28/04/11

पैसा पैसा हाय पैसा

कुछ दिन पहले एक नामी गिरामी बाबा चल बसे, अब यह कैसे बाबा थे, जो आदमी की जेब देख कर ही दर्शन देते थे, अब जब मर गये तो अपने पीछे आकूत दोलत छोड गये, उस दोलत के लिये  उसी के बंदे जो उस के धंधे मे शामिल थे लड रहे हे, सभी को अपनी अपनी पडी हे, यानि वह दोलत जो उस बाबा ने जादू दिखा कर लुटी, भोले भाले लोगो से, लालची लोगो से, दुसरो को लुटने वालो से, इन नेताओ से, वगेरा वगेरा...इस आकूत दोलत मे से एक पैसा भी बाबा के संग नही गया, बस उस बाबा के कर्म ही उस के संग गये हे, ओर इस खेल को मै रोजाना समाचार पत्रो मे पढ रहा हुं, आज एक विचार आया मन मे सो आप सब से बांटना चाहा, हम आराम से अगर रोजाना मजदुरी कर के जितना कमा लेते हे, वो हमारे लिये ओर हमारे परिवर के लिये काफ़ी होता हे,हम उस मे किसी का हक भी नही मारते, फ़िर हमे अच्छॆ कर्म करने की जरुरत भी नही होगी, क्योकि हम पापो से तो दुर ही हे,अगर सभी हमारी तरह से सोचे तो इस भारत क्या पुरी दुनिया मे कोई भुखा ना सोये.

इस बाबा ने तडप तडप कर ही अपने प्राण छोडे हे, उस की आकूत दोलत भी उस के पराण नही बचा पाई, उस की भक्ति भी उसे नही बचा पाई, बाल्कि भगवान भी उसे सबक देना चाहता था, उस के संग हम सब को भी एक सबक इस बाबा की मृत्यु से लेना चाहिये कि हमारे संग कुछ नही जाना, तो क्यो हम दुसरो का हक मार मार कर बेंक बेलेंस बढाने पर लगे हे, क्यो खुद भी सुख से नही रहते ओर हजारो लाखो की वद दुआ भी लेते हे, यह अरब पति, करोड पति, लखपति क्या मेहनत से ईमानदारी से बने हे, यह नेतओ ने जो काला धन स्विस बेंक या अपने रिशते दारो के नाम से जमा कर रखा हे, क्या इस धन से यह आसान मोत मरेगे? या स्वर्ग मे जायेगे? या मरने के बाद अपने परिवार को सुख शांति दे पायेगे? तो क्यो यह दुसरो के मुंह से निवाला छीन कर दुसरो को दुखी करते हे, अपने चंद पल खुशी मे बिताने के लिये क्यो यह लाखॊ अरबो की बद दुयाऎ... नन्हे नन्हे बच्चो के मुंह से दुध छीन कर यह अपने पेग पीते हे, क्या यह सब सुखी रहेगे? कई लोग कुत्तो की तरह से भीख मांग कर खाते हे इन की वजह से, क्या यह अपने परिवार को सुख शांति दे पायेगे,

हम सब की जिन्दगी कितने बरस की हे, ओर उस दोरान हम इस समाज को इस दुनिया को क्या दे रहे हे? जो दे रहे हे, वो तो हम एक कर्ज दे रहे हे, कल को ब्याज के संग हमे वापिस तो मिलेगा ही, उस समय जब हम एक एक सांस के लिये तडपेगे तब पशछताने से क्या लाभ, जानवर भी सदियो के लिये खाना जमा कर के नही रखते, चुहे, ओर चींटिया भी ३, ४ महीने का खाना ही जमा रखती हे, ओर हमारा बस चले तो हम अपनी बीस ्पिढियंओ के लिये जमा रखे, जब कि हमे पता नही हमारी अगली पिढी भी आयेगी जा नही,ओर अगर आई तो वो केसी निकलेगी? कोकि कोई भी हराम की कमाई खा कर हलाल का काम नही करेगा.

हाय पैसा हाय पैसा कया करेगे यह इतने पैसो का, अपने कुछ साल तो ’ऎश मै बिता लेगे, बाकी परिवार इन के जाते हे आपस मे लडेगा; भाई भाई दुशमन बन जाते हे, अपनी जिन्दगी के कुछ साल ऎश मे बीताने के लिये क्यो हजारो लाखॊ को दुखी करते हे,कितने लोग भुख से मरते हे, कितने बच्चे बिना दुध के बिना दवा के मरते हे, उन सब के जिम्मेदार यही लोग हे जो पैसा पैसा करते हे... सीखॊ इस बाबा के अंत से कुछ अब भी सुधर जाओ

51 comments:

shikha varshney said...

प्राणी क्या लेकर आया था ? जो कुछ ले जायेगा..
बढ़िया सीख देती पोस्ट.

मनोज कुमार said...

सच है ... खाली हाथ आए हैं हम, खाली हाथ जाना है।
इतना पैसा कहां से आया? और यह दान किसका था? देखें, बहुत कुछ सामने आएगा।

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

कितनी अच्छी बात कही ....सच भी है जाना तो खाली हाथ ही है....

सुज्ञ said...

यह मृत्यु ही नश्वरता और क्षणभंगुरता से साथ साथ कितने भी बुरे कर्म करले साथ कुछ भी नहीं जाने वाला।

ललित शर्मा said...

कफ़न में जेब सिला कर रखने लगे हैं लोग
कुछ ऐसा कर जाएं जो नहीं कर सके हैं लोग॥

Rahul Singh said...

सार्थक चिंतन.

M VERMA said...

वाह ... बहुत सुन्दर बात है
सार्थक और विचारोत्तेजक भी

Suman said...

nice

वाणी गीत said...

इस माया मोह से संत भी नहीं बच पाए ..
मगर आखिर अंत तो सबका एक सा ही होता है ...
सत्य वचन !

Arvind Mishra said...

यह बाबा थोडा अलग इसलिए था कि इसने जन कल्याण की कई योजनायें उसी पैसे से चलाई -कुछ तो जनता को वापस किया -उन हरामखोरों से तो अच्छा ही रहा जो भारतीयों का पैसा सिस बैंक और जर्मनी के बैंकों में दबाये बैठे हैं

सुशील बाकलीवाल said...

जब लोग अपनी अगली पीढियों के लिये धन जोडने-छोडने की कोशिश करते हैं तो जैसे वो सोच रहे होते हैं कि उनकी अगली पीढियां अपाहिज ही जन्मेंगी और कुछ कमा-धमा नहीं पाएँगी इसलिये हम ही उन्हीं के लिये सब कुछ जुटादें । जबकि एक कपूत भी दस पीढियों के लिये संग्रहित धन को आसानी से ठिकाने लगा देता है । फिर भाई-भाईयों में मरने-मारने की शैली में फैसले भी इसी अनीतिपूर्ण कमाई से छोडे गये धन के कारण परिवार में उपजती है ।
सब कुछ जानने समझने के बाद भी बहुसंख्यक इंसान हाय पैसा की जुगत में ही लगे रहते हैं ।

Khushdeep Sehgal said...

अभी तो राज जी देखिएगा, तीन करोड़ अनुयायियों से नियमित मासिक चंदे के बल पर जो डेढ लाख करोड़ का सरमाया पूरी दुनिया में खड़ा किया है, उसकी बंदरबांट के लिए क्या क्या खेल होंगे...

जय हिंद...

ajit gupta said...

हद तो तब होती है जब हमारा मीडिया इन्‍हें भगवान कहकर प्रचारित करता है। शीर्षक देखिए - "भगवान की मृत्‍यु पर भगवान रोए"। सचिन को भी भगवान बनाकर पेश किया गया और उनके आँसुओं के सैलाब में सारा मीडिया ही डूब गया। वाह रे भगवान!

अन्तर सोहिल said...

अपना भी यही फलसफा है जी कि जब मैनें कोई पाप किया ही नहीं तो पुण्य की क्या जरुरत रह गई।
मुश्किल से 10% सज्जन होते हैं जो बिना पाप की कमाई किये पुण्य के कार्य करते हैं। 90% दान-पुण्य वही करते हैं, जिन्होंने ज्यादा पाप किये होते हैं।
काला धन कमाने के बाद अचानक सफेद वस्त्र पहनना अच्छा लगने लगता है, ये मेरा अपना अनुभव है।
प्रणाम

: केवल राम : said...

जो लोग व्यक्तियों को जीवन दर्शन का पाठ पढ़ाते हैं वह खुद भी इस माया से बहार नहीं निकल सके तो औरों का क्या होगा ...आपने बहुत सटीकता से प्रकाश डाला है ..जीवन की नियति यही है ..लेकिन इस वास्तविकता को समझना आवशयक है ...शुक्रिया

sushil gupta said...

युधिष्टर जी ने कहा था कि हर रोज किसी न किसी प्राणी को हम मरते हुए देखतें हैं, पर यह सोचते हैं कि वो मर गया हम थोडे ही मरेगें, यह दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य है। इस लिए आदरणीय राज जी बाबा जी को सामने रख कर किसी बदलाव की उम्मीद न रखें।
प्रणाम
सुशील गुप्ता

नरेश सिह राठौड़ said...

मै तो इतना जानता हूँ की गीता का कथन है की जैसा कर्म करोगे वैसा ही फल पाओगे ये बात इस संसार के लगभग लोग जानते है | फिर भी लोग अपने कुकर्मो को छिपाने के लिए कुतर्को का सहारा लेते है |एक बच्चे से पूछा गया की बेटा तुम्हारा पेट क्यों बढ़ रहा है तो उसने कहा की मै मिट्टी खाता हूँ | अब आप सोचिये जब उस बच्चे को पता है की मिट्टी खाने से पेट बढ़ता है फिर भी वो मिट्टी खा रहा है | यही हाल इस भौतिक संसार का है उसे पता है की गलत कार्यों की सजा इसी योनी में भुगतनी है फिर भी वो गलत कार्य करता है | भले ही वो योगी हो या भोगी हो |

हरकीरत ' हीर' said...

हाय ..हाय..ये पैसा ......

पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

सब पैसे की ही माया है भाटिया साहब, अब देखिये न कि बाबा तो चला गया मगर ४०००० करोड़ की सम्पति देख सेवकों के मुह से लार टपक रही है :)
पूरी पब्लिक ही पागल है !

anshumala said...

ये बात जानते सब है पर मानता कौन है | सब तो यही सोचते है जितने दिन जीना है आराम से जी लो मरने और मरने के बाद की चिंता अभी हम क्यों करे तब की तब देखी जाएगी |

Er. सत्यम शिवम said...

आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (30.04.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

नीरज जाट जी said...

खुद को भगवान कहता था।

rashmi ravija said...

बहुत ही अच्छी सीख दी है...इस पोस्ट के माध्यम से

प्रवीण पाण्डेय said...

नश्वर तन, बहका है मन,
क्या करे हमारा यह जीवन।

Abhishek Ojha said...

सत्य वचन !

Sunil Kumar said...

राज जी अभी तो यह देखना है की बाबा जी की शिक्षा, जैसे मिलकर रहो ,आपस में प्रेम व्यवहार बनाये रखें ,धन का मोह छोड़ें का प्रभाव उनके चेलों पर कितना पड़ा

ZEAL said...

भाटिया जी ,
जब तक व्यक्ति पैसे से ऊपर उठकर नहीं सोचेगा , कभी भी भवसागर पार नहीं हो पायेगा। इस सार्थक आलेख के लिए बधाई एवं आभार।

रंजना said...

सत्य कहा...

जाते वक़्त साथ सिर्फ किया कर्म ही जाता है...सो बस वही पूंजी जीवन में जुटाना चाहिए..

सुशील बाकलीवाल said...

श्री राज जी,
स्वास्थ्य-सुख ब्लाग पर भाभीजी की कलाई के दर्द से सम्बन्धित आपके प्रश्न का उत्तर इसी ब्लाग पर अगली पोस्ट के रुप में देने का प्रयास किया है । आप कृपया उसे देखलें व प्रयोग में भी अवश्य करवाएँ । धन्यवाद सहित...

Manoj K said...

जीवन का सच मृत्यु... अगर हम इसे समझ लें तो शायद पाप कम हों जायेंगे

सटीक लेखन के लिए शुभकामनाएँ

दिगम्बर नासवा said...

मौत का एक दिन मुऐयन है ...
नींद क्यों रात भर नही आती ....
बस वैसे ही ग़ालिब का ये शेर याद आ गया आपकी पोस्ट पढ़ कर .... सार्थक चिंतन और लेखन ....

kase kahun? said...

dunia chhod vairagya liya aur vaha bhi maya jal me fans gaye....ant to vahi hua jo sabka hota hai....sarthak chintan.

Kajal Kumar said...

बाप रे कैसे कैसे कड़े सवाल उठा मारे हैं आपने भी आज. बहुत से बाबा लोगों के भक्तों को आपकी बातें रास नहीं आएंगी.

मदन शर्मा said...

क्या खूब लिखा है आपने !बहुत सार्थक लेखन है आपका.
कडवी सच्चाई को व्यक्त किया है आपने
जाने कब हम इससे सबक सीखेंगे.
कितने दुःख की बात है की आज भी हम सच्चाई को स्वीकार करने को तैयार नहीं.
लोगों को बेवकूफ बना कर गलत कमाई द्वारा परोपकार के काम को कभी भी उचित नहीं ठहराया जा सकता.
इसे उचित ठहराने की प्रवृत्ति समाज के लिए बहुत घातक सिद्ध होगी....

मदन शर्मा said...

क्या खूब लिखा है आपने !बहुत सार्थक लेखन है आपका.
कडवी सच्चाई को व्यक्त किया है आपने
जाने कब हम इससे सबक सीखेंगे.
कितने दुःख की बात है की आज भी हम सच्चाई को स्वीकार करने को तैयार नहीं.
लोगों को बेवकूफ बना कर गलत कमाई द्वारा परोपकार के काम को कभी भी उचित नहीं ठहराया जा सकता.
इसे उचित ठहराने की प्रवृत्ति समाज के लिए बहुत घातक सिद्ध होगी....

मदन शर्मा said...

क्या खूब लिखा है आपने !बहुत सार्थक लेखन है आपका.
कडवी सच्चाई को व्यक्त किया है आपने
जाने कब हम इससे सबक सीखेंगे.
कितने दुःख की बात है की आज भी हम सच्चाई को स्वीकार करने को तैयार नहीं.
लोगों को बेवकूफ बना कर गलत कमाई द्वारा परोपकार के काम को कभी भी उचित नहीं ठहराया जा सकता.
इसे उचित ठहराने की प्रवृत्ति समाज के लिए बहुत घातक सिद्ध होगी....

mahendra verma said...

सार्थक एवं सटीक चिंतन के लिए आभार।

G.N.SHAW said...

ताऊ जी प्रणाम ...आप ने बहुत ही बारीकी से जीवन के अंत को प्रस्तुत किया है ! बहुत - बहुत बधाई !

कविता रावत said...

बहुत सुन्दर सार्थक चिंतन...
आपकी पोस्ट पढ़कर यह पंक्तियाँ याद आ गयी ...
"माया मोह महा ठगनी हम जानी
त्रिगुण फाँस लिए डोले बोले मधुर बानी!! "

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

माया मोह - अगर संत ना भी चाहे तो देने वाले कितने ही हैं .. और फिर वह संत जकड जाता है ऊ सत्ता को बचाने में .. घोड़े वाले हसन ने भी कमाल किया कई हज़ार करोड़ों का इनकम टेक्स डकार गया तो स्विस बेंक की दौलत का कोई हिसाब नहीं... आखिर आदमी को कितनी जरूरत है .. भूख तो रोटी की और प्यास पानी की होती थी ..आज इन लोगों की भूख ही दौलत और प्यास पराया धन हड़पने की है ... और जाते समय क्या ले जाते है .. जैसे आये वैसे गए ..सब यही धरा रह गया ... इस से सच में इंसान को सीख लेनी चाहिए..

honesty project democracy said...

काश हर व्यक्ति की पैसों की लालसा मूलभूत साधन और संसाधन तक ही सीमित रहती...ऐसे बाबाओं की वजह से पैसों की लालसा और बढती है लोगों के मन में ...

निर्मला कपिला said...

बाबा लोग ज़िन्दा रहते हुये तो कुछ सिखा नही पाते चलो मर कर ही ये शिक्षा तो दे दी। शुभकामनायें।

BrijmohanShrivastava said...

काश कोई ऐसे दृष्टांतों से शिक्षा लेता ।सबको पता है सिकंदर जब गया दुनिया से दौनों हाथ खाली थे। कविता सुनाई सब ठाठ पडा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा , कहा गया साई इतना दीजिये जामें कुटुम्ब समाय मै भी भूखा न रहूं साधु न भूखा जाये ं मगर ये अर्थ युग है। अर्थ के पीछे हाय हाय । मरने के वाद अरथी कहा गया तो ठीक कहा गया

निर्झर'नीर said...

आज जब इन्सान खुद का पेट नहीं पाल पा रहा है ऐसे में एक इन्सान ने करोड़ो लोगों को मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराइ जो खुद सर्कार भी नहीं करा पा रही है ..इस बात को नजरंदाज नहीं किया जा सकता

Babli said...

सच्चाई को बहुत ही सुन्दरता से प्रस्तुत किया है आपने! आख़िर सभी खाली हाथ आते हैं और खाली हाथ ही जाते हैं! बढ़िया लगा!

Sunil Kumar said...

कोई जागे या ना जागे , हम तो आवाज लगाते रहेंगे , बहुत सुंदर आलेख , बधाई

kunwarji's said...

bilkul sahi baat kahi aapne,par udaaharn......

kunwar ji,

सतीश सक्सेना said...

न हाथी है न घोडा है वहां पैदल ही जाना है ...
शुभकामनायें राज भाई !

Arunesh c dave said...

क्या करे इंसान किसी न किसी पर भरोसा करना ही पड़ता है श्रद्धा रखनी पड़ती है ऐसे मे बाबा लोगो की बन आती है । पर श्रद्धा लोगो की निजी राय है दूसरो को उस पर आक्षेप नही करना चाहिये ।

देवेन्द्र पाण्डेय said...

ये नशे के प्रकार हैं। पैसे कमाने का नशा हो या बाबाओं की अंध भक्ति का।

Rakesh Kumar said...

मोह,अज्ञान और आसक्ति के कारण ही हम जीवन का ध्येय नहीं समझ पाते.या समझ कर भी अनजान बने रहते हैं.
आपने सुन्दर प्रेरणास्पद प्रस्तुति की है.
बहुत बहुत आभार इस प्रस्तुति के लिए.