15/04/08

माता सीता जी से एक शिक्षा १०

क्रमश से आगे...
दुष्ट रावाण ने बलात हरण करने के समय मुझ को स्पर्श किया था, उस समय तो मे परधीन थी,मेरा कुछ भी बस नही चलता था,अब तो श्रीराम स्वंय यहां आवें ओर राक्ष्सों सहित रावण का वध करके मुझे अपने साथ ले जाये, तभी उनकी ज्वलन्त कीर्ति की शोभा हे.
भला विचारीये , हनुमान-सरीखा सेवक , जो सीता जी को सच्चे ह्र्दय से माता से बढकर समझता हे ओर सीता राम की भक्ति करना ही अपने जीवन् का परम ध्येय मानता हे ,सीता पतिव्रत्य धर्म की रक्षा के लिये, इतने घोर विपत्तिकाल मे अपने स्वामी के पास जाने के लिये भी उसका स्पर्श नही करना चाहती. केसा अद्भुत धर्म का आग्रह हे, इस से सीखना चाहिये की भारी विपाति के समय भी स्त्री को यथासाध्य पर पुरुष के अंगो का स्पर्श नही करना चहिये.
वियोग मे व्याकुलता..
भगवान श्रीराम मे सीता का कितना प्रेम था ओर मिलने के लिये उनके दिल मे कितनी अधिक व्याकुलता थी,इस बात का कुछ पता हरण के समय से ले कर लकां विजय तक के सीता जी के विविध वचनो से लगता हे,उस प्रसंग को पढते पढते ऎसा कोन हे जिसका मन करुणा से ना भर जाय ? परन्तु सीता जी की सच्ची व्याकुलता का सबसे बढकर प्रमाण तो यह हे,कि श्रीरघुनाथ जी महाराज उनके लिये विरह्व्याकुल स्त्रेण मनुष्य की भांतिविह्लल हो कर उन्मत्वत रोते ओर विलाप करते हुये ऋषिकुमारो, सुर्य, पवन,पशु पक्षी ओर जड वृक्षलताओ से सीता का पत्ता पुछते फ़िरते हे
क्रमश...

3 comments:

neeraj badhwar said...

आपके विषयों का चयन और लेखन आपकी संवेदनशीलता बयान करते हैं। आपकी टिप्पणी के माध्यम ही आपके ब्लॉग तक पहुंचना हुआ। पढ़कर अच्छा लगा। खैर, आपकी कमेंट के लिए शुक्रिया।

Gyandutt Pandey said...

बिल्कुल, राम जी ने एक सामान्य जन के व्यवहार को बखूबी निभाया है और उसके बाद भी आदर्श स्थापन के प्रतिमान विश्व को दे दिये।
उनका यह समाज को बहुत बड़ा कण्ट्रीब्यूशन है।

राज भाटिय़ा said...

आप सब का बहुत धन्यवाद