13/08/08

कलर्क बाबु

यह कहानी बहुत पुरानी हे, जब हम बहुत ही छोटे थे, शायद तब की, लेकिन आज इस बिमारी के किटाणू पुरे भारत मे फ़ेल गये हे, उस समय पता नही लोग इसे बहुत बुरा समझते थे, ओर जो इस बिमारी से बिमार थे, उन्हे होश ही नही था, लेकिन इस बिमारी का अन्त जो मेने देख उसे यहां आप सब को बता रहा हु, यह कहानी बिलकुल सच्ची हे।
जब मे यही कोई १०,१२ साल का रहा हुगा, यह बात तब की हे,हमारी मोसी का घर बिलकुल ही पास मे था,ओर जब भी उन के घर कोई मेहमान आता तो हम भी उसे उसी रिश्ते से बुलाते जिस रिश्ते से मोसी के बच्चे बुलाते थे, ओर हमारे घर भी कोई मेहमान आता तो वही हिसाब मोसी के बच्चो का होता था,ओर हम कोई अमीर परिवार से नही थे, मेरे पिता जी सरकारी नोकरी करते थे,ओर मोसा की अपनी दुकान थी,ओर हमारे रिश्ते दार भी कोई हम जेसे ही थे,ओर जब भी कोई रिश्ते दार आता तो बच्चो को बहुत अच्छा लगता था, सभी मिल कर सारा दिन खेलते, इकट्ट मिल कर खाना खाते, ओर सोने भी सभी इकट्टे ही जाते, फ़िर शरारते, कुछ समय तो मुहल्ले वालो के नाक मे दम हो जाता था,ओर हम पुरा साल सोचते थे, कब सब मिले, घर मे सभी बहुत खुश रहते थे, जेसा भी बनता सब मिल जुल कर खाते थे,ओर कम जगह पर गुजारा कर लेते थे।

एक थे हमारी मोसी के रिश्ते दार, जिसे हम ने आज तक नही देखा,वो थे दिल्ली मे ही कहीं ओफ़्फ़िस मे कलर्क थे, पता नही नगर निगम मे या किसी ओर महकमे मे,उन के दो बच्चे थे, बडा लडका ओर छोटी लडकी, लेकिन यह लोग साल मे ५,६ बार आते थे, जब भी आते तो मोसा ओर मोसी को बहुत मुस्किल होती,ओर हमे भी बिलकुल मजा नही आता था,क्यो कि हम बिलकुल अकेले हो जाते थे,मोसी के बच्चे उस समय अपने आप को हम से अमीर बन जाते थे, ओर हमे गिरी हुई नजरो से देखना, उस समय तो हमे कुछ समझ मे नही आता था, ओर अगर गलती से उस समय मोसी के घर पहुच जाते तो सारे घर वाले हमे बहुत ही बुरी तरह से देखते थे, जेसे कोई भिखारी आ गया हो, ओर हमारे हाथ मे बिस्किट वगेरा पकडा कर चलता करते थे,

घर आ कर मां या पिता जी से बात करनी तो पहले तो उन्होने हमे समझाया की तुम वहां मत जाया करो जब यह लोग आये ना समझने पर ओर जिद करने पर कभी कभार मार भी सहनी पडती, फ़िर कुछ बडे हुये, तो एक दिन हम लड पडे कि सारा दिन हमारे साथ खेलते हो ओर जब यह लोग आ जाते हे तो तुम हम से बात भी नही करते, बताओ नही तो गली का कोई भी बच्चा तुमहारे साथ नही खेलेगा।ओर मोसी की लडकी भी छोटी थी तो उस ने कहा कि बह लोग बहुत अमीर हे, इस लिये वो तुम लोगो के साथ अपने बच्चो को नही खेलने देना चाहते, ओर वो खुब सारी मिठाईया, फ़ल लेकर आते हे, इस लिये हम लोग सिर्फ़ घर मे ही रहते हे,अब हमे हर बात के बारे मे पुछताश करने की बिमारी थी, सो हम ने घर जा कर पुछा कि उस के रिश्ते दार इतने अमीर केसे हे, क्यो हे, हमारे रिश्ते दार क्यो नही, पिता जी भी नोकरी करते हे, फ़िर पिता जी क्यो नही अमीर हे। मां ओर पिता जी ने हमे बहुत समझा कर खेलने भेज दिया।

एक दिन उन रिश्ते दार की बीबी मोसी के घर आई ओर काफ़ी समय तक खुब बाते हुयी, उस दिन पहली बार हमारे मां ओर पिता जी को भी बुलाया गया, ओर काफ़ी समय तक बाते हुई, ओर वह पहली बार अकेली ओर अजीब से कपडो मे आई थी, यह सब देख कर हमे भी अजीब लगा लेकिन कोई भी बताने वाला नही था, रात को जब मां ओर पिता जी घर आये तो उन की बातो से उस समय हमे यही मालुम हुया की, वह आदमी कोई गलत काम करता हे,ओर आज किसी की रिपोर्ट पर रंगे हाथो पकडा गया,ओर फ़िर यह सिलसिला काफ़ी बार हुया,काफ़ी समय बाद जब हम बडे हुये तो, हमे पता चला की जनाब दिल्ली मे किसी दफ़तर मे कलर्क हे ओर सडक पर रेहडी वालो से,दुकानदारो से,ओर पता नही किस किस से रिश्वत खाते हे, ओर बहुत सी ज्यादाद बना रखी हे, दिल्ली मे ही काफ़ी प्लाट अपने बच्चो के, हमारी मोसी के बच्चो के नाम करवा रखे हे, बहुत सा पेसा भी जमा कर रखा हे।

हमे तो पहले भी इन साहब से कोई वास्ता ना था, इस लिये जब हम यहां आ गये तो एक तरह से इन जनाब को ओर इनके परिवार को भुल गये,एक बार जब हम भारत घर पर आये ओर पुरानी फ़ोटो देख रहे थे, तो एक फ़ोटो मे उन की लडकी की फ़ोटो देख कर हम ने उन साहिब के बारे पुछा, उस समय मोसी भी वहा थी, मेने कहा मोसी से कि इन साहब ने तो खुब धन जमा किया हे। अब तो ऎश कर रहे होगे,तो मोसी ने कहा कि नही वो तो एक एक रोटी के लिये तरस रहे हे। ओर मां ने मुझे चुप रहने का इशारा किया तो मेने भी बात आगे नही की,

बाद मे मां ने बताया की, जितने प्लाट इन के रिश्ते दार ने इन के बच्चो के नाम किये थे, ओर बेंक मे पेसा जमा किया था, वह सब तो इन के बच्चे खा गये, फ़िर उसने अपनी लडकी की शादी जहा कि ओर काला धन छुपाने के लिये काफ़ी धन लडकी के नाम किया अब लडकी ने भी देने से मना कर दिया, लडका भी निकमा निकला। घर का सत्यानाश कर दिया, ओर रिश्ते दार कॊ शराब पीने की आदत हे, पहले तो मुफ़त की किल जाती थी, अब कहा से पीये। ओर पहले वाले दुकान दार अब मुह पर गालिया देते हे।घर मे बार बार छापे पडने से आसपडोस भी नही बुलाता, रिश्ते नाते तो इस ने पहले ही खतम कर दिये थे। ओर अब सारा दिन अकेला रहता हे, ओर एक एक रोटी को भी तरस्ता हे, फ़िर पिता जी ने कहा की थोडी खा लो उसी मे इज्जत हे शान्ति हे,लेकिन ईमान दारी का खाओ.

ओर मे काफ़ी दिनो तक उस अन्देखे रिश्तेदार के बारे सोचता रहा, ओर मे यही कहना चाहता हु कि क्यो हम गलत ढग से पेसा कमाना चाहते हे, दुसरो को दुखी कर के क्या हम सुखी रह सकते हें
क्या आप ने भी देखे हे ऎसे केस तो जरुर लिखे, ताकि हम सब कि आंखे खुले, ओर हम मे इंसानियत आये।
शब्दो मे या कोई अन्य गलती हो तो जरुर बताये, धन्यवाद

13 comments:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

धन्यवाद भाटिया जी, बहुत अच्छी प्रस्तुति है - और आँखें खोलने वाली भी. काश ऐसे लोगों को समय पर सद्बुद्धि आ जाए और पाप करने से पहले ही सुधर जाएँ.

Anil Pusadkar said...

koi galti nahi sir jee short-cut ke daur me ye aankhen kholne waala aur sahi rah dikhlaane waala kissa hai.badhai aapko

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

आपके पिताजी ने बिल्कुल सही कहा है "थोड़ी खाओ मगर ईमानदारी की खाओ"

Birds Watching Group Ratlam (M.P.) said...

jabardast dhondh kar laaye ho janaab.

majaa aaya padhkar

vaise bhi raiis to babu hi hai kyoki sabhi to unhe hi karnaa hai adhikaari to sirf chidiya baithane tak simit hain

रश्मि प्रभा said...

bahut sahi tasweer pesh ki hai aapne,par hosh kaha rahta hai kisi ko,paisa bolta jata hai,
bahut badhiyaa

अनुराग said...

अब ऐसा नही होता भाटिया जी....सब सेटिंग हो गई है....अब बच्चे ऐ.सी कारो से उतरते है ,दूसरो को कुचलते है फ़िर छूट जाते है उनके बदले उनका ड्राईवर गुनाह कबूलता है....वे कसम खाते है आगे से दो पैग लेकर गाड़ी चलायेगे ....

जितेन्द़ भगत said...

जब दुनि‍या की तरफ देखता हूँ तो लगता है, इतने कम में गुजारा कैसे होगा। फि‍र उन्‍हें देखता हूँ जो मुझसे भी ज्‍यादा मुश्‍ि‍कल में हैं। तब लगता है, जीने के लि‍ए शांति‍ चाहि‍ए जो इमानदारी में ही बसती है,ज्‍यादा पाने की ति‍कड़म मुझे आती भी नहीं।
आपके लेख में इसी ईमानदारी की इज्‍जत है।

P. C. Rampuria said...

भाई यूँ तो पूरे कुए मैं ही भांग पडी सै ?
पर इब भी इमानदारों का टोटा नही सै !
बेईमानी की नाव पार ना लाग्या करती !
कोई करके देखल्यो ! बहुत सुंदर प्रसंग सै
यो तो ! आप तो ऐसे ही प्रेरणा दाई लेख
लिखते रहो ! धन्यवाद !

सुनीता शानू said...

बहुत दिन बाद पढा आपको...कहानी बहुत अच्छी लगी, सब कुछ इमानदारी से बयान किया गया है...

Ila's world, in and out said...

राज भाई,मैं भी ऐसे एक परिवार को जानती हूं,जिस के मुखिया उत्तर प्रदेश के सिंचाई विभाग में असिस्टेंट एन्जीनियर थे.उनके घर की शानो-शौकत को देख के मैं हैरान रह जाती थी,घर में आठ कुत्ते,चार नौकर,विदेश में पढ रहे दो बच्चे,ढेर सारी खरीदारी सरकारी तन्ख्वाह से नहीं ऊपरी कमाई से होती थी.एक दिन ईश्वर की लाठी ऐसी बरसी,कि वो चानक हार्ट फ़े्लियर से मर गये और उनके बच्चे अधूरी पढाई छोड कर वापस आ गये और उनके जीवन यापन के लाले पडे हुए हैं.
आपकी कहानी इस सच्ची कहानी से कितनी मिलती जुलती है.आदमी इतनी हाय तौबा कर के गलत ढंग से पैसे कमाता है किन्तु उसे सुख चैन नसीब कभी भी नहीं हो सकता.

Udan Tashtari said...

"थोड़ी खाओ मगर ईमानदारी की खाओ"

ब्रह्म वाक्य.

बहुत अच्छा लगा आपको पढ़कर. आभार.

राज भाटिय़ा said...

आप सभी का धन्यवाद

Advocate Rashmi saurana said...

राज जी मैं आपको बहुत दिन से कहना चाहती थी कि आप मात्राओं की गलती बहुत करते है. अगर आप इन छोटी बातों का ध्यान रखेगे तो आपकी लिखावट बहुत ही प्रभावित लगेगी. आज आपने पूछा इसलिए बता रही हूँ. अब तक इसलिए नहीं कहा क्योंकि मुझे लगता था की आपको बुरा न लग जाए. मैं उम्र और तजुर्बे में बहुत छोटी हूँ. क्षमा कीजियेगा.कहानी बहुत बढ़िया है. लिखते रहे.