01/01/10

वाह वाह कहते है शहीदो की चितऒ पर लगेगे हर वर्ष मेले(श्रद्धांजलि या उत्सव)

इस साल की पहली पोस्ट, ओर उस मै भी विरोध, अब करुं तो क्या करू, झुठ मुझे भाता नही, ओर सच बोले बिना, सच देखे बिना रह नही पाता, आज फ़िर एक खबर पर नजर पडी, दो चार दिन पुरानी है,अजी नही करीब एक महीना पुरानी है, लेकिन भारत के समाचार पत्रो मै तो शायद ही किसी एक कोने मै ऎसी खबर छपे सोचा आप से बांट लू.....तो लगाईये इस साल का पहला चटका ओर  पढिये इसे

25 comments:

परमजीत बाली said...
This comment has been removed by the author.
परमजीत बाली said...

संवेदनाएं मर चुकी हैं...और क्या कहे......बस दिखावा रह गया है और वह भी बेहूदा दिखावा...

Udan Tashtari said...

किस नजर से देखूँ, ए जिन्दगी तुझको..
दोष तेरा है या कि फिर मेरी नजर का...


-समीर लाल ’समीर’

-सुर कोठे पर भी सजते हैं और मंदिर में भी-फर्क होता है.


मैं इस आलेख की भावना से सहमत नहीं हो पा रहा हूँ, क्षमाप्रार्थी हूँ. मुझे लगता है पूरा प्रश्न नज़रीये का है.

Arvind Mishra said...

इसलिए ही तो गौतम बुद्ध उदासीन हो गए थे ....

जी.के. अवधिया said...

आज शोक किसे होता है? शोक भी तो एक दिखावा बन कर रह गया है। दिखावे की दौड़ ने हमारी भावनाओं तथा संवेदनाओं को खत्म कर के रख दिया है।

आप और अन्य सभी को नववर्ष की मंगल कामनाएँ!

वाणी गीत said...

बनावटी शोक सभाओं पर खूब नजर गयी आपकी ....!!

पी.सी.गोदियाल said...

दिखावा, आडम्बर और नक़ल मार गई इस देश को भाटिया साहब !

ताऊ रामपुरिया said...

शायद संज्ञा शुन्य हो गये हैं.

रामराम.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

नई इन पीढ़ियों मे अब, बढ़ी कृतघ्नता कितनी।
शहीदों की मजारों पर मनाने लग गये पिकनिक।।

rakhshanda said...

hamaara culture ab raha kahan...ham doosron ki zindgi ji rahe hain...aise mein unhi ki tarah insenstive hojana fitri hai...hairani kaisi?

महेन्द्र मिश्र said...

बस दिखावा रह गया है और वह भी बेहूदा दिखावा...

ab inconvenienti said...

कुछ सही या गलत नहीं होता सिर्फ अपना अपना अलग नज़रिया होता है. हमारी संस्कृति में शव को बैंड बाजों के साथ मरघट ले जाने की रस्म है, वहीँ पश्चिम में शादी भी ख़ामोशी में होती है. हम बस अलग हैं.

शोभना चौरे said...

aaj jab sab kuch bnavati ho gya hai to shok sbhaye kaise achuti rhegi ?

हरकीरत ' हीर' said...

मैं समझ नहीं पाई क्या कहना चाहते हैं ......शहीद हमारे देश शान होते हैं उनके सम्मान में अगर ऐसा आयोजन हो तो बुरा क्या है .....?

शहरोज़ said...

धर्म-वर्म, वाद-आद सब आज ढकोसला है! और देशभक्ति तो उस समय गायब हो जाती है जब मिलियन में देश का धन अवैध जमा किया जाता है.हाँ एक सम्प्रदाय विशेष को गलियाने में लोग ज़रूर देशभक्ति समझते हैं.
बेईमान रहो.भ्रष्ट रहो
लेकिन उन्हें गलियाते रहो
आप सब से बड़े देशभक्त हैं!

मेला--धेला से अच्छा हो की हम उनके बताये रास्ते पर किंचित भी चलने का यत्न करें.भगत सिंह को याद तो किया जाता है , मूर्ति या तस्वीर को हार पहनाने के लिए.लेकिन उनकी किताबों को उनके साहित्य को सार्वजनिक नहीं किया जाता.उनकी बातों का प्रचार-प्रसार नहीं किया जाता.!

आप की पकड़ समय की नब्ज़ पर रहती है, बहुत विशवास मज़बूत होता है अपना!

ज्योति सिंह said...

hame itna bhi nahi badalna chahiye ki apni pahchan kho de ,dikhave me sachchai chhali jaye .bahut sundar post lagi .

संजय भास्कर said...

बनावटी शोक सभाओं पर खूब नजर गयी आपकी ...

G M Rajesh said...

mai gayaa tha ek fauji jagah par.
shaheedon ke naam vahaan jal rahe the deepak.
jab jab bhi veerataa ka paigaam dena tha deepak sandesh dete najar aate the.
shaheedon ke naam lage ye mele maine dekhe.
han ek baat ka dukh jaroor hai ham civilians ki duniyaa in jajbaaton se behad door hain.

दिगम्बर नासवा said...

दिखावा और झूठे आडंबर ही रह गये हैं आज ........ शर्म आती है .........

नरेश सिह राठौङ said...

हम तो अब आदी हो गए है इन चीजों के ,आप को अजीब सा लगता है |

सतीश सक्सेना said...

वाकई ! बहुत सटीक और सही लिखा है भाई जी !

rashmi ravija said...

मन तो जरूर व्यथित होता है,जब सिर्फ झूठा आडम्बर ही रह जाता है, और शहीदों ने किसलिए शहादत की..इसे सब भूल जाते हैं.

Babli said...

आपको और आपके परिवार को नए साल की हार्दिक शुभकामनायें!
बहुत बढ़िया लिखा है आपने!

निर्मला कपिला said...

वाकई आपकी नज़र दूर से भी सब कुछ देख रही है। इन शोक सभाओं का क्या कहें शहीदों का तो नाम होता है बस । मनोरंजन अधिक है श्रद्धाँजली कम धन्यवाद

योगेन्द्र मौदगिल said...

अच्छी पोस्ट

और हां स्वागत है भाटिया जी, रोहतक आएं तो बताएं....... बताएं क्या हमारी कुटिया में आएं संपर्क ०९८९६२०२९२९ और ०९४६६२०२०९९