22/09/10

यह केसी आस्था कि हम अपने इष्ट को, अपने ईश्बर को पेरो मै रोंदे?

मैने देखा है कि  सभी लोग जो चाहे किसी भी धर्म को माने , अपने इष्ट की पुजा अपने अपने ढंग से करते है, लेकिन कुछ मेरे जेसे भी है जो अपने भगवान को तो मानते है लेकिन गलत करने वाले को एक्क दो बार जरुर रोकते  भी है, ओर खुद कभी वो काम नही करते, जिस से लगे कि यह सही नही.

हिदू मुर्ति की पुजा इस लिये करते है कि, उन्हे उस पत्थर की , मिट्ठी की मुर्ति मै अपने इष्ट की छवि नजर आती है, ओर इस कारण उस मुर्ति को हमेशा ऊच स्थान पर ओर पबित्र स्थान पर रखा जाता है, लेकिन जेसे जेसे हम माड्रन होते जा रहे है, उसी भगवान को हम अपने ही पेरो मै कुचलते भी है, उसे पता नही केसी केसी गंदगी मै फ़ेंक देते है, या तो किसी मुर्ति को पुजो नही, अगर पुजना हे तो कम से कम अपना मतलब मत निकालो, क्योकि उस मुर्ति मै जान नही वो भगवान भी नही, बस उस जेसी छवि है हमारे भगवान की, तो उस छबि को पांव के नीचे मत रोंदो.... आप खुद देख ले.... इस के संग हम पानी को हवा को भी तो दुषित कर रहे है, अगर यही पुजा का तरीका है तो  मै उस भगवान का शुक्र करता हुं कि कम से कम मै तो यह काम बिलकुल नही करता.... अगर आप भी करते है तो ध्यान से देखे क्या आप सच मै पुजा कर के उस भगवान को खुश कर रहे है या दुखी कर रहे है.....
 अरे अरे कहां गई आप को प्यार करने वालो की भीड?क्यो मुंह छुपाने की कोशिश कर रहे है बाबा.
 फ़ेक गये ना आप को फ़िर से

 यह बुलडोजर आप को कहां फ़ेंके गा?.... सब को पता है क्या

 अब हाथ ऊठा कर किस से फ़रियाद कर रहे है, यह आप के भगत है या दुशमन जो आप का यह हाल कर दिया.....


गणेश बाबा यह हाल तो आप के प्यार करने बालो ने किया है, अगर यह दुशमनो ने किया होता तो आप के नाम का दम भरने वालो ने कितना हंगामा किया होता, आप से निवेदन है कि हर साल अपनी दुर्दशा करवाने मत आया करो, यहां लोग अपने मां बाप को भी आप की तरह से ऊठा कर घर से बाहर फ़ेंक देते है, फ़िर आप की क्या ऒकात आप तो मिट्टी ओर पत्थर की मुर्ति मात्र है, कही ओर जाओ हम कितने सालो से आप को फ़ेक रहे है ओर आप फ़िर आ जाते है, अभी थोडी देर पहले कुत्ता भी तो अपना काम दिखा गया बाबा जी

48 comments:

M VERMA said...

परम्परा निर्वहन में तो हम माहिर हैं ही. सच्चाई कौन स्वीकार करेगा?

'उदय' said...

... kuchhek visangatiyaan hain system men ... sanshodhan kee aavashyakataa nihaayat jaruree hai !!!

shikha varshney said...

भेड़ चाल है सब अंधे बनकर किये जा रहे हैं सब वही सालों से.

Ashok Pandey said...

आप ठीक कह रहे हैं। भगवान की यह दुर्दशा कराने से बेहतर है कि उन्‍हें मन ही मन प्रणाम‍ कर लिया जाए।

anshumala said...

अपने इष्ट का अनादर तो करते है और उनकी बनाई सृष्टि को भी हर साल प्रदूषित करते है इनको तो खुद इनके इष्ट भी नहीं समझा सकते है |

महफूज़ अली said...

आप ठीक कह रहे हैं।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

थोड़े से सुधार की आवश्यकता है.... परम्पराओं पर चलते हुये भी यह कार्य किया जा सकता है....

दीपक 'मशाल' said...

Vichaarneey baat kahi sir..

ललित शर्मा said...

यह दृश्य तो मुझे बड़ा ख़राब लगा...., मन ख़राब हो गया देखकर.........मूर्तियाँ.......प्लास्टर की जगह मिटटी की बनानी चाहिए.....जो कि पानी में जल्दी घुल जाये......

Archana said...

कैसी परंपरा.......चिन्तनीय...

Udan Tashtari said...

क्या कहा जाये...सार्थक आलेख.

प्रवीण पाण्डेय said...

आस्थाओं का विकृत निरूपण। यदि यही हश्र होना है तो इष्ट बना कर पूजा क्यो?

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

मतलब निकल गया है तो
पहचानते नहीं!
यूँ जा रहे हैं जैसे हमें
जानते नहीं!!

खुशदीप सहगल said...

राज जी,
आज ही शिखा जी की पोस्ट पढ़ी कि किस तरह शालीनता और सादगी से लंदन में गणपति का विसर्जन किया गया...

हमारे देश में धर्म के नाम पर नदी-समुद्र को किस तरह प्रदूषित किया जाता है, इसका सबूत है पिछले साल अकेले मुंबई में ही एक लाख सत्तासी हज़ार गणपति प्रतिमाओं का विसर्जन किया गया था...

जय हिंद...

Mrs. Asha Joglekar said...

Environment minister kyun nahi ye kanoon banate ki murtiyan sirf mitti kee hi banayee jayen. Aur samudra ke ander tak jakar wisarjit kee jayen.

निर्मला कपिला said...

आपसे बिलकुल सहम्त हूँ। अगर परंपरा का ही पालन करना है तो आटे आदि से बना कर मूर्ती विसरजन किया जा सकता है जिसे कम से कम समुद्री जीवों का पेट ही भरे बजाये कि पैरों तले रेंदा जाये। अच्छी पोस्ट। बधाई।

अमित शर्मा said...

अपने इष्ट का अनादर तो करते है और उनकी बनाई सृष्टि को भी हर साल प्रदूषित करते है इनको तो खुद इनके इष्ट भी नहीं समझा सकते है |

पी.सी.गोदियाल said...

स्वार्थी कलयुगी लोगो की सरासर मूर्खता है यह भाटिया साहब , हम हिन्दुस्तानी दिखावे में ज्यादा विस्वास रखते है , सड़कों पर हुडदंग मचाया और फ़ेंक दिया मूर्ती को कूड़ेदान में ! इस पर रोक लगनी चाहिए , बेवकूफ लोग वातावरण को भी प्रदूषित कर रहे है !

गजेन्द्र सिंह said...

बहुत बढ़िया प्रस्तुति .......

कुछ दिनों पूर्व एक पोस्ट को लेकर ब्लॉग पर विवाद हो गया था, कुछ लोग आहात थे की इसमें भगवन श्री राम का अपमान हुआ है .... भगवन का आपमान .... पर यहाँ आकर लगा की लोगो की सोच कितनी छोटी हो गयी है .... एक हास्य से लोगो को भगवन का अपमान दिख गया पर यहाँ जो गणपति का अनादर हो रहा है वो शायद किसी को दिखाई नहीं दे रहा है .........

पढ़े और बताये कि कैसा लगा :-
http://thodamuskurakardekho.blogspot.com/2010/09/blog-post_22.html

नरेश सिह राठौड़ said...

भाटिया साहब आपने दुरस्त फरमाया |यह हाल तो भगवान के भक्तो ने किया है अगर दुशमनों ने किया होता तो कितना दंगा फसाद होता कितनी जाने जाती और राजनीति कि रोटिया सेंकी जाती |

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सार्थक पोस्ट ...

डा. अरुणा कपूर. said...

...sundar aalekh..dhanyawaad!

ajit gupta said...

राज जी मुझे तो वैसे भी विसर्जन का अर्थ ही समझ नहीं आता। मूर्ति की स्‍थापना मंदिर में होती है, तो भई वही करो ना। बाजार में करनी है तो उस मूर्ति को मंदिर में स्‍थापित करना चाहिए। यह तो यूज एण्‍ड थ्रो का सिद्धान्‍त ह‍ो गया।

रंजना said...

बहुत सही कहा आपने....
बहुत ही दुखद है यह...

sandhyagupta said...

अगर यह दुशमनो ने किया होता तो आप के नाम का दम भरने वालो ने कितना हंगामा किया होता....


धर्म के ठेकेदारों को "प्रणाम". ये लोग कुछ भी करें गलत कैसे हो सकता है.

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सटीक और सार्थक मुद्दा ऊठाया आपने, शुभकामनाएं.

रामराम.

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

ऎसी मूर्खतापूर्ण परम्पराएं सिर्फ इसी देश में निभाई जाती हैं....मूर्ख, हाजिल लोग फिर भी अपने आप को "धार्मिक" कहते हैं.

दिगम्बर नासवा said...

भेड़ चाल ..... परंपरा के नाम पर कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं हम .... और पलट के देखना ... वो तो हमने सीखा ही नही .... शर्म की बात है ये ....

Tarkeshwar Giri said...

Namaskar


ऎसी मूर्खतापूर्ण परम्पराएं सिर्फ इसी देश में निभाई जाती हैं

Arvind Mishra said...

हाँ हाँ कोई तो बताये ,सवाल बिलकुल दुरुस्त है !

Shah Nawaz said...

बहुत ही अच्छा सन्देश देती हुई पोस्ट है. हम जिन्हें आदर देते हैं, उन्हें दिल से आदर देना चाहिए, केवल दिखावे के लिए अथवा जोश/उत्साह में आदर देने का यही परिणाम होता है. जैसे मुसलमान अक्सर रमजान समाप्त होते ही मस्जिद का रास्ता भूल जाते हैं और अगले रमजान या जुमा के दिन ही मस्जिद याद आती है. अगर सच्चे मन से सम्मान दिया जाता तो सम्मान बाकी रहता और इस तरह आस्था के साथ मज़ाक नहीं होता.

गजेन्द्र सिंह said...

बहुत बढ़िया प्रस्तुति .......

(क्या अब भी जिन्न - भुत प्रेतों में विश्वास करते है ?)
http://thodamuskurakardekho.blogspot.com/2010/09/blog-post_23.html

rashmi ravija said...

गणपति उत्सव के बाद अक्सर ऐसे ई- मेल आते हैं....फोटो की तरफ तो देखा भी नहीं जाता. जरूरत है लोगों के जागरूक होने की.

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
आभार, आंच पर विशेष प्रस्तुति, आचार्य परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पधारिए!

अलाउद्दीन के शासनकाल में सस्‍ता भारत-2, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

सुनीता शानू said...

यही एक बात कभी समझ नही आती।

Babli said...

आपने बिल्कुल सही कहा है है! मैं आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूँ! उम्दा प्रस्तुती!
मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

डॉ. मोनिका शर्मा said...

थोड़े से सुधार की आवश्यकता है.... परम्पराओं पर चलते हुये भी यह कार्य किया जा सकता है....
bhartiya nagrik ki is baat se poori tarah sahmat

BrijmohanShrivastava said...

भाटिया जी आपका विचार बिल्कुल सत्य है बचपन से देख रहा हूं कम होने के बजाय प्रथायें बढती ही चली जारही है ।पहले पूजा का सारा पत्रं पुष्पं फलं तोयं सब कुओं में विसर्जित कर दिया जाता था अव कुये तो रहे नहीं और इस विसर्जन में कई नोनिहालेां का विसर्जन भी हो जाता है

ज्योति सिंह said...

अगर यह दुशमनो ने किया होता तो आप के नाम का दम भरने वालो ने कितना हंगामा किया होता....
bahut hi uchit baate rahi ,is tarah ka haal apne bhagyavidhata ka karange wo naraz na honge isse behtar chhoti si tasvir ki hi pooja karke apne bhav pragat kar de .jo pujniye hai unka samman behtar hona chahiye .man ko bha gayi ,bahut sahi likha hai aapne .

कविता रावत said...

Sach mein kitnna matlabi hai insaan.. nadi paar huyee aur naav ko thokar maar badh liye aage...
bahut hi chintansheel aalekh... tasveeron ko dekh sach mein man bahut darvit ho utha....uf!kitna kaduwa satya hai yah!!

विनोद कुमार पांडेय said...

धार्मिक आडंबरों के आगे इस बातों की परवाह कोई नही करता..बहुत सच्ची तस्वीर प्रस्तुत की आपने..अगर परंपरा है विसर्जन तो सही तरीके से होना चाहिए ...श्रद्धा यह नही कहता की ऐसी विसर्जन उचित है...बहुत बढ़िया प्रसंग ..राज जी धन्यवाद

अशोक बजाज said...

इष्ट देवों को अपमान से बचाने की कोई तरकीब ढूढनी पड़ेगी .ध्यानाकर्षण के लिए आभार .

S.M.MAsum said...

मूर्तियाँ.......प्लास्टर की जगह मिटटी की बनानी चाहिए
sahee mashwira

निर्झर'नीर said...

bhatia ji ....aaj bhi navratri ke dino mein hamare yahan gaanv mein mitti ki devi ki moorti banayi jati hai or dashahara pe us mitti ki moorti ko vahi visarjit kiya jata hai jis talab se vo mitti layi jati hai isse kya hota hai ki mitti jahan se aayi vahin vapis chali gayi prakriti ka santulan bana raha or aastha bhi bani rahi or paryavaran bhi bana raha .

ab kya hai humne bahut tarakki kar lii hai khaskar dikhave ki tarakki ,prakriti se chedchaad ki tarakki or anjaam aapko maloom hi hai ,naa aastha rahi naa suddh hava naa pani or aise hi chalta raha to jald hi prakriti apne aap sab santulit kar degii ...

aapka chintan bahut hi gahra or vicharniiy hai .

Vaibhav said...

मैं २८ साल का हूँ, जब से होश संभाला है इस तरह के कई विरोध दर्ज करा चुका हूँ अपने परिवार के सामने परन्तु बड़े लोग समझते हैं कि ये नई पीढ़ी अपनी संस्कृती का सम्मान नहीं करना चाहती अब उनको कौन समझाए कि मेरी शिकायत और उनकी चिंता अलग अलग हैं|
आपके इस ब्लॉग का लिंक मैंने अपने फेसबुक पेज पर दिया है ताकि जागरूकता और फ़ैल सके |

शरद कोकास said...

बहुत बढ़िया तस्वेरें लाये है आप इन्हे देखे सब तब ही समझ मे आयगा ।

शोभना चौरे said...

किसी जमाने में कुम्हार के घर कि रोजी रोटी चले इसलिए दीवाली और अन्य त्योहारों पर मिटटी कि मूर्तियों ka chalan tha जिन्हें pooja के bad नदी में विसर्जित कर दिया जाता tha |लेकिन आज इस परम्परा ka विकृत रूप हमारे सामने आ रहा है jiske liye sbhi nagrik jimmevar hai और fir mumbai to padhe kikho ka shhar hai sath hi vahan के log jagruk bhi pr jab vahan ye hal hai to desh के baki kya hal ?
achha alekh hm jaise log bhi kuchh to sikhege .

Tausif Hindustani said...

राज जी मुझे तो वैसे भी विसर्जन का अर्थ ही समझ नहीं आता। मूर्ति की स्‍थापना मंदिर में होती है, तो भई वही करो ना। बाजार में करनी है तो उस मूर्ति को मंदिर में स्‍थापित करना चाहिए। यह तो यूज एण्‍ड थ्रो का सिद्धान्‍त ह‍ो गया।
काफी अच्छा लिखा है आपने आप के इस लेख की जितनी प्रशंसा की जाये कम है ,
शायद इस से लोग कुछ समझ लें
dabirnews.blogspot.com