03/10/09

हम ऎसे कब बनेगे??

अभी हम पेदल घुमने गये,करीब ५,६ किलो मीटर घुम कर आये, यहां पेदल घुमना भी कभी कभी होता है, ओर जब हम घुमने गये तो रास्ते मै एक दुकान मिली, जहां बेचने वाला अपनी दुकान को भ्गवान के भरोसे छोड कर ओर अपना समान अपनी दुकान पर लगा कर चला गया, हर वस्तु का मुल्य उस ने हिसाब से लगा दिया, ओर आप को एक छोटा सा बक्स भी राईट साईड मै दिखेगा, आप इस चित्र को बडा देखना चाहते है तो चित्र पर क्लिक करे आप ने जो भी समान लेना है ले, ओर इमान दारी से उस मै पैसे डाल दे, नही डाले तो कोई बात नही, आप का जमीर, ऎसी दुकाने हमारे यहां बहुत मिलती है, दुध वाले के यहां भी यही हिसाब है, अगर आप दुध किसी किसान से लेते है तो आप अपनी इमान्दारी से जितना दुध लिया उतने पेसे वहां रख आये,कोई चेक नही करने वाला, कोई आप को कुछ नही कहेगां, वो ऊपर वाला आप को देख रहा है, ओर अगर हमारे गांव मै आप का पर्स, पेसे, सोने की कोई चीज, या कुछ भी खो गया तो आप को ९७% उम्मीद है कि आप को वापिस मिक जायेगी.
काश हम भी ऎसे हो जाये, हम इन गोरो से यह चीजे सीखे, इमान दारी, लाल पीली चड्डी पहनने के स्थान पर.यह लोग भी हमरी तरह से ही है, लेकिन यह हम से अच्छी बाते ही सीखते है, तो क्यो ना हम भी इन की अच्छाईयां ही अपनाये
बताईये हमरे गांव की यह दुकान केसी लगी??

28 comments:

mehek said...

sach hai kaash aisi imadaari hamare yaha bhi sba mein aa jaye.

निशांत मिश्र - Nishant Mishra said...

भाटिया जी, यहाँ तो पर उपदेश कुशल बहुतेरे वाली परंपरा चली आ रही है. भारत में तो लोग पैसे का बक्सा तो दूर, पूरी रेहडी ही उठाकर ले जाएँ.

अमेरिका में पढाई करनेवाले वाले छात्र सड़क के किनारे अख़बार-पत्रिकाएं रखकर कॉलेज चले जाते हैं और लोग ईमानदारी से खरीद करके डिब्बे में पैसे डाल जाते हैं. यहाँ ऐसा हो सकता है?

आपके गाँव की दुकान बड़ी प्यारी है. मैं तो पूरी रेहडी पर हाथ साफ़ कर देता!:)

कौन से फल ऐसे हैं जो यहाँ नहीं मिलते? उनकी जानकारी चित्रों के साथ ब्लौग पर दें तो अच्छी पोस्ट बनेगी.

कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee said...

आप का संस्मरण ताजी हवा जैसा है.
यही स्थिति नोर्वे की भी है,...बल्कि नोर्वे में तो बैंक्स में छुट्टे पैसे की बास्केट भरी पडी रहती हैं काऊंटर पर, लोग स्वेच्छा से बड़े नोट बदल लेते हैं उन से और छुट्टे पैसे ले जाते हैं.
जर्मनी में तो हमें स्ट्राबेरी के बगीचे से जितनी चाहे दिन भर खाओ, बस लौटते समय साथ ले जाने वाली मात्रा का ही भुगतान रखना होता है स्वयं.

Dr Parveen Chopra said...

बहुत सही लिखा है । काश !!!!!!!

Varun Kumar Jaiswal said...

भाटिया जी आपके इस संस्मरण ने एक टीस उभर दी बस यूँ समझ लीजिये कि एक बहुत लम्बा सफ़र तय करना है सभ्य बनने के लिए |

काजल कुमार Kajal Kumar said...

पागल हैं.
अरे अभी तक बेइमानी नहीं सीखी ?
बताओ यूं ही उन्नत होने का ढोंग भ्ररे फिरते हैं...
इन्हें हमारे यहां ट्रेनिंग ही ज़रूरत है

शिवम् मिश्रा said...

बहुत बढ़िया जानकारी मिली , आभार ! पर इस बात पर थोडा मतभेद जरूर है कि हम सभ्य नहीं है ............हम सभ्य है पर हमारी कुछ समस्यां है जिन से हमे उबरने में थोडा और समय लगेगा पर हम उन को भी पार कर जायेगे !

राज भाटिय़ा said...

यह सब कद्दू ( सीता फ़ल ) या पेठा जिसे अग्रेजी मै पम्पकीन है जी, लेकिन अलग अलग तरह के है

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

भाटिया जीष आप बहुत सही जगह रह रहे हैं। हम तो यहाँ अगले सौ सालों में भी उम्मीद नहीं कर सकते।

सतीश पंचम said...

बहुत रोचक जानकारी मिली है।

हम लोग केवल हरीशचंद्र के नाम को ढो रहे हैं और इन्हें देखो....कितनी इमानदारी से अपने काम कर और करवा रहे हैं।

बहुत बढिया पोस्ट।

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

भाटिया जी, वाह्! वहाँ एक हिन्दुस्तानी के लिए तो ये सब सतयुग में जीने से तो कमतर न होगा ।
बहुत बढिया!!

संगीता पुरी said...

यहां वैसी दुकान होती तो न जाने क्‍या होता ?
शायद आपकी पोस्‍ट से हिन्‍दुस्‍तानियों को कोई सीख मिले !!

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर said...

पहले हम भी यही थे !!
पर अब तो मुफ्त -ए- माल दिल - ए- बेरहम !!

पहले हम सीने में वार करते थे ...आज हम ??

रश्मि प्रभा... said...

kaash....aisa hota,par jaha hai,us jagah ishwar hain

ज्ञानदत्त पाण्डेय| Gyandutt Pandey said...

देख कर आंखें मल रहा हूं!

सर्वत एम० said...

आंसू आ गये, मैं अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, जापान, अरब तथा विश्व के दूसरे देशों के बारे में पढ़ता-सुनता हूँ तो ग्लानि महसूस होती है. हम सिर्फ नैतिकता, सत्य, धर्म,आचरण जैसी बातें ढिंढोरा पीट कर करते हैं, अमल एक प्रतिशत भी नहीं करते. गुजरात के भूकम्प और दंगों में आलीशान दुकानों के साज़-ओ-सामान मिनटों में गायब हो गये थे. हमारे देश में तो दूकानदार की मौजूदगी में ही असलहा दिखाकर सामान के साथ कैश भी ले लिया जाता है. जब भगवान की मूर्तियाँ और गहने सुरक्षित नहीं फिर अन्य चीज़ों के बारे में सोचना बेवकूफी है. राज साहब, हम २०० वर्षों बाद भी यहीं होंगे.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

लगता है अपने राम विदेशों में चले गये हैं।

hem pandey said...

ऐसी ईमानदारी की बातें सुन सुन कर ही मन खुश हो जाता है.वैसे भारत के किसी गाँव के बारे में भी ऐसा ही कहीं पढा था.

'अदा' said...

raj ji,
aapne kitna sach kah diya ..
ham bhi aisi hi imaandaari se har din do-chaar hote hi rehte hain aur khud se sharminda hote rehte hain..
Lekin ab Canada mein bhi imaandaari par aanch aane lagi hai aur dukh ki baat ye hai ki ye sab kuch hamare bharteeyon, pakistaaniyon, somaliyon ityadi ki hi kripa hai..varna yahan ke log to jhooth aur be-imaani jaante hi nahi hain...
hain na kshobh bhi baat ham hindustaaniyon ke liye..?

अभिषेक ओझा said...

हमारे यहाँ रख दो तो पूरी दूकान ही गायब हो जाए :)

राज भाटिय़ा said...

एक टिपण्णी चंदर मोहन गुप्त जी ने मेल से भेजी है...
2009/10/5 Chandra Mohan Gupta

I am again facing problem in posting my comment at your blog "desh pardesh". So sending my comment at your Mail address directly. Please publish the same as given below as my comment at your blog.

राज़ भाई,

जबरदस्त ईमानदारी का परिचय कराया.
आपके वहा के लोग लगता है तरक्की पसंद नहीं है जो अभी तक नफे के नशे से मुक्त हैं तरक्की के उन्माद से पागल नहीं, दिमाग कितना स्वस्थ होगा ये तो हरियाली ही बता रही है. सभी को नमन, नमन, नमन.
हार्दिक आभार.

चन्द्र मोहन गुप्त.
जयपुर.

Dipak 'Mashal' said...

dil ko chhoo gayi ye aapki aapbeeti, kuchh kuchh aisa hi yahan Belfast(UK) me bhi hai, lekin itni imaandari to nahin yahan bhi. aapka aabhar aise ramrajya ke bare me batane pe. par jahan ram the wahan ab aisa rajya hi nahin.

वन्दना अवस्थी दुबे said...

हां दूसरे , धनी देशों में ऐसी ईमानदारी के कई किस्से सुने हैं हमने भी. लेकिन भारत में? यहां इतनी ईमानदारी की गुन्जाइश ही नहीं है.

शरद कोकास said...

यह सोचकर ही अच्छा लगता है कि हम भी इसी दुनिया मे रहते है

Mrs. Asha Joglekar said...

Bhaatiya jee aapkae gaon ki Dukan such much bahut hee achchee lagee. Kash aise hee gaon bharat men bhee hon. Lekin jankaar khushee huee kee abhee bhee logon kee achchhaee par bharosa kiya jata hai.

कुन्नू सिंह said...

अमहदाबाद(गूजरात) मे गया था तो एसा ही लग रहा था(फोटो मे जो ईमान दारी है उसका 50% ही था)

पडोसी के घर से कोई आया और फ्रिज का बर्फ "ICE" दे दिया और बोला दुर से आए होंगे....आदी

एक बार वहीं टिवी देख कर चाए पी रहा था और तभी चाय का कप धीरे धीरे घूमा रहा था और गरम चाय हाथ पर गीर गया और जैसे ही मै दवाई की दूकान पर जल्दी से गया और पैसे लेना भूल गया था तो कई सारे टिप्स बताया की कैसे जल्दी ठिक होगा और दवाई भी लगा दिया और पैसे के लिये मैने कह दिया की अभी लाता हूं तो बोला कल सुबह दे देना।


वही एक जगह है जहां मै गया तो बस वाला ज्यादा यात्रीयों को नही बिठा रहा था और लिमीट मे था - बहुत सान्त जगह है और खुब अच्छी हवा भी चलती है(साम को और रात मे)

- मेरा कंप्युटर बहुत आवाज कर रहा था तो मै बनाने के लिये उसे खोल दिया और CPU FAN + SMPS(Power Supply) खराब हो गया था और 1.30 दिन तक कंप्युटर बंद था :;))

Vijay Verma said...

हिन्दुस्तान संतों और महात्माओं की भूमि है सरकार... माँओं ने ऐसे भी लाल जने हैं जिन्होनें ईमान और आन की खातिर जानें कुर्बान कर दीं. इस बात से इनकार नहीं है मुझे कि कुछ बीज खराब हो गए... मगर दोष ज़मीन, हवा और मौसम किसी का भी हो सकता है. लेकिन संभाल होगी... और जरूर होगी... हराम का एक एक पैसा खून बनकर बहेगा और झक मारकर हर इंसान को इमानदारी और मेहनत का दामन थामना होगा.. आज भी हिन्दुस्तान रो रहा है तो महज़ मुट्ठीभर लालची,स्वार्थी और बिना रीढ़ के उन्हीं चोर लोगों की वजह से जिनकी तरफ आपका इशारा है... मगर मुझे यकीन है कि ये हालात् जरूर सुधरेंगे... कभी न कभी .
मुझे खुशी है कि आपने अपने दिल में अपने वतन कि याद को जिंदा रखा हुआ है...

शोभना चौरे said...

जब हम किसी के घर जाते है और घर साफ सुथरा रहता है तो व्यवस्थित रहता है तो हम भीउसे वैसा रखने कि कोशिश करते है और किसी का घर बिखरा या अस्तव्यस्त रहता है तो हमारी कोशिश उस अस्तव्यस्तता को बढ़ने कि ही रहती है |असी हमारी मानसिकता बन जाती है कही कूड़ा पडा है तो हम भी व्ही कूड़ा और छोड़ देते है ऐसा ही ईमानदारी और बेइमानी के साथ भी होता है |और जैसा चल रहा है वैसा चलने देते है |i
आपकी पोस्ट अनुसरणीय है |
abhar