25/12/10

भारत जाते समय के किस्से..

इस बार जब भारत गया तो बेटा मुझे एक घंटा पहले ही एयर पोर्ट पर छोड आया था,सब कुछ तो मैने घर से ही कर लिया था, बस समान दिया ओर चेकिंग से गुजर कर वेटींग हाल मे पहुच गया, कुछ समय बाद ही हम जहाज मे बेठ गये, पेरिस तक की यात्रा थी करीब ४५ मिंट की बाकी आधा घंटा उतरने चढने मै लगा, घर से सिर्फ़ चाय पी कर निकला था, ओर जहाज मे भी सिर्फ़ एक छोटा सा बिस्किट मिला ओर एक संतरे का जुस.जहाज खुब भरा था, मेरे साथ दो ओर बेठे थे, सभी बापू के बंदर की तरह से चुप रहे.

पेरिस पहुचते ही मैने अगले टर्मिनल की तरफ़ कूच किया, मेरे पास सिर्फ़ एक घंटा ही था, ओर सारी चेकिंग बगेरा अभी होनी बाकी थी, जल्द बाजी मे मै कब बाहर निकल गया पता ही ना चला, लेकिन बाहर आ कर मुझे लाभ हुया, बीच से जाता तो काफ़ी चलना पडता, बाहर से गया तो दो मिंट मै पहुच गया अपने ट्रमिनल पर. वहां फ़िर से चेकिंग हुयी, ओर फ़िर से पासपोर्ट चेक हुया( इमिग्रेशन) फ़िर जब वेटिंग रुम की तरफ़ पहुचा तो लोग जहाज मे घुस रहे थे, हम भी लाईन मै लग गये,

जहाज मै अपनी सीट सम्भाली खिडकी के संग, ओर वेल्ट बांध कर तेयार हो गये, एक सीट छोड कर एक गोरे सज्जन बेठे थे, मेरे साथ वाली सीट अभी खाली ही थी, तभी एक बुजुर्ग से दिखने वाले एक सज्जन आये ओर नम्बर मिलाया, फ़िर एयर होस्टेज के पास गये, हुया यु कि उन की सीट मेरे साथ थी, ओर उन की बीबी की सीट आगे थी, अब एयर होस्टेज ने हमे इशारे से पुछा तो हम ने कहा कि हमे तो खिडकी वाली सीट चहिये, गोरे ने भी मना कर दिया,अब सज्ज्न ने हमे पुछा कि भाई आप तो अपने लगते हे, तो सीट बदल लो ना, ओर हम ने बेमन से उन से सीट बदल ली, अब हम दो गोरो के बीच फ़ंस कर बेठ गये, एक तरफ़ फ़्रासिसि था, तो दुसरी तरफ़ एक अमेरिकन महिला, जब हम सीट बदल रहे थे तो हमारा हाथ इन महिला के सर से थोडा टच हुआ था, उस समय इन्होने अपना शक्ति प्रदर्शन हमे दिखा दिया था, ओर हम ही ही कर के चुप रहे थे, ओर फ़िर चुप चाप बेठ गये उस सीट पर.

जनाब अब जहाज उडा, खाना आया, सब ने खाया, अभी दिन के ग्यारहा ही बजे थे, नींद कहां आये, हमारे साथ वाले ने अपनी मेक बुक निकाली ओर फ़टा फ़ट उस पर इधर उधर हाथ मारने लगा, मैने चोर आंख से देखा तो वो अपनी फ़ोटो पर युही मजे ले रहा था, फ़िर हमारे साथ बाली अमेरिकन को भी दोरा पडा, उस ने भी हमारी तरफ़ मुस्कुरा कर देखा, हम भी मुस्कुराये फ़िर सीट पर चढी, हम उसी तरफ़ पहले से देख रहे थे, तो जनाब हम ने शरमा कर आंखे नीची कर ली, जब वो ऊपर से नीचे उतरी तो, उन के हाथ मै भी मेक बुक थी, उन्होने एक बार उन सज्जन की तरफ़ देखा, फ़िर एक बार मेरी तरफ़ देखा ओर अपनी मेक बुक को चलाया,अब हम ने एक बार चोर नजर से उन्हे भी देखा, तो उन्हे समझ नही आ रहा था कि क्या करुं, कभी दो लाईन लिखती ओर उसे मिटा देती, फ़िर लिखती, फ़िर मिटा देती......

अब तक सुबह का नाशता पच गया था, हम ने एक मसाला चाय( भारतिया चाय) मंगवाई ओर मजे से पी, समाने पडी मेगजींन को भी दस बर उलटा पुलटा, अब क्या करे? तभी वो महिला उठी तो हम भी उस के साथ ऊठ पडे, ओर अपना लेपटाप नीचे ऊतार लिया,ओर अपनी सीट पर जम गये, ओर लेपटाप को पैरो के पास नीचे रख दिया, तभी वो महिला लोट के अपनी सीट पर बेठ गई, कुछ समय बाद वो महिला जोर जोर से चीखने लगी, जब मैने ध्यान दिया तो एक आदमी अगली तरफ़ जा रहा था, शायद उस का हाथ उसे लग गया,ऎसा इस महिला से एक दो बार पहले भी किसी अन्य यात्री से हुआ था, ओर सब मेरी तरह ही ही ओर सॊरी कर के चुप हो गये थे, लेकिन वो आदमी चुप नही रहा ओर वो भी इसे बुरी तरह से डांट रहा था, इधर से यह महिला बोल रही थी, वो आदमी बोल कर ओर डांट कर अपनी सीट पर बेठ गया, ओर यह महिला बोले जा रही थी, कि एयर होस्टेज ने इसे समझा कर बिठाया ओर चुप करवाया, मै ओर मेरे साथ वाला एक दुसरे को देख कर मुस्कुरा दिये.

तभी दोपहर का खाना आया, हम ने तो पहले ही भारतिया शाका हारी खाना बुक कर रखा था, ओर यह अमेरिकन महिला हमारे खाने की खुशबु से बहुत खुश हुयी, ओर ललचाई नजरो से देख रही थी, हमारी ओर, हमे किसी ने खाने की शुभकामनऎं नही दी, हमने चुपचाप अपना खाना खा लिया, ओर वो अमेरिकन हमे देखती रही.जिन का खाना पहले से बुक होता हे उन्हे पहले मिल जाता हे फ़िर बाकी सब को मिलता हे.

अब जब सब को खाना मिलने लगा तो उस महिला ने हमारे वाला भारतिया शाका हारी खाना ही मंगवाया,उस दुसरे आदमी ने युरोपियन खाना लिया,हम ने दोनो कॊ काने की शुभकामनाऎ दी, यानि बोन अपेतीत, अब हम बीच मे बेठे कभी चोर नजरो से इन्हे तो कभी उन्हे देख रहे थे, भारतिया खाने मै हमे आचार भी मिलता हे जो काफ़ी मिर्ची वाला होता हे, उस महिला ने पहले तो कुछ चावल खाये सब्जी के संग, फ़िर छोटी छोटी रोटिया मिलती हे पुडी से भी छोटी, तो उस ने आधी रोटी के संग आचार की पुरी डिब्बी सब्जी की तरह से लगा कर मुंह मे डाली यह देख कर पहले मै उसे रोकने लगा लेकिन अब तो काफ़ी देर हो गई थी, ओर जब उस ने दो चार बार उस रोटी को चबाया तो उस की शकल देखने की थी, कुछ देर तो वो मुंह बन्द किये बेठी रही, फ़िर जल्दी से उस कोर को अंदर निगल लिया,उस के बाद उस का बेठना मुश्किल हो गया, ओर बेचारी सी सी करती कभी बाथ रुम मे भागे तो कभी मुंह मै नेपकिन डाले, फ़िर मैने उसे बताया कि यह दुध वाली खीर को खायो मुंह कि जलन कम होगी, फ़िर मेने उसे कुछ टाफ़ियां दी ओर उसे बताया कि इसे जीभ पर रख कर चूसो.... फ़िर मैने उसे बताया कि जब भी भारत मे खाना खाओ किसी भी होटल मे तो इस आचार को बहुत कम लगाते हे, ओर हरी मिर्च को कभी मत छुना, अब वो काफ़ी ढीली पड गई ओर दोस्ताना आंदाज मे बात करने लगी थी.लेकिन अब हमारे पास समय नही था उस के लिये, कुछ बाते बता कर हम ने अपने बर्तन वापिस दे दिये, एक बार फ़िर मसाला चाय पी.

ओर फ़िर हम ने अपना लेपटाप निकाला....... बाप रे उन दोनो की मेकबुक से भी डबल था मेरा लेपटाओ १७,३, अब उसे खोल तो लिया लेकिन वो सीट पर बेठ कर( कम जगह के कारण सेट ना हो, मैने उसे नांव की तरह से गोद मै रखा, ओर हिन्दी मे एक पोस्ट लिखी, लेकिन बहुत तंग हो कर, पता नही यह दोनो भी चोर आंखॊ से देख रहे होगे, मुझे क्या देखे.... उन्हे हिन्दी समझ आये तब ना,करीब एक घंटा मैने अपना लेपटाप चलाया, लेकिन मजा नही आया, जब लिखता था तो लेपटाप का स्क्रीन साफ़ नही दिखता, अगर मोनीटर को सेट करू तो लिखू केसे, लेकिन किसी तरह से मैने उन के मेक बुक का सामना किया.वो पोस्ट भी मेरी मेरे उस लेपटाप के संग डेंगू की शिकार हो गई,फ़िर मैने अपना लेपटाप रख दिया ऊपर बेग मे, मैरे साथ उन दोनो का बुखार भी उतर गया.

अब क्या करे, तभी उस महिला को भारतिया समय का ख्याल आया ओर एयर होस्टेज से पूछने लगी भारतिया समय, ओर एयर होस्टेज को भी कहां मालूम था भारतिया समय, जनाब हम ने तो घर से ही सेट कर रखा था भारतिया समय, बस हम छा गये, हम ने अकड कर बताया कि हमे मालुम हे ओर इस समय भारत मे यह समय हुआ हे, फ़िर बीच बीच मे जलपान चलता रहा, मै एक घंटा खडा रहा जहाज मे ओर थोडी कसरत कि ताकि टांगे सीधी रहे, इधर उधर घुमा, फ़िर चाय बगेरा पी, थोडी देर मै रात का खाना भी आ गया, उसे भी खतम किया.

कुछ देर बाद हम दिल्ली उतरे ओर थोडी देर मै हम बाहर आ गये, वहां से टेकसी पकड कर शाली मार पहुचे. चलिये आज इतना ही सही , ओर ब्लांग मिलन कॊ फ़ोटो साफ़ नही आई क्यो कि केमरा मेने अपने भाई के लडके को दिया था, सोचा इसे खींचनी आती होंगी, लेकिन उस ने एक फ़ोटो भी साफ़ नही खींची,शायद कुछ फ़ोटो जोमैने या किसी ओर ने खींची होगी साफ़ हो उन्हे अगले दिनो जरुर दुंगा, वर्ना आई एम सॊरी

26 comments:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

बाप रे भाटिया साहब, क्या खतरनाक सहयात्री मिली.

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

हमारे यहा बस मे भी लगभग यही होता है सिवाय खाना खाने के

प्रवीण पाण्डेय said...

कहीं का भी नया खाना खाने के पहले, थोड़ा थोड़ा चख कर तो देखना ही चाहिये। आपकी आतमीयता देखकर वह जलन कम अवश्य हुयी होगी।

केवल राम said...

जीवन के सफ़र में ऐसा कई बार होता है .....

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

पेरिस से भारत, फ्रांस और अमरीका के बीच हो कर, चलो पहुँचे तो सही।

ZEAL said...

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मुझे लगता है जहाज में space थोड़ी बढ़ानी चाहिए , ताकि ब्लॉग-पोस्ट लिखते समय लैपटॉप आसानी से सेट किया जा सके । सभी ब्लोगर्स को इस दिशा में जहाज कंपनियों को अपील करनी चाहिए।

और हाँ जहाज में अगर सहयात्री गांधी जी के बन्दर की तरह mute-mode में ना रहे तो सफ़र का आनंद ही कुछ और रहे।

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'उदय' said...

... sundar charchaa !!!

ललित शर्मा said...

हा हा हा देखिए हिन्दुस्तानी अचार का कमाल, हो गया ना अमेरिकन गोरी का गुस्सा ठंडा। ये अचार गजब की चीज है।

इतनी लम्बी फ़्लाईट म्युट-मोड में करना बड़ा तकलीफ़देह हो जाता है। जर्मनी से कोई ट्रेन नहीं आती क्या भारत के लिए? जिसके स्लीपर क्लास में आराम से गपियाते बतियाते चले आते।:)

Arvind Mishra said...

बढियां रही यह अन्दर बाहर जहाजी यात्रा की दास्ताँ -जगह जरूर कम लगती है और साईड सीट पर तो आपके कंधे ,हाथ से किसी के टकरा जाने की संभावना भी ..मगर गगन परिचारिकाएँ कभी नहीं टकरातीं कम्बख्त ! :)

जी.के. अवधिया said...

यह जानकर अच्छा लगा कि भले ही कोई भारतीय किसी विदेशी को न रुला सके पर भारतीय अचार में अच्छे-अच्छे विदेशियों को रुला देने की ताकत है। :)

ajit gupta said...

आप कौन सी फ्‍लाइट से आए थे जो आपको मसाला चाय मिल गयी? बड़ा ही रोचक वर्णन रहा।

Satish Chandra Satyarthi said...

यात्रा संस्मरण अच्छा रहा...
मैं इसी साइलेंट-जर्नी से बचने के लिए ट्रेन में भी स्लीपर या थर्ड एसी ही लेता हूँ.. पता नहीं चुप और रिजर्व रहने से लोगों को क्यों लगता है कि वे आधुनिक और सभ्य हैं....

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

रोचक ...और अचार का कमाल ...पोस्ट डेंगू का शिकार हो गयी ..अफ़सोस हुआ ...

परमजीत सिँह बाली said...

वाह!राज जी कुल मिल कर रोचक रही यात्रा।

राज भाटिय़ा said...

@ अजित गुप्ता जी युरोप से चलने वाली सभी फ़लाईट्स (भारत की ओर) मे आप को मसाला चाय, ओर जल जीरा मिलेगा, बस इन का कहने का स्टाईल अलग होता हे , यह मसाले को मासाला थोडा लम्बा खींच कर बोलते हे, मसाला चाय यानि चाय ओर मासाला यानि जलजीरा, मैने लुफ़्थंसा, ब्रिटिश एयर वेज,फ़्रांस,फ़िन ओर भी काफ़ी युरोपियन एयर वेज मे सफ़र किया हे, आप को शुद्ध भारतिया खाना, ओर चाय मिलेगी, लेकिन चाय जल्द ही खत्म हो जाती हे, अगर भारतिया ज्यादा हो. धन्यवाद आप सब का.

सुज्ञ said...

सधारण आचार को आपने सदाचार से रोचक बना दिया।
अच्छा यात्रा वृतांत!!

अनुपमा पाठक said...

यह यात्रा विवरण बड़ा रोचक रहा!
सादर!

सुरेश शर्मा (कार्टूनिस्ट) http://sureshcartoonist.blogspot.com/ said...

आपकी हवाई यात्रा के रोचक पलों को
पढ़कर बहुत अच्छा लगा ..!

Kajal Kumar said...

ये महिला ज़रूर फ़्र्स्टो रही होगी.

मनोज कुमार said...

रोचक संस्मरण। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
विलायत क़ानून की पढाई के लिए

उपेन्द्र ' उपेन ' said...

रोचक रही आपकी यात्रा......अच्छा है एक दो सहयात्री ऐसे मिल जाये तो बोरियत नहीं होती ....अच्छा यात्रा संस्मरण .
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Meenu Khare said...

सशक्त रोचक संस्मरण।!बधाई.नव वर्ष की शुभकामनाएँ.

अन्तर सोहिल said...

उनके सीट पर खडे होने से आप क्यों शरमा गये जी।
हम भारतीयों की माफ कीजियेगा मेरी तरह मौके का फायदा उठाना चाहिये था और खूब घूर-घूर कर देखना चाहिये था।

प्रणाम

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" said...

यह किस्से ब्लॉग में परोसने के लिए धन्यवाद!

डा. अरुणा कपूर. said...

बहुत बढिया पोस्ट...मजा आ गया...नए साल की बहुत बहुत शुभकामनाएं!

Hari Shanker Rarhi said...

yatra vrittant kafi rochak hai.! par han, aap ddlhi aaye, pata hi nahin chala.