04/07/08

भारत यात्रा ७

नमस्कार...
आज मई की २५ तारीख हे, ओर आज पिता जी की तेरहवी ओर पगडी रस्म थी,हम सब सुबह बहुत जल्दी उठे, सभी सुबह सुबह नहा लिये फ़िर पडिंत जी आये ओर उन्होने हवन किया ओर सभी रस्मे पुरी कर के पिण्ड दान किया, यानि जो जो समान एक व्यक्ति को रोजाना चहिये वह सब पडिंत जी को दान मे दिया, फ़िर सुबह सुबह सब ने नास्ता किया, ओर फ़िर हलवाई भी आ गया, यहां पर मेने किसी को काम नही सोपा था*, ओर जो जो समान हलवाई मागंते रहे हम देते रहे कभी कोई दे देता कभी कोई, मेने उन से कह दिया था हमे ठीक १२ बजे खाना तेयार चाहिये.
ओर अब धीरे धीरे हमारे खान दान के लोग भी आना शुरु हो गये थे काफ़ी लोग तो रात मे ही आ गये थे पंजाब से आने वाले, बाकी जो दिल्ली या दिल्ली के आस पास रहते थे वह भी आने शुरु हो गये थे, भाई या उस की वीवी किसी को भी नही जानते थे, इस कारण मुझे हर समय वही रुकना पडा, फ़िर मेने भाई ओर उसके परिवार से सभी को मिलवाया , करीब करीब ११ बजे तक सभी जान पह्चान वाले ओर रिश्तेदार आ गये थे
अब सुईया धीरे धीरे १२ की ओर जा रही थी, बीच बीच मे मॆ हलवाईयो को भी हिदायत दे देता था ठीक समय पर खाना तेयार हो गया, ओर मेज पर लग गया, मेने सभी से हाथ जोड कर खाने के लिये निवेदन किया, ओर सही समय पर खाना हो गया, यहां कई गलतियां हुई, एक तो भाई ने पलेट गलत ली जिस के कारण लोगो को बहुत असुबिधा हुई, चम्मच भी काफ़ी छोटे , फ़िर काफ़ी समान हलवाईयोको मिला ही नही, जेसे हरी सब्जिया, सालाद वगेरा वगेरा , ओर मेरे पास समय यहा बिलकुल नही था सभी तरफ़ धयान देना पड रहा था, वेयरा वगेरा हमने नही रखे थे सभी मिलजुल कर काम कर रहे थे, कुछ कमियो के वावजुद सभी काम ठीक से हुये, करीब २ बजे तक खाना भी हो गया, हम ने पगडी रास्म का समय २,३० का रखा था, मुझे तो भुख ही नही थी, पता नही सब को खिलाते खिलाते पेट भर गया या फ़िर उदासी के कारण ??? पता नही दिल मे अजीब से सवाल उठ रहे थे,बाते बहुत थी सुनने वाला कोई नही था, सवाल बहुत थे जवाव देने वाला कोई नही था, अभी भी सभी सवाल दिल मे ही कुलबुला रहे हे वीवी से भी पुछता हु तो वो भी बेचारी मेरी तरह से क्या जवाव दे....
अब ठीक २,३० बज गये ओर पडिंत जी ने पगडी रस्म शुरु की, मुझे तो सिर्फ़ पुराने लोग ही जानते थे, सो पडिंत जी भी मुझे शायद नही जानते थे,फ़िर रस्म शुरु हुई,ओर पता नही कोन कया क्या बोलता रहा मे अपनी ही धुन मे रमा पिता जी के बारे सोचता रहा,रो तो नही पाया लेकिन आखंओ मे आंसू भरे थे ओर दिल अन्दर ही अन्दर रो रहा था, ओर पुछ रहा था उस भगवान से तुम ने इन्सान को ऎसा मतलबी क्यो बनाया हे जो जिन्दा इन्सान की तो इज्जत नही करता मरने पर यह सब दिखावा क्यो, लेकिन मुझे मालूम था यहां मेरे सवालो का जवाव किसी के पास नही, सब रस्मे करने के बाद मेरे ओर भाई के सिर पर पगडी बाधी गई, मे अपने आसूओ को बडी मुस्किल से रोक पा रहा था, फ़िर दोद्नो भाईयो ने दरवाजे पर खडे हो कर सभी मेहमानो को हाथ जोड कर उन के आने का धन्यवाद किया, कई बुजुर्गो ने सिर पर हाथ रखा, ओर मे सिर झुका कर अपने आंसुओ को पीता रहा सब से मुस्किल समय मेरे लिये यही था,
फ़िर हमारे पजाबियो मे मां को कुछ देना होता हे, मेने ओर भाई ने अपनी समर्था के अनुसार दिया ओर बाकी रिस्तेदारो ने भी दिया, मेरे हिसाब से यह रस्म इस लिये बनी हे की कोई भी अपने आप को बेसाहारा ना समझे, ओर फ़िर सब ने चाय वगेरा पी ओर धीरे धीरे सब जाने लगे, पंजाब वाले भी आधे चले गये, मेने फ़ुफ़ा जी को दो दिन ओर रुकने को कहा,आज मां भी काफ़ी उदास थी,
दुसरे दिन शुधि करण की रस्म ओर निभानी थी, मेने कहा था कि पडिंत जी को सुबह सुबह ६,०० बजे बुला लो फ़िर हम ९,०० बजे तक फ़्रि हो जाये गे, लेकिन भाई ओर उस की वीवी बोले नही पडिंत जी को ९ बजे बुलाये गे, ओर पडिंत जी को दुसरे दिन ९ बजे बुला लिया, लेकिन सभी तेयारी सुबह ६ बजे तक हो गई, भाई बोला मे पडित जी को बुला लाता हू, तो पडिंत जी आये १०,३० पर ओर दोपहर के २,०० बजे तक काम निपटे, भाई ओर उस की वीबी बोले भाई आप का कहना मान लेते तो अच्छा था,
फ़िर पाचं पडितो को खाना खिलाना था, मेने कहा अब इन पाचं पडितो को केसे ढुडॆ? तो यह काम भी हमारे पडित जी ने कर दिया... वाप रे उन पाचं पडितो का खाना देख कर मे हेरान रह गया, आज तक मेने किताबॊ मे ही पडा था, फ़िर बाद मे हम ने खाना खाया.कई गलतिया मेरे से हो जाती हे लिखने मे आप सब माफ़ करे.
आख्ररी भाग कल...

5 comments:

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

जिन्दा इन्सान की तो इज्जत नही करता मरने पर यह सब दिखावा क्यो
यही तो विडंबना है.. बहुत सारी कड़वी सच्चाइया दिखाई है आपने अपने संस्मरण में

DR.ANURAG said...

राज जी कई बार हम कुछ रीती रवाज शायद जीवित लोगो की खुशी या समाज के लिये करते है.....आपके दुःख को समझना मुश्किल है बस हम आपको सांत्वना दे सकते है....पंडितो के लिये ये एक ऐसा ही व्यसवाय है जैसा हमारे आपके लिये अपने अपने...आज की भाग दौड़ भरी जिंदगी में इन्सान शायद मृत व्यक्तियों को भी इतना समय नही दे पाता ..तो जीते की बात दूर की बात है....शायद द्रिवेदी जी कुछ दिन पहले इन्ही रीती रवाजो पर कुछ लेख लिखे थे....

श्रद्धा जैन said...

विडंबना है..
हमारे रीति रिवाज़
बढ़ों की सेवा करो और उनका साथ दो जब उन्हे ज़रूरत है सहारे की ये पुनय है मगर इन रीति रिवाज़ों में फंसकर हम सब कई बार ढोंगी पंडितों के चंगुल में फँस जाते हैं
अपनो के खोने का दुख क्या है ये समझ सकता है जिसने खोया हो
बाकी तो लोग बस दिखावा ही करने आते हैं

राज भाटिय़ा said...

आप सभी का धन्यवाद.

सतीश सक्सेना said...

उच्चारण मंत्रों का अशुद्ध ,
कर अपने को पंडित माने।
मांगलिक समय पर श्राद्धमंत्र
मारण पर मंगलगान करें ,
संस्कृत का का खा गा न पढ़ा ,
व्याकरण तत्व का ज्ञान नहीं!
ऐसे पंडित कुलगुरु बना,
क्यों लोग मनाते दीवाली ?