01/04/08

दुर्गा का मन्दिर भाग अन्तिम

क्र्मश से आगे
दुर्गा का मंदिर
भामा ने फिर देवी की ओर सशंक दृष्टि से देखा। उनके दिव्य रूप पर प्रेम का प्रकाश था। ऑंखों में दया की आनंददायिनी झलक थी। उस समय भामा के अंत:करण में कहीं स्वर्गलोक से यह ध्वनि सुनाई दी--जा तेरा कल्याण होगा।संध्या का समय है। भामा ब्रजनाथ के साथ इक्के पर बैठी तुलसी के घर, उसकी थाती लौटाने जा रही है। ब्रजनाथ के बड़े परिश्रम की कमायी जो डाक्टर की भेंट हो चुकी है, लेकिन भामा ने एक पड़ोसी के हाथ अपने कानों के झुमके बेचकर रुपये जुटाए हैं। जिस समय झुमके बनकर आये थे, भामा बहुत प्रसन्न हुई थी। आज उन्हें बेचकर वह उससे भी अधिक प्रसन्न है।जब ब्रजनाथ ने आठों गिन्नियॉँ उसे दिखाई थीं, उसके हृदय में एक गुदगुदी-सी हुई थी; लेकिन यह हर्ष मुख पर आने का साहस न कर सका था। आज उन गिन्नियों को हाथ से जाते समय उसका हार्दिक आनन्द ऑंखों में चमक रहा है, ओठों पर नाच रहा है, कपोलों को रंग रहा है, और अंगों पर किलोल कर रहा है; वह इंद्रियों का आनंद था, यह आत्मा का आनंद है; वह आनंद लज्जा के भीतर छिपा हुआ था, यह आनंद गर्व से बाहर निकला पड़ता है।तुलसी का आशीर्वाद सफल हुआ। आज पूरे तीन सप्ताह के बाद ब्रजनाथ तकिए के सहारे बैठे थे। वह बार-बार भामा को प्रेम-पूर्ण नेत्रों से देखते थे। वह आज उन्हें देवी मालूम होती थी। अब तक उन्होंने उसके बाह्य सौंदर्य की शोभ देखी थी, आज वह उसका आत्मिक सौंदर्य देख रहे हैं।तुलसी का घर एक गली में था। इक्का सड़क पर जाकर ठहर गया। ब्रजनाथ इक्के पर से उतरे, और अपनी छड़ी टेकते हुए भामा के हाथों के सहारे तुलसी के घर पहुँचे। तुलसी ने रुपए लिए और दोनों हाथ फैला कर आशीर्वाद दिया--दुर्गा जी तुम्हारा कल्याण करें।तुलसी का वर्णहीन मुख वैसे ही खिल गया, जैसे वर्षा के पीछे वृक्षों की पत्तियॉँ खिल जाती हैं। सिमटा हुआ अंग फैल गया, गालों की झुर्रियॉँ मिटती दीख पड़ीं। ऐसा मालूम होता थ, मानो उसका कायाकलूप हो गया।वहॉँ से आकर ब्रजनाथ अपवने द्वार पर बैठे हुए थे कि गोरेलाल आ कर बैठ गए। ब्रजनाथ ने मुँह फेर लिया।गोरेलाल बोले--भाई साहब ! कैसी तबियत है?ब्रजनाथ--बहुत अच्छी तरह हूँ।गोरेलाल--मुझे क्षमा कीजिएगा। मुझे इसका बहुत खेद है कि आपके रुपये देने में इतना विलम्ब हुआ। पहली तारीख ही को घर से एक आवश्यक पत्र आ गया, और मैं किसी तरह तीन महीने की छुट्टी लेकर घर भागा। वहॉँ की विपत्ति-कथा कहूँ, तो समाप्त न हो; लेकिन आपकी बीमारी की शोक-समाचार सुन कर आज भागा चला आ रहा हूँ। ये लीजिये, रुपये हाजिर हैं। इस विलम्ब के लिए अत्यंत लज्जित हूँ।ब्रजनाथ का क्रोध शांत हो गया। विनय में कितनी शक्ति है ! बोले-जी हॉँ, बीमार तो था; लेकिन अब अच्छा हो गया हूँ, आपको मेरे कारण व्यर्थ कष्ट उठाना पड़ा। यदि इस समय आपको असुविधा हो, तो रुपये फिर दे दीजिएगा। मैं अब उऋण हो गया हूँ। कोई जल्दी नहीं है।गोरेलाल विदा हो गये, तो ब्रजनाथ रुपये लिये हुए भीतर आये और भामा से बोले--ये लो अपने रुपये; गोरेलाल दे गये।भामा ने कहा--ये मरे रुपये नहीं तुलसी के हैं; एक बार पराया धन लेकर सीख गयी।ब्रज०--लेकिन तुलसी के पूरे रुपये तो दे दिये गये !भामा--दे दिये तो क्या हुआ? ये उसके आशीर्वाद की न्योछावर है।ब्रज०-कान के झुमके कहॉँ से आवेंगे?भामा--झुमके न रहेंगे, न सही; सदा के लिए ‘कान’ तो हो गये।
समाप्त
यह रचना मुंशी प्रेम चन्द जी की हे

6 comments:

DR.ANURAG ARYA said...

मन को गहरे तक छू गई ......हमसे बांटने के लिए शुक्रिया

mamta said...

कहानी मे तारतम्य बना रहा।
ये सिलसिला प्रेमचंद की कहानी का आगे भी जारी रखिये।

Wallpaper said...
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कुन्नू सिंह said...

बहूत अच्छी कहानी है अच्छा हूवा ऊनका "कान" ब च गया।
अगली कहानी का ईंतजार रहेगा। मूझे कहानी पढना या सूनना बच्पन से ही बहुत अच्छा लगता है।

ऊप्पर वाला जो कमेंट डीलीट कीया है वो मेरा ही है।
दूसरी आई-डी खूली थी जो मैने पबलीस करने के बाद देखा।

SUNIL DOGRA जालि‍म said...

दादा दादी की कहानियां तो बचपन में बहुत कम सुनने का मौका मिला. परन्तु अब लगता है की जो कमी तब पूरी रह गयी उसे आप पूरा कर देंगे.. इस तरह की प्रेरणादायक कहानियाँ हम तक पहुँचने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद..

राज भाटिय़ा said...

आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद