17/04/08

शेख मखमूर अन्तिम भाग

पोस्ट की देरी के लिये क्षमा चाहता हु,गुगल मेरे यहां किसी कारण बन्द हो गया था.

क्रमश से आगे...
शेख मखमूर

हॉँ, ठीक उस वक्त जब जोकि वह मलिका के हाथ को चूम रहा था, उसकी जिन्दगी भर की लालसाएं आँसू की एक बूँद बनकर मलिका की मेंहदी-रची हथेली पर गिर पड़ी कि जैसे मसऊद ने अपनी लालसा का मोती मलिका को सौंप दिया। मलिका ने हाथ खींच लिया और फकीर मखमूर के चेहरे पर मुहब्बत से भरी हुई निगाह डाली। जब सल्तनत के सब दरबारी भेंट दे चुके, तोपों की सलामियॉँ दगने लगीं, शहर में धूमधाम का बाजार गर्म हो गया और खुशियों के जलसे चारों तरफ नजर आने लगे।
राजगद्दी के तीसरे दिन मसऊद खुदा की इबादत में बैठा हुआ था कि मलिका शेर अफगन अकेले उसके पास आयी और बोली, मसऊद, मैं एक नाचीज तोहफा तुम्हारे लिए लायी हूँ और वह मेरा दिल है। क्या तुम उसे मेरे हाथ से कबूल करोगे? मसऊद अचम्भे से ताकता रह गया, मगर जब मलिका की आँखें मुहब्बत के नशे में डूबी हुई पायी तो चाव के मारे उठा और उसे सीने से लगाकर बोला-मैं तो मुद्दत से तुम्हारी बर्छी की नोक का घायल हूँ, मेरी किस्मत है कि आज तुम मरहम रखने आयी हो।

ल्के जन्नतनिशॉँ अब आजादी और खुशहाली का घर है। मलिका शेर अफगान को अभी गद्दी पर बैठे साल भर से ज्यादा नहीं गुजरा मगर सल्तनत का कारबार बहुत अच्छी तरह और खूबी से चल रहा है और इस बड़े काम में उसका प्यारा शौहर मसऊद, जो अभी तक फकीर मखमूर के नाम से मशहूर है, उसका सलाहकार और मददगार है।
रात का वक्त था, शाही दरबार सजा हुआ था, बड़े-बड़े वजीर अपने पद के अनुसार बैठे हुए थे और नौकर जर्क-बर्क वर्दियॉँ पहने हाथ बॉँधे खड़े थे कि एक खिदमतगार ने आकर अर्ज की-दोनों जहान की मलिका, एक गरीब औरत बाहर खड़ी है और आपके कदमों का बोसा लेने की गुजारिश करती है। दरबारी चौंके और मलिका ने ताज्जुब-भरे लहजे में कहा- अन्दर हाजिर करो। खिदमतगार बाहर चला गया और जरा देर में एक बुढ़िया लाठी टेकती हुई आयी और अपनी पिटारी से एक जड़ाऊ ताज निकालकर बोली तुम लोग इसे ले लो, अब यह मेरे किसी काम का नहीं रहा। मियॉँ ने मरते वक्त इसे मसऊद को देकर कहा था कि तुम इसके मालिक हो, मगर अपने जिगर के टुकड़े मसऊद को ढूँढूँ? रोते-रोते अंधी हो गयी, सारी दुनिया की खाक छानी, मगर उसका कहीं पता न लगा। अब जिंदगी से तंग आ गयी हूँ, जीकर क्या करूँगी? यह अमानत मेरे पास है, जिसका जी चाहे ले लो।
दरबार में सन्नाटा छा गया। लोग हैरत के मारे मूरत बन गये, कि जैसे एक जादूगर था जो उँगली के इशारे से सबका दम बन्द किए हुआ था। यकाएक मसऊद अपनी जगह से उठा और रोता हुआ जाकर रिन्दा के पैरों पर गिर पड़ा। रिन्दा अपने जिगर के टुकड़े को देखते ही पहचान गयी; उसे छाती से लगा लिया और वह जड़ाऊ ताज उसके सर पर रखकर बोली-साहबो, यही प्यारा मसऊद और शाहे बासुराद का बेटा है, तुम लोग इसकी रिआया हो, यह ताज इसका है, यह मुल्क इसका है और सारी खिलकत इसकी है। आज से वह अपने मुल्क का बादशाह है, अपनी कौम का खादिम।
दरबार में कयामत का शोर मचने लगा, दरबारी उठे और मसऊद को हाथों-हाथ ले जाकर तख्त पर मलिका शेर अफगन के बगल में बिठा दिया। भेंटें दी जाने लगीं, सलामियॉँ दगने लगीं, नफीरियों ने खुशी का गीत गाया और बाजों ने जीत का शोर मचाया। मगर जब जोश की यह खुशी जरा कम हुई और लोगों ने रिन्दा को देखा तो वह मर गयी थी। आरजुओं के पूरे होते ही जान निकल गयी। गोया आरजुऍं रूह बनकर उसके मिट्टी के तन को जिन्दा रखे हुए थीं।

समाप्त

2 comments:

Udan Tashtari said...

इतनी बेहतरीन चीज प्रस्तुत की है..फिर थोड़ी देर से ही सही....क्षमा मांग कर शर्मिंदा न करें.

अल्पना वर्मा said...

bahut achchee kahani thi-masood ki asleeyat ne kahani ko sukhd ant diya lekin natkiy dhang se.
-dhnywaad.