23/06/09

हवाई जहाज ?

क्या आप ऎसी जगह पर रहने की सोच सकते है, जहां सडक के ट्रेफ़िक से ज्यादा हवाई जहाजो को शोर हो, यानि हर पल आप के सर से एक हवाई जहाज चढे तो दुसरा उतरे...
देखिये तो सही....

16 comments:

डॉ. मनोज मिश्र said...

धन्य होंगे वहाँ के लोग .

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

वो समय जल्दी ही आने वाला है।
अभी से आदत डाल लो।

AlbelaKhatri.com said...

waah
waah
kya jagah dhoondhi hai?

saahitya saadhna k liye itnee shaanti aur kahan milegi ?
chalo raajji, vahin chalte hain .......ha ha ha ha

अजय कुमार झा said...

bhatia jee ...haay ham to mare jaa rahe hain plane kaa shor sunne ko..kambakht yahaan kee blue line bason aur shor machate auto ke shor se achaa hee hoga na..log kahenge..waah plane ke shor se behra hua hai...

श्यामल सुमन said...

कमाल का चीज आपने दिखाया भाटिया साहब।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

ताऊ रामपुरिया said...

शोर सुनकर ही आदमी मर जायेगा. पर धीरे २ वहां रहने वाले लोगो को इसकी इतनी आदत हो जायेगी कि बिना इस शोर को सुने वो सो ही नही पायेंगे.:)

रामराम

योगेन्द्र मौदगिल said...

Wah Bhatia g
कमाल है... कमाल है......

योगेन्द्र मौदगिल said...

Wah Bhatia g
कमाल है... कमाल है......

बालसुब्रमण्यम said...

ताऊ रामपुरिया की बात बिलकुल सही है। मेरे एक रिश्तेदार का घर मुंबई में लोकल ट्रेन की पटरी के ठीक किनारे है। हर दो मिनट पर एक लोकल ट्रेन धनधनाती हुई निकलती है, और घर की खिड़कियां थर-थरा उठती हैं। जब हम उनके घर रुकते हैं, इन ट्रेनों के कारण पांच मिनट की भी नींद नहीं ले पाते। पर मेरे रिश्तेदार या उनकी सोसाइटी के अन्य लोगों को इन ट्रेनों के शोर की कोई शिकायत नहीं है, वे तो उसे नोटिस तक नहीं करते।

निरंतर शोर वाले परिवेश में रहने पर हमारा मस्तिष्क ऐसे शोरों को नजरंदाज करना सीख जाता है, जिनसे तुरंत कोई खतरा न हो।

यही बात जानवरों में भी पाई जाती है। दक्षिण के मंदिरों के उत्सवों में हाथियों का खूब उपयोग होता है। उत्सवों में आतिशबाजी भी की जाती है। दस-बीस हाथी सज-धजकर लाइन से खड़े रहते हैं, और उनसे दो-तीन फुट की ही दूरी पर भयंकर शोर करनेवाले पटाखे फोड़े जाते हैं। हाथियों के कानों में जू तक नहीं रेंगता। वे मजे से झूमते हुए खड़े रहते हैं। वे इस शोर के आदी हो चुके हैं। वहीं जंगली हाथी पटाखे की ध्वनि से भाग खड़े होते हैं। हाथियों से खेतों की रक्षा के लिए किसान पटाखे फोड़ने का उपाय खूब आजमाते हैं। पर पालतू हाथी इस शोर के आदी हो गए हैं।

पर यह जरूर है कि उच्च डेसिबल वाले शोर के निरंतर प्रभाव से धीरे-धीरे आदमी बहरा हो जता है, और अन्य शारीरिक विकार भी प्रकट होने लगत हैं।

परमजीत बाली said...

पता नहीं आने वाले समय में और क्या क्या मिलेगा देखने को।

P.N. Subramanian said...

हमें नहीं रहना है. वैसे ताऊ बिलकुल सही कह रहे हैं.

अभिषेक ओझा said...

ना जी ! हम तो ऐसे ही खुश हैं :)

काजल कुमार Kajal Kumar said...

दिल्ली के पालम पर तीसरा रनवे बनने से वसंत विहार वालों का लगभग यही हाल है.

Udan Tashtari said...

हमारे तो इतनी ही देर में कान पक गये.

अल्पना वर्मा said...

bahut hi jagahen aisee hai jahan airport main city mein hi hai...aur logon ko is shor ke sath rahne ki habit ho jaati hai---

Abhishek Mishra said...

Bharat mein bhi kai shahron mein aise drishya ab aam hote ja rahe hain. Magar kashtdayak to hai hi.