28/05/10

आईये आज आप को अपने गांव के अंदर घुमा लाये भाग अन्तिम

कल हम ने यही पर यह कडी छोडी थी, अभी हम यहां के कब्रिस्थान मै ही है, यह गांग के दुसरी ओर के कुछ घर है
यह मुर्तियां एक पुरी दिवार जितनी है, शायद जब किसी को दफ़नाने आते हो तो यहां सब मिल कर कोई पुजा वगेरा करते होंगे, वेसे जब यह लोग किसी को दफ़नाने आते है तो पुरे सुट बुट पहन कर आते है, ओर यह सुट सिर्फ़ इन्ही मोको पर पहने जाते है, ओर फ़िर दफ़नाने के बाद किसी जगह, होटल वगेरा मै जा कर खाना ओर बीयर, पेग वगेरा चलते है,
यह गिर्जा घर है जो इसी कब्रिस्थान मै बना है, ओर हर घंटे के बाद इस के घंटा घर से घंटी बजती है, हां तो यह लोग दफ़नाने के बाद खाना वगेरा खाते है, जिस मै इन के रिश्ते दार, परिवार, जान पहचान वाले, ओर आस पडोस के लोग शामिल होते है, ओर यहां किसी को दफ़नाना इतना सस्ता नही पडता, ओर दफ़नाने से पहले लाश को भी सुट बुट पहना कर, ओर सुंदर से ताबुत मै बहुत गद्दे दार बिस्तर बिछा कर दफ़नाते है, बिलकुल वेसे ही जेसे हम लोग चोथा ओर तेहरबी करते है.

जब मैने किसी से पूछा कि आप मरे हुये आदमी पर इतना खर्च क्यो करते है तो मुझे बताया गया कि मरने वाला एक बार मरता है, उस के बाद पता नही वो कहां जाता है, तो क्यो ना हम उसे अपने धर्म ओर विश्वास के संग दफ़नाये, कई बार उन्हे कर्ज भी लेना पडता है.


चलिये अब आप को इस गांव के स्कुल की तरफ़ ले चलते है, यह गांव का स्कुल नंवी कलास तक है, ओर आप को जर्मनी मै कोई भी अनपढ नही मिलेगा, पुरे जर्मन मै शायद ही एक आध अनपढ मिले, यह गली हमे नजदीक पडी इस लिये इधर से जाते है, मेरे बच्चे भी इधर से ही जाते थे...
नीचे ऊतर पर स्कुल है राईट साईड मै , यह जो चोडा सा चिमनी टाईप का ख्म्बा सा दिख रहा है, यह किचन से ओर हीटर रुम से जुडा है, ओर इस मै जो धुआं बाहर निकलता है उसे पहले फ़िलटर किया जाता है, जिस से चिकनाई ओर अन्य घातक वस्तुये धुये के संग बाहर जा कर हवा को खराब ना कर सके,

साथ वाले चित्र मै स्कुल का मेन गेट है काफ़ी नीचे जा कर, ओर यह सारी बिल्डिंग स्कुल की है, यहां कोई युनिफ़ार्म नही, कोई फ़ीस नही, कोई बस का किराया नही जिस से बच्चे स्कुल आते जाते है, कोई किताबो का खर्च नही सब खर्च सरकार करती है, लेकिन शिक्षा आनिवार्य है, भाषाणो मै नही हकीकत मै, अगर बच्चे को स्कुल नही भेजा तो पुलिस घर आ जाती है.
यहां बच्चो को पढाई के मामले मै बिलकुल आजाद छोडा जाता है, कोई बॊझ नही पढाई का, कोई टयुशन नही, कोई होम वर्क नही, लेकिन बडी कलास मै बच्चो को थोडा कलास वर्क मिलता है,ओर जो बच्चे पढने मै मन नही लगाते तो वो किसी अन्य काम मै दिल लगाते है तो उसी काम मै टीचर उसे हिम्मत बढाते है, कोई सजा नही होती, स्कुलो मै अग्रेजी के संग संग बाकी युरोपियन भाषाये भी सिखाई जाती है,जर्मन तो जरुरी है, बाकी यहां के लोग अग्रेजी समझते है, लेकिन बोलता कोई नही, सिर्फ़ बडी कम्पनियो को छोड कर, लेकिन जर्मन लोग आपस मै सिर्फ़ जर्मन ही बोलते है, अगर इन का कोई आदमी अग्रेजी मै बोले तो यह उसे डांट देते है, टी वी पर कभी कोई अग्रेजी का नया शव्द आ जाये तो यह झट से आवाज ऊठाते है, इन्हे अपनी भाषा, अपना पहरावा बहुत अच्छा लगता है ओर यह अपने पहरावे, अपनी भाषा, ओर अपने देश, अपने लोगो के बारे बुराई नही सुन सकते, ओर बुरा मान जाते है.


यह सामने जो बिलंडिग है यह स्कुल के वायु मै ही है, यह यहां का किन्डर गार्डन है, यहां ३ साल से ६ साल तक के बच्चे आते है, यहां कुछ खर्च देना पडता है, लेकिन यहां बच्चो को बिलकुल नही पढाया जाता, बस बच्चा सुबह से शाम तक खुब खेलता है, थक जाने पर वही अपने बिस्तर पर सो जाता है, यही से बच्चो को सफ़ाई की आदत भी डालते है, मेरे दोनो बेटे इसी किन्डर गार्डन मै फ़िर इसी स्कुल मै पढे है, अब बडे स्कुल मै है, ओर अगले साल युनिव्रस्टि जा रहे है.
यह सामने पेड देखे सारे पते इस के लाल रंग के है, अजी पतझड या गर्मी से नही हमारे यहां तो अभी बसंत आई है, यह पेड है ही ऎसा.

वो सामने हमारा घर है, नीचे कोई ओफ़िस है ओर ऊपर सारे का सारा मेरा, पांच कमरे,शांति ही शांति है गांव मै ओर नीचे नदी बहती है
यह मकान हमारे गांव का सब से पुराना मकान है, इसे तोडना या मुरम्मत करना बाहर से मना है उस के लिये पहले सरकार से अनुमति लेनी पडेगी, इस की छत इस के मालिक ने बिना पूछे नयी डलवा ली थी जिस के कारण उसे बहुत ज्यादा जुर्माना देना पडा था.



अब आप को ले चलते है खेल कुद की तरफ़, यह है नन्हे बच्चो के खेलने कुदने के लिये, यहां सभी बच्चे छोटी उम्र के मस्ती से खेलते है
यह झुले भी बच्चो के लिये ही है, लेकिन इस पर कभी कभी बडे बच्चे भी बेठ जाते है..... लेकिन यह बच्चो के झुले अकेले नही, इस के संग संग बडो के लिये ओर भी मनोरंजन के साधन है चलिये देखते है...




यह स्थान भी बच्चो के झुलो के साथ ही है, वहां बच्चे अपना झुला झुलते है तो बडे लोग यहां कुछ सेहत के बारे ध्यान देते है, सामने एक ओरत कुडा बीन रही है, अजी वो मन मर्जी से कर रही है, यहां सभी लोग अपने आसपास सफ़ाई पसंद करते है, इस लिये हम सब इस ओर बहुत ध्यान रखते है,सामने जो गोल सा पहिया सा दिख रहा है, इस पर नल लगा है, ओर पानी बर्फ़ से भी ठंडा है, हम लोग इस मै अपनी दोनो वायू कोहनियो

तक डुबाते है, जिस से हमारे खुन का दोरा ठीक रहता है, ओर यही पानी बाद मै नीचे साथ दिये चित्र मै बनी जगह पर घुटनो तक भर जाता है, ओर हम इस मै बार बार तीन चार चक्कर मारते है, जिस से हमारी टांगो का खुन का दोरा भी ठीक रहता है, यह पानी हद से ज्यादा ठंडा होता है, ओर अंदर जाते ही चीख सी निकल जाती है.यह पानी पी भी सकते है, यानि हम सब पीते भी है

ओर यह है हमारा कमेनेटी हाल, स्पोर्ट हाल, जहां हम बहुत से प्रोगराम कर सकते है, जब बच्चो की स्पोर्ट हो तो यही पार्टी होती है, जब फ़ुट बाल मेच हो तो भी पार्टी यही, ओर भी बहुत से काम आता है यह हाल
यह चित्र कमेनेटी हाल, स्पोर्ट हाल,का सामने से लिया गया है, इस के सामने फ़ुट्बाल मेदान है, साथ मै बच्चो के झुले ओर वो पानी वाला





यह सामने फ़ुट वाल मेदान है,असल मै यहां साथ साथ तीन मेदान है
यह चित्र आप ध्यान से देखे तो नदी के पानी को रोका हुआ है, ओर रुके पानी मै मच्छलिया हो जाती है, जिन्हे लोग पकड सकते है, दुसरा पानी को ऎसे रोक कर लोग इस से पनच्क्की चलाते है आरा मशीन चलते है, ओर कई सयाने बिजली भी बनाते है, लेकिन पानी की शुद्धता ना खराब हो इस ओर भी ध्यान देना पडता है










यह घर पहले तो यहां के किसी अमीर आदमी का था, लेकिन अब इस मै वो लोग रहते है जिन की आमदनी कम है, या बिलकुल नही, इन्हे इस मकान मै कुछ हिस्सा सरकार दे देती है, ओर खाने के लिये भी देती है
यह है हमारे गांव का वो हिस्सा जहां सब से दुखी लोग रहते है, यानि बुजुर्ग लोग, यह जवानी मै बच्चो को समय नही देते, ओर जब बच्चे जवान हो जाते है तो वो इन्हे नही पुछते, ओर इन्हे यहां छोड जाते है, फ़िर मदर्स डे, फ़ादर डे पर दो फ़ुल ले कर प्यार जताने आ जाते है, लेकिन गलती किस की बच्चो की या मां बाप की.चित्रो वाली पोस्ट आज खत्म, अगली पोस्ट मै आप सब की टिपण्णियो के कुछ जबाब दुंगा, अगर यहां बहुत अच्छा है तो बुरा भी बहुत है, अगर हम चाहे तो इन की अच्छाईया ले सकते है, बुराईयो को छोड कर, जुन महीने मै हमारे यहां गांव का मेला लगता है, अब आप लोग बताये कि आप विडियो देखना पसंद करेगे या मेले के चित्र? आप सभी का धन्यवाद मेरा साथ निभाने के लिये, मेरे चित्रो को पसंद करने के लिये

38 comments:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

बहुत अच्छा लगा आप के गांव के बारे में जानकर. हमारे देश की विडम्बना है कि सरकार यहां तो मुफ्त पढ़ा नहीं पाती और जब विदेशी सरकारें मुफ्त पढ़ाती हैं तो छात्र को अपने खाते में निर्धारित मिनिमम पैसा जो रखना आवश्यक है, उसके लिये भी कर्ज नहीं दे पाती... ,मेरा जो भाई एम०एस०करने के लिये जा रहा है उसके लिये तकरीबन साढ़े पांच लाख रुपये का बैलेन्स अपने खाते में रखना है और उसे इस रकम का कर्ज भी नहीं मिल पा रहा क्योंकि बैंक कहते हैं कि वह फीस के लिये कर्ज देते हैं.... अब जर्मनी में फीस तो लगनी नहीं... खैर हम सब लोग इन्तजाम करने में लगे हैं और सम्भवत वह अगस्त में चला जायेगा.. लेकिन सरकारों के रवैये में अन्तर देखिये...

शिवम् मिश्रा said...

बेहद उम्दा गाँव है जी आपका ! नज़र ना लगे !

परमजीत सिँह बाली said...

बहुत सुन्दर गाँव है.आपका।.अपनी मातृभाषा के प्रति ऐसा ही प्रेम होना चाहिए.......काश ! हमारे देश मे भी हिन्दी के प्रति ऐसा ही प्रेम होता...।जानकारी के लिए आभार।

shikha varshney said...

bahut hi sundar gaanv hai aapka.

Abhishek Pandey said...

आपका गांव, देख के बहुत अच्छा लगा, कोशिस करेंगे की हम भी आपके गांव मैं कभी आये.

Udan Tashtari said...

बहुत रोचक विवरण रहा!

M VERMA said...

उम्दा गाँव

उम्दा प्रस्तुति

उम्दा चित्र

दीपक 'मशाल' said...

सर आप तो राम राज्य में रह रहे हैं.. :) स्कूल वाला पार्ट सबसे अच्छा लगा.. श्रेष्ठ शिक्षा प्रणाली.. हमें सीखना चाहिए जर्मंस से कुछ..

Suman said...

nice

Arvind Mishra said...

बहुत रोचक और मनोरंजक सफ़र रहा आपके गाँव का -और केवल बिल्डिंग ,स्कूल, मैदान, पानी, कब्रिस्तान ,ओल्ड होम ही नही दिखा जर्मनी की संस्कृति भी खूब दिखाई -यह सचित्र यात्रा विवरण यादगार रहेगा !

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

आपका गांव देख कर अपना गांव अभी जा कर देखुन्गा क्या कुछ समानता है

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

गांव अच्छा लगा। गाँव के लोगों से मिलना बाकी रहा।

वाणी गीत said...

बहुत सुन्दर गाँव ....अपने हेरिटेज के प्रति सतर्क जर्मन सरकार से कुछ सीखना चाहिए ...
मेले की तस्वीरों का इन्तजार रहेगा ...!!

महाशक्ति said...

गाव के बारे मे अच्‍छी पोस्‍ट, आज हम भी जा रहे है।

राजकुमार सोनी said...

मरने वाला एक बार मरता है बात तो सही है.. आपके लेखन के साथ एक खास बात यह है कि उसमें रवानगी बहुत शानदार रहती है। सरलता के साथ आप चुटकी भी ले लेते हैं। अच्छा लगा। मैंने तो सारी किस्त पढ़ ली है।

'अदा' said...

saari kisht padh li ...aur paaya ki germany aur Cnadaian gaaon mein bahut jyada fark nahi hai...kamse kam dekhne mein...vaisi hi hariyaali aur vyavsthit...main to gaaon mein nahi rehti lekin gayi hun kai baar aur laga aisa hi tha sabkuch...
bahut hi rochak...
aapka dhnywaad...

honesty project democracy said...

भाटिया जी मैं तो बहुत प्रभावित हूँ आपके गाँव से और आपसे भी निश्चय ही उम्दा गाँव है आपका जिसे देखने की तम्मना हर किसी की होगी /

जी.के. अवधिया said...

"...वेसे जब यह लोग किसी को दफ़नाने आते है तो पुरे सुट बुट पहन कर आते है, ओर यह सुट सिर्फ़ इन्ही मोको पर पहने जाते है, ओर फ़िर दफ़नाने के बाद किसी जगह, होटल वगेरा मै जा कर खाना ओर बीयर, पेग वगेरा चलते है..."

वाह राज जी! आपने तो हमें गाँव घुमाने के साथ ही साथ वहाँ की संस्कृति से भी कुछ कुछ परिचित करा दिया। धन्यवाद!

सुलभ § Sulabh said...

इतना सुन्दर और रोचक विवरण की हम बस घूमते रह गए.
सफाई मानव सेवा है... इसे सभी को समझना होगा.

आप मेले के छोटे छोटे विडियो दिखा दे तो और मजा आएगा.

Mithilesh dubey said...

ओह हो , इतनी रोचक कथा चल रही थी और मैंने पिछला सार छोड़ दिया , अब पहले वापस पिछला पढ़ता हूँ फिर आता हूँ ।

अन्तर सोहिल said...

पर्यावरण का इतना ध्यान रखने वाले और अपनी मातृभाषा से प्यार करने वाले नागरिकों को सलाम
आपने तो आखिरी किस्त लगा दी जी, बहुत अच्छा लग रहा था जी आपके गांव के बारे में जानना और तस्वीरें देखना।
"पुरानी छत बदलने पर जुर्माना" यह बात कुछ समझ नही आयी जी।

प्रणाम स्वीकार करें

नरेश सिह राठौङ said...

आपके गाँव की यात्रा बहुत रोचक रही | लगता है इस प्रकार की पोस्ट अगर पढ़ने को मिले तो शायद ब्लोगिंग सार्थक है | हमें आपके गाँव वासीयो की अच्छी आदतों से सीखना चाहिए | यंहा कोइ सफाई करना भी चाहे तो लोग उसे हेय दृष्टि से देखते है |

नीरज जाट जी said...

भाटिया जी,
जब आपने अपने गांव की तस्वीर दिखानी शुरू कर ही दी है तो एक बार घर की भी दिखायें। अन्दर से भी, और बाहर से भी। आज सामने से आपके घर की एक झलक मिली लेकिन वो पर्याप्त नहीं है।

Sanjeet Tripathi said...

ghuma sara gaon aapke sath, kafi jankari mili.
shukriya

jitendra said...

bahut sundar

post thodi lambi honi chaiye or detail be, man karta hai padthe he jaye.

wahan "kale gore" ki koi baat to nahi hai na ?

male ki or gaon dono ki photo post karyaga .

thanks

aruna kapoor 'jayaka' said...

सर!...मेरे जर्मनी प्रवास के दरमियान, आपके साथ आपके गांव में घुमने का मजा जो आया था....वह अलग ही था!... यहां इस लेख में आपने आपने लेखनी का जादू चलाया है...सुंदर फोटोग्राफ्स पेश किए है, जो काबिले तारीफ है!...धन्यवाद!

पॄथ्वी जी आप को बहुत याद करतें है!... वे भी आपकी आवाज सुनने के लिए बेचैन है!

डॉ टी एस दराल said...

वाह भाटिया जी , आपने बहुत मेहनत से अपना जर्मन गाँव घुमाया । बड़ा आनंद आया । बहुत खूबसूरत है । साफ सफाई , हरियाली , सुविधाएँ , मशीनें , दूध , गाय , सभी कुछ देख लिया ।
इसीलिए विश्व के इस भाग को विकसित कहते हैं ।

लेकिन पूरे विवरण में बस एक बच्ची साइकल चलाते हुए नज़र आई। बाकी सब खाली पड़ा दिखा ।
शायद यही बात वहां खलती होगी । यहाँ तो बाहर निकलते ही आदमी ही आदमी । कभी अकेलापन लग ही नहीं सकता ।
वहां कौन किस से बात करता होगा ।
मैंने भी यह बात कनाडा में महसूस की थी ।

लेकिन अंत में सब कुछ बढ़िया ही लगा ।

प्रवीण शाह said...

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आदरणीय भाटिया जी,

पूरी सीरिज पढ़ी, बहुत अच्छा लगा आपका गाँव, आपके गाँव को देखकर यह भी आभास हो गया है कि German Engineering का इतना नाम क्यों है और German Quest for Perfection क्यों इतनी अनुकरणीय है।

आभार!

पी.सी.गोदियाल said...

भाटिया साहब , मेरा दो सौ रूपये का बिल है ( मेरी ज्यादा की औकात नहीं ) जो खून आपने मेरा अपना गाँव दिखाकर जलाया ! कोरियर से भेज रहा हूँ !

पलक said...

http://pulkitpalak.blogspot.com/2010/05/blog-post.html जिस्‍म पर आंख।
मैंने अपना ब्‍लोग बनाया है। कृपया मुझे मार्गदर्शन दीजिए।

sangeeta swarup said...

आपने बहुत खूबसूरत अंदाज़ में दिखाया अपना गांव....यह सब तो यहाँ बस कल्पना मात्र है

महफूज़ अली said...

काश! हमारे हिंदुस्तान में भी ऐसे ही गाँव होते....

सतीश पंचम said...

पिछली तीनों पोस्टें देखीं और यह भी.....सब देख कर लगता है कि एकदम अलग तरह की ही दुनिया है यहां..इतना सुंदर और स्वच्छ। वाह।

rashmi ravija said...

बहुत ही सुन्दर और शांतिपूर्ण गाँव है आपका....बेहद ख़ूबसूरत तस्वीरें हैं..
बस एक बात भारत और जर्मनी के गाँव में एक जैसी है...श्राद्ध के लिए क़र्ज़ लेना...पर वहाँ शायद ,क़र्ज़ पीढ़ी दर पीढ़ी ना चलते हों...

बेचैन आत्मा said...

सुंदर चित्र. उम्दा पोस्ट.
सभी सुविधाओं से सुसज्जित आपके गावँ के बारे में पढ़कर अच्छा लगा. क्या इतनी सुविधा सभी गावों में है या आपका गावँ कुछ विशेष है..?

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छा लगा आप के गांव के बारे में जानकर|
हम तो अच्छी चीज़ें ज़रूर ग्रहण करना चाहेंगे।
उम्दा चित्र।

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छा लगा आप के गांव के बारे में जानकर|
हम तो अच्छी चीज़ें ज़रूर ग्रहण करना चाहेंगे।
उम्दा चित्र।

शोभना चौरे said...

aise bhi ganv hote hai?
bahut bdhiya post.
abhar