02/07/08

भारत यात्रा ५

नमस्कार...
तो हम हरिद्वार मे गलियो से होते हुये उस घाट की तरफ़ जा रहे थे, जहा अस्थिया गगां मैया मे प्र्भावित करनी थी,मामा के लडके ने एक तरफ़ कार पार्किग के लिये कहा ओ मदन जी ने वही कार पार्किग की, हम सब बाहिर उतरे, तभी एक महाशय़ हमारे पास आये ओर बहुत कुछ पुछने लगे, मुझे भी अब करीब ८,९ दिन हो गये थे भारत मे आये, ओर मे भी फ़टा फ़ट समझने लगा था, मेरा छोटा भाई हे तो ४२,४३ साल का लेकिन उसे अपने खान दान के बारे कुछ नही मालुम यह मेने हरिद्वार मे जा कर मह्सुस किया, जब बह आदमी कई सवाल पुछने लगा तो मे झट से आगे आया ओर उसे सही ढगं से जबाब दिये, फ़िर वो चला गया, घाट पर जाते ही एक व्यक्ति वोला आईये भाटिया साहिब ओर मे समझ गया जहा पर सब गोल माल हे, उसने कुछ मन्त्र वगेरा पढे ओर अपनी दक्षिणा ली फ़िर एक आदमी ओर आया उसने आस्थिया गगां मे बहाने को कहा ओर कुछ दक्षिण उसने भी ली, मेने देखा भाई तो भाई मामा का लडका भी मेरे जेसा सीधा हे, तो हम सब ने सलाह की कि अगली बार हम चुस्त रहे गे, यहा जो हुया सो हुया.

फ़िर हम कार की तरफ़ बढने लगे, तभी एक साईकल सवार से मे टकरा गया, ओर मेने उससे माफ़ी मांगी, तो जेसे भगवान ने उसे भेजा हो, बेटा तुम किस काम से यहा हरिद्वार आये हो, मेने कहा की पिता जी कि अस्थिया लेकर आये हे, फ़िर उसने हमारे खानदान के बारे, गाव के बारे, जात, गोत्र सब पुछा ओर मेने उन्हे सब सही सही बताया, तो बोले आप किसी के गलत हाथो मे मत पडना, आप का पंडित इस स्थान पर हे, ओर उस का यह नाम हे, मेने उन्हे फ़िर से धन्यावाद कहा ओर पुछा अब आप की क्या सेवा करे, आप ने इतनी अच्छी जान कारी हमे दी हे, तो बुजुर्ग बोले बस मेरे लिये इतनी ही प्राथना करना भगवान से कि मे अपने बच्चो के साथ ऎसे ही सुखी रहु जेसे आज तक रहा, मेने दोनो हाथॊ से उन्हे प्राणाम किया ओर कहा आप ने तो आधुनिक Computers को भी फ़ेल कर दिया.

वहां से हम गगां का पुल पार करके दुसरी तरफ़ गये, ओर फ़िर कार ओर मदन जी को वही छोड कर हम हर की पोडी से शहर मे गये, वहां पडित जी मिले, जब पडिंत जी ने मेरे पुरे खानदान के बारे बताया, मेरे दादा ओर ताऊ के नाम तो मुझे पुरा यकीन हुया की हम सही जगह पहुच गये हे, लेकिन पडिंत जी ने कहा की दसवी से पहले पनिंड दान नही होता, हां अगर आप चाहो तो मे करवा देता हु, लेकिन जब आप सभी काम सही कर रहे हे तो पिंड दान दसवी के बाद ही करे, तो हम ने पुछा क्या पिंड दान हरिद्वार मे ही करना होगा, तो पडिंत जी ने कहा नही आप जहा रहते हे वहा पर भी पडिंत कर सकता हे, हा अस्थिया ३ दिन के बाद कभी भी प्र्वाह कर सकते हे, फ़िर पंडित जी को दक्षिणा दे कर हम वपिस चल पढे, हां यहा भिखारी बहुत ही ज्यादा थे मेने कई बार पेसे खुले करवाये लेकिन हर बार २ मिन्ट मे खतम एक भिखारी ने तो हमारी कार मे वापिस पेसे फ़ेक दिये, अगर किसी को ,००५०या १ रुपया दो तो वह नाक भो चडाते थे, फ़िर हम लोग गगां के घाट पर पहुचे, गरमी बहुत थी, फ़िर गगां घाट शायद हर की पोडी थी, वहा गऎ, दिल तो करता था,कि कपडे उतार कर गगां मे डुबकीया लगाता रहु, लेकिन यहा गगां के बारे पढ कर नहाने की हिम्मत नही हुई, भाई ओर उस का लडका खुब नहाए,भाई अपना नहा रहा था, उस के बेटे को मे एक हाथ से पकड कर डुबकीया लगवा रहा था, तभी एक स्त्रि शायद डुबने लगी या कुछ ऎसा ही हुआ ओर घबरा कर पानी से दोनो हाथ बाहर निकाल कर मदद के लिये चिल्लने लगी, मेने लडके को खीच कर एक दम से किनारे किया ओर काफ़ी आगे जा कर उसे आवाज दी की आप घवराये नही मेरा हाथ पकड कर बाहिर आ जाये, लेकिन तब तक वह समभल चुकी थी, वेसे मेने भाई ओर उस के लडके को कह दिया था तुम मजे से नहाओ, तुम्हे डुबने नही दुगां.
(मुझे हरिद्वार ओर आस पास बहुत अच्छा लगा २००९ मे जब भी आया एक सप्ताह यहां जरुर बिताउगा) मेरे ताउ जी का बडा लडका अपने पिता जी की आस्थिया यहां लाया था, कुछ पखाडियो के हाथ लग गया ओर वापिस घर तक जाने का किराया भी उस के पास नही बच्चा था, ओर अपने पडिंत के पास भी नही पहुचा,क्योकि जब पडिंत जी हमे बता रहे थे हमारे खानदान के बारे तो मे बडे ध्यान से सुन रहा था,ओर फ़िर मेने भाई को फ़ोन पर पुछा तो उसने सारी बात बताई.
फ़िर वहा से निकल कर दोनो ने कपडे पहने ओर कार की ओर चल पडे, मेने खरीदा कुछ भी नही, ओर फ़िर वहा से कार की ओर चल पडे,मेने मदन भाई से पुछा आप कॊ भुख तो नही लगी,अगर लगी हे तो यही कुछ खा लो वरना रास्ते मे ही कही रोक लेना, फ़िर भाई ओर बच्चे से भी पुछा मामा के लडके ने भी कहा अभी भुख नही हे, फ़िर वहा से हम घर की ओर चल पडे,रास्ते मे दोपहर का खाना खाया, फ़िर आगे चल पडे,

मदन भाई बोले गोहाना मे एक जलेबी की दुकान हे जो पुरे हरियाणा मे मशहुर हे,मे समझ गया की मदन भाई का दिल जलेबी खाने के लिये हे,लेकिन कया अच्छा लगता हे पिता की अस्थिया वहा कर आये ओर जलेबिया खा रहे हे, लेकिन मेने कहा मदन भाई जब गोहाना आये तो चाय पीने उस जलेबी वाले की दुकान पर कार रोक लेना, साथ ही बच्चे को बोला अगर घर जा कर किसी को बोला कि हम ने जलेबी खाई तो कभी भी साथ नही लाउगां,मेने १ किलो जलेबी ली लेकिन एक किलो जलेबी हम सब के लिये ज्यादा थी अब आधी जेलेबी बच गई क्या करे,अब इसे घर ले जाये तो बुरा लगता, फ़ेकंने कॊ दिल नही करता था, तो मेने कहा झुट बोला जाये, ओर सब ने मिल कर सलाह बनाई की हम कहे गे यह प्रसाद हे,फ़िर सभी घर पहुच गये, ओर जलेबियो का प्रसाद सब ने खाया,घर मे सब ने पुछा तुम गगां मे क्यो नही नहाये तो मेने कहा गगां मईया गन्दी ना हो जाती मेरे जेसे पापी के नहाने से, बस मे यु ही नही नहाया, दिल बहुत उदास हो गया था, मे सोता उसी कमरे मे था जहां पिता जी ने अखारी स्वास छोडे थे, फ़िर घर आ कर भी आराम कहा अब क्रिया कर्म के लिये समान लाना था, वह रिश्ते दार तो सुबह सुबह नाश्ता कर के भाग गया था,
तो मेने भाई से कहा कि पहले हम कल के काम बाटं लेते हे, फ़िर आधे काम तुम करो ओर आधे काम मे करुगा, ओर समय से सभी काम पुरे हो जाये तो थी हे,बाद मे कोई कमी होगी तो पुरी कर सकते हे, दुसरे दिन मे हर रोज की तरह से सुबह ५,०० बजे उठ गया, ओर एक घण्टा बाहर घुमा, फ़िर धीरे धीरे सभी जाग गये,
शेष कल...

7 comments:

अभिषेक ओझा said...

ये अच्छा रहा की आप पाखंडियों के चक्कर में नहीं पड़े... नहीं तो इनसे बचना इतना आसन नहीं.

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

बस पढ़ रहे है आपको.. मैं समझ गया था पहले ही की वो रिश्तेदार महोदय अपनी ज़िम्मेदारी बखूबी निभाएँगे.. और उन्होने निभाई भी कम से कम नाश्ते तक तो रुके..

praney ! said...

lagataar pancho kram padne se laga ki aap ke saath he ghoom raha hoon, Teen varsh pahle isi anubhav se gujra hoon, pahle bhi bhoola nahin tha parntu aap ki post pad akshhar sha samaran ho aaya.

mehek said...

ttpganga ghat ka anubhav padhkar achha laga,aage ka intazaar rahega

Udan Tashtari said...

इन पंडो से बड़ी परेशानी होती है इन सब जगहों पर. जलेबी का प्रसाद भी खूब रहा. आगे जारी रहिये.

महामंत्री-तस्लीम said...

आपका यात्रा वृत्तान्त रोचक एवं आकर्षक है। इसी बहाने बहुत कुछ जानने को मिल रहा है।

राज भाटिय़ा said...

आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद.