08/04/08

माता सीता जी से एक शिक्षा ३

क्रमश से आगे..

माता पिता का आज्ञा का पालन..

सीता अपने माता पिता की आज्ञा पालन करने मे कभी नही चुकती थी,माता-पिता से उसे जो भी शिक्षा मिलती .उस पर बडा अमल करती थी,मिथिला से विदा होते समय ओर चित्रकूट मे सीता जी को माता-पिता से जो शिक्षा मिली हे,वह स्त्रीमात्र के लिये पालनीय हे.

होएहु संतत पियहि पिआरी, चिरु अहिबात असीस हमारी,

सासु ससुर गुर सेवा करेहू, पति रुख लखि आयसु अनुसरेहू.

पति सेवा के लिये प्रेमाग्रह...

श्रीराम को राज्यभिषेक के बदले यकायक वनवास हो गया, सीता जी ने यह समाचार सुनते ही तुरन्त अपना कर्तव्या निश्चया कर लिया, नॆहर-ससुराल, गहने-कपडे,राज्य-प्रिवार,महल-बाग,दास दासी,ओर भोग-राग आदि से कुछ मतलब नही ,छाया की तरह पति के साथ रहना ही पत्नी का एकमात्र कर्तव्य हॆ, इस निश्चयपर आकर सीता ने श्रीराम के साथ वनगमन के लिये जॆसा कुछ व्यवहार किया हॆ,वह परम उज्जवल ओर अनुकरणीय हॆ, श्रीसीता जी ने प्रेमपुर्ण विनय ओर हठ से वनगमन के लिये पूरी कोशिश की,साम ,दाम,नीति सभी वॆध उपायो का अवलम्बन किया ओर अन्त मे वह अपने प्रयत्न मे सफ़ल हुई, सीता जी काअ ध्येय था किसी भी उपाय से वन मे पति के साथ रह कर पति की सेवा करना,इसी को वह अपना परम धर्म समझती थी, इसी से उन्हे परम आनन्द की प्राप्ति होती थी, वह कहती थी...

मातु पिता भगिनी प्रिया भाई,प्रिय परिवारु सुह्र्द समुदाई,

सासु-ससुर गुरु सजन सहाई,सुत सुंदर सुसील सुखदाई.

जहॆ लगि नाथ नेह अरु नाते,पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते,

तनु धनु धामु धरनि पुर राजु,पति बिहीन सबु सोक समाजू.

भोग रोग सम भूषन, जम जातना सरिस संसारु

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