14/04/08

शेख मखमूर भाग ४

क्रमश से आगे...

शेख मखमूर

मसऊद ने चुने हुए सिपाहियों का एक दस्ता तैयार किया और कुछ इस दमखम और कुछ इस जोशखरोश से मीर शुजा पर टूटा कि उसकी सारी फौज में खलबली पड़ गयी। सरदार नमकखोर ने जब देखा कि शाही फौज के कदम डगमगा रहे हैं, तो अपनी पूरी ताकत से बादल और बिजली की तरह लपका और तेगों से तेगें और बर्छियों से बर्छियॉँ खड़कने लगीं। तीन घंटे तक बला का शोर मचा रहा, यहॉँ तक कि शाही फौज के कदम उखड़ गये और वह सिपाही जिसकी तलवार मीर शुजा से गले मिली मसऊद था।
तब सरदारी फौज और अफसर सब के सब लूट के माल पर टूटे और मसऊद जख्मों से चूर और खून में रँगा हूआ अपने कुछ जान पर खेलनेवाले दस्तों के साथ मस्कात के किले की तरफ लौटा मगर जब होश ने आंखें खोलीं और हवास ठिकाने हुए तो क्या देखता है कि वह एक सजे हुए कमरे में मखमली गद्दे पर लेटा हुआ है। फूलों की सुहानी महक और लम्बी छरहरी सुन्दरियों के जमघट से कमरा चमन बना हुआ था। ताज्जुब से इधर-उधर ताकने लगा कि इतने में एक अप्सरा-जैसी सुन्दर युवती तश्त में फूलों का हार लिये धीरे-धीरे आती हुई दिखायी दी कि जैसे बहार फूलों की डाली पेश करने आ रही है। उसे देखते ही उन लंबी छरहरी सुन्दरियों ने आंखें बिछायीं और उसकी हिनाई हथेली को चूमा। मसऊद देखते ही पहचान गया। यह मलिका शेर अफगान थी।
मलिका ने फूलों का हार मसऊद के गले में डाला। हीरे-जवाहरात उस पर चढ़ाये और सोने के तारों से टँकी हुई मसनद पर बड़ी आन-बान से बैठ गयी। साजिन्दों ने बीन ले-लेकर विजयी अतिथि के स्वागत में सुहागे राग अलापने शुरू किये।
यहॉँ तो नाच-गाने की महफिल थी, उधर आपसी डाह ने नये-नये शिगूफे खिलाये। सरदार ने शिकायत की कि मसऊद जरूर दुश्मन से जा मिला है और आज जान-बूझकर फौज का एक दस्ता लेकर लड़ने को गया था ताकि उसे खाक और खून में सुलाकर सरदारी फौज को बेचिराग कर दे। इसके सबूत में कुछ जाली खत भी दिखाये गये और इस कमीनी कोशिश में जबान की ऐसी चालाकी ने काम लिया कि आखिर सरदार को इन बातों पर यकीन आ गया। पौ फटे जब मसऊद मलिका शेर अफगन के दरबार से विजय का हार गले में डाले सरदार को बधाई देने गया तो बजाय इसके कि कद्रदानी का सिरोपा और बहादुरी का तमगा पाये, उसकी खरी-खोटी बातों के तीर का निशाना बनाया गया और हुक्म मिला कि तलवार कमर से खोलकर रख दे।
मसऊद स्तम्भित रह गया। ये तेगा मैंने अपने बाप से विरसे में पाया है और यह मेरे पिछले बड़प्पन कि आखिरी यादगार है। यह मेरी बॉँहों की ताकत और मेरा सहयोगी और मददगार है। इसके साथ कैसी स्मृतियां जुड़ी हुई हैं, क्या मैं जीते जी इसे अपने पहलू से अलग कर दूँ? अगर मुझ पर कोई आदमी लड़ाई के मैदान से कदम हटाने का इलजाम लगा सकता, अगर कोई शख्त इस तेगे का इस्तेमाल मेरे मुकाबिले में ज्यादा कारगुजारी के साथ कर सकता, अगर मेरी बॉँहों में तेग पकड़ने की ताकत न होती तो खुदा की कसम, मैं खुद ही तेगा कमर से खोलकर रख देता। मगर खुदा का शुक्र है कि मैं इन इल्जामों से बरी हूँ। फिर क्यों मैं इसे हाथ से जाने दूँ? क्या इसलिए कि मेरी बुराई चाहनेवाले कुछ थोड़-से डाहियों ने सरदार नमकखोर का मन मेरी तरफ से फेर दिया है? ऐसा नहीं हो सकता।
मगर फिर उसे ख्याल आया, मेरी सरकशी पर सरदार और भी गुस्सा हो जायेंगे और यकीनन मुझे तलवार शमशीर के जोर से छीन ली जायेगी। ऐसी हालत में मेरे ऊपर जान छिड़कनेवाले सिपाही कब अपने को काबू में रख सकेंगे। जरूर आपस में खून की नदियॉँ बहेंगी और भाई-भाई का सिर कटेगा। खुदा न करे कि मरे सबब से यह दर्दनाक मार-काट हो। यह सोचकर उसने चुपके से शमशीर सदरार नमकखोर के बगल में रख दी और खुद सर नीचा किये जब्त की इन्तहाई कुवत से गुस्से को दबाता हुआ खेमे से बाहर निकल आया।
मसऊद पर सारी फौज गर्व करती थी और उस पर जानें वारने के लिए हथेली में लिये रहती थी। जिस वक्त उसने तलवार खोली है, दो हजार सूरमा सिपाही मियान पर हाथ रक्खे और शोले बरसाती हुई आँखों से ताकते कनौतियॉँ बदल रहे थे। मसऊद के एक जरा-से इशारे की देर थी और दम के दम में लाशों के ढेर लग जाते। मगर मसऊद बहादुरी ही में बेजोड़ न था, जब्त और धीरज में भी उसका जवाब न था। उसने यह जिल्लत और बदनामी सब गवार की, तलवार देना गवारा किया, बगावत का इलजाम लेना गवारा किया और अपने साथियों के सामने सर झुकाना गवारा किया मगर यह गवारा न किया कि उसके कारण फौज में बगावत और हुक्म न मानने का ख्याल पैदा हो। और ऐसे नाजुक वक्त में जबकि कितने ही दिलेर, जिन्होंने लड़ाई की आजमाइश में अपनी बहादुरी का सबूत दिया था, जब्त हाथ से खो बैठते और गुस्से की हालत में एक-दूसरे के गले काटते, खामोश रहा और उसके पैर नहीं डगमगाये। उसकी बहादुरी का सबूत दिया खामोश रहा और उसके पैर नहीं डगमगाये। उसकी परेशानी पर जरा भी बल न आया, उसके तेवर जरा भी न बदले। उसने खून बरसाती हुई आँखों से दोस्तों को अलविदा कहा और हसरत भरा दिल लिये उठा और एक गुफा में छिप बैठा और जब सूरज डूबने पर वहॉँ से उठा तो उसके दिल ने फैसला कर लिया था कि बदनामी का दाग माथे से मिटाऊँगा और डाहियों को शर्मिन्दगी के गड्ढे में गिराऊँगा।

क्रमश

2 comments:

mamta said...

मसऊद की समझदारी की तारीफ करनी होगी।
राज जी आपसे गुजारिश है की इस कहानी के बाद अगर हो सके तो गोदान भी हम लोगों को पढ़वाइये।

राज भाटिय़ा said...

ममता जी जरुर,इस महीने के आखिर तक गोदान जरुर पढाये गे आप, टिपण्णी के लिये धन्यवाद