01/09/08

चिंतन दीपक

हम मे से कई लोग अच्छा काम करना चाह्ते हे, लेकिन कई बार दुसरे लोग जो इस भावना को नही समझते, कोई ना कोई कमी कोई ना कोई बात जरुर निकालेगे, जिस से उस काम करने वाले को किसी तरह से अपने मकसद से हटाया जाये, उस को नीचा दिखाया जाये, आज का चिंतन इसी बात पर हे....
तो लिजिये आज का चिंतन आप के सामने हे....

एक मुह्ल्ले मे एक गरीब बुढिया रहती थी, उस के दो जवान बेटे थे, लेकिन दोनो ही उसे इस बुढापे मे छोड कर बाहर दुसरे शहर मे चले गये नोकरी चाकरी करने के लिये, बुढिया दिन भर इधर उधर घुमती, फ़िर थोडा बहुत खाना बना कर खाती, अपना पेट भर लेती, लेकिन अब उसे यह जिन्दगी बेकार लगती, उसे लगता, अब वो बेकार जिन्दा हे किसी काम की नही, बस खाना ही खाती हे।

वह बुढिया जिस गली मे रहती थी, उसी गली के सामने एक नाला बहता था, जिस की वजह से वहां बहुत कीचड रहता था, ओर बरसात के मोसम मे तो ओर भी गन्दा हाल हो जाता था, एक बार एक परदेशी वहां से गुजरा तो उस का पेर फ़िसल गया , जिस के कारण उसे बहुत चोट आई, बुढिया उसे सहारा दे कर अपने घर तक लाई, ओर उसकी चोट पर पट्टी वगेरा बांधी, जब थोडा दर्द ठीक हुआ तो वह राहगीर इस मां का धन्यवाद करके चला गया।

अब उस बुढिया को जीने का एक सहारा एक मकसद मिल गया, हर शाम को बुढिया उस स्थान पर एक दीपक जला कर रख देती ताकि हर आने जाने वाले को मुस्किल ना हो, पहले पहल लोगो ने इसे बुढिया की सनक समझा, ओर उस का मजाक भी उडाया, लेकिन जब देखा की कई महीनो से उस दीपक की वजह से वहां कोई दुर्घटना नहि हुयी, तो सभी उस बुढिया की तारीफ़ करने लगे, कहते हे उस बुढिया के मरने के बाद भी उस गली वाले नियम से बारी बारी अब भी वहां दीपक जलाते हे।

चलिये हम भी कोई ऎसा दीपक जलाये जिस से लोगो को सहारा मिले राह मिले, ओर जो दीपक जलाये उस दीपक से अगला दीपक जलाये तो सभी भटके हुओ को रास्ता मिल जाये।

25 comments:

Anil Pusadkar said...

wah, achha udahran.aabhar achhi post padhne ka mauka dene ka

दीपक said...

निश्चीत ही भाटिया जी मरने के पहले यह सुकुन मै अवश्य ही चाहुंगा !!

अभिषेक ओझा said...

एक और अच्छा और व्यवहारिक विचार !

Ramesh said...

बहुत खूब दोस्त। सच में अंधकार चाहे जितना पुराना हो एक नन्हा सा दीपक सदियो-सदियों का अंछकार मिटा सकता है। अगर हम सब अपने अपने स्तर पर एक-एक दीप जलाते चले तो चारों ओर प्रकाश ही प्रकाश होगा।

रमेश

mamta said...

अति उत्तम विचार।

अनुराग said...

achhi seekh raj ji.....

seema gupta said...

" the story contain a hidden mesaage of humanity and emotions for others, a very touching story, hope your message goes deep into every body's heart "

Regards

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत शिक्षा दायक और प्रेरणास्पद कहानी
सुनाई आपने ! बहुत धन्यवाद आपका ! पर
आजकल ऎसी अम्माओं का नितान्त अभाव
है ! पर हीरा कोहीनूर तो एकाध ही निकलता है
जो सबको रोशनी देता है ! और श्रद्धा स्वरुप
दिया जलाना भी हमारी नेक भावना को ही
व्यक्त करता है ! हमारी तरफ़ से भी अम्माजी
को प्रणाम !

रश्मि प्रभा said...

raaj ji ,aap jo drishtant prastut karte hain,wah sahi arthon me ek bahut achhi baat sikha jaati hai,
maksad jeene ka isi tarah dhoondhna chahiye,
bahut achha laga

भूतनाथ said...

भूत काल की बहुत सुंदर कहानी सुनाई आपने !
सारे जिंदा मनुष्य इतने सज्जन हो जाए तो ये
धरती ही स्वर्ग हो जाए ! अम्माजी को नमन !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

काश ऐसा निस्वार्थ मकसद हम सब खोज सकें!

महेंद्र मिश्रा said...

"koi esa dee jalaye ki jisase logo ko sahara mil sake"
sarahaniy bahut hi prerak post . abhaar

Gyandutt Pandey said...

सच कहा भाटिया जी, एक जिन्दगी का मकसद तलाश लेना चाहिये।
बहुत सुन्दर।

जितेन्द़ भगत said...

अच्‍छी सबक थी, याद रखूंगा सर।

कुन्नू सिंह said...

बहुत अच्छा उदाहरण दीया है।
और पढ कर बहुत अच्छा लगा।

पहले तो लगा की जो राहगीर गीरा वो उसका बेटा ही होगा।

Lavanyam - Antarman said...

Yes, it is very important in life to find the right direction & aim.

परमजीत बाली said...

ब्हुत प्रेरक कथा है।आभार।

Lovely kumari said...

इस दीपक का उजाला हमेसा कायम रहे यही प्रार्थना है

Radhika Budhkar said...

बहुत अच्छी कहानी राज जी ,बहुत अच्छी सिख मिली इस कहानी से .

आपकी जानकारी के दोनों :मेरे ब्लोग्स वाणी और मंथन बंद हो गए हैं ,जिनके स्थान पर मैंने वीणापाणी जिसका URL http://vaniveenapani.blogspot.com/ हैं .और आरोही जिसका URL हैं http://aarohijivantarang.blogspot.com/ शुरू कर दिए हैं .

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

प्रेरक प्रसंग...
अन्धकार को क्यों धिक्कारें,
नन्हा सा एक दीप जलायें...

यहाँ आने में मुझसे देर हुई, इसका अफ़सोस होने लगा है। सादर।

दीपक तिवारी said...

अम्माजी को तिवारी साहब का सलाम !
बहुत उम्दा सीख ! धन्यवाद !

makrand said...

बहुत ही प्रेरक कहानी है ! अम्मा को प्रणाम !

सतीश पंचम said...

प्रेरक तो है लेकिन आजकल के जमाने में अव्यवहारिक है, वजह साफ है...किसी को किसी से मतलब नहीं है....क्योंकि अपने से ही फुर्सत लोगों को कम मिलती है, दुनियादारी की कौन कहे। एकाध उदाहरण हैं....वैसे शायद अनिल पुसदकर के ही पोस्ट पर पता चला था कि एक अमीर IAS अफसर बिना वेतन काम करते हैं......मात्र सेवा हेतु, ऐसे लोग कम ही हैं।
अच्छी पोस्ट।

कामोद Kaamod said...

प्रेरकता से भरपूर..
आभार

सतीश सक्सेना said...

राज भाई !
आपका यह लेख आज की आवश्यकता है ! आपने बहुत सुंदर द्रष्टान्त दिया है, मगर इस विषय पर आपको और पढ़ना चाहता हूँ ! यह सबकी आवश्यकता है !