08/09/08

इच्छा शक्ति

आज का विचार, हम मे से कितने लोग तम्बाकू, पान, बियर, शराब, सिगरेट जेसे व्यासनो से पीडित हे, नही मेने गलत कहा, पीडित नही इन की आदत से ग्रस्त या कह ले इन के गुलाम हे, ओर वह इन्हे छोडना चाहते हे लेकिन छोड नही पाते, अजी यह कया हम बहुत सी अन्य गन्दी आदतो से ग्रस्त हे जेसे रिश्र्वत लेना,देना,कानुन तोडना,हेरा फ़ेरी,आदी आदी, उपर से वहाना इन सब के बिना चल नही सकता हम आदत से मजबुर हे, छोडना चाहते हे लेकिन छुट नही रही,अजी आप इसे छोडना ही नही चाहते... तो पढिये आज का चिंतन

यह बात बहुत पुरानी हे , जब आचर्या विनोबा जी पवनार आश्रम मे चिंतन, मनन ओर लेख के कामो मे व्यस्त थे, तभी की यह बात हे, उन के आश्रम मे रोजाना तरह तरह के लोग आते थे, हर किसी की अपनी अपनी परेशानी, सभी अपनी परेशानियो को हल विनोबा जी से पुछते थे, ओर विनोवा जी भी जरुर कोई ना कोई रास्ता बता देते।

एक दिन एक शराबी उनके पास आया ओर बोला,विनोबा जी मे इस गन्दी आदत को छोडना चाहता हू,लेकिन छोड नही पाता, इस मुई शराब ने मेरे घर का सुख चेन छीन लिया हे, मेरा अपना जीवन भी बरवाद कर दिया हे,मेरा पुरा परिवार भी बरवादी तक पहुच गया हे, मे इस शराब से मुक्ति चाहता हू, आप ही कोई उपाय बताये, जिस से मॆ इस से मुक्त हो जाऊ।

विनोबा जी ने उस व्यक्ति से कहा, अरे इस मे कठ्नाई क्या हे जब तुम इसे छोडना चाहते हो तो छोड दो,तो उस व्यक्ति ने कहा बाबा जी , मेने बहुत कोशिश कि लेकिन मे इस का गुलाम हो गया हु, नही छुटती, आप ही कोई दवा, कोई ढंग बताये, जिस से मे इस से छुटकारा पा जाऊ,विनोबा जी उस की सारी बात सुन कर काफ़ी देर शांत रहे, चुप रहे,थोडी देर बाद बोले भई ठीक हे कल शाम को चार बजे आ जाना , हां अन्दर आने से पहले आवाज दे कर पुकार लेना,तब तक शायद कोई बात मेरी समझ मे आ जाये, जिस से तुम्हारी यह आदत छुट जाये।

दुसरे दिन वह आदमी सही समय पर विनोबा जी के आश्रम पर पहुच गया, ओर जब कुटिया मे घुसने लगा तो उसे याद आ गया की विनोबा जी ने अन्दर घुसने से पहले आवाज लगा कर पुछने को कहा था,ओर वह व्यक्ति बाहर से ही बोला बाबा मे आ गया, अब आप बाहर आ जाये, विनोबा जी अन्दर से बोले भाई मे बाहर नही आ सकता, इस खम्बे ने मुझे जकड रखा हे,वह आदमी बहुत ही हेरान हुआ कि एक खम्बां केसे एक आदमी को जकड सकता हे, उसने जब अन्दर झांका तो क्या देखता हे की विनोबा जी ने एक खम्बे को दोनो बाजुयो से जकड रखा हे, ओर वह आदमी कुटिया मे अन्दर आ गया ओर हसं कर बोला बाबा जी खम्बे ने आप को नही, आप ने खम्बे कॊ जकड रखा हे।

इतना सुनते ही विनोबा जी खिलखिला कर जोर से हंस पडे ओर खम्बे को छोड कर बोले भाई तुम्हारा भी यही हाल हे, मेरी तरह से तुम ने भी इस शराब को पकड रखा हॆ, ओर ऊपर से कहते हो इस ने तुम्हे पकडा हे, अस्लियत मे तुम इसे छोडना ही नही चाहते

जब तक तुम्हारे अन्दर तुम्हारी अपनी इच्छा शक्ति नही जागे गी तब तक कोई दवा, कोई राय, कोई रास्ता काम नही आये गा, जेसे मेने खम्बे को जकडा था तुमने शराब को जकड रखा हे

यह तो तुम्हारे अपने हाथ मे हे जब चाहो इसे छोड दो, जेसे मेने खम्बे को छोड दिया, बस अपनी इच्छा शक्ति को पहचानो ओर उस आदमी ने उसी समय प्राण किया ओर फ़िर कभी भी शाराब को छुआ नही,

तो चलिये आप भी कोई आदत छोडना चाहते हे तो ... इसी वक्त छोड दे, पहचानिये अपनी ताकत, हम गुलाम नही हो सकते किसी आदत के
धन्यवाद अगर मेरे दो शब्दो से आप किसी का भला हो तो मुझे खुशी होगी

28 comments:

Anil Pusadkar said...

wah.sach me humne khambhon ko pakad rakha hai.sad-vicharon ko jante sab hain lekin lagta hai bhulte jaa rahen hain.aise me unhe yaad dilane ka aapka prayas sarahniya hai

जितेन्द़ भगत said...

क्‍या इत्‍तफाक है, आज जो मैने पोस्‍ट कि‍या, आपका लेख उसी की एक कड़ी लग रही है। पढना अच्‍छा लगा।

श्रीकांत पाराशर said...

Ji Bhatiyaji, baat ichha shakti ki hi hai. achha drishtant dekar ek upayogi sandesh diya hai aapne. Kal aapke chutkale bhi padhe. Har vidha ke badshah hain aap.

seema gupta said...

"very inspiring story, well said strong will power can make you commit and execute and thing"

Regards

ज़ाकिर हुसैन said...

भाटिया साहब
एक बार फिर एक अच्छे और सार्थक लेख के लिए बधाई

अनुराग said...

aapka ye blog mujhe sabse jyada pasand hai raj ji......kai cheeje aasan kar deta hai.

Gyandutt Pandey said...

टॉम पीटर्स की बात मानें तो बदलने में नैनो सेकेण्ड्स लगते हैं। पर बदलना चाहें तब न!

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सही लिखा आपने ! सारे बंधन हमारे ही बनाए हुए हैं !
और हमारी मर्जी के बिना दूसरा छुड़वा भी नही सकता ! जब
हमको किसी ने पकडा ही नही तो छुडवायेगा कौन ? अगर हमारी
मर्जी होगी तो ही तो कोई बांधेगा ! बहुत सुंदर कहानी ! धन्यवाद !

रश्मि प्रभा said...

किसी भी जीत के लिए,
इक्षा-शक्ति ज़रूरी है-
यह मोड़ती है हवाओं का रुख,
बदलती है नदी की धारा...
एक बहुत सही दृष्टिकोण,उचित प्रयास एवं सुझाव.......

mamta said...

सही कह रहे है आप किसी भी बुरी आदत को छोड़ने के लिए इच्छा शक्ति होनी चाहिए।

शोभा said...

बहुत बढ़िया बात कही है आपने. अगर इच्छा शक्ति है तो कुछ भी असंभव नहीं. आशा है बहुत से लोगों को लाभ होगा. सस्नेह

ओमप्रकाश तिवारी said...

सही कह रहे है आप

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

prerak or badhaiya seekh deti post. dhanyawaad.

अभिषेक ओझा said...

आपके ये विचार वाले पोस्ट बड़े काम के होते हैं सर !

अशोक पाण्डेय said...

प्रेरणादायक कथा के लिए धन्‍यवाद। यदि आदमी दृढ़निश्‍चय कर ले तो कोई भी व्‍यसन छोड़ना मुश्किल नहीं।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत सुंदर विचार, हमारे प्रिय विनोबा भावे थे ही ऐसे.
इतना अच्छा प्रसंग हम लोगों के ध्यान में लाने के लिए धन्यवाद, भाटिया जी.

भवेश झा said...

bahot bahot dhnyabad sir....

डा. अमर कुमार said...

भाटिया जी, आपकी बात तो दिल को छू गयी,
बिनोबा का प्रसंग भी पहले पढ़ रखा था, अमल भले ही न कर पायें हों !

आज आपकी पोस्ट ने एक नया सवाल खड़ा कर दिया है,
भई ये तो मन ही पापी है , सो एक सहज प्रश्न कर रही है,
यहाँ उलटा क्यों है.. ब्लागिंग तुमको क्यों नहीं छोड़ रहा है ?
यह शौक व्यसन बनने पर क्यों उतारू है ?

Dr. Chandra Kumar Jain said...

बिल्कुल सही...सटीक.
==================
आभार
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

दीपक said...

अब यह भी बताइये की ये इच्छा शक्ती कैसे बढती है सबो ने कहा वाह पर यह किसी ने नही बताया की क्या छोडने वाले है मै पिछले दस साल से अपने आलसी पन को छोडने की इच्छा से ग्रस्त हु पर अभी तक नही छुटी है इसिलिये मुझे शायद अधिक इच्छा शक्ती की आवश्यकता है यदि ऐसा कुछ मटेरीयल मिले तो जरुर देवे.

कुन्नू सिंह said...

आपके ये दो शब्द जरूर हैं। पर ईसमे बहोत दम हैं।
ये पढ कर कीसी भी ईंसान के अंदर जोश आ जाएगा।

मै ईच्छासक्ती को अच्छी तरह से पहचान गया हू। ईसमे बहोत दम है आप ईससे कूछ भी कर सक्ते हैं।
दीमाग कंट्रोल मे रखने से कूछ दीनो बाद एक अलग ही सक्ती का एहसास होता है। खूद पर भरोसा बढ जाता है।

राज भाटिय़ा said...

आप सब का धन्यवाद,

दीपक भाई यह मटेरीयल तो आप के पास मोजुद हे, क्या आप किसी के गुलाम हे ? हां आप इस आलसी पन के गुलाम हे,अगर आप अपने अन्दर यह नियम बना ने कि आप किसी की गुलामी नही सहे गे ओर जो काम भी हे उसे आज ओर अभी पुरा करे गे फ़िर बाद मे आराम तो देखिये आप की इच्छा आप की गुलाम ना बने तो कहे,आप की इच्छा शक्ति किसी ओर के देने से नही अपने आप हिम्मत करने से सोचने से ही आयेगी, यह कोई विटामिन की गोली तो नही की दो सुबह ओर दो रात को सोने से पहले पानी के साथ खा लो चार दिन मे आप की खत्म हुयी इच्छा शक्त्ति फ़िर से लोट आये गी
धन्यवाद

दीपक said...

भाटिया जी आपकी सारी बाते सर आंखो पर मेरा अनुभव यही कहता है कि यह नेति-नेति जैसा पेचीदा मामाला है।

शहरोज़ said...

महापुरुषों का जीवन ही प्रेरक रहा hai सदियों से लेकिन हम उनसे प्रेरणा हासिल करें, ये हमसे नहीं हो पाता.हमारा दुर्भाग्य यही है.सुचिंतित लेखन.गहराई की खबर देता और गहरे उतर कर हमें सोचने को विवश करता.

मुकेश कुमार मिश्र said...

प्रबल इच्छाशक्ति के माध्यम से दुष्कर कार्य भी सुकर हो जाता है । आज आवश्यकता इसी इच्छाशक्ति को अपने अन्दर भरने की है तभी हम दुर्व्यसनों से मुक्त हो सकते हैं ।

ताऊ रामपुरिया said...

@आदरणीय गुरुदेव अमरकुमार जी गुरुओं के सवाल का जवाब तो गुरु ही दे सकते हैं ! अत: आप ही बताओ की इस आदत के नासूर बनने से पहले कैसे छुटकारा पाया जाए ?

adwet said...

बहुत सही लिखा है, जब तक इच्छाशक्ति नहीं होगी, कोई दवा या उपाय काम नहीं करता।

रंजना said...

"जब तक तुम्हारे अन्दर तुम्हारी अपनी इच्छा शक्ति नही जागे गी तब तक कोई दवा, कोई राय, कोई रास्ता काम नही आये गा, जेसे मेने खम्बे को जकडा था तुमने शराब को जकड रखा हे"

क्या बात कही है,वाह...लाजवाब.सचमुच दुर्गुणों से बचना केवल और केवल हमारी इच्छाशक्ति पर ही नर्भर है.