12/07/08

फैसला

एक मोहल्ला था। किस गांव या शहर में था, इस बात का इस कथा से कोई सम्बन्ध नहीं है। मोहल्ले में कई घर थे। घरों में लोग रहते थे। चूंकि सभी लोग एक ही मोहल्ले में रहते थे, इसलिये वे सभी पड़ोसी थे। इन्हीं पड़ोसियों में से दो अड़ोसी-पड़ोसी थे। अड़ोसी-पड़ोसी मतलब - उनकी छतें एक दूसरे से मिली हुई थीं। एक के घर तरकारी में छौंक लगता था तो खुशबू दूसरे के घर में आती थी। एक के आंगन में झाड़ू लगती तो धूल उड़कर दूसरे के आंगन में पहुंचती। किस्सा ये कि किसी एक के भी घर में सास-बहू में झगड़ा होता तो पड़ोसी को पता पहले चलता, घर के मर्दों को बाद में । इनमें से एक छोटा पड़ोसी था - एक बड़ा पड़ोसी। छोटा पड़ोसी छोटा इस मायने में कि - उसका घर छोटा था, उसका परिवार छोटा था, उसकी आमदनी छोटी थी। बड़े पड़ोसी का घर बड़ा था, उसके लड़के भी एक-दो नहीं पूरे सात थे। सातों हट्टे-कट्टे जवान। उसके पास जमीन जायदाद भी छोटे पड़ोसी के साथ-साथ और दूसरे कई पड़ोसियों के मुकाबले ज्यादा थी। तो बात साफ हुई - एक छोटा पड़ोसी, एक बड़ा पड़ोसी। वे दोनों अच्छे पड़ोसी नहीं थे। कारण - छोटा पड़ोसीर् ईष्यालु था तो बड़ा पड़ोसी स्वाभाविक रूप से घमंडी। बड़े पड़ोसी के ऊपर बड़प्पन कुछ इस तरह हावी था कि वह अपने सामने छोटे पड़ोसी को कुछ गिनता ही नहीं था। जब कभी भी बड़े पड़ोसी-छोटे पड़ोसी का आमना-सामना हुआ तो बड़े पड़ोसी ने अपनी तरफ से कभी भी राम राम- दुआ सलाम की पहल नहीं की। वह छोटे पड़ोसी को सचमुच छोटा ही समझता था और उसकी ओर कभी ध्यान ही नहीं देता था। छोटे पड़ोसी को बड़े पड़ोसी का यह बड़प्पन सहज ही हजम नहीं होता था। लिहाजा जब कभी उसकी बहू चूहेदानी में कुछ चूहे फांस लेती तो वह उन चूहों को बड़े पड़ोसी के घर की तरफ छोड़ देता। जब कभी उसकी बीबी छत पर झाड़ू लगाती और वह मौजूद होता तो वह कूड़े को बड़े पड़ोसी की छत के किनारे से डलवा देता। गरज ये कि वह बड़े पड़ोसी को तंग करने के नए-नए बहाने ढूंढ़ता रहता और उन्हें अमल में लाता जिससे बड़े पड़ोसी को मजबूरन उसका नोटिस लेना पड़ता। एक बार बड़ा पड़ोसी एक भैंस खरीदकर लाया। उसने उस भैंस का खूंटा अपने दरवाजे पर, छोटे पड़ोसी के घर की तरफ वाले कोने पर, गाड़ दिया। अब ये कि जब भी भैंस गोबर करती या पेशाब करती तो उसके छींटे छोटे पड़ोसी के दरवाजे तक भी जाते। बदबू आती सो अलग। छोटे पड़ोसी को तकरार का नया बहाना मिल गया। वह मन ही मन खुश हुआ। यह बात अलहदा है कि भैंस के कारण वह सचमुच दुखी भी था। उसने बड़े पड़ोसी को अपनी आपत्ति दर्ज कराई कि वह अपनी भैंस का खूंटा कहीं और गाड़े क्योंकि इसकी वजह से उसे परेशानी होती है। बड़े पड़ोसी ने अपने स्वाभाविक बड़प्पन का परिचय देते हुये उसकी बात मुस्कुराते हुये सुनी और उसकी आपत्ति पर विचार करने का आश्वासन देते हुये विदा किया। इस बात से छोटा पड़ोसी और कुढ़ गया। स्साला..... अपने आप को जाने क्या समझता है । मारे क्रोध के उसका मन हुआ कि अभी वापस जाए और बड़े पड़ोसी की खोपड़ी पर लट्ठ दे मारे । परन्तु वह ऐसा नहीं कर सकता था क्योंकि इसका परिणाम क्या होगा यह वह अच्छी तरह से जानता था। बड़े पड़ोसी के सात भूतों जैसे बेटों से वह अच्छी तरह से परिचित था। बहरहाल छोटे पड़ोसी की शिकायत-सह-अपील के कई दिनों बाद तक भी खूंटा और भैंस दोनों अपनी जगह यथावत थे। उसकी अपील पर विचार किया गया था या नहीं, कोई नहीं जानता। एक दिन छोटा पड़ोसी कही बाहर जाने की तैयारी में था। जैसे ही उसने घर के दरवाजे से बाहर पैर रखा कि छपाक्...... की आवाज के साथ भैंस ने गोबर विसर्जन कर दिया। उस दिन भैंस का हाजमा कुछ खराब था, शायद इसीलिये गोबर का स्वरूप आम दिनों की अपेक्षा कुछ पतला था। छोटे पड़ोसी महाशय के कपड़े छींटों की जद में आने से न बच सके। उफ्...........। भनभनाता हुआ वह बडे पड़ोसी की बैठक के दरवाजे पर पहुंचा। आज फैसला होकर ही रहेगा........। परन्तु वहां कोई भी नहीं था। शायद वे लोग खेतों पर गये थे। वैसे ही फनफनाता हुआ वह लौटा और उसने भैंस की सांकल खूंटे से निकाल कर खोल दी और भैंस को जोर की लात जमाई। पता नहीं आजादी मिलने की खुशी थी या लात के प्रहार से उपजा दु:ख, भैंस बड़े जोर से कुदकती हुई गली में भाग गई। अपने कपड़ों पर पड़ें हुए गोबर के छींटों को साफ करता हुआ छोटा पड़ोसी भी जहां जाना था वहां को चला गया। दो दिन बाद जब छोटा पड़ोसी वापस आया तो उसके दरवाजे का स्वरूप एकदम बदला हुआ था। उसके दरवाजे की दहलीज से सटाकर भैंस का खूंटा गड़ा हुआ था, खूंटे से भैंस बंधी थी। भैंस ने गोबर, फिर पेशाब और फिर उसके ऊपर चहलकदमी कर करके कीचड़ का वह आलम बनाया था कि बिना पैर गन्दे किये घर के अन्दर जाया नहीं जा सकता था। खैर ज्यादा क्या कहें, अंतत: पंचायत बुलाने की नौबत आनी थी, सो आ गई। सारे मोहल्ले के लोग जमा हुये। पंचायत बैठी। बड़ा पड़ोसी भी आया। उसके सातों भूतों जैसे बेटे भी आये। सातों के हाथों में लाठियां थीं। छोटे बेटे के साथ गांव के सात भूत और भी थे। वे थोड़ा हटकर आक्रमण के लिये तैयार वाली मुद्रा में बैठे थे। पहले छोटे पड़ोसी ने क्रोध और भावावेश के मिले जुले स्वरूप में अपनी बात पंचायत के सामने रखी। उसका दुख सुनकर पंच भावुक हो गये। फिर बड़े पड़ोसी को अपनी बात रखने के लिये कहा गया। बड़ा पड़ोसी बोला - मैं भला आप लोगों के सामने क्या बोलूं। पंच परमेश्वर होता है। पंचायत की बात भगवान का आदेश होती है। आपका कहा हुआ सिर माथे, परन्तु ....- परन्तु क्या ? पंचों में से किसी ने पूछा। बड़े पड़ोसी ने अपने बेटों की ओर एक नजर देखा। छोटे बेटे और उसके साथियों की ओर देखा। फिर अपनी बात पूरी की - परन्तु खूंटा अब जहां गड़ गया है वहां से नहीं उखड़ेगा।

9 comments:

अनुराग said...

सही बात है जी जहाँ खूंटा गडा हुआ है आज तक वही है.....कितने छोटे पड़ोसी दर बदर मारे फ़िर रहे है.....

Prashant said...

mast hai ji..
ant me hansi aa gayi.. magar yahi sach bhi hai,,

Gyandutt Pandey said...

बढ़िया नेगोशियेसन तकनीक है। खूब तर्क-वितर्क-कुतर्क कर लें; पर अन्तत: खूंटा वहीं गड़ेगा! :D

महेंद्र मिश्रा said...

sahi hai aajakal khoote ka hi jor hai jahan gad gaya so gaad diya .bahut badhiya kahani raaj ji . dhanyawad.

SUNIL DOGRA जालि‍म said...

वाह, खूंटा तो खूंटा है..

राज भाटिय़ा said...

आप सभी का धन्यवाद, इस खूंटे के दुख को बांटने के लिये

सतीश पंचम said...

खूंटा यदि हट जाता तो शायद उस बडे पडोसी के बेटे खुद उसे ही खूंटे से बांधने मे कोर कसर न रखते :)
अच्छी रचना।

Udan Tashtari said...

खूंटा तो वहीं गड़ा रहेगा.

rakhshanda said...

एक दम सही, जहाँ खूंटा गडा था वहीं रहेगा,बहुत ही सुंदर, अंदाज़ वाही हैं आपके, बहुत खूब...