26/05/10

आईये आज आप को अपने गांव के अंदर घुमा लाये भाग २....

यह साथ वाला चित्र किसान के घर का है जो दुर से लिया है, लिजिये आज बाते कम होंगी ओर आप को अब ले चलते है एक किसान के यहां, जहां से हम ताजा दुध भी खरीदते है, जब हम दुध लेने जाते है अगर किसान वहां हो तो तो हमे दुध नाप कर दे देता है, ओर हम उसे उतने पेसे दे देते है ( एक लीटर ०,५० Cent) ओर अगर किसान वहां ना हो तो हम अपने आप जितना दुध चाहिये बर्तन मै डाला, ओर हिसाब से पेसे डाले , अगर हमारे पास नोट है तो बाकी पेसे  अपने आप निकाले ओर घर आ गये.


यह चित्र हम ने किसान के घर के पिछले हिस्से से लिया है, जहां इस के काम आने वाले कुछ यंत्र पडे है, ओर कुछ गंदा घास.





 यह साथ वाला चित्र उस कुये का है जिस मै किसान के जानवरो के बाडे का गंद जमीन के अंदर ही अंदर इस कुये तक पहुच जाता है, जिस मै जानवरो का गोवर, मुत्र, ओर वहां का पानी शामिल होता है. ओर जो यह आसमानी रंग का मोटा सा पाईप नजर आ रहा है, इसे टेंक से जोड कर, उसे इस गोबर से भर कर खेतो मै छिडका जाता है खान के स्थान पर, ओर रासायनिक खादो का प्रयोग बहुत कम किया जाता है
 यह किसान के घर का समाने का हिस्सा है, कुछ हिस्से मै वो रहता है बाकी हिस्से मै जावरो के रहने का इंतजाम है, उस के घर की दो खिडकियां ही इस चित्र मै आ पाई सब से पहले वाली, उस का रहने वाला घर भी काफ़ी बडा है
 इस दवडॆ मै वो गाय है , जो अभी दुध नही दे रही या फ़िर जल्द ही बच्चे को जन्म देने वाली है, हर गाय का एक एक नाम है, ओर हर गाय नाम से झट कान खडे करती है, अभी हरी घास का मोसम है इस लिये मजे से खा रहि है हरी घास
 ऊपर वाला चित्र, साथ वाला चित्र ओर नीचे वाला चित्र एक ही कमरे का है

 यह है हमारा किसान भाई, बहुत अच्छे स्व्भाव का, ओर इस कमरे मै सारा दुध अपने आप इन पाईपो के जरिये आता है
 गायो का दुध मशीनो से निकल कर इन पाईपो के रास्ते इस बडे से ड्रम मै भर जाता है, इस ड्र्म मै दुध को ठंडा करने की मशीन भी लगी है, ओर इस ड्रम मै करीब ६ से ८ सॊ लिटर दुध आ जाता है
 यह सब दुधारू गाये है चित्र को बडा कर के देखे पिछली ओर  कई तरह के पाईप लगे है, कोई पानी का है तो कोई दुध को दुसरे कमरे मै रखे ड्रम मै भेजने के लिये, साथ वाला चित्र लेफ़ट साईड का है ओर नीचे वाला चित्र राईट साईड का

 यह चित्र बीच से लिया है, अभी गमी के कारण सारे दरवाजे खोल दिये गये है
 यह लेफ़ट वाला चित्र गायो के पिछले की तरफ़ वाला लिया है, आप इस चित्र को बडा कर के देखे गायो का गोबर, मुत्र, ओर साफ़ सफ़ाई के बाद सारा पानी इस जाली दार नाली से बाहर कुये मै चला जाता है, ओर बाद मै यही सब खाद के काम आता है, यहां जमीन का पानी भी पीने के काम आता है, क्योकि कोई भी किसान आंखे बन्द कर के रास्यनिक खाद को अपने खेतो मै नही डाल सकता, ओर साल मै दो तीन बार जमीन के पानी को जगह जगह से चेक किया जाता है, ओर किसानो की फ़सलो ओर इस के जानवरो के दुध को भी चेक किया जाता है
 जो सामने सुखा सा दिख रहा है यह पिछले साल की मक्की की फ़सल है, जिसे भुट्टॆ समेत काट कर ओर सुखा कर यहा स्टोर कर लिया जाता है, ओर फ़िर पुरी सर्दियो मै यही खाना चलता है, ओर साथ जो हरी रंग की घास दिख रही है, वो आज ही आई है, ओर इसी तरह से सारे साल का इंतजाम कर लेते है यहां के किसान
 आज तो गाऊ माता ताजा ओर हरा घास खा रही है, साल मै तीन चार बार सरकारी कर्मचारी आ कर इन के जानवरो के दवडे को चेक करते है, जानवरो के खाने को भी चेक करते है, ओर इन की साफ़ सफ़ाई पर भी ध्यन देते है
 इस ट्राली मै भी चारा ही लाया जाता है,
 यह सुखी लकडियां है जो सर्दियो मै घर को गर्म करने के लिये जलाई जाती है, ओर किसान को यह उस के जगल से मिल जाती है मुफ़त मै

इस चित्र मै जो थोडी दुर लेफ़ट साईड मै जो सफ़ेद रंग के पाकेट दिख रहे है इस मै भी गाय के लिये कटी हुयी सुखी मक्की पेक कर रखी है, जो नयी फ़सल तक चलेगी, ओर वही सामने जितने भी पेड दिख रहे है सब पेड सेव के है
इस चारे के आलावा भी यहा जानवरो को गेंहुं, ओर बाजार का बना खाना भी देते है, ओर एक गाय का दुध ३०, ४० किलो तक हो जाता है.
तो बताईये केसा लगा हमारा गांव? मेने जिन्दगी ज्यादा यहां बिताई है, इस लिये यह देश भी मुझे उतना ही प्यारा लगता है जितना भारत, यहां के लोगो मै हम अब रस बस गये , ओर कभी नही लगता कि हम विदेशी है, इन लोगो से हम वेसे ही बात करते है जेसे किसी भारतीया से,हमारे बच्चे वेसे ही शरारते करते है जेसे हम बचपन मै करते थे, ओर आप को इस किसान के घर से निकलते ही कही भी बाहर इस के कारण गंदगी नही दिखेगी,
कल हम फ़िर से अपने ही गांव की सडको ओर गलियो मै ले जायेगे, काश मेरा भारत भी ऎसा ही होता, लेकिन मै जब भी भारत जाता था, अपनी सडक को  ऎसे ही चमका देता था, मेरे घर के आसपास ऎसे ही सफ़ाई होती थी.

35 comments:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

बहुत अच्छा लगा आप के गांव को देखकर. मेरा एक भाई भी जर्मनी जा रहा है शिक्षा ग्रहण करने. उसे भी आपके और आपके गांव के बारे में बताऊंगा..

महफूज़ अली said...

काश! हमारे हिंदुस्तान में भी ऐसे ही गाँव होते.......

honesty project democracy said...

बहुत ही उम्दा प्रस्तुती / आपने तो हमसब को फ्री में जर्मनी के गाँव में घुमा दिया ,धन्यवाद आपका / उम्दा तस्वीरें /

राजीव तनेजा said...

उम्मीद पर दुनिया कायम रखते हैं कि कभी ना कभी तो तरक्की की लहर यहाँ भी आएगी ...

बहुत बढ़िया लगा आपका गाँव देखकर

दीपक 'मशाल' said...

वाह सर.. मुझे ऐसी प्राकृतिक चीजें बड़ी पसंद हैं.. यहाँ तो देखने को मिली नहीं.. अलबत्ता जर्मन गायें देख लीं अब आपके द्वारा.. :) हमारे भारत में भैंसों का दूध मिलता है और यहाँ गायों का.. देखिये तो..कई सारी रोचक जानकारियाँ दीं आपने आभार..

AlbelaKhatri.com said...

अच्छा है जी,,,,,,,,,,,,,
उम्दा पोस्ट !

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

गाँव की उन्नति के इस स्तर को देख कर लगता है कि हम अभी बहुत पीछे हैं। हमें तो अभी आपस में लड़ने के लिए फौजें पैदा करने से ही फुरसत नहीं है।

नीरज जाट जी said...

भाटिया जी,
आज अपने देसी गांव के बारे में कुछ नहीं कहूंगा क्योंकि मुझे अपने गांव की धूल से, गांव की गन्दगी से, असुविधाओं से बेहद प्यार है।
हां, आपका गांव देखकर लगा कि तकनीकी इन्सान का काम कितना आसान कर देती है।
हम तो जी आज के समय में भी चिलम भरना, दूध दुहना, खाट बुनना, भैंस के ऊपर बैठकर जोहड में जाना जानते हैं।

राज भाटिय़ा said...

नीरज भाई मैने भी भारत मै गांव मै यह सब किया है, वो भी अच्छा है ओर यह भी अच्छा है

गिरीश बिल्लोरे said...

दादा जी
अच्छा वर्णन
आभार

Sanjeet Tripathi said...

great, badhiya ghuma rahe hai varnan ke sath aap apna nivas wala gaon....
accha lag raha hai bhatija ji..

Yogesh Gulati said...

सुन्दर! बहुत सुन्दर्! आपकी मेहनत और आपकी हिंदी दोनों के लिये आभार! पराये देश में भी अपने देशवासियों और अपनी मिट्टी से आपका जुडाव काबिले तारीफ है! स्टार एंकर पर आपकी वो लंबी सी कमेंट मैंने पढी, और आपसे सहमत हूं! क्योंकि विनम्रता ही बडप्पन की निशानी है!

M VERMA said...

बहुत बढिया
सुन्दर प्रस्तुति

Suman said...

nice

Udan Tashtari said...

अच्छा लगा जर्मनी के ग्रमीण जीवन के बारे में विस्तार से जानकर, आभार.

पी.सी.गोदियाल said...

Bhatia sahab , kabhi plot-walot kat rahe hon to bataana, majaak nahee kar raha.

खुशदीप सहगल said...

राज जी बेहतरीन पोस्ट के लिए आभार...

कितना साइंटिफिक और कितना ईमानदार है जर्मनी का ग्रामीण जीवन...किसानों के साथ सरकार भी पशुओं के स्वास्थ्य के लिए कितनी सजग है, ये आधा सेंट भारतीय रुपये में कितना बैठता होगा...

जय हिंद...

विनोद कुमार पांडेय said...

कितना प्रगतिशील है जर्मनी और जर्मनी के किसान काश हमारे भारत देश में कुछ इस तरह की क्रांति हो और हमारे देश के किसान और व्यवस्था ऐसी हो..आधुनिकता और बढ़िया व्यवस्था राज जी आपके गाँव की यह प्रस्तुति बहुत बढ़िया लगी..धन्यवाद इस बेहतरीन पोस्ट के लिए

Dr Parveen said...

हर गाय का एक एक नाम है, ओर हर गाय नाम से झट कान खडे करती है....

पोस्ट देख कर बहुत अच्छा लगा।

Arvind Mishra said...

बहुत सुन्दर और जानदार वर्णन -मन करता है मैं भी वहीं आ जाऊं !
ऐसे किसान की कल्पना भी भारत मे मुश्किल है !

बेचैन आत्मा said...

उम्दा पोस्ट.
गाँव का सचित्र वर्णन पढ़कर हम बनारस वाले आँखे फाड़ने और बड़ा सा मुँह बाने के सिवाय क्या कर सकते हैं?

मेरा एक यादव मित्र है, उसके पास ३५ भैस हैं, उसको दिखाऊंगा तो बोलेगा ...रहे दs यार ई जर्मनी ना हौ..!

कभी बड़ा तो कभी छोटा करके चित्र देखा ..आनंद आ गया .. वहाँ की गायों की आँखें भी कैसी जर्मनियों जैसी हैं..! नही..!

आप वहीँ रहिये राज साहब ..और हमें दुनियाँ दिखाते रहिये...सम्पूर्ण धरती अपनी है..
.वसुधैव कुटुम्बकम.

..उम्दा पोस्ट के लिए एक बार और बधाई.

वर्षा said...

मैं हमेशा सोचती हूं, खेती-बाड़ी से दूर जा रहे लोगों से, ऐसा लगता है अब यहां खेती भी निजी कंपनियां ही करेंगी। गांव और डेरी की ये तस्वीर बताती है हमें अभी विकास की राह पर लंबी दूरी तय करनी है।

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

मेरे यहा तो दो गाय है एक ५ किलो दूध देती है दूसरी ९ किलो

जर्मनी और भारत के किसानो मे एक समानता है क्या आपने कभी मह्सूस किया .....
............ मैने किया दोनो को अंग्रेजी नही आती :)

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

मेरे यहा तो दो गाय है एक ५ किलो दूध देती है दूसरी ९ किलो

जर्मनी और भारत के किसानो मे एक समानता है क्या आपने कभी मह्सूस किया .....
............ मैने किया दोनो को अंग्रेजी नही आती :)

girish pankaj said...

bharat mey gayon ki durdasha par ek upanyaas likh rah hoo.ab vah poora ho gayaa hai,lekin usme kahi n kahi ab jarman ke is kisan ki gaushaalaa ka zikra karana hi hoga.ap[ne desh mey bhi yah sab ho sakataa hai, lekin yahaan to gaay ka matalab hai keval 'duhana''. gaay ko behatar haalaat dene ki mansikataa hi nahi hai. kharcha hoiga n. yahaa kamaaee par nazar jyaadaa rahati hai isiliye gayey badhal hai. dhanyvaad aapko ki aapne sundar gaanv aur pragatisheel kisan ke baare mey itani sundar jankaree di.

सुलभ § Sulabh said...

आज आपके किसान मित्र के घर गौशाला और फसले देख मन प्रसन्न हुआ...

भारत में भी कम से कम सफाई पर विशेष ध्यान तो दिया ही जा सकता है.... तकनीक तो देर सवेर सबके पास आ ही जायेगी.

Mishra Pankaj said...

sahi mayano me yahi bloging hai sir ji

अन्तर सोहिल said...

हमने तो ऐसे गांव फिल्मों में ही देखे थे जी
यहां भारत की गाय तो अधिकतम 10 किलो दूध ही देती हैं

प्रणाम

राज भाटिय़ा said...

@ खुशदीप सहगल जी( एक लीटर ०,५० Cent) यानि ५० cent, एक € मै १०० cent होते है, अभी तो € का रेट काफ़ी नीचे चला गया है वेसे यह १€= ६० रुपये यानि ३० रुपये का एक लीटर दुध, हमारे यहां महंगाई बिलकुल नही है

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

भाटिया जी, आज तो आपने कमाल कर दिया. ऐसी ही जानकारियों और चित्रों की अपेक्षा है. जर्मनी के आम मजदूर और किसान के जीवन के बारे में जानें तो समझ में आता है कि जान की परवाह न करते हुए भी लोग पूर्वी जर्मनी के किसान और मजदूर वहां के शोषक कम्म्युनिस्ट बंदूकचियों से बचकर इधर क्यों आना चाहते थे.

राजकुमार सोनी said...

धूम लिया भाई साहब आपका गांव... यह गांव है कि शहर। जो भी हो अच्छा है।

RAJWANT RAJ said...

aasma bhi vhi , jmi bhi vhi
mehnt vha bhi vhi mehnt yha bhi vhi
frk hai to tkniki ka .
aise post ki daqumentri bnni chahiye jisse ki log labhanvit ho ske .

shikha varshney said...

वाह..... ऐसी एक .गौशाला यहाँ भी है ,ISCON मंदिर वालों की

rashmi ravija said...

बेहतरीन पोस्ट...चित्र और इतनी रोचक तरह से दी गयी जानकारी के लिए आभार...
अंग्रेजी उपन्यासों में विदेशों के गाँव के बारे में बहुत पढ़ा है...कुछ ऐसी ही तस्वीरे खींचती थी...पर आज आँखों देखे वर्णन ने उसे सम्पूर्ण कर दिया

नरेश सिह राठौङ said...

जानकारी बहुत ही रोचक है और चित्र तो बहुत ही जानदार है | आप से इसी प्रकार की पोस्ट की उम्मीद है |