12/04/08

शेख मखमूर भाग २

क्रमश से आगे...
शेख मखमूर
शाह किशवरकुशा ने आधी सदी तक खूब इन्साफ के साथ राज किया मगर किशवरकुशा दोयम ने सिंहासन पर आते ही अपने अक्लमन्द बाप के मंत्रियों को एक सिरे से बर्खास्त कर दिया और अपनी मर्जी के मुआफिक नये-नये वजीर और सलाहकार नियुक्त किये। सल्तनत का काम रोज-ब-रोज बिगड़ने लगा। सरदारों ने बेइन्साफी पर कमर बॉँधी और हुक्काम रिआया पर जोर-जबर्दस्तरी करने लगे। यहॉँ तक कि खानदाने मुरादिया के एक पुराने नमकखोर ने मौका अच्छा देखकर बगावत का झंडा बुलन्द कर दिया। आसपास से लोग उसके झंडे के नीचे जमा होने वाले और कुछ ही हफ्तों में एक बड़ी फौज कायम हो गयी और मसऊद भी नमकखोर सरदार की फौज में आकर मामूली सिपाहियों का काम करने लगा।
मसऊद का अभी यौवन का आरम्भ था। दिल में मर्दाना जोश और बाजुओं मे शेरों की कूवत मौजूद थी। ऐसा लम्बा-तड़ंगा, सुन्दर नौजवान बहुत कम किसी ने देखा होगा। शेरों के शिकार का उसे इश्क था। दूर-दूर तक के जंगल दरिन्दों से खाली हो गये। सवेरे से शाम तक सैरो-शिकार के सिवा कोई धंधा न था। लबोलहजा ऐसा दिलकश पाया था कि जिस वक्त मस्ती में आकर कोई कौमी गीत छेड़ देता तो राह चलते मुसाफिरों और पहाड़ी औरतों का टट लग जाता था। कितने ही भोले-भाले दिलों पर उसकी मोहिनी सूरत नक्श थी, कितनी ही आँखें उसे देखने को तरसती और कितनी ही जानें उसकी मुहब्बत की आग में घुलती थीं। मगर मसऊद पर अभी तक किसी का जादू न चला था। हॉ, अगर उसे मुहब्बत थी तो अपनी आबदार शमशीर से जो उसने बाप से विरसे में पायी थी। इस तेग को वह जान से ज्यादा प्यार करता। बेचारा खुद नंगे बदन रहता मगर उसके लिए तरह-तरह के मियान बनवाये थे। उसे एक दम के लिए अपने पहलू से अलग न करता। सच है दिलेर सिपाही की तलवार उसकी निगाहों में दुनिया की तमाम चीजों से ज्यादा प्यारी होती है। खासकर वह आबदार खंजर जिसका जौहर बहुत-से मौकों पर परखा जा चुका हो। इसी तेग से मसऊद ने कितने ही जंगली दरिन्दों को मारा था, कितने ही लुटेरों और डाकुओं को मौत का मजा चखाया था और उसे पूरा यकीन था कि यही तलवार किसी दिन किशवरकुशा दोयम के सर पर चमकेगी और उसकी शहरग के खून से अपनी जबान तर करेगी।
एक रोज वह एक शेर का पीछा करते-करते बहुत दूर निकल गया। धूप सख्त थी, भूख और प्यास से जी बेताब हुआ, मगर वहॉँ न कोई मेवे का दरख्त नजर आया न कोई बहता हुआ पानी का सोता जिससे भूख और प्यास की आग बुझाता। हैरान और परेशान खड़ा था। सामने से एक चांद जैसी सुन्दर युवती हाथ में बर्छी लिए और बिजली की तरह तेज घोड़े पर सवार आती हुई दिखाई दी। पसीने की मोती जैसी बूँदें माथे पर झलक रही थीं और अम्बर की सुगन्ध में बसे हुए बाल दोनों कंधों पर एक सुहानी बेतकल्लुफी से बिखरे हुए थे। दोनों की निगाहें चार हुईं और मसऊद का दिल हाथ से जाता रहा। उस गरीब ने आज तक दुनिया को जला डालने वाला ऐसा हुस्न न देखा था, उसके ऊपर एक सकता-सा छा गया। यह जवान औरत उस जंगल मे मलिका शेर अफ़गान के नाम से मशहूर थी।
मलिका ने मसऊद को देखकर घोड़े की बाग खींच ली और गर्म लहजे में बोली-क्या तू वही नौजवान है, जो मेरे इलाके के शेरों का शिकार किया करता है?, बतला तेरी इस गुस्ताखी की क्या सजा दूँ?
यह सुनते ही मसऊद की आंखें लाल हो गयीं और बरबस हाथ तलवार की मूठ पर जा पहुँचा मगर जब्त करके बोला-इस सवाल का जवाब खूब देता, अगर आपके बजाय यह किसी दिलेर मर्द की जबान से निकलता!
इन शब्दों ने मलिका के गुस्से की आग का और भी भड़का दिया। उसने घोड़े को चमकाया और बर्छी उछालती सर पर आ पहुँची और वार पर वार करने शुरू किये। मसऊद के हाथ-पॉँव बेहद थकान से चूर हो रहे थे। और मलिका शेर-अफगन बर्छी चलाने की कला में बेजोड़ थी। उसने चरके पर चरके लगाये, यहॉँ तक कि मसऊद घायल होकर घोड़े से गिर पड़ा। उसने अब तक मलिका के वारों को काटने के सिवाय खुद एक हाथ भी न चलाया था।
तब मलिका घोड़े से कूदी और अपना रुमाल फाड़-फाड़कर मसऊद के जख्म बॉँधने लगी। ऐसा दिलेर और गैरतमन्द जवॉँमर्द उसकी नजर से आज तक न गुजरा था। वह उसे बहुत आराम से उठवाकर अपने खेमे में लायी और पूरे दो हफ्ते तक उसकी परिचर्या में लगी रही। यहॉँ तक कि घाव भर गया और मसऊद का चेहरा फिर पूरनमासी के चॉँद की तरह चमकने लगा। मगर हसरत यह थी कि अब मलिका ने उसके पास आना-जाना छोड़ दिया।
एक रोज मलिका शेर अफगान ने मसऊद को दरबार मे बुलाया और यह बोली- ऐ घमण्डी नौजवान! खुदा का शुक्र है कि तू मेरी बर्छी की चोट से अच्छा हो गया, अब मेरे इलाके से जा, तेरी गुस्ताखी माफ करती हूँ। मगर आइन्दा मेरे इलाके मे शिकार के लिए आने की हिम्मत न करना। फिलहाल ताकीद के तौर पर तेरी तलवार छीन ली जाएगी। ताकि तू घंमड के नशे से चूर होकर फिर इधर कदम बढ़ाने की हिम्मत न करे।
मसऊद ने नंगी तलवार मियान से खींच ली और कड़ककर बोला-जब तक मेरे दम में दम हैं, कोई यह तलवार मुझसे नहीं ले सकता। यह सुनते ही एक देव जैसा लम्बा तंड़गा हैकल पहलवान ललकार कर बढ़ा और मसऊद की कलाई पर तेगे का तुला हुआ हाथ चलाया। मसऊद ने वार खाली दिया और सम्हलकर तेगे का वार किया तो पहलवान की गर्दन की पट्टी तक बाकी न रही। यह कैफियत देखते ही मलिका की आंखों से चिनगारियां उड़ने लगीं। भयानक गुस्से के स्वर में बोली-खबरदार, यह शख्स यहॉँ से जिन्दा न जाने पावे। चारों तरफ से आजमाये हुए मजबूत सिपाही पिल पड़े और मसऊद पर तलवारों और बर्छियों की बौछार पड़ने लगी।
क्रमश...

1 comment:

mamta said...

दिलचस्पी बनी है कि अगली कड़ी मे क्या होगा।