10/04/08

माता सीता जी से एक शिक्षा ५

क्रमश से आगे...
सीता जी के प्रेम की विजय हुई,श्रीराम उन्हें साथ ले चलना स्वीकर किया, इस कथा से यह सिद्ध होता हे कि पत्री को पति सेवा के लिये-अपने सुख के लिये नही-पति की आज्ञा को दुहराने का अधिकार हे,वह प्रेम से पति सुख के लिये ऎसा कर सकती हे,सीता जी ने यहां तक ह दिया था " यदि आप आज्ञा नहीं देंगे तब भी मॆ तो साथ चलूंगी,सीता जी के इस प्रेमाग्रह कि आज तक कोई भी निन्दा नहीं करता,क्योकि सीताजी केवल पति प्रेम ओर सेवा ही के लिये समस्त सुखों कों तिळाअजंलि देकर वन जाने को तॆयार हुई थी,किसी ईन्द्र्य सुखरुप स्वार्थ साधन के लिये नही,इस से यह नहीं समझना चाहिये कि सीताजी का व्यवहार अनुचित या पतिव्रत धर्म से विरुद्ध था,स्त्री को धर्म के लिये ऎसा व्यवहार करने का अधिकार हे,इस से पुरुष को भी यह शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये कि सहधर्मिणी पतिव्रता पत्रीं की बिना इच्छा उसे त्याग कर अन्यत्र चले जाना अनुचित हे, इसी प्रकार स्त्री को भी पति सेवा ऒर पति सुख के लिये उस्के साथ ही रहना चाहिये,पति के बिरोध करने पर भी कष्ट ऒर आपत्ति के समय पति सेवा के लिये स्त्री को पति के साथ रहना उचित हे, अवश्य ही अवस्था देख कर कार्य करना चाहिये,सभी स्थितियो मे सब के लिये एक सी व्यवस्था नही हो सकती,सीता जी ने भी अपनी साधुता के कारण सभी समय इस अधिकार क उपयोग्नहीं किया था.
पति सेवा मे सुख
वन मे जा कर सीताजी पति सेवा मे सब कुछ भुल कर सब तरह सुखी रहती हे,उसे राजपाट, महल-बगीचे,धन दोलत ओर दास-दासियो की कुछ भी स्मृति नहीं होती,राम को वन मे छोड कर ळोटा हुया सुमन्त सीता जी के लिये विलाप करती हुई माता कॊसल्या से कहता हॆ ’सीता निर्जन वन मे घर की भांति निर्भय होकर रहती हे,वह श्रीराम मे मन लगा कर उनका प्रेम प्राप्त कर रही हे,वनवास से सीता जी को कोई भी दुख नही हुया, मुझे तो ऎसा प्रतीत होता हे कि (श्रीराम के साथ ) सीता जी वनवास के सर्वथा योग्या हे,चन्द्रानना सती सीता जॆसे पहले यहां बगीचों मे जा कर खेलती थी, वॆसे ही वहां निर्जन वन मे भी वह श्रीराम के साथ बालिका के समान खेलती हे, सीता क मन राम मे हे,उसका जीवन श्रीराम के अधीन हे,अतएव श्रीराम के साथ सीता के लिये वन ही अयोध्या हे ऒर श्रीराम के बिना अयॊध्या ही वन हॆ,धन्य ! पातिव्रत्य ! धन्य !
क्रमश...

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