13/12/10

घर की ओर वापिस.. एक बिटिया के संग..Delhi to San Francisco California

मै २२/११ को दिल्ली आ गया, शाम हो गई थी, दो दिन युही दिल्ली मे रहा, मन तो कब का बच्चो की ओर था,फ़िर आई २५ तारीख, ओर मैने शुक्र किया,पेकिंग तो पहले ही हो गई थी, सीट भी मैने नेट से बुक कर दी थी, ओर चेंक इन भी मैने नेट से ही कर दिया, अब बस समान देना बाकी था, ओर सारा दिन मैने घडी देख कर बिताया.

 रात का खाना भी मुझे अच्छा नही लगा, फ़िर वादे के अनुसार आज मुझे गोलगप्पे, चाट, आईस क्रीम ओर भी पता नही क्या क्या खिलाया बच्चो ने, वेसे मै इन सब चीजो से दुर रहता हुं भारत आ कर, फ़िर रात के दस बजे टेक्सी आ गई, ओर हम पहुच गये एयर पोर्ट पर, समान बगेरा दो मिंट मे दे दिया, फ़िर इमिग्रेशन पर पहुचे बाप रे यहां तो पहले से भी ज्यादा भीड थी, हम भी एक विदेशियो की लाईन मै लग गये, लेकिन तभी एक नया काऊंटर खुला** पी आई ओ** के लिये तो हमारा ना० भी झट से आ गया, फ़िर हमारे हेंड बेग की ओर हमारी चेकिंग हुयी, ओर हम चल पडे अपनी बेलगाडी की ओर....

एयर पोर्ट देख कर खुशी हुयी, लेकिन कुछ कमियां रह गई जो इस खुब सुरती पर एक दाग दिखती हे, जेसे जहां भी देखो सफ़ाई कर्मचारी अपने साधारण कपडो मे दिखे, अरे इन्हे कम से कम दो तीन जोडी वर्दी तो दो, फ़िर कलीन देख कर मन खिन्न हुआ, यह जल्द ही गंदा होगा, वेसे भी अच्छा नही लगा, साधारण फ़र्श होता तो बहुत अच्छा लगता ओर सफ़ाई भी खुब रहती, वेसे सफ़ाई तो अब भी बहुत थी, हम अपनी मजिंल कॊ ओर जा रहे थे, चेन से, तभी एक लडकी अपने बेग को उठाये हाफ़ंती हुयी दिखाई दी, कुछ घबराई सी.

मेरे पास आ कर बोली क्या यह रास्ता ७ बी की तरफ़ ही जा रहा हे? मैने मुस्कुरा कर कहा आप को बुरी तरह सांस चढी हे पहले आप आराम से खडी हो कर सांस ले, अरे इस बेग को नीचे रख दे..... फ़िर मैने उस से कहा आप पेरिस जा रही हे ना, तो अभी तो बहुत समय हे फ़लाईट का मस्ती से चलो मैने भी ए एफ़ २२५ से ही जाना हे, तो वो लडकी बोली कि मै पहली बार जहाज मे बेठ रही हुयी, ओर बहुत घवराई हुयी हुं, इतनी देर मै हम बाते करते करते कब वेटिंग रुम मै पहुच गये पता ही नही चला.

फ़िर मैने उस की सीट ना० देखी ओर उसे बताया कि आप की सीट काफ़ी पीछे हे, ओर थोडी बहुत ओर बाते बताई, कि घबराना नही, ओर भी अन्य बाते, फ़िर मै बेमतलब युही इधर उधर घुमता रहा,ओर थोडी देर मै बोर्डिंग का समय हो गया, ओर सब धीरे धीरे अपनी अपनी सीटॊ पर बेठ गये,जाते समय मैने उस लडकी से कहा कोई भी काम हो तो मुझे या साथ वाले से पुछ लेना सभी मदद करेगे.

मेरे साथ वाली दो सीट खाली थी, ओर जहाज के दरवाजे बंद हो गये थे, तो मै मन मे बहुत खुश हुया कि चलो आज भी सोते जायेगे, लेकिन तभी पीछे से एक गोरी ने आ कर एक सीट पर कब्जा कर लिया, ओर अपने पति से बोली तुम आराम से सो जाना, फ़िर अपनी सहेली को बुलाया कि एक सीट ओर खाली हे तुम भी...... तभी मैने उसे जर्मन भाषा मे कहां मादाम यह सीट खाली नही, यहां मेरी दोस्त आने वाली हे, ओर वो लगी एयर होस्टेज को बुलाने.... तो मै चला गया उस लडकी को बुलाने, वो बेचारी जहाज के अंत वाली सीट पर विराज मान थी, मैने उसे अपने साथ वाली सीट पर बेठने का न्योता दिया, तो वो बहुत खुश हुयी, ओर मैने कहा अभी समान यही रहने दो बाद मे उठ लेगे, अभी चलो.

अब उस गोरी मादाम का चेहरा देखने लायक था,लेकिन बोली कुछ नही ओर कोई हाव भाव भी नही आने दिया चेहरे पर, फ़िर बातो बातो मे पता चला कि वो लडकी करनाल से हे, ओर पंजाबी  भी बोलती हे, तो मैने उसे बताया कि मै भी पंजाबी ही हुं, पंजाब से, फ़िर हमारा जहाज करीब डेढ , दो घंटे लेट हो गया, ओर बेठे बेठे सभी बोर होने लगे, फ़िर कुछ हरकत हुयी ओर हम चल पडे अपनी मंजिल की ओर यानि अब जहाज रेंगता हुआ रनवे की ओर चल पडा, वो लडकी काफ़ी डरी हुयी थी, ओर आंखे बंद कर के पता नही अपने भगवान को याद कर रही थी या रो रही थी, जब जहाज रनवे पर आया तो मैने उसे टोक कर समझाया कि डरो मत सब ठीक होगा, ओर अगर तबीयत खराब हो तो भी घबराना नही यह आप के लिये ही पडा हे ऊलटी इस मे करना, अपने आस पास वालो पर नही ओर हमारी परवाह भी मत करना, कभी कभी यह सब होता हे, बस अब मस्ती से देखो यह तुम्हारी पहली उडान हे इसे हमेशा याद रखोगी, डरो नही, ओर फ़िर कुछ पल के बाद ही जहाज ने जमीन छॊड दी.

करीब दस पंद्रहा मिंट के बाद लडकी की आवाज सुनाई दी कि मेरे कान बंद हो गये हे, तो मैने उसे बताया कि ऎसे सांस लो कान खुल जायेगे, फ़िर मैने बीयर मंगवाई, ओर लडकी ने शायद ओरेंज जूस, फ़िर खाना आ गया, मैने तो सब चट कर दिया, लडकी को मैने पहले ही कह दिया था कि तुम भारतिया खाना ही लेना, युरोपियन खाना तुम अभी नही खा पाओगी, फ़िर खाना आने पर लडकी ने पुछा क्या खत्म करना जरुरी हे, मैने कहा अरे नही  जरुरी नही जितना खाना खाओ, ओर उस बेचारी ने शायद कुछ नही खाया.

फ़िर पता नही कब मेरी आंख लग गई, ओर एक दो घंटे के बाद ऊठा तो लडकी ने कहा कि बाथरुम जाना हे, मैने उसे समझाया ओर बताया कि वहां जाओ, फ़िर मै भी टांगे सीधी करने के लिये उठ गया, मादाम सो रही थी बेचारी को जागना पडा, करीब एक घंटे के बाद मै वापिस आया,अब लडकी को अगली फ़लाईट के बारे समझाया, उस ने सेन फ़्रासिस्को जाना था, ओर मैने मुनिख, मैरे पास समय भी कम था, मैने उसे बडे प्यार से समझाया कि अब डरो मत, तुम्हे आगे भी सभी यात्री मदद करने वाले ही मिलेगे, वो चाहे किसी भी देश के हो, ओर मै चाहता हुं कि तुम्हे भारतिया साथी ही मिले, लेकिन आगे कि यात्रा के लिये डरो मत सब सफ़ल होगा.

फ़िर हमारा जहाज पेरिस एयर पोर्ट पर उतर गया, ओर जब मै अपनी मंजिल की ओर बढा तो लगा कोई मुझे देख रहा हे, मुड कर देखा तो वो लडकी मासूम ओर उदास नजरो से मेरी ओर देख रही थी,मै वापिस आया ओर उसे कहा कि मुझे उस के साथ सफ़र करके बहुत मजा आया, ओर बहुत अच्छा लगा,अब तुम घबराओ नही तुम्हे आगे मुझ से भी अच्छा साथी मिलेगा,जाओ...... अरे अरे अपना नाम तो बताती जाओ, उस ने रुआसीं आवाज मे अपना नाम बताया, लेकिन मुझे सिर्फ़ कोर समझ मै आया, ओर मुझे लगा कि अगर मै ओर रुका तो यह रो ना पडे, मैने उसे अपना नाम बताया शुभ्कामनाये दी ओर मुड कर अपनी मंजिल की ओर चल पडा.

बाद मे मुझे भी वहां दो तीन घंटे बेठना पडा, घर आ कर बीबी को बताया कि मुझे एक मासुम सी भोली भाली ओर जवान लडकी मिली, ओर बहुत डरी हुयी थी, मुझे अपनी बिटिया की तरह लगी, दिल चाहता था उसे बच्चो की तरह सीने से लगा कर समझाऊ, लेकिन कर नही पाया, ओर अंत मे उस की मासुम शकल देख कर समझ गया कि उसे भी बहुत दुख हुया..... लेकिन यह जिन्दगी कुछ ऎसे ही चलती हे, बीबी ने पुछा उस के बारे तो मैने इतना ही कहा कि मै तो उसे होस्स्ला ही देता रहा, कोन हे कहां किस के पास जाना हे मैने यह सब नही पूछा, शायद घर वालो से भी पहली बार बिछडी होगी तभी गुम थी, मेरे साथ भी पहली बार यही हुया था,

जहां भी हो खुश रहे,ओर अगर सेन फ़्रासिसको मे वो बच्ची यह लेख पढे तो, जरुर अपना पुरा नाम बताये, बच्ची मै कह रहा हुं, वो शायद २०, २५ के बीच की होगी, बिलकुल मेरे बच्चो की तरह, ओर मुझे सारे रास्ते ऎसा लगा जेसे मेरी बेटी पहली बार प्लेन मे मेरे संग बेठी हो ,दिल्ली से पेरिस, फ़िर पेरिस से सेन फ़्रासिसको २६/११ फ़्रांस एयर लाईन, ना० AF 225.सब को राम राम

36 comments:

शिवम् मिश्रा said...


बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है - पधारें - पैसे का प्रलोभन ठुकराना भी सबके वश की बात नहीं है - इस हमले से कैसे बचें ?? - ब्लॉग 4 वार्ता - शिवम् मिश्रा

JAGDISH BALI said...

अंत तक कहानी मर्मस्पर्षी हो चली है !

नरेश सिह राठौड़ said...

भाटिया साहब आप पाठकों को भी अपने भावुकता के बहाव में बहा ले जाते है |हमारा रोहतक आना इस मायने में भी सार्थक रहा था |

मनोज कुमार said...

राज जी बहुत ही आत्मीयता से भरा यह संस्मरण पढकर मन भींग-सा गया।

प्रवीण पाण्डेय said...

आपने बहुत अच्छा किया जो बिटिया का हृदय बाँधे रखा। ऐसी यात्राओं में कोई ढाढ़स बँधाने वाला मिल जाये तो घबराहट कम होती है।

सतीश सक्सेना said...

आपने बहुत अच्छा किया वह बच्ची बाकी रास्ता आपके द्वारा दी गयी हिम्मत से काट लेगी ! प्रेरक प्रसंग के लिए आभार भाटिया जी !

ajit gupta said...

कल आपकी यही पोस्‍ट खुल नहीं रही थी। सच है फ्‍लाइट में कोई अपना सा मिल जाता है तो सफर आसानी से कट जाता है। परिवार में सभी को हमारा नमस्‍मार कहें।

ललित शर्मा said...

ऐसा काम राज भाटिया जैसे नेक दिल बंदा कर सकता है।
आभार

योगेन्द्र मौदगिल said...

wah bhatiya ji wah.....hame aap par garv hai.....

निर्मला कपिला said...

यात्रा विदेश की हो या देश की कई बार बहुत से ऐसे लोग मिल जाते हैं जिन्हें हम चाह कर भी भुला नही पाते। अच्छा लगा संस्मरण। शुभकामनायें।

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

आदरणीय राज भाटिया जी,
आपकी आत्मीयता ने उस लड़की को कितनी हिम्मत बंधाई होगी इसका अनुमान मैं सहज ही लगा सकता हूँ क्योकि १६ महीने पहले जब मेरा बेटा MS करने के लिए sandiago जा रहा था तो उसकी पहली इतनी लम्बी हवाई यात्रा को लेकर हम बहुत ही चिंतित थे और सोचते थे कि काश कोई ऐसा मिल जाता जो साथ में जा रहा होता तो सारीचिंताएं दूर हो जाती !
आपने अपना फ़र्ज़ बखूबी निभाया आपके विशाल हृदय को मेरा नमन !
ऐसे सहज लोग बहुत कम ही मिलते हैं जो किसी अनजान के काम आयें !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

Kajal Kumar said...

पढ़ कर आनंद आया. यात्राओं में इस प्रकार के अनुभव होते हैं. ऐसा ही कुछ मुझे एकबार हांगकांग हवाई अड्डे पर देखने को मिला जहां एक नवदंपति जोड़ा एकदम नर्वस घूम रहा था. वे केवल पंजाबी जानते थे जबकि उन्हें अंग्रेज़ी में समझाया जा रहा था. उन्हें लग रहा था कि उनकी सिडनी की फ़्लाइट छूट गई है क्योंकि उन्हें बताए गए टर्मिनल पर दिल्ली की फ़्लाइट थी...और कुछ रगड़ा टाइम-ज़ोन का भी था. मैने उन्हें पंजाबी में इत्मीनान से बताया कि, हवाई अड्डे की घड़ी के अनुसार, उनकी फ़्लाइट में अभी 3 घंटे बाकी हैं तब कहीं उनकी जान में जान आई.

mridula pradhan said...

bahot achchi aapbitee.

'उदय' said...

... behad rochak va bhaavpoorn abhivyakti !!!

anshumala said...

बहुत अच्छा संस्मरण पोस्ट पढ़ कर अच्छा लगा |

डा. अरुणा कपूर. said...

बहुत अच्छा लगा पढ कर!..किसी की मदद कर के जो खुशी मिलती है, उसका आनंद अवर्णनीय होता है!...बहुर सुंदर पोस्ट!

ZEAL said...

अनुकरणीय प्रसंग !

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

भावुकता से भरा यात्रा संस्मरण ...उस लडकी के लिए आपका दिया हौसला अनुकरणीय है ..

दिगम्बर नासवा said...

अच्छा लगा पढ़ कर ... दिल को छु गया आपका लेख ... बहुत कम देखने को मिलता है ऐसा भाटिया जी .. वो भी एक अकेली लड़की के साथ ... .

shikha varshney said...

उस बच्ची का मनोबल बढ़ा कर आपने अनुकरणीय कार्य किया
बहुत सुन्दर पोस्ट.

सुज्ञ said...

बच्ची का मनोबल बढ़ाना आपके उत्तम सद्भावों का परिचायक था।
किसी के दुविधाभरे क्षणों मे आत्मियता देना ही मानवीय सद्गुण है।

अभिनन्दन!!

पी.सी.गोदियाल said...

भावुक मगर मजेदार संस्मरण भाटिया सहाब ! दोनों ही तरह के लोग मिल जाते है सफ़र में !

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

आप की कामनाओं में हम भी साथ हैं..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" said...

आपकी इस सुन्दर पोस्ट की चर्चा
बुधवार के चर्चामंच पर भी लगाई है!

Er. सत्यम शिवम said...

बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति.........मेरा ब्लाग"काव्य कल्पना" at http://satyamshivam95.blogspot.com/ जिस पर हर गुरुवार को रचना प्रकाशित साथ ही मेरी कविता हर सोमवार और शुक्रवार "हिन्दी साहित्य मंच" at www.hindisahityamanch.com पर प्रकाशित..........आप आये और मेरा मार्गदर्शन करे..धन्यवाद

अनुपमा पाठक said...

भावपूर्ण संस्मरण!

Sadhana Vaid said...

भाटिया जी बहुत ही सुन्दर और सुखद संस्मरण रहा यह आपका ! आपने जिस सहृदयता और सद्भावना के साथ उस अनजान युवती को हिम्मत और हौसला दिया और उसकी सहायता की यह आपके विशाल हृदय का परिचायक है ! वह युवती भी आपको अवश्य ही आजीवन याद रखेगी ! आपको बहुत बहुत साधुवाद !

इंदु पुरी गोस्वामी said...

राज सर ! आप एकदम वैसे ही निकले जैसा मैंने सोचा था.किसी की मदद करके किसी को क्या महसूस होता है नही मालूम.किन्तु खुद को जो आत्मिक सुख मिलता है उसकी तुलना किसी से नही की जा सकती.मैं जानती हूँ आप वही सब महसूस कर रहे हैं.है ना?

Udan Tashtari said...

बहुत अच्छा लगा...काश!! वो बच्ची कभी इसे पढ़े तो पुनः आपके संपर्क में आ जाये.

संजय भास्कर said...

आदरणीय राज भाटिया जी,
.......दिल को छु गया आपका लेख

G M Rajesh said...

jivan ke safar me raahi milte hain bichhad jaane ko
aur de jaate hain yaaden

taraanaa yaad aa gayaa so gungunaa rahaa tha aap bhi gunguna lena

हिंदीब्लॉगजगत said...

यदि आप अच्छे चिट्ठों की नवीनतम प्रविष्टियों की सूचना पाना चाहते हैं तो हिंदीब्लॉगजगत पर क्लिक करें. वहां हिंदी के लगभग 200 अच्छे ब्लौग देखने को मिलेंगे. यह अपनी तरह का एकमात्र ऐग्रीगेटर है.

आपका अच्छा ब्लौग भी वहां शामिल है.

Manoj K said...

सुन्दर यात्रा वृतान्त. पहली बार का सफर हमेशा डरा जाता है, उम्मीद है उस लड़की को कोई आप जैसा सज्जन आगे की यात्रा में मिला हो.


मनोज

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

राज जी, अब तो जलन होने लगी है। आप इतने अच्छे क्यों हैं?

Harshad Jangla said...

Raj Saab

Wonderful article, heart touching true story gave me immense pleasure.

-Harshad Jangla
Atlanta, USA

कविता रावत said...

bahut hi sundar aatmiyata bhara sansmaran.......aabhar