21/04/08

माता सीता जी से एक शिक्षा १३

क्रमश से आगे...
यथा मे ह्रदयं नित्यं नापसर्प्ति राघवात ,
तथा ळोकरुप साक्षी मां सर्वत: पातु पावक.
यथा मां शुद्धचारित्रां दुष्टां जानाति राघव,
तथा ळोकस्य साक्षी मां सर्वत:पातु पावक.
’ हे अग्रिदेव ! यदि मेरा मन कभी भी श्रीराम चन्द्र से चलायमान न हुआ हो तो तुम मेरी सब प्रकार से रक्षा करो, श्रीरघुनाथ जी महाराज मुझ शुद्ध चरित्रवाली या दुष्टा को जिस प्रकार याथार्थ जान सकें वेसे ही मेरी सब प्रकार से रक्षा करो, क्योकि तुम सब ळोकों के साक्षी हो, इतना कहकर अग्रिकी प्रदक्षिणा कर सीता नि:शक ह्रदय से अग्रिमे प्रवेश कर गयी, सब ओर हाहाकार मच गया, ब्रह्मा, शिव, कुबेर,इन्द्र,यमराज ओर वरुण आदि देवता आकर श्रीराम को समझाने लगे,ब्रह्मा जी ने बहुत कुछ रहस्य की बाते कहीं.
इतने मे सर्वळोको के साक्षी भगवान अग्रिदेव सीता को गोद मे लेकर अकस्मात प्रकट हो गये ओर वॆदेही को श्रीराम के प्रति अर्पण करते हुये बोले....
एषा ते राम वॆदेही पापमस्यां न विद्दाते,
नॆव वाचा न मनसा नॆव बुद्धचा ना चक्षुषा.
सुवृत्ता वृत्तशॊटीर्य न त्वामत्यचरच्छुभा,
रावणेनापनीतॆषा वीर्योत्सिक्तेन रक्षसा.
त्वया विरहिता दीना विवशा निर्जने सती,
रुद्धा चान्त:पुरे गुप्ता त्वच्चित्त त्यत्परायाण.
रक्षित राक्षसीभिक्ष्च घोराभिघोंरबुद्धिभि.
प्रळोभ्यमाना विविधं तजर्यमाना च मेथिली.
नाचिन्तयत तद्रक्षस्त्व दूतेनान्तरात्मना.
विशुद्धभावां निष्पापां प्रतिगृह्रीष्ट मेथिलीम,
न किक्ष्चिदभिघातव्या अहमाज्ञापयामि ते.
( वा० रा० ६/११८ १५-१० )
राम ! इस अपनी वॆदही सीता को ग्रहण करो,इस्मे कोई भी पाप नहीं हे, हे चारित्राभिमानी राम! इस शुभलक्षणा सीता ने वाणी, मन, बुद्धि या नेत्रों से कभी तुम्हारा उल्लंघन नही किया, निर्जन वन मे जब तुम इसके पास नहीं थे तब यह बेचारी निरुपाय ओर विवश थी, इसी से बलगर्वित राबण इसे बलात हर ले गया था, यद्धपि इसको अन्त:पुर मे रखा गया था ओर क्रूर से क्रूर स्वभाव वाली राक्षसियां पहरा देती थी, अनेक प्रकार के प्रलोभन दिये जाते थे ओर तिरस्कार भी किया जाता था.परन्तु तुम्हारे मन लगाने वाली, तुम्हारे परयाण हुई सीता ने तुम्हारे सिवा दुसरे कामन से विचार ही नही किया, इसका अन्त:करण शुद्ध हे,यह निष्पाप हे, मे तुम्हे आज्ञा देता हुं, तुम किसी प्रकार की भी शंका न करके इसको ग्रहण करो,अग्रिदेव के वचन सुनकर मर्यादा-पुरुषोत्त्म भगवान श्रीराम बहुत प्रसन्न हुये,उनके नेत्र हर्ष से भर आये ओर उन्होंने कहा....
क्रमश.....

4 comments:

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DR.ANURAG ARYA said...

एक बार फ़िर आपके आगे नतमस्तक राज जी ,हैरानी है की आपने संस्कृत के शब्दों को कैसे हिन्दी फॉण्ट मे लिया होगा......

राज भाटिय़ा said...

अनुराग जी, धन्यवाद आज से मेने ब्लोग पर आना कम कर दिया हे यह एक नशा सा लग गया था, सारे काम छोड कर लगे रहॊ यही, आज से बहुत कम समय दु गां , बाकी बच्चो के साथ,बाकी आप की बात संस्कृत के शब्द अरे बहुत मुश्किल से एक एक शब्द पर १०, १५ मिन्ट लग जाते हे, फ़िर मेरा की बोर्ड भी जर्मन मे हे (जर्मन ओर दुसरे युरोपियन देशो का की बोर्ड अलग हे)लेकिन इसे पुरा करु गा,

SUNIL DOGRA जालि‍म said...

वाह! इतनी मेहनत करते हैं आप... आप तो सचमुच महान हैं