28/03/08

दुर्गा का मन्दिर भाग १

मुंशी प्रेमचन्द जी की एक ओर सुन्दर रचना,एक सीख उन् लोगो के लिये जो दुसरो का हक मारते हे.तो आप भी पढिये...
दुर्गा का मन्दिर
बाबू ब्रजनाथ कानून पढ़ने में मग्न थे, और उनके दोनों बच्चे लड़ाई करने में। श्यामा चिल्लाती, कि मुन्नू मेरी गुड़िया नहीं देता। मुन्नु रोता था कि श्यामा ने मेरी मिठाई खा ली। ब्रजनाथ ने क्रुद्घ हो कर भामा से कहा—तुम इन दुष्टों को यहॉँ से हटाती हो कि नहीं? नहीं तो मैं एक-एक की खबर लेता हूँ। भामा चूल्हें में आग जला रही थी, बोली—अरे तो अब क्या संध्या को भी पढ़तेही रहोगे? जरा दम तो ले लो।ब्रज०--उठा तो न जाएगा; बैठी-बैठी वहीं से कानून बघारोगी ! अभी एक-आध को पटक दूंगा, तो वहीं से गरजती हुई आओगी कि हाय-हाय ! बच्चे को मार डाला ! भामा—तो मैं कुछ बैठी या सोयी तो नहीं हूँ। जरा एक घड़ी तुम्हीं लड़को को बहलाओगे, तो क्या होगा ! कुछ मैंने ही तो उनकी नौकरी नहीं लिखायी!ब्रजनाथ से कोई जवाब न देते बन पड़ा। क्रोध पानी के समान बहाव का मार्ग न पा कर और भी प्रबल हो जाता है। यद्यपि ब्रजनाथ नैतिक सिद्धांतों के ज्ञाता थे; पर उनके पालन में इस समय कुशल न दिखायी दी। मुद्दई और मुद्दालेह, दोनों को एक ही लाठी हॉँका, और दोनों को रोते-चिल्लाते छोड़ कानून का ग्रंथ बगल में दबा कालेज-पार्क की राह ली।
सावन का महीना था। आज कई दिन के बाद बादल हटे थे। हरे-भरे वृक्ष सुनहरी चादर ओढ़े खड़े थे। मृदु समीर सावन का राग गाता था, और बगुले डालियों पर बैठे हिंडोले झूल रहे थे। ब्रजनाथ एक बेंच पर आ बैठे और किताब खोली। लेकिन इस ग्रंथ को अपेक्षा प्रकृति-ग्रंथ का अवलोकन अधिक चित्ताकर्षक था। कभी आसमान को पढ़ते थे, कभी पत्तियों को, कभी छविमयी हरियाली को और कभी सामने मैदान में खेलते हुए लड़कों को। एकाएक उन्हें सामने घास पर कागज की एक पुड़िया दिखायी दी। माया ने जिज्ञासा की—आड़ में चलो, देखें इसमें क्या है।बुद्धि ने कहा—तुमसे मतलब? पड़ी रहने दो।लेकिन जिज्ञासा-रुपी माया की जीत हुई। ब्रजनाथ ने उठ कर पुड़िया उठा ली। कदाचित् किसी के पैसे पुड़िया में लिपटे गिर पड़े हैं। खोल कर देखा; सावरेन थे। गिना, पुरे आठ निकले। कुतूहल की सीमा न रही। ब्रजनाथ की छाती धड़कने लगी। आठों सावरेन हाथ में लिये सोचने लगे, इन्हें क्या करुँ? अगर यहीं रख दूँ, तो न जाने किसकी नजर पड़े; न मालूम कौन उठा ले जाय ! नहीं यहॉँ रखना उचित नहीं। चलूँ थाने में इत्तला कर दूँ और ये सावरेन थानेदार को सौंप दूँ। जिसके होंगे वह आप ले जायगा या अगर उसको न भी मिलें, तो मुझ पर कोई दोष न रहेगा, मैं तो अपने उत्तरदायित्व से मुक्त हो जाऊँगा। माया ने परदे की आड़ से मंत्र मारना शुरु किया। वह थाने नहीं गये, सोचा—चलूं भामा से एक दिल्लगी करुँ। भोजन तैयार होगा। कल इतमीनान से थाने जाऊँगा।
भामा ने सावरेन देखे, तो हृदय मे एक गुदगुदी-सी हुई। पूछा किसकी है?ब्रज०--मेरी।भामा—चलो, कहीं हो न !ब्रज०—पड़ी मिली है।भामा—झूठ बात। ऐसे ही भाग्य के बली हो, तो सच बताओ कहॉँ मिली? किसकी है?ब्रज०—सच कहता हूँ, पड़ी मिली है। भामा—मेरी कसम?ब्रज०—तुम्हारी कसम।भामा गिन्नयों को पति के हाथ से छीनने की चेष्टा करने लगी। ब्रजनाथ के कहा—क्यों छीनती हो?भामा—लाओ, मैं अपने पास रख लूँ।ब्रज०—रहने दो, मैं इसकी इत्तला करने थाने जाता हूँ।भामा का मुख मलिन हो गया। बोली—पड़े हुए धन की क्या इत्तला?ब्रज०—हॉँ, और क्या, इन आठ गिन्नियों के लिए ईमान बिगाडूँगा? भामा—अच्छा तो सवेरे चले जाना। इस समय जाओगे, तो आने में देर होगी।ब्रजनाथ ने भी सोचा, यही अच्छा। थानेवाले रात को तो कोई कारवाई करेंगे नहीं। जब अशर्फियों को पड़ा रहना है, तब जेसे थाना वैसे मेरा घर। गिन्नियॉँ संदूक में रख दीं। खा-पी कर लेटे, तो भामा ने हँस कर कहा—आया धन क्यों छोड़ते हो? लाओ, मैं अपने लिए एक गुलूबंद बनवा लूँ, बहुत दिनों से जी तरस रहा है।माया ने इस समय हास्य का रुप धारण किया। ब्रजनाथ ने तिरस्कार करके कहा—गुलूबंद की लालसा में गले में फॉँसी लगाना चाहती हो क्या?
यह रचना मुंशी प्रेमचन्द जी की हे
क्रमश...

5 comments:

mahendra mishra said...

राज जी मुंशी प्रेमचन्द जी की सुंदर रचना हम सब तक बांटने के लिए आभार

शोभा said...

राज जी
इतनी सुन्दर अभिव्यक्ति पढ़वाने के लिए बधाई।

mamta said...

मुंशी जी की रचनाएं पढने मे बहुत अच्छा लग रहा है।

Udan Tashtari said...

आभार इस प्रस्तुति के लिये..या यूँ कहूँ अपने अंदाज में तो: साधूवाद!!!!

राज भाटिय़ा said...

बहुत धन्यवाद आप सब का