13/04/08

माता सीता जी से एक शिक्षा ८

क्रमश से आगे...
धर्म के लिये प्राण त्याग की तेयारी
विपत्ति मे पद कर भी कभी भी धर्म का त्याग नही करना चहिये, इस विषय मे सीता का उदाहरण सर्वोत्तम हे, लकां की आशोक-वाटिका मे सीता का धर्म नष्ट करने के लिये दुष्ट रावण की ओर से कम चेष्टाएं नहीं हुई, राक्षसियो ने सीता जी को भय ओर प्रलोभन दिखाकर बहुत ही तगं किया, परन्तु सीता तो सीता ही थी,धर्म त्याग का प्रश्र तो वहां ऊठ ही नही सकता, सीता ने तो छल से भी अपने बाहरी बर्ताव मे भी विपत्ति से बचने हेतु कभी दोष नही आने दिया, उसके निर्मल ओर धर्म से परिपूर्ण मन मे कभी बुरी स्फ़ुरणा ही नही आ सकी, अपने धर्म पर अटल रहती हुई सीता दुष्ट रावण का सदा तीव्र ओर नितियुक्त्त शब्दो मे तिरस्कार हि करती रही, एक बार रावण के वाग्बाणो को न सह सकने के समय ओर रावण के दुआरा माया से श्रीराम-लक्ष्मण को मरे हुये दिखला देने के कारण वह मरने को तेयार हो गयी,परन्तु धर्म से डिगने की भावना स्वप्रमे भी कभी उसके मनमे नहीं उठी,वह दिन रात भगवान श्रीराम के चरणो के ध्यान मे लगी रहती थी, सीता जी ने हनुमान के दुवारा जो सन्देश कहलाया, उससे पता लग सकता हे कि उन की केसी पवित्र सिथति थी.
नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट,
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट.
इससे स्त्रियों को यह शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये कि पति के वियोग मे भीषण आपत्तियां आने पर भी पति के चरणॊ का ध्यान रहे, मन मे भगवान के बल पर पूरी वीरता,धीरताओर तेज रहे,स्वधर्म पालन मे प्राणो कीभी आहुति देने को सदा तॆयार रहे,धर्म त्याग कर प्राण रहने मे कोई लाभ नही,प्ररन्तु प्राण त्याग कर धरम मे रहने मे ही कल्याण हे.
स्वधमें निधनं श्रेय: (गीता ३ ३५ )
सावधानी:
सीता जी की सावधानी देखिये, जब हनुमान जी आशोक वाटिका मे सीता के पास जाते हे तब सीता अपने बुद्धिकॊशल से सब प्रकार उन की परीक्षा करती हे. जब तक उसे यह विश्रास नही हो जाता कि हनुमान वास्तव मे श्रीरामचन्द्र के दुत हे, शाक्तिसम्पन्न हे ओर मेरी खोज मे ही यहां आये हे, तब तक खुल कर बात नहीं करती हे.
दाम्पत्य प्रेम
जब पुरा विश्रास हो जाता हे तो स्वामी ओर देवर की कुशलता पूछती हे,फ़िर आसुं बहाती हुई करुणापूर्ण शब्दो मे कहती हे-हनुमन ! रघुनाथ जी का चित्त तो बडा कोमल हे, कृपा करना तो उन का स्वभाव ही हे,फ़िर मुझ से वह इतनी निष्ठुरता क्यो कर रहे हे,वह तो स्वभाव से ही सेवक को सुख देने वाले हे, फ़िर मुझे उन्होने क्यो बिसार दिया हे,क्या श्री रघुनाथजी कभी मुझे याद भी करते हे ?हे भाई ! कभी उस श्याम सुन्दर के कोमल मुख कमल को देख कर मेरी ये आखें शीतल होंगी ?अहॊ ! नाथ ने मुझ को बिलकुल भुला दिया ! इतना कह्कर सीता रोने लगी, उस की बाणी रुक गई!!
क्रमश...

2 comments:

Gyandutt Pandey said...

बहुत अच्छा लगा माता सीता के विशय में पढ़ कर। सुन्दरकाण्ड का प्रसंग सामने आ गया।
आपका टेम्प्लेट अच्छा लगा - सरल और देखने में सुन्दर।

राज भाटिय़ा said...

ज्ञान दत्त जी धन्यवाद,आप ने तरीफ़ की, मुझे बहुत अच्छा लगा, आप का बहुत धन्यवद