21/07/08

कुछ शेर सुनाता हु मे......

अजी हम भी सुनाते कुछ शेर,
अर्ज किया हे....
नही लग सकता कभी मय खाने मे ताला.
एक नही, दो नही, सारा शहर हे पीने वाला.

अब के बारिस मे भी क्या बात हे,हर बुंद जेसे इक मुलाकात हे,
भीगा बदन तुम्हारी बांहो को तरसे हे,मुया बादल अनजान बनके बरसे हे.

8 comments:

अभिषेक ओझा said...

ये अंदाज भी खूब रहा !

Shiv Kumar Mishra said...

अच्छे शेर हैं.

अनुराग said...

अब के बारिस मे भी क्या बात हे,हर बुंद जेसे इक मुलाकात हे,
भीगा बदन तुम्हारी को बांहो तरसे हे,मुया बादल अनजान बनके बरसे हे.
bahut badhiya........

महेंद्र मिश्रा said...

Raj ji,
नही लग सकता कभी मय खाने मे ताला.
एक नही, दो नही, सारा शहर हे पीने वाला.
tahedil se aaj ki post ke badhai .jab sara shahar peene vala ho to tala lagane ki jararat hi nahi hai . barish me sher to bahut khobbsoorat laga . anand aa gaya.

Udan Tashtari said...

बढ़िया शेर हैं.जारी रहिये.

P. C. Rampuria said...

ताऊ की तरफ़ से भी मुलाहिजा फरमाइए !

"फुगाँ को वस्ल में आराम क्या हो
जुदाई का तसव्वर बाँध रहा है"

पर बूंद के बाद ? जोरदार है !

राज भाटिय़ा said...

आप सभी का धन्यवाद ताऊ को राम राम

रश्मि प्रभा said...

sach-andaje bayaan dilchasp....
aapne mere blog ko dekha,mera maan badhaa,aur kya kahu......
kalam mera sapna hai,shabd mera sach......aur aap bhi inke saath hain to aapka samman karti hun.