29/04/08

जब नाना के घर चोर घुसा

यह बात शुरु करने से पहले बता दू मे कोई लेखक या पत्रकार नही, इस लिये मेरी गलतियो को नजर अन्दांज करे, ओर सुधारने मे मदद करे, धन्यवाद
बात बहुत पुरानी हे,यह बात हमारी ममी हमे सुनाया करती थी,शायद जब वो छोटी होगी तब की, मेरे मां बाप पंजाब मे गावं मे रहते थे शादी से पहले यह तभी की बात हे, उन दिनो गावं मे बिजली नही होती थी,शाम (सध्यां ) को दीपक ओर लालटेन से काम चलता था, ओर आदमी लोग सिर पर पगंडी पहनते थे (हिन्दु भी हम भी हिन्दु हे ) एक सध्या को नाना जी घर आये, उस समय घर पर कोई नही था,(उन दिनो घरो मे ताला लगाना अपसुकुन समझा जाता था ) तो नाना जी ने अपनी शेरवानी उतार कर एक किली ( खुटें ) पर टांग दी ऊपर अपनी पगडी रख दी, दुसरे कपडे पहने , पगडी बदली ओर घर से फ़िर चले गये, किसी काम से, इस बात का घर मे किसी को नही पता था,ओर जाते जाते दरवाजा बन्द कर दिया, ताकि सध्या के समय कोई जानवर, कुता वगेरा अन्दर ना घुस जाये, इन सब बातो का घर मे किसी को नही पता था.
जब थोडा थोडा अंधेरा हुया तो नानी मां ने घर आ कर दिया जलाना चाहा, बन्द दरवाजा देख कर थोडी हेरान हुई,खिडकी मे अन्दर झाकं कर देखा तोएक आदमी पगंडी पहने दिवार के साथ खडा दिखा,नानी ने झट से सभी पडोसियो को आवाज दे कर बुला लिया, सभी हेरान थे आज तक गाव मे चोरी नही हुई ओर यह कोन चोर घर मे घुस आया,सभी उसे कह रहे हे, देखो तुम चुप चाप बहिर आ जायो तुम्हे कोई कुछ नही कहए गा, अगर अपने आप बहिर नही आये तो बहुत बुरा होगा, लेकिन वो आदमी चुपचाप दिवार से सटा खडा रहा, ओर बाहर आधा गावं इक्कठा हो गया,सभी अपनी अपनी राय दे रहे थे,कुछ बुजुर्गो ने भी देखा अन्दर अंधेरा होने के कारण कुछ साफ़ नही दिख रहा था, फ़िर भी लग रहा था, एक आदमी पगडी पहने, सामने दिवार से सटा खडा हे, उन बुजुर्गो ने कहा बेटा तुम जो भी हो बाहिर आ जाओ, बर्ना यह जवान तुम्हे नही छोडे गे, आखरी बार तुम्हे कह रहे हे, बेटा यह गाव हे हम वचन के पक्के हे तुम्हे कोई कुछ नही कहे गा, बाहिर आ जायो,सभी बारी बारी (एक एक )से खिडकी से देख रहे हे, कोई कहता वो हिला, कोई कहता उस के पास अभी मेने बन्दुक देखी, कोई लाठी कहता, अब बहुत समय बीत गया, गावं के तीन चार नोजवान मेरे बडे मामा के साथ लाठिया ले कर अन्दर घुसे, बहुत होशियारी से फ़िर कया खुब चली लाठी उसे मार मार कर अध्मरा कर दिया, लेकिन ना तो उसने कोई आवाज ही की ओर ना ही वो गिरा, तभी मेरे नाना जी भी घर वापिस आ गये, भीड को देख कर थोडा चिन्तित हुये,पुछने पर उन्हे सारी बात मालुम हुई,लेकिन जब अन्दर गये तो थोडी ही देर मे सभी खुब हसंते हुये बाहिर आये.
नाना जी ने बताया जिसे सब चोर समझ रहे हे वो तो मेरे कपडे हे, आज मे थोडा जल्द आ गया था फ़िर कपडे बदल कर पंचायत मे चला गया, ओर खुटंई पर टांगे कपडो को ओर उस पर पडी पगडी तो बाहर से देखने पर किसी आदमी का ही भ्रम हुया, ओर सब ने बिना सोचे ही चोर चोर चिल्लाना शुरु कर दिया, ओर फ़िर सभी हसंते हुये अपने अपने घर चले गये.

2 comments:

नितिन बागला said...

मजेदार संस्मरण है!

praney ! said...

Very Interesting.

BTW which city/town in punjab were you refereing. Ki patta, aasin tussin ghwandi hi hoyeey :)