12/04/08

माता सीता जी से एक शिक्षा ७

क्रमश से आगे...
गुरुजन सेवा ओर मर्यादा
बडॊं की सेवा ओर मर्यादा मे सीता का मन कितना लगा रहता था, इसे समझनेके लिये महराज चित्रकुट यात्रा के प्रसंग को याद कीजिये, भरत के व जाने पर राजा जनक भी राम से मिलने के लिये चित्रकुट पहुंचते हे, सीता की माता श्रीराम की माताओ से सीता की सासुओं से मिलती हे ओर सीता को साथ ले कर अपने डेरे पर आती हे, सीता को तपस्विनी के वेष मे देख कर सब को विषाद होता हे,पर महाराज जनक अपनी पुत्री के इस आचरण पर बडे ही सन्तुष्ट होते हे ओर कहते हे...
पुत्रि पबित्र किए कुल दोऊ,
सुजस धवळ जगु कह सबु कोऊ.
माता पिता बडे प्रेम से ह्र्दय से लगा कर अनेक प्रकार की सीख ओर असीस देते हे, बात करते करते रात अधिक हो जाती हे, सीता मन मे सोचती हे कि सासुओं की सेवा छोड कर इस अवस्था मे रात यहां रहना अनुचित हे, किन्तु स्वभाव से ही लज्जाशीला सीता संकोचवस मन की बात मां बाप से कह नही सकती.
कहित न सीय सकुचि मनमाहीं,
इहां बसब रजनी भल नाहीं.
चतुर माता सीता के मन का भाव जान लेती हे ओर सीता के शील स्वभाव की मन ही मन सराहना करते हुए माता पिता सीता को कोसल्या के डेरे मे भेज देते हे, इस प्रसंग से भी स्त्रियों को सेवा ओर मर्यादा की शिक्षा लेनी चहिये.
निर्भयता
सीता का तेज ओर उस की निर्भयता देखिये, जिस दुद्रांत रावण का नाम सुन कर देवता भी कपंते थे,रावण के हाथो मे पडी हुई सीता अति क्रोध से उसका तिरस्कार करती हुई कहती हे-अरे दुष्ट निशाचर,तेरी आयु पूरी हो गयी हे, अरे मुर्ख ! तू श्रीरामचन्द्र जी की सह धर्मिणी को हरण कर प्र्ज्वलिज़ अग्रिन के साथ कपडा बाधं कर चलना चाहता हे, तुझ मे ओर राम्चन्दर जी मे उतना ही फ़र्क हे जितना सिंह ओर सयार मे हे,समुन्द्र ओर नाले मे,अमृत ओर कांजी मे, सोने ओर लोहे मे ,चन्दन ओर कीचड मे, हाथी ओर बिलाव मे,गरुड ओर कोवें मे,हंस ओर गीध मे होता हे,मेरे अमित प्रभाव वाले स्वामी के रहते तू मुझे हरण क्रेगा तो जेसे मकखी घी पीते ही मृत्यु के वश हो जाती हे , वेसे हीतू भी काल के गाल मे चला जायेगा,ओर हमे सीखना चहीये की अपने ईशवर के होते हमे कभी भी किसी भी अवस्था मे डरना नही चहिये,अन्याय का निर्भीक समाना करना चहिये, ओर उस ईश्वर के विश्वास पर भारोसा कर के जेसे भगवान ने रावण का वध कर के सीता को उस से छुडवाये हमे भी विपत्ति से छुडा लेगें.
क्रमश...

3 comments:

DR.ANURAG ARYA said...

aapne aadte kharab kar di hai raj ji,is jeevan me aisi soch banayege to jeevan me mushkile aayegi.

mahendra mishra said...

जीवन मे धार्मिक आस्था का भी होना नितांत आवश्यक है अपना धार्मिक ज्ञान युवा पीढी के बीच बांटना भी श्रेष्ट कार्य माना गया है और आप नेट के माध्यम से अपने काम को बखूबी अंजाम दे रहे है . आपकी सोच सराहनीय है . आप बधाई के पात्र है

Dr. Chandra Kumar Jain said...

प्रेरक और सुंदर प्रस्तुति.
साधुवाद.