19/04/08

माता सीता जी से एक शिक्षा ११

क्रमश से आगे...
आदित्य भॊ ळोककृताकृतज्ञ ळोक्स्य सत्यानृतकर्मसक्षिन,
मम प्रिया सा क्र गता ह्र्ता वा शंसस्व मे शोकहतस्य सर्वम.
ळोकेषु सर्वेष न नास्ति किश्रिधतें न नित्यं विदितं भवेत्तत,
शंसस्व वायो कुलपालिनी तां मृता ह्र्ता वा पथि वर्तते वा.
वा० रा० ३/६३/१६-१७
ळोकों के कृत्याकृत्य को जानने वाले हे सुर्यादेव ! तू सत्य ओर असत्य कर्मो का साक्षी हे, मेरी प्रिया को कोई हर ळे गया हे या वह कहीं चली गयी हे, इस बात को तू भली भातिं जानता हे, अतएव मुझ शोक पीडित को सारा हाळ बतळा, हे वायु देव ! तीनो ळोकॊ मे तुझे से कुछ भी छिपा नही हे,तेरी सर्वत्र गति हे, हमारे कुल की मर्यादा की रक्षा करने वाली सीता मर गयी, हरी गयी,या कहीं मार्ग भटक रही हे, जो कुछ हो सो याथार्थ कह.
हा गुन खानि जानकी सीता,
रुप सील ब्रत नेम पुनीता.
ळक्षिमन समुझाए बहू भांती,
पूछत चले ळता तरु पांती.
हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी
तुम देखी सीता मृग नॆनी.
+ + + + + + +
एहि बिधि खोजत बिळखत स्वामी,
मनहूं महा बिरही अति कामी.
इस से यह नही समझना चहिये कि भगवान श्री राम ‘महाविरही ओर अतिकामी’ थे, सीता जी का श्रीराम के प्रति इतना प्रेम था ओर वह उनके ळिये इतनी व्याकुल थी कि श्रीराम को भी वॆसा ही बर्ताव करना पडा,भगवान का यह प्रण हॆ-...
ये यथा मां प्रपधन्ते तांस्तथॆव भजाम्यहम. (गीता ४/११ )
श्रीराम ने ’महाविरही ओर अतिकामी’ के सदृश ळीळा कर इस सिद्धान्त को चरितार्थ कर दिया, इससे यह शिक्षा ळेनी चहिये कि यदि हम् भगवान को पाने के लिये व्याकुल होंगे तो भगवान भी हमारे लिये वॆसे ही व्याकुल होंगे,अतएव हम सब को परमात्मा के लिये इसी प्रकार व्याकुल होना चाहिये.
क्रमश...

2 comments:

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव said...

बहुत अच्छा चल रहा है। अगली किस्त का इंतजार रहेगा

Gyandutt Pandey said...

बिलखते राम की सरल उद्विग्नता बहुत भाती है। वे व्यग्रता दूर करने का रास्ता बता रहे हैं। अपने इमोशंस को दमित करने में ही व्यग्रता दूर नहीं होती।