05/07/08

चिंतन अहंकार

हम सभी कोई भी काम करे उस मे अहंकार भरपुर होता हे यानि मॆ, ओर इस मॆ मे ही अहंकार भरा हे, चाहे हम कोई दान करे, धर्मिक कार्य करे सब मे हमारा अहंकार होता हे, आज का विचार इस अहंकार पर....

कुरुक्षेत्र युद्ध में विजय पाने की खुशी में पांडवों ने राजसूय यज्ञ किया। दूर-दूर से हजारों लोग आए। बड़े पैमाने पर दान दिया गया। यज्ञ समाप्त होने पर चारों तरफ पांडवों की जय-जयकार हो रही थी। तभी एक नेवला आया। उसका आधा शरीर सुनहरा था और आधा भूरा। वह यज्ञ भूमि पर इधर-उधर लोटने लगा। उसने कहा, 'तुम लोग झूठ कहते हो कि इससे वैभवशाली यज्ञ कभी नहीं हुआ। यह यज्ञ तो कुछ भी नहीं है।' लोगों ने कहा, 'क्या कहते हो, ऐसा महान यज्ञ तो आज तक संसार में हुआ ही नहीं'

नेवले ने कहा, 'यज्ञ तो वह था जहां लोटने से मेरा आधा शरीर सुनहरा हो गया था।' लोगों के पूछने पर उसने बताया, 'एक गांव में एक गरीब ब्राह्मण अपनी पत्नी, पुत्र और पुत्रवधू के साथ रहता था। कथा कहने से जो थोड़ा बहुत मिलता था, उसी में सब मिल जुल कर खाते थे। एक बार वहां अकाल पड़ गया। कई दिन तक परिवार में किसी को अन्न नहीं मिला। कुछ दिनों बाद उसके घर में कुछ आटा आया। ब्राह्मणी ने उसकी रोटी बनाई और खाने के लिए उसे चार भागों में बांटा। किंतु जैसे ही वे भोजन करने बैठे, दरवाजे पर एक अतिथि आ गया। ब्राह्मण ने अपने हिस्से की रोटी अतिथि के सामने रख दी, मगर उसे खाने के बाद भी अतिथि की भूख नहीं मिटी। तब ब्राह्मणी ने अपने हिस्से की रोटी उसे दे दी। इससे भी उसका पेट नहीं भरा तो बेटे और पुत्रवधू ने भी अपने-अपने हिस्से की रोटी दे दी। अतिथि सारी रोटी खाकर आशीष देता हुआ चला गया। उस रात भी वे चारों भूखे रह गए। उस अन्न के कुछ कण जमीन पर गिरे पड़े थे। मैं उन कणों पर लोटने लगा तो जहां तक मेरे शरीर से उन कणों का स्पर्श हुआ, मेरा शरीर सुनहरा हो गया। तब से मैं सारी दुनिया में घूमता फिरता हूं कि वैसा ही यज्ञ कहीं और हो, लेकिन वैसा कहीं देखने को नहीं मिला इसलिए मेरा आधा शरीर आज तक भूरा ही रह गया है।' उसका आशय समझ युधिष्ठिर लज्जित हो गए।

11 comments:

praney ! said...

Balya kaal mein Amar Chitra Katha mein sachitr yeh katha padhi the. Punna Samaran karwane ka hardik dhanyawad.

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

हमेशा की तरह एक प्रेरणास्पद पोस्ट..

महेंद्र मिश्रा said...

saty.prerak kathan abhaar.

दिनेशराय द्विवेदी said...

खुद से अधिक जरूरतमंद के लिए अपनी आवश्यकता का त्याग सबसे बड़ा बलिदान और पुण्य है।

DR.ANURAG said...

कहते रहिये ........

सतीश पंचम said...

बचपन में सुना था, आज फिर याद दिला दिया आपने, धन्यवाद.....

Suresh Gupta said...

कितनी सही बात है. जरा सा कोई अच्छा काम हो जाता हे हमसे बस हम एहंकार से फूल जाते हैं.

अभिषेक ओझा said...

prerak katha !

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

प्रेरक कहानी है, पढ कर अच्छा लगा।

महामंत्री-तस्लीम said...

बहुत ही सुन्दर कथा है।

राज भाटिय़ा said...

आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद,