03/07/09

चढता ओर उतरता हवाई जहाज का

जब हम बहुत छोटे थे तो हवाई जहाज को दुर से देखा करते थे, दिल करता था, काश हम भी कभी इस मे बेठे गे ? पता नही बहुत महंगा होगा ? लेकिन एक दिन इस मै बेठ ही गये, दिल्ली से बम्बई, उन दिनो पालम एयर पोर्ट ही होता था, ओर बम्बई मै शायद सहारा या कुछ ओर नाम हो, वहां तक हवाई जहाज मै, डरे सहमे से, जेसे किसी गरीब को ट्रेन के फ़ास्ट्र कलास मे बिठा दो, घर वालो से पहली बार दुर हुये थे, इस लिये पता ही नही चला कब सफ़र खत्म हुया, क्योकि सारे समय तो आंखो मे आंसु जो थे,

फ़िर वहां से युरोप के लिये शबीना एयर वेज का जहाज पकडना था, मां ने परोठियां घर से बना कर दे दी थी, लेकिन भुख बिलकुल नही थी,कब बेल्जियम पहुचे पता ही नही चला, लेकिन दिन चढ गया था, फ़िर वहा से फ़्रेकफ़ुट के लिये फ़लाईट जो करीब ३५ मिन्ट की होगी.
उस के बाद बहुत बेठे इस हवाई जहाज मै, अब तो बिलकुल भी अच्छा नही लगता, बल्कि सब से बोर यात्रा हवाई जहाज की लगती है, ओर सब से प्यारी यात्रा भारतीया बस की, जिस मै सब दोस्त बन जाते है, ओर वो खचडा बस हो तो ओरभी अच्छा कानो की मेल भी निकल जाती है, लेकिन अब बस मै चढना बहुत मुश्किल है,
लेकिन आज हम आप को विमान को चढता हुआ, ओर फ़िर उतरता हुआ दिखाये गे, चढता हुआ बाहर से, ओर उतरता हुआ, कोक पिट से( पता नही इसे कोक पिट क्यो कहते है) यानि जहा ताऊ ड्राईवर बिना पिये जहाज को चलाता है  :) मेर कहने का मतलब आप को पायलेट के साथ कोक पिट से जहाज को उतारता हुआ दिखायेगे.
पहली विडियो चढते हुये जहाज की, दुसरी विडियो कोक पिट से ली है उतरते हुये जहाज की...



17 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

सही बात है, जहाज़ में सभी लोग नकचढ़े से दीखते हैं. ऐसे डरे हुए कि कहीं कोई उनसे बात न कर बैठे. पर बस, जहाज़ का रास्ता तय नहीं कर सकती न.
बम्बई (अब मुंबई) में उसे सहर एअरपोर्ट कहते थे.
आपने ने अच्छे लिंक दिए हैं.

ताऊ रामपुरिया said...

जमाना बदल गया है . आपने पुरानी यादों को याद करने की कोशीश की है, जरा और कुरेदिये, बहुत कुछ दबा होगा वहां, उनको भी लिखिये.

रामराम.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

भाटिया जी!
हम भी बचपन में आपके जैसे ही
सपने देखा करते थे।
आपकी पोस्ट पढ़कर अच्छा लगा।

Abhishek Mishra said...

चलिए आपके साथ जहाज के चढ़ने-उतरने का आनंद भी ले लिया. धन्यवाद.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

मुझे तो उड़ाने में ज्यादा मजा आता!

सुशील कुमार छौक्कर said...

बार बार खोलने पर भी विडियों नही नजर आ रहे है। बाद में देखेगे ।

Nirmla Kapila said...

कैलिफोर्निया जाते हुये मेरी फ्लाईट भी दो घन्टे फ्रेंकफु्ट रुकी थी मुझे क्या पता कि ताऊ जी चला रहे हैं तभी कहूँ कि दो की बजये चार घण्टे बाद क्यों चली अच्छा हुआ बता दिया आगे से पता कर के जाऊँगे कि ताऊ तो नहीं चला रहे हैण्

Dr. Amar Jyoti said...

रोचक।

''ANYONAASTI '' {अन्योनास्ति} said...

आपके साथ जहाज के चढ़ने-उतरने का आनंद भी ले लिया. धन्यवाद.वरना अपनी किस्मत कहाँ और जिस सवारी पर जरुरत पड़ने पर उतर कर भगा न जा सके उससे हम डरते हैं


जरुरी सूचनाये यहाँ उपलब्ध हैं ::---- " स्वाइन - फ्लू और समलैंगिकता [पुरूष] के बहाने से "

नरेश सिह राठौङ said...

बहुत अच्छे विडियो लगाये है । हम जैसे ग्रामीण लोग तो आज भी दूर से ही जहाज निहारा करते है कभी बैठने का मौका ही नही मिला है ।

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाह भाटिया जी वाह.... आप तो जहाज में ही बोर होने लगे..

Harkirat Haqeer said...

वाह...वाह...राज जी बहुत खूब लीं तस्वीरें ......

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

वीडियो तो चल ही नहीं रहा है........

राज भाटिय़ा said...

योगेंदर जी सच मै बहुत बोरिंग है, बस एक दो बार अच्छा लगता है इस से अच्छी तो अपने बसे है, हर जगह रोक लो खिडकी खोल कर ताजा हवा लो, लेकिन अब पता नही वेसा ही महोल है जेसा पहले था या बदल गया है

शोभना चौरे said...

bahut achhi post .
ab phle jaisa bus ka safar nhi rha
bhut si rajyo me rajy privhan ko theke par de diya hai aur vo log choti -choti bus chlate hai jime do ki seat par ak aadmi bhi mushkil se baith pate hai .aor itne logo ko bhra jata hai ki sas lena bhi dubhar hai .hmari jo yade hai bas vo hi mithi hai .

शोभना चौरे said...

bahut achhi post .
ab phle jaisa bus ka safar nhi rha
bhut si rajyo me rajy privhan ko theke par de diya hai aur vo log choti -choti bus chlate hai jime do ki seat par ak aadmi bhi mushkil se baith pate hai .aor itne logo ko bhra jata hai ki sas lena bhi dubhar hai .hmari jo yade hai bas vo hi mithi hai .

Vijay Kumar Sappatti said...

raaj ji

aapne sahi kaha , jo aanand apne desh me hai wo aur kahana aur bus ka safar ..wo bhi MP ki sadko par ....wah wah ...

aapki post padkar purane din yaad aa gaye ji .

Aabhar

Vijay
Pls read my new poem : man ki khidki
http://poemsofvijay.blogspot.com/2009/07/window-of-my-heart.html