09/07/09

जब हम ने पहरेदारी की २

क्रमश से आगे..

अब कब रात के ११.०० बजे आखिर इन्त्जार की घडी खतम हुई, ओर चोकी दार हम सब को एक स्थान पर ले गया ओर सब कुछ समझा दिया, ओर सभी को एक एक लाठी ओर एक एक सीटी दे दी, सभी ने अपने अपने मोर्चे सम्भंल लिये,ओर सभी अपने अपने साथियो के संग अपनी अपनी दिशा मै चल पढे, आधी रात हो गई घुमते घुमते, साथ मै शीला सिनेमा था जिस का आखरी शो खत्म, ओर लोग भी सब अपने अपने घरो को चले गये,अब दुर दुर तक कोई नही, एक दम सन्नटा.
सोचा कही चाय पी ले लेकिन कहां ? अब नींद भी हावी होने लगी, मेरे साथ स्वामी था ओर वो पुरी तरह से चुस्त, शायद वो संघ मै जाता था, दो बार सब मिले ओर सब फ़िर से दुर दुर चले गये , युही घुमते घुमते हम उस प्रेस वाले के पास से गुजरे, तो मुझे एक शरारत सुझी, वो प्रेस वाला आले किस्म का डरपोक तो था ही, मेने स्वामी से सलाह कि की अब नींद भगाने का इस से अच्छा कोई ढंग नही, ओर फ़िर हम दोनो ने आपिस मे सलाह कर के उस प्रेस वाले की चार पाई के पास जा कर उस की चादर को खींचा तो उस ने नींद मै ही बिना देखे चादर फ़िर से ले लि.

मेने आवाज बदल कर कहा...सरदार यह प्रेस वाला बहुत करोड पती है इन ने प्रेस कर कर के ओर नकली कोयले जला जला कर बहुत पेसा जमा किया है आज इस की तिजोरी लूटी जाये, ओर हम ने चांदनी रात मै देखा कि वो आदमी हमारी बाते सुन कर थोडा हिला ओर मुंह छुपाये छुपाये ही बोला तुम कोन हो.....
मेने कहा हम डाकू गरदन तोड हे, पहले गोली मारते है, फ़िर गर्दन तोडते है,, उसी समय स्वामी ने अपनी लाठी उस की छाती पर रख दी ओर कहा अगर ज्यादा बोले तो गोली पार...अब वो प्रेस वाला आजीब आजीब सी आवाजे निकाल रहा था, हम ने कहा बोल प्रेस सेठ तिजोरी की चाभी कहा रखी है, प्रेस वाला बोला जी मै तो बहुत गरीब हुं, मेरे पास कोई तिजोरी नही... हम ने उसे कहा तो सुन हम तुझे पांच मिंट का समय दे रहे है, तुम चुप चाप चाभी निकाल कर वापिस लेट जाना ओर हम पेशाब कर के आते है... लेकिन शोर नही मचाना ओये वरना गोली अन्दर दम ....
हम वहा से थोडी हि दुर गये तो उस ने लेटे लेटे ही शोर मचा दिया, हाय मुझे लुट लिया हाय मै कंगाल हो गया. आधी रात का समय आवाज खुब गुंजी हम दोनो भाग कर काफ़ी दुर चलेगे, तो सामने से नेपाली चोकी दार ओर एक अन्य लडका हमे मिले, हमे भागता देख नेपाली को कूछ शक हुआ तो हम ने उसे कहा वहां एक आदमी जोर जोर से चीख रहा है चलो सब मिल कर चले, उस नेपाली ने कोड बर्ड मै सीटी मार कर सब को बुला लिया, जब हम प्रेस वाले के पास गये, तो वहा ओर भी लोग  इकट्ठे हुये थे, ओर जब सब ने पुछा कि तुम सब कहां थे , हम सब ने अपनॊ अपनी पोजिशन बता दी ओर बताया की यहां हम ने किसी को नही देखा, फ़िर प्रेस वाले की बाते सुन कर सब हंसने लगे कि तेरे पास कोन सा खजाना है, चल सो हा तुझे कोई सपना आया होगा.
अब रात के २ बज गये थे, ओर एक बार फ़िर से शांति छा गई, हम दोनो फ़िर आये ओर उसे आवाज मार कर कहा... सेठ तुझे मना किया था कि शोर नही मचाना अब मर.. ओर रंगा लगा तो जरा इस सेठ का निशाना, मेने कहा सरदार बंदुक तो हम वही भुल आये, चलो बंदुक ले आये... यह कह कर हम एक दिवार से कुद कर वहा से दुर चले गये ..... लेकिन उस आदमी ने फ़िर जोर जोर से शोर मचा दिया कि भागो भागो डाकू आ गये हाय हाय मुझे मार दिया.... फ़िर से सभी लोग डंडे लाठिया ले कर भागे ओर उस से पूछा बोल कहा है डाकू, अब वो क्या बताये , बोला अभी अभी यही बात कर रहे थे, ओर मुझे मारने के लिये बंदुक लाने गये है, इतनी देर मै हम सब भी आ गये,ओर सब हेरान की आज इसे कया हो गया है, इसे तो सब जानते है, इस के पास पेसे कहा, शायद कोई बुरा सपना देखा होगा, ओर उसे चेतावनी  दे कर ओर उस की बाते सुन कर सब फ़िर से चले गये,
अब सब की पोजिशन भी बदल गई, ओर हमारी नींद भी उड गई, बल्कि मजा आने लगा अब सुबह के चार बजने वाले थे लेकिन थोडा थोडा अंधेरा अभी भी था, हम ने एक बार फ़िर दिवार से झांका ओर देखा वहा उस गली मे कोई नही था, तो स्वामी ने कहा एक बार फ़िर से मजा ले , लेकिन ध्यान रखना कोई छुप कर देख ना रहा हो, ओर एक चक्कर हम उस के पास लगा कर निकले ओर आवाज लगाई जागते रहो.... ओर फ़िर हम वहा से दुसरी तरफ़ चलेगे ओर फ़िर मै दिवार कुद के उस के पास गया ओर कहा ओये मुंह से चादर उतार हम ढके मुंह वाले को गोली नही मारते, हम तुझे अब गोली मारेगे, कर नंगा अपना मुंह... ओर वो गि गि कर के अपना मुंह चादर मै ओर भी छुपाने लगा, लेकिन मै तो कब का वहां से भाग गय था ओर दिवार के दुसरी तरफ़ पहुच कर हम दोनो वहा से चले गए थे. जब प्रेस वाले को चोकी दार की सीटी सुनी ओर उसे यकीन हो गया कि अब उस के सिरहाने कोई नही तो वो फ़िर से जोर जोर से शोर मचाने लगा, हाय लुट गया, हय मर गया हाय मुझे मार दिया, सभी लोग फ़िर इकट्टॆ हुये, सब ने इधर उधर देखा कोई भी तो नही था,आसपास भी काफ़ी देखा लेकिन मिलता तब जब कोई होता, उस दिन के बाद उस का बाहर सोना लोगो ने बंद कर दिया.
सुबह पांच बजे हम घर आये, ओर शाम को सभी हम उम्र वालो को यह कहानी बताई, उस के बाद रोजाना ही उस प्रेस वाले का शोर रात को आने लगा, अब बाकी भी आते जाते उस का दरवाजा खडखडा , कभी धमका देते, अब तो चोकी दारो को भी यह सब पता चल गया, ओर फ़िर एक दिन सब बडो को भी,  तो बडो ने फ़िर से मिटींग की ओर आईंदा सब बडॆ ही पेहरा देने लगे,ओर सब नोजवानो का पहरा देना बन्द. लेकिन उस प्रेस वाले को फ़िर सभी खुब छेडने लगे थे..ओर बाकी लोग भी शन्ति से सोने लगे.

13 comments:

Udan Tashtari said...

प्रेस वाले सेठ की तो हालत खराब कर दी आप लोगों ने..

बढ़िया रहा संस्मरण!!

ताऊ रामपुरिया said...

हमको तो पहले ही मालुंम था और हमने सबको उस दिन भी बता दिया था कि यह भाटियाजी की करतूत थी. आज आपने खुद कबूल ली. अब उस प्रेस वाले को ढूंढ कर यह वाकया पढवाते हैं.:)

रामराम.

seema gupta said...

हा हा हा चलो चैन की नींद तो नसीब हुई....

regards

P.N. Subramanian said...

बेचारा प्रेस वाला !

जितेन्द़ भगत said...

ये शरारत भी खूब रही:)

रंजन said...

ये भी खुब रही.....

नरेश सिह राठौङ said...

आपकी पुरानी यादो मे वही गांव वाला मजा आता है । आपका यह संस्मरण पढकर बहुत मजा आया ।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

बहुत अच्छा लग रहा है.

अभिषेक ओझा said...

बेचारा प्रेस वाला ! चलिए अंततः सब भला हुआ.

Abhishek Mishra said...

Majedar raha sansmaran, magar isne badon ki jimmedari badha di. Naya comment box jodne se kafi suvidha ho gai, usi ka upyog kar raha hun. Dhanyavad.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

कैजुअल पहरेदारी ऐसे ही होती है।

Science Bloggers Association said...

रोचक विवरण, मजा आया पढकर।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

राज भाटिय़ा said...

gagan sharma
भाटिया जी,
सच में बहुत मजा आया पूरा पढ कर। बचपन और किशोरावस्था की कयी बातें याद आ
गयीं। पर वहां टिप्पणी नहीं दी जा पा रही थी।