र सन्मार्ग पर चलने के लियेपूर्ण मार्ग दर्शन हे,सीता जी के असाधारण पतिव्रत्य,त्याग,शील,अभय,शान्ति,क्षमा,सहनशीलता,धर्मपरायण्ता, नम्रता,सेवा,संयम,सद्व्यवहार,साहस,शोर्या आदि गुण एक साथ जगत की विरली महिलाओ मे मिल सकते हे,सीता जी के पवित्र जीवन ओर अप्रतिम पतिव्रत्यध्र्म के सद्र्श उदाहरण रामायण तो कया जगत के किसी भी अन्य पुस्तक मे मिलने कठिन हे,आरम्भ से ले कर अन्त तक सीता जी के जीवन की सभी बाते ( केवल एक प्रसंग को छोड कर) पवित्र ओर आदर्श हे.ऎसी कोई बात नही जिस से हमारी मां बहन को सत शिक्षा न मिले,संसार मे अब तक जितनी भी स्त्री हो चुकी हे,उन मे सीता जी को पातिव्रत्य्धर्म मे सर्वशिरोमिण कहा जाता हे.किसी भी ऊची से ऊची स्त्री के चरित्र की सूक्ष्म आलोचना करने से ऎसी एक न एक बात मिल ही सकती हे जो अनुकरण के योग्य ना हो,परन्तु सीता जी का ऎसा कोई भी आचरण नही मिलता.
जिस एक प्रंसग को सीता के जीवन मे दोष युक्त समझा जाता हे वह हे माया म्रग को पकडने के लिये श्रीराम के चले जाने ओर मारीच के मरते समय हा सीते ! हा लक्ष्मण ! की पुकार करने पर सीता का घबडाकर लक्ष्मण के प्रति यह कहना कि "मे समझती हुं की तू मुझे पाने के लिये अपने बडे भाई की मृत्यृ देखना चाहता हे.मेरे लोभ मे तु भाई की रक्षा करने नही जाता,इस बार्तव के लिये सीता ने आगे जा कर बहुत पश्रअताप किया.साधारण स्त्री-चरित्र मे सीता जी का यह बर्ताव कोई विशेष दोषयुक्त नही हे,स्वामी को संकट मे पडे देख कर आतुरता ओर प्रेम की बाहुल्तया से सीता जी यहां पर नीति का उल्लंघन कर गयी थी.श्रीराम-सीता जी का अवतार मर्यादा की रक्षा के लिये था, इसी से सीता जी की यह एक गलती सम्झी गयी ओर इसीलिये सीता जी ने पक्ष्श्रताप किया था.
क्रमश...