28/06/08

नमस्कार नमस्ते सलाम आप सब को

मेरी भारत यात्रा १६-०५-०८ से २९-०५-०८
मुझे अचानक कुछ दिनो के लिये भारत आना पडा,जिस कारण आना पडा वो तो आप सब को मालुम ही हे, लेकिन अपनी जिन्दगी मे ( शादी ) के बाद पहली बार अकेला भारत आया, मे आप सब से अपने इन १० १५ दिनो की सभी बाते बांटुगा, लेकिन सिर्फ़ अच्छी बाते ही, मेने इन १० १५ दिनो मे जिन्दगी को जितना करीब से देखा,शायद अगर परिवार के साथ आता तो ना देख पाता, मुझे बहुत से अच्छे लोग मिले, काफ़ी लोग ऎसे भी मिले जिन्हे देख कर मे हेरान रह गया, ओर आज की पीढी पर शर्मिदा भी हुया, ओर बस देखता रह गया......तो चलिये आप को अपनी भारत यात्रा पर ले चलते हे....
१५मई को मुझे ५,०० बजे सुबह ही भाई का फ़ोन आया ओर मे काफ़ी विचलित सा हो गया ओर सोचा काश मेरे पर होते,उस के बाद मे सो नही पाया, फ़िर दफ़्तर गया वहा भी दिल नही लगा, तो वपिस आ गया ओर फ़िर ९,०० बजे के करीब Internet पर भारत के लिये जल्द से जल्द टिकट डुंडने लगा, ओर जल्द ही मुझे शाम की टिकट मिल गई. ओर बीबी ने झट्पट से मेरे लिये एक बडी अटेची तेयार कर दी, उस बडी
अटेची मे एक छोटी अटेची थी जिस मे मेरे पहनने के कपडे ओर अन्य सामान बीबी ने पे कर दिया था, ओर शाम को ६,०० बजे मेरा दोस्त मुझे एयर पोर्ट छोडने आया, मेने बच्चो ओर बीबी से जिन्दगी मे पहली बार अलग होने का कारण महसुस किया.
सही वक्त पर मेरी फ़्लाईट दिल्ली पहुच गई, ओर हम जल्द ही बहिर आ गये, बाप रे कितनी गर्मी.... मेने एक कोने मे जा कर टी शर्ट पहनी ओर कोट ओर कमीज को पेक किया, मुझे मालुम था मुझे कोई लेने भी नही आया होगा, ऎसा पहली बार हो रहा था मेरे साथ, सो मेने पहले सोचा की रोहतक के लिये यहां से ही टेक्सी पकड लु, लेकिन अन्दर ही अन्दर डर रहा था, मुझे किसी ने बताया था, एयर पोर्ट से सीधी बस मिलती हे बस आड्डे के लिये, लेकिन वहां कोई बस नही थी, तभी मेने देखा कुछ लोग एक जगह खडे हे, पता करने पर पता चला की यहा से टेक्सी मिलती हे दिल्ली के लिये, मे भी लाईन मे लग गया, थोडी सी देर मे मेरा नम्बर आ गया,मेने हिन्दी मे उसे बस अड्डे के लिये टेक्सी के लिये कहा, तो भाई साहिब बहुत तेजी से बोले ३२०.. मेरे बार बार पुछने पर फ़िर झाला कर बोले जी आप ३२० रुपये दे,मेने पेसे दिये तो एक कागज मुझे थमा दिया, शायद झट से टेक्सी का नम्बर भी बोले लेकिन मुझे कुछ समझ नही आया,वह कागज ले कर मे थोडा आगे आया ओर जो भी पहली टेक्सी दिखी उसे कागज थमा दिया, वह भाई भी झट से ५६५४ बोले मेने फ़िर पुछा भाई कया तो बोले ५६५४, मेरी समझ मे कुछ नही आया, मेने कहा भाई सहिब माफ़ करे आप थोडा आराम से ओर धीरे धीरे समझाये तो मे समझ सकता हू, आप की मेहरबानी होगी, ओर मे माफ़ी चाहता हू आप का समय खराब करने के लिये, अब उन सज्जन को पता नही कया हुया झट से मेरा समान लिया ओर दुर खडी टेक्सी तक मुझे मेरे समान समेत ले गये, ओर टेक्सी बाले को बोले साहिब को ले जायो,उस टेक्सी वाले ने वह कागज लिया, मेरा अटेची अपनी कार मे रखा ओर फ़िर मे बेठा ओर चल पढे, ओर तभी मुझे धयान आया अरे मेरे सारे पेसे तो मेरी टी शर्ट की उपर वाली जेब मे पडे हे, अब कया करु, अगर इस से बच गया तो बस अड्डॆ पर जेब जरुर कट जाये गी.
काफ़ी समय बाद हम बस अड्डे पर पहुच गये, उस आदमी ने मेरा समान कार से उतारा ओर खडा हो गया मे जल्दी से वहां से भागा, ओर इस अफ़रदफ़री मे उसे टिप भी नही दे, प्यास ए मारे मेरा बुरा हाल था,अभी तो ९,०० भी नही बजे थे, बाप रे अभी से इतनी गरमी, तभी मेरी नजर एक स्टाल पर पडी, मेने उसे कहा भाई साहिब एक पानी की सब से ठण्डी बोतल दो, ओर उसे ५० रुपये का नोट दे दिया( ४०, ४५ हजार रुपये पिछली बार साथ ले आया था वोही काम आ रहे थे ) १२ रुपये की एक बोतल थी,अब भाई के पास खुले पेसे नही थे, वो खुले लेने चला गया किसी ने उसे नही दिये तो वापिस आ कर मुझे ४० वापिस किये, मेने कहा आप ५ का नोट रख लो लेकिन उस के पास १० का खुला भी नही था,तो मेने २ का उधार किया,फ़िर पुछता पुछता रोहतक वाली बस तक पहुचा, वहा काफ़ी लोग चिल्ला रहे थे रोहतक वाले,भिवानी हिसार बाले उस बस मे बेठे, मे थोडी देर तो अपनी पसंद की बस देखता रहा, फ़िर जो पसंद आई उस की टिकट लेने लगा तो उस ने बिठाने से मना कर दिया, फ़िर दुसरी पे गया उस ने भी मना कर दिया, फ़िर कया था कभी यह मना करे कभी वो, फ़िर सब ने मना कर दिया, मेने कहा भाईयो आप मेरे से दो टिकट के पेसे लेलो, जहां तक आप की बस जाये गी वहां तक की टिकट दे दो.. लेकिन कोई तेयार नही, फ़िर मे बहुत जोर से चिल्लाया ओर पुछा सब को बिठा रहे हो मुझे क्यो नही बिठा रहे, तो एक आदमी ने कहा जनाब आप की अटेची के कारण आप को कोई नही बिठा रहा,फ़िर मुझे याद आया टेक्सी वाला जिस ने मुझे अपना नम्बर दिया था, लेकिन मेने भी जिद पकड्ली की आज जाउगा तो बस से ही ओर समाने खडी बस मे घुस गया, टिकट देने वाला आया ओर कुछ बोला मेने उसे कहा जो करना हे करो मुझे रोहतक से पहले उतार कर दिखाओ,अगर नही लेजाना तो बस को पुलिस स्टेशन पर ले जायो.ओर खबर दार मुझे या मेरे समान को हाथ लगाया, तभी १० मिन्ट मे हमारी बस चल पडी, उस ने मेरे से दो टिकट के पेसे लिये, ओर एक टिकट दिया, ओर हा उस दस मिन्ट मे कभी कोई तो कभी कोई समान बेचने आता रहा,फ़िर वो टिकट कन्डेकट्र मेरे पास बेठा रहा, फ़िर कई ओर लोग भी मेरे साथ सफ़र मे साथ वाली सीट पर आते रहे , मे चुप चाप रहा...
रास्ते की बाते कल........

7 comments:

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

भाटिया जी आपको इतने दिनो बाद यहा देखकर अच्छा लगा.. आपका यात्रा वृतांत ज़रूर सुनेंगे..

दिनेशराय द्विवेदी said...

सिर्फ़ अच्छी बाते ही,
तो खराब बातें कौन सी होंगी?
आप थोड़ा जल्दी जल्दी आएंगे तो भारत समझ आ जाएगा। फिर तकलीफ न होगी।

DR.ANURAG said...

आप आये दिल को सकूँ मिला.......जाने दे सबको राज जी ....इस देश में सब चलता है......अब आप लिखते रहे....आप को देखकर दिल बहुत खुश हुआ है.......

mehek said...

sir ji,ye bhi to aapka hi desh hai:),aur kabhi aap bhi yaha rehte thay,so sab halat se vakif hi honge;),swagat hai.

Udan Tashtari said...

आ गये आप वापस ब्लॉगजगत में. अच्छा किया, मन भी बहल जायेगा. लिखिये, शुभकामनायें.

रंजू ranju said...

रोहतक ..बहुत कुछ याद आ गया इसको पढ़ कर ..सही तस्वीर खिंची है आपने लफ्जों से .पर यही अपना प्यारा देश है और रोहतक हरियाणा तो दिल से जुडा है मेरे भी ..:)सो अच्छा लगता है इस तरह भी आना जाना ..:)

राज भाटिय़ा said...

आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद