08/08/08

जब हम ने रिशवत दी

आज सुबह से ही दिमाग मे एक कीडा कुलबुला रहा था तो सोचा एक किस्सा लिख देता हु जो आज से कई साल पहले मेरे साथ घटा था...

बात बहुत पुरानी हे, शायद १९९३ की मेरा एक लडका अभी १ साल के आस पास था ओर दुसरा २ साल के आस पास था, महीना मार्च का था, हम भारत आये थे ओर यह बात एयर पोर्ट की हे, जब हम दिल्ली एयर पोर्ट पर उतरे, तो बच्चो के साथ पहली बार आये थे, इस कारण बहुत परेशान थे,फ़िर दिल्ली एयर पोर्ट पर इमेग्रेशन करवाने के लिये लम्बी लाईन मे लगे, उधर बच्चे रो रहे हे, दुसरी बात जर्मन मे खुब बर्फ़ गिर रही थी ओर दिल्ली मे खुब गर्मी, यानी बहुत ही परेशान, चलिये काफ़ी देर के बाद हमारा ना० भी आ गया इमिग्रेशन करवाने के लिये.

हम साहब के पास पहुचे, ओर स्भाव के अनुसार हम ने उन्हे नमस्ते की,भाई साहिब ने कोई जबाब नही दिया ओर एक लम्बी सी उवासी मार कर अपना चशमा उतारा ओर उसे साफ़ करने लगे, फ़िर अपनी फ़ाईल बस यु ही देखने लगे, काफ़ी देर तो मे उन्हे देखता रहा, फ़िर तंग आ कर मेने कहा जनाब आप अपना काम शुरु क्यो नही करते, मेरे बच्चे रो रहे हे आप की जान को, तो उन साहिब ने हमे गुस्से से देखा, ओर बोले दिख नही रहा मे काम कर रहा हू, तो मेने कहा कोन सा काम कर रहे हे,यह पकडिये मेरे पास पोर्ट ओर चेक किजिये, लेकिन नही उन्हे कोई असर नही हुआ, दोनो हाथो की उगलियां एक दुसरे मे फ़ंसा कर फ़िर से बत्मीजी करने लगे,अब मे जोर से चिल्लया तो मेरे दोनो( उन दिनो बच्चो के नाम मां बाप के पास पोर्ट पर चढ जाते थे) पास पोर्ट ले कर उन्हे अजीब ढग से खोल कर देखने लगे, ओर मेरे सबर का प्याजा भरा जा रहा था,

तभी बोले यह दो पास पोर्ट आप के ओर आप की बीबी के हे, मेने कहा जी फ़िर दोनो पास पोर्ट पर बच्चो के नाम क्यो हे ? मेने बडे प्यार ओर इजजत से जबाब दिया सर कभी बीबी बच्चो को ले कर भारत अकेली भी तो आ सकती हे इस लिये, हूं फ़िर से सारे पेज उलट पलट करने लगे, मेने कहा सर आप को कुछ मिल नही रहा तो बताये मे आप की मदद कर देता हु, मेरी तरफ़ देखा( मुझे लगा जेसे किसी बकरे को देखा हॊ) ओर बोले नया पास पोर्ट कब बनबाया,तो मेने कहा दो महीने पहले ही तो बनबाया हे, अच्छा अच्छा तो पुराना कहां हे, मेने कहा वो तो मेने दुता वास को वापिस भेज दिया था, हुं लेकिन मुझे क्या पता मुझे तो आप के पुराने पास पोर्ट भी चाहिये,( मे अन्दर से अच्छी तरह से जल भुन गया था लेकिन गुस्से को दबा रहा था) तो मेने कहा आप थोडी देर यहा रुकिये मे वापिस जर्मन जा कर दुता वास से अभी पुराने पास पोर्ट लेकर आता हू, अब तो उन साहिब को बहुत गुस्सा आया, बोले लगता हे तुम ने अन्दर नही जाना यहां से वापिस जाना हे, तभी मेरी बीबी ने मुझे शांत रहने का इशारा किया, तो जनाब ने देख लिया, ओर बोले बहन जी इन्हे गुस्सा बहुत आता हे, इन्हे थोडा सम्झाओ,

मे फ़िर उन से प्यार से बात करने लगा हर बात मे सर जी बोलने लगा तो बोले अब लाईन पे आये हो, मेने का जी सर जी, बोले देखो हम भी बच्चे वाले हे हमारा भी ध्यान रखो,( मेने दिल ही दिल सोचा बेटा अब आया हे लाईन पे याद रखना हम को भी) मेने कहा क्यो नही सर, बोले कुछ रुपये , मेने कहां मेरे पास रुपये तो, तभी बोले अरे डालर, मार्क जो भी हे चले गे. मेने झट से ५० मार्क उन्हे दे दिये, ओर उन्होने मुझे मेरे दोनो पास पोर्ट लोटा दिये, बोले अब जाओ, लेकिन मे वहां जमा रहा, बोले भाई आप का काम हो गया अब जाओ, मेने कहा सर जी पहले मुझे ५० मार्क की रसीद दो, केसी रसीद, मेने कहा सर अभी मेने आप को जो ५० मार्क दिये हे उस की रसीद, तो बोले केसे मार्क मेने कहां वो जो आप ने नीचे कही फ़ेंके हे इतनी देर मे उन का कोई ओफ़िसर आ गया, ओर मेरे से बोला सर कोई शिकायत हे, तो पहले वाले सज्जन बोले जी नही यह तो हमारे जान पहचान के हे ओर मेरे दोनो हाथ अपने हाथो मे लेकर मेरे ५० मार्क भी वापिस किये ओर दयानीय सी शकल से मेरी ओर देखने लगा, जेसे मिन्न्त कर रहा हो, मेने सारी बात उस के ओफ़िसर को बाताई ओर ५० मार्क भी दिखाये,फ़िर हम तो वहा से आ गये पता नही बाद मे क्या हुआ

13 comments:

Anil Pusadkar said...

sir jee aap bhi bachpan se hi aise hi ho lagta hai.zabardasti fate me pair dalna aur fir chillana bachao-bachao.mazaa aa gaya aaj, apan bhi kuch aise hi the,the kya hain.aaj bhi lafde hote rahte hai,aapko to aadarniya bhabhjee ne shaant kara diya yanha to wo lafda bhi nahi hai,bus dost gaaliyan bakte hai chhuta saand hai..ha.ha.ha sach me mazaa aa gaya

योगेन्द्र मौदगिल said...

बढिया संस्मरण. पूरी किस्सागोई के साथ.
वाह भाटिया जी, वाह.....

G M Rajesh said...

kal main mansurbhai ko padh rahaa tha to unhone yakin dila diya shabdon se
aur apne ki kagaj jo aapne diyaa woh lakshi katai nahin saraswati maa hi thi.

बालकिशन said...

ये बहुत ग़लत बात है आपतो हमारे यंहा का सिस्टम ही ख़राब करने पर तुल गए जनाब.
ये आपने सही नही किया.

Advocate Rashmi saurana said...

sahi bolu to agar me hoti to aesa nahi karti. mujhse kisi ka dard nahi dekha jata hai. lekin aapne bhi sahi kiya hai. jo galat hai uska virodh to karna hi chahiye. taki fir kisi ke sath aesa na ho.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत खूब! अगर उस बाल-बच्चेदार बेशर्म का फोटो भी ले सकते तो क्या ही बात होती!

P. C. Rampuria said...

यो तो भई भांग आल्ला कुँआ सै ! इत्
और के मिलण की उम्मीद करी थी ?

Udan Tashtari said...

ये आपने क्या किया-तभी उसने हमसे पैसे नहीं लिये और हमें जबरदस्ती लाईन में लगना पड़ा-टाइम खोटी गया.

Anwar Qureshi said...

kisi ke pet mein laat nahi maarna chahiye .. aap ko india ka dastur nahi maalum hai kya? haan uswakt tak to nahi maalum hoga ? lekin ab to maalum hai na ...??? dhanywad ...

राज भाटिय़ा said...

आप सब का बहुत बहुत धन्यवाद,
अनबर कुरेशी साहब सलाम, भाई मेने किसी के पेट पर लात नही मारी, मेने भी भारत मे ५ साल सरकारी नोकरी की हे मेरे पिता जी ने ४०,४५ साल सरकारी नोकरी की हे,लेकिन एक पेसा नही रिश्वत का खाया, भाई आप मुझे बतायेगे हराम का पेसा क्या होता हे??? ओर यह हराम की कमाई क्या जायज हे, क्या गलत काम करने वाले के साथ सहनुभुति दिखानी चाहिये, उस समय मेरे पास समय कम था वरना उस आदमी को मे वो सवक देता की आस पास वाले भी भीख मांगने से वाज आते, मियां ना मेने गलत किया हे ना गलत सहता हु, धन्यवाद

pallavi trivedi said...

mere hisab se paise dene wala aur paise lene wale donon hi bhrashtachar ko badhava dete hain....ham line mein na lagna pade isliye paise khilate hain fir dosh system ko dete hain...

Rajesh Roshan said...

भाटिया जी हिन्दी की वर्तनी की इतनी गलतिया हैं कि ठीक से पढ़ा नही जा रहा.... बहुत सारी गलतिया हैं.... आप जरा गौर से पढ़े और ध्यान से लिखे.... मुमकिन है गलतिया जाती रहेंगी.... मेरी बातो को दिल से नही लगाईएगा

सतीश पंचम said...

रोचक संस्मरण है।