29/05/10

गांव वाली पोस्ट की टिपण्णीयों के जबाब भाग १

Blogger रेखा श्रीवास्तव said...

राज जी,

गाँव का नाम तो बता दीजिये, लगता नईं है की ये हमारे ही देश का गाँव है. आपने तो बस गाँव के बाहर चक्कर लगवा दिया अन्दर वालों से भी मिलवानाथा.

25 May 2010 11:24 AM

रेखा जी हमारे गांव का नाम इसन(Isen) है, जिस की आबादी करीब ५ हजार के आसपास है, यह बाबेरिया मे पडता है, मुनिख से ४० किमी ओर एयर पोर्ट से ३० कि मी.

Blogger माधव said...

ऐसा खुबसूरत गाँव तो पहली बार देखा है , ये तसवीरें कहा की है सर

25 May 2010 2:29 PMBlogger

नीरज जाट जी said...

भाटिया साहब,
पहली बात तो ये कि आपने गांव का नाम नहीं बताया।
बहुत सुन्दर नजारे हैं। मैं आज ही दिल्ली से जर्मनी जाने वाली ट्रेन का स्लीपर में टिकट रिजर्व कराता हूं।

माधब ओर नीरज जी आप को भी जबाब ऊपर मिल गया

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Blogger ओम पुरोहित'कागद' said...

हमारे गांव ऐसे कब होंगे भाटाया जी ?

25 May 2010 10:19 PM

ऒम जी हमारे गांव ओर शहर इस से भी सुंदर बन सकते है, अगर हम चाहे तो, जब तक हम खुद जागरुक नही होते, आजादी का असली मतलब नही समझते तब नही, जिस दिन हमे यह बात समझ मै आ गई तो हम इस गांव से भी सुंदर गांव बना सकते है.क्योकि हम मेहनती तो बहुत है.

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Mishra Pankaj ओर दुसरा डिब्बा जिस पर Biotonne लिखा है ओर जिस का ढक्कन लाल है इस मै हमे सिर्फ़ खाने का बचा हुआ, ओर सब्जियो के छिलके, घास वगेरा, बरेड , रोटी के बचे हुये टुकडॆ ही फ़ेकने है, ओर इसे भी हर १५ दिनो बाद खाली करते है.
in 15 dino mw yah khana mahakata aur gandh nahi aati ?

पंकज जी नही, क्योकि इस दिब्बे को घर से बाहर, आंगन मै किसी निश्चित जगह पर रखते है, ओर इस का ढक्कन भी बन्द रहता है, ओर इस से खाद बनती है

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Blogger Mishra Pankaj said...

राज अंकल आपने हमारे जिज्ञासा का समाधान किया इसके लिए धन्यवाद और सपनों सा प्यारा है आपका गाव !
कभी हमें भी बुलाइए ना :)
कहिये तो RESUME भेजू :)

26 May 2010 4:50 PM

Blogger दीपक 'मशाल' said...

सर जी आपका गाँव बड़ा प्यारा.. मैं तो हूँ पछताया..... बिन आये वहाँ रे...

26 May 2010 6:41 PM

Blogger योगेन्द्र मौदगिल said...

Bhatiya...main to ise dekhe bagair nahi maan sakta....Kab Bula Rahe Ho..?

आप सभी ओर अन्य लोग जो भी यहां आना चाहे स्बागत है एक भारतिया हाथ जोडे खडा है.

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Blogger भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

बहुत अच्छा लगा आप के गांव को देखकर. मेरा एक भाई भी जर्मनी जा रहा है शिक्षा ग्रहण करने. उसे भी आपके और आपके गांव के बारे में बताऊंगा..

26 May 2010 7:40 PM

आप चाहे तो मेरे पता उसे दे सकते है, मेरा फोन ना० भी मैने आप को मेल मै भी लिखा था, आप मेल करे मै आप को फ़ोन ना० दे दुंगा...
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Blogger महफूज़ अली said...

काश! हमारे हिंदुस्तान में भी ऐसे ही गाँव होते.......

Blogger राजीव तनेजा said...

उम्मीद पर दुनिया कायम रखते हैं कि कभी ना कभी तो तरक्की की लहर यहाँ भी आएगी ...

बहुत बढ़िया लगा आपका गाँव देखकर

Blogger दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

गाँव की उन्नति के इस स्तर को देख कर लगता है कि हम अभी बहुत पीछे हैं। हमें तो अभी आपस में लड़ने के लिए फौजें पैदा करने से ही फुरसत नहीं है।

Blogger सुलभ § Sulabh said...

आज आपके किसान मित्र के घर गौशाला और फसले देख मन प्रसन्न हुआ...

भारत में भी कम से कम सफाई पर विशेष ध्यान तो दिया ही जा सकता है.... तकनीक तो देर सवेर सबके पास आ ही जायेगी.

काश नही अगर हम मेहनत करे देश मै इमान दारी हो तो हमारा देश भी ऎसा बन सकता है, लेकिन दिनेश जी ने आगे की बात लिख दी हमें तो अभी आपस में लड़ने के लिए फौजें पैदा करने से ही फुरसत नहीं है।

सुलभ जी आप ने बिलकुल सही लिखा कि तकनीक तो देर सवेर सबके पास आ ही जायेगी. पहले हमे सफ़ाई पर, अपनी जागरुकता पर ध्यान देना चाहिये.

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Blogger खुशदीप सहगल said...

राज जी बेहतरीन पोस्ट के लिए आभार...

कितना साइंटिफिक और कितना ईमानदार है जर्मनी का ग्रामीण जीवन...किसानों के साथ सरकार भी पशुओं के स्वास्थ्य के लिए कितनी सजग है, ये आधा सेंट भारतीय रुपये में कितना बैठता होगा...

जय हिंद...

खुश दीप जी यहां € चलते है, ओर एक € मै सॊ सेंट होते है, ओर एक € करीब ६० रुपये के बराबर है आज कल, ओर दुध ०,५० सेंट यानि ३० रुपये का एक लिटर है... यहां महगाई बिलकुल नही है, पता नही हमारे नेता रोज भाषाण मै क्यो चिल्लाते है कि विश्व मै महांगाई बढ गई है, चीनी ०,६० सेंट की किलो, बीयर ००, ६० सेंट

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Blogger dhiru singh {धीरू सिंह} said...

मेरे यहा तो दो गाय है एक ५ किलो दूध देती है दूसरी ९ किलो

जर्मनी और भारत के किसानो मे एक समानता है क्या आपने कभी मह्सूस किया .....
............ मैने किया दोनो को अंग्रेजी नही आती :)

धीरु जी यहां सब को अग्रेजी आती है, कोई अनपढ नही, लेकिन यह अग्रेजी बोलते नही, इन्हे अपनी मात्र भाषा से बेहद प्यार है

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Blogger Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

भाटिया जी, आज तो आपने कमाल कर दिया. ऐसी ही जानकारियों और चित्रों की अपेक्षा है. जर्मनी के आम मजदूर और किसान के जीवन के बारे में जानें तो समझ में आता है कि जान की परवाह न करते हुए भी लोग पूर्वी जर्मनी के किसान और मजदूर वहां के शोषक कम्म्युनिस्ट बंदूकचियों से बचकर इधर क्यों आना चाहते थे.

जी वो पुर्वी जर्मन के लोग आज भी काम चोर ओर चलाक है,लेकिन अब तो बहुत देर हो गई, ओर जर्मन सरकार ने उन्हे भी बराबर खडा कर लिया, लेकिन उन्हे आज भी यह लोग दुसरे ना० का नागरिक समझते है.

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Blogger RAJWANT RAJ said...

aasma bhi vhi , jmi bhi vhi
mehnt vha bhi vhi mehnt yha bhi vhi
frk hai to tkniki ka .
aise post ki daqumentri bnni chahiye jisse ki log labhanvit ho ske .

फ़र्क है लोगो की सोच का, नेताओ की नीयत का.... अगर यहां १०० € गांव के लिये दिया जाता है तो मै कभी भी जा कर उस सॊ € का हिसाब किताब पुछ सकता हुं, ओर नेता को हिसाब देना होगा, क्योकि मै जानता हुं कि वो नेता मेरा( जनता) का नोकर है मालिक नही.ओर वो सॊ € पुरा उसी काम पर लगेगा जिस के लिये मिला है.
बस यही फ़र्क है
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Blogger डा० अमर कुमार said...
तस्वीरें और वर्णन ढेर सारी लज़्ज़ा और कुछ ईर्ष्या जगाती है,
क्या भारतीय सच में असभ्य और सामाजिक रूप से गैरजिम्मेदार हैं ?
वो देश भी मेरा ही है, ओर दिल करता है कि वहां जा कर कुछ ऎसा करुं, मै क्या हमारे सभी मित्र यही चाहते है, लेकिन हमारे देश मै भरष्टा चार, ओर नोकर शाही ने ओर रही सही कसर साहब जेसे लोगो ने खराब कर रखी है, वर्ना ऎसी कोई दिक्कत नही कि हमारा देश सुंदर ना बन सके, हम मेहनती भी बहुत है, बस जागरुक नही.
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Blogger नीरज जाट जी said...

भाटिया जी,
आज अपने देसी गांव के बारे में कुछ नहीं कहूंगा क्योंकि मुझे अपने गांव की धूल से, गांव की गन्दगी से, असुविधाओं से बेहद प्यार है।
हां, आपका गांव देखकर लगा कि तकनीकी इन्सान का काम कितना आसान कर देती है।
हम तो जी आज के समय में भी चिलम भरना, दूध दुहना, खाट बुनना, भैंस के ऊपर बैठकर जोहड में जाना जानते हैं।

नीरज भाई हम ने भी यह सब किया है जो आप बता रहे है, मुझे आज प्यार है उस देश से जहां मै पेदा हुआ, वो केसा भी हो.है वो मेरा, उस की दुर्दशा देख कर हमारा दिल भी रोता है, उसे खुशहाल देख कर, हमारा सीना भी गर्व से फ़ुलता है, जय हिन्द

***Blogger पी.सी.गोदियाल said...

Bhatia sahab , kabhi plot-walot kat rahe hon to bataana, majaak nahee kar raha.

गोदियाल साहब अभी मै अकेला कमाता हुं, इस लिये ज्यादा पेसे नही है, ओर कर्ज लेना मेरे नियम से गलत है, इस लिये कभी मकान या प्लाट लेने की नही सोची, लेकिन रिटायार मेन्ट के बाद जरुर सोचूंगा इस बारे तब आप को बता दुंगा,

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18 comments:

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

भाटिया जी, आपका गाँव तो वाकई बहुत खूबसूरत है. डिस्कवरी चैनल पर जर्मनी के गाँव और वहां की रिसायकलिंग के बारे में देखा है सो कुछ जानता हूँ. सुना है वहां हर घर में धातु, पेपर, प्लास्टिक, और कांच का कचरा रखने के अलग-अलग डिब्बे होते हैं और किसी भी कचरे को फेंका नहीं जाता.

मैं आपसे यह भी जानना चाहता हूँ कि कई बड़े-बड़े शहरों को छोड़कर गाँव में रहने के पीछे क्या कारण है?

खुशदीप सहगल said...

राज जी,
आपका गांव बड़ा प्यारा,
मैं तो गया हारा,
देखके आपकी सारी पोस्ट रे...

जय हिंद...

काजल कुमार Kajal Kumar said...

वाह आपने तो दिल जीत लिया...सभी की टिप्पणियों का अलग से जवाब देकर.

शिवम् मिश्रा said...

फिर कहता हूँ ...............नज़र ना लगे आपके गाँव को !!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

जिस दिन भारत के गाँव ऐसे हो जाएंगे उस दिन लोग शहर छोड़ वापस गाँव लौटना चाहेंगे।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

thank you bhatia ji... nischit roop se main uske liye aapka number doonga..

पलक said...

मेरे नए ब्‍लोग पर मेरी नई कविता शरीर के उभार पर तेरी आंख http://pulkitpalak.blogspot.com/2010/05/blog-post_30.html और पोस्‍ट पर दीजिए सर, अपनी प्रतिक्रिया।

Udan Tashtari said...

ये सही काम किया!

योगेन्द्र मौदगिल said...

भाटिया जी मैंने तो पासपोर्ट पर सरसों का तेल ऒर काला टीका लगाकै तैयार कर दिया... बस आप तुरंत कविगोष्ठी करवालो इस गांव में.... मैं रोहतक की रेवड़ी, पानीपत का कंबल, जगाधरी की नंबर वन अर इंदौर तै असली ताऊ नै लेकै तैयार हो रहा हूं............. बहरहाल बेहतरीन प्रस्तुति... साधुवाद..

जी.के. अवधिया said...

वाह भाटिया जी, आपने अपने गाँव में घुमा कर सभी लोगों को पहले ही खुश कर दिया था और अब लोगों की जिज्ञासा शान्त करके दिल भी जीत लिया!

डा० अमर कुमार said...


यही तो... भाटिया जी,
जागरुकता तो दूर, नेता स्वयँ चाहते हैं कि गरीबी अशिक्षा बनी रहे ।
पर यदि कोई अपनी पहल पर सभ्यता, सौजन्य, नियम कानून की बात करता है.. तो उसे यह कह कर ख़ारिज़ कर दिया जाता, " अबे, चल हट ! बड़े आये अँग्रेज़ की औलाद ..."
मानो कि सभ्यता, सौजन्य, नियम कानून इत्यादि हमने अँग्रेज़ों के हवाले कर दिया है, और स्वयँ एक मुँहजोर लतिहरपन में ही मस्त हैं !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

टिप्पणियों पर आधारित रचना बहुत बढ़िया रही साहिब!

राजकुमार सोनी said...

यह भी खूब रही भाटिया जी।

अजय कुमार झा said...

भाटिया जी ,
जितनी सुंदर ग्राम यात्रा की पोस्टें रहीं उतनी ही सुंदर ये सबकी जिज्ञासा शांत करने वाली पोस्ट भी । अब तो हमें पूरा जर्मनी देखने की ईच्छा है ।

hem pandey said...

जर्मनी के गाँव की सुन्दर जानकारी के लिए धन्यवाद . विदेशों में रह रहे भारतीय ब्लोगर यदि अपने देश की अच्छी बातों और बुरी बातों से अवगत कराते रहें तो, अपनी अच्छाइयों और बुराइयों का पता चलता रहेगा. कामना है कि हमारे गाँव भी इस तरह के बनें. संभवतः हमारे विकास की परिभाषा में गाँव का विकास सही सन्दर्भ में शामिल नहीं हो पाया है.

दिगम्बर नासवा said...

बहुत प्यारा है आपका गाँव .... ऐसी हरियाली कम से कम भारत के गावों में तो देखने को नही मिलती ...

boletobindas said...

सर सेल का चक्र तो कई बार लगाया औऱ फंसे भी। जब समझ मं आया तो बड़ी मार्किट में ज्यादा घूमना शुरु किया औऱ वही समान बिन सेल के सस्ते में खरीदने में कई बार कामयाबी गई।

हां सर आपके गांव में गाय होती है तो हमें बता दें। मन तो करता है कि साल में छह महीने कम से कम आपके ही गांव आ कर रहें. पर क्या करें काम दिल्ली में करते हैं। औऱ रोजी रोटी का चक्कर भी है।

अरुणेश मिश्र said...

अहा ! ग्राम्य जीवन भी क्या है ।
रोचक ।