26/02/09

बचपन के दिन

यह रचना मेरी नही, किसी ?? नाम की लडकी की है, मुझे अच्छी लगी तो इसे यहां आप सब को दिखा रहा हू, अगर किसी कॊ इस से ऎतराज हुआ तो ( इस के मालिक कॊ ) इसे मै हटा दुंगा...
लेकिन तब तक इस रचना के रचियता को इस सुंदर रचना के लिये मेरा धन्यवाद...


बचपन के दुख कितने अच्छे होते थे,
तब तो सिर्फ़ खिलोने टूटा करते थे.
वो खुशिया भी ना जाने केसी खुशिया थी,
तितली के पर नोंच के उछला करते थे.
पांव मार कर खुद बरिस के पानी मै,
अपनी नांव खुद डुवोया करते थे,
अपने जल जाने का भी एहसास भी ना था,
जलते हुये शोलो को छेडा करते थे.
अब तो ईक आंसू भी रुसवा करता है,
बचपन मै जी भर के रोया करते थे.
आईशा..

27 comments:

HEY PRABHU YEH TERA PATH said...

बचपन मै जी भर के रोया करते थे...........
भाटिया जी,
जिसने भी यह कविता लिखी उसने अपने मन के भावो को इन्ह पक्तियो मे उडेल्ल दिया है
सुन्दर!
काश नाम बता देते तो ॥

Arvind Mishra said...

Very touching ! Thanks Bhatiya ji !

ab inconvenienti said...

बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारें छूने दो
चार किताबें पढ़कर वो भी हम जैसे हो जाएँगे

ताऊ रामपुरिया said...

इसीलिये कहते हैं , बचपन के आगे शहंशाहों के ताज ठोकर मे हैं.

रामराम

रंजन said...

कोई लौटा ने मेरे बीते हुऐ दिन..

mehek said...

bahut achhi lagi rachana shukran.

संगीता पुरी said...

जिसने भी लिखा हो ... बहुत ही अच्‍छा लिखा है ... पर आपको नाम अवश्‍य ही लिखना चाहिए था।

सुशील कुमार छौक्कर said...

वाह क्या रचना पढवाई है।

mamta said...

इस कविता के लिखने वाले को और आपको धन्यवाद ।

रश्मि प्रभा said...

us anam ladki ko meri bhi badhaai.........aisi rachna jo sbko samet le yaadon ke talaiye me....

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

वाह्! बहुत ही भावपूर्ण रचना......आपने तो बचपन की यादें ताजा कर दी.

seema gupta said...

तितली के पर नोंच के उछला करते थे.
पांव मार कर खुद बरिस के पानी मै,
अपनी नांव खुद डुवोया करते थे,

" bachpan ke vo pal or barish ka pani or vo naav jaise samne aa gye......mausm se vo din yaad dilane ke liye aabhar.,."

Regards

Abhishek said...

वाकई बहुत भावपूर्ण कविता चुनी आपने. मूल लेखिका को भी बधाई.

कुश said...

बहुत शुक्रिया जी.. इसे यहा पढ़वाने के लिए... बहुत ही सुंदर

G M Rajesh said...

bachapn ke din bhoola na denaa
ye gana yaad dilaane ka shukriyaa

डॉ .अनुराग said...

dilchasp.....

अल्पना वर्मा said...

bahut badhiya..

bachpan ke din bhi kya din they!
kavita achchee hai.

Dr. Amar Jyoti said...

मर्मस्पर्शी!

kumar Dheeraj said...

अब तो ईक आंसू भी रुसवा करता है,
बचपन मै जी भर के रोया करते थे
क्या सुन्दर रचना आपने प्रस्तुत किया है । इस रचना में उस लड़की ने जो अपनी जिन्दगी के कुछ पल को बयां किया है वह शानदार है आभार

योगेन्द्र मौदगिल said...

रोचक पोस्ट है भाटिया जी... उद्वेलित करती हुई आप दोनों को बधाई...

नरेश सिह राठौङ said...

"वो कागज कि कश्ती वो बारिश का पानी" गजल याद आ गयी । बहुत अच्छा लगा । नीचे टैग लगा है घिसी पिटी शायरी का वह गलत है । जंच नही रहा है ।

shyam kori 'uday' said...

पांव मार कर खुद बरिस के पानी मै,
अपनी नांव खुद डुवोया करते थे,
... बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!!!

Mrs. Asha Joglekar said...

बचपन के दुख कितने अच्छे होते थे,
तब तो सिर्फ़ खिलोने टूटा करते थे.
अब तो ईक आंसू भी रुसवा करता है,
बचपन मै जी भर के रोया करते थे.
आईशा..

राज साहब,
आइशा जी को बहुत बधाई और आपको धन्यवाद ।

Hari Joshi said...

मन को भा गई ये कविता। जिसकी भी है उसे मेरा प्रणाम।
आपका आभार।

ज़ाकिर हुसैन said...

अब तो ईक आंसू भी रुसवा करता है,
बचपन मै जी भर के रोया करते थे.
.........
सबसे पहले लेखिका को बधाई! जिसने इतनी ख़ूबसूरत हकीक़त बयां की.
और फिर आपका धन्यवाद! इस शानदार रचना को पोस्ट करने के लिए!

potpourrii said...

Bachapan ke din bhi kya din the!!!! Thanks for the flashback. For few minutes I got lost in the good old days of childhood.

shelley said...

achchhi kavita hai bachpan aisa hi hota hai.