10/07/08

चिंतन,ईर्ष्‍या

आज का विचार... हम अनजाने मे ही अपना बुरा करते जाते हे,जब की दुसरे का बुरा करना चाहते हे,जिसे सीधे शब्दो मे हम जलन कहते हे,दुसरो कॊ हर बात से जलाना, ईर्ष्‍या
करना, इस से अन्य व्याक्ति का कोई नुक्सान तो नही होता बल्कि हम अपना ही नुकसान करते जाते हे...तो आये विचार करे इस बात पर ओर बचे इस नुकसान से...
जेसे आज कल बेनामी टिपण्णियो की बरसात हो रही हे उन टिपण्णियो से किसी को नुकसान तो नही हो रहा, लेकिन उस टिपण्णी देने वाले/वाली की ईर्ष्या का पता चलता हे,ओर उस ईर्ष्या से किस का नुकसान हे... तो यह पढे आज का विचार

दो भाईयो की दुकान एक ही बजार मे थी, ओर थी भी बिलकुल आमने सामने,ओर दोनो भाई बेचते भी एक ही तरह का समान थे, दोनो की दुकाने भी भगवान की दया से चलती भी खुब थी,पेसो की कमी भी दोनो को नही थी, लेकिन इस के वावजुद दोनो भाईयो की सेहत दिन पर दिन गिरती जाती थी,बहुत दवा दारु किया,झाड पुछ भी करवाया,पुजा पाठ यानि सब कुछ करवाया लेकिन दोनो भाईयो की सेहत मे कोई भी फ़र्क नही आया, थक हार कर अब दोनो भाई जादु टोनो बालो के पास भी गये लेकिन बात फ़िर भी ना बनी,ओर दोनो भाई यह सोच कर बेठ गये कि कोई लाईलाज बिमारी लग गई हे.समय बीतता रहा, एक दिन एक रिश्तेदार जब उन्हे मिलने आया तो दोनो भाईयो को देख कर हेरान हुया, फ़िर दो चार दिन उन के साथ रहा ओर जाने से पहले बोला मेरे पास एक ईलाज हे आप दोनो की बिमारी का, लेकिन थोडा कठिन हे,दोनो भाई सुन कर खुश हुये ओर बोले बताओ हम सब कुछ करने को तेयार हे, तो उस रिशते दार ने कहा ईलाज शुरु करने से पहले आप दोनो को अपना स्थान बदलना पडेगा,दोनो भाई कुछ समझ नही सके तो, रिशतेदार बोला तुम दोनो भाई एक महीने तक अपनी दुकान मे मत जाना, बल्कि एक महीना दुसरे की दुकान इमान्दारी से समभालाना, उस के बाद तुम्हारा ईलाज करुगा,दुसरे दिन से ही भाई एक दुसरे की दुकान सम्भालने लगे.
एक महीने के बाद जब वह रिश्तेदार इन से मिलने आया तो दोनो भाई काफ़ी स्वस्थ दिख रहे थे,ओर काफ़ी खुश भी थे, तब रिश्तेदार ने कहा की आप दोनो को कोई भी बिमारी नही बस तुम दोनो मे ईर्ष्‍या थी,जब तुम अपनी अपनी दुकान पर बेठे दुसरे की दुकान मे ग्राहक को जाते देखते थे तो जलते थे, ओर यह बात मेने दो दिन तुम्हारे साथ रह कर देखी थी, ओर उसी ईर्ष्‍या से तुम अपना ही नुकसान करते थे, अब तुम दुसरे की दुकान पर बेठ कर अपनी दुकान मे जाते ग्राहक देख कर खुश होते हो, यही तुम्हारे स्वस्थ होने का राज हे,
तो हमे कभी भी दुसरो से ईर्ष्‍या या जलन नही करनी चाहिये

9 comments:

Udan Tashtari said...

हमे कभी भी दुसरो से ईर्ष्‍या या जलन नही करनी चाहिये

--उत्तम विचार!!

advocate rashmi saurana said...

bilkul aap sahi kha rhe hai. lekh me bhut dum hai. likhate rhe.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सही चिंतन ...

mehek said...

bahut hi sahi baat,irsha ke danav se bachke rehna chahiye,magar saheli ki saari agar sundar ho to apneaap irsha ho jati hai usse,halaki usska bura nahi chahe hum :)

अनुराग said...

राज जी मस्त रहिये.....ऐसे लोगो को नेगलेक्ट करना ही सबसे अच्छा तरीका है....

अभिषेक ओझा said...

उत्तम विचार

महेंद्र मिश्रा said...

sahi kah rahe hai aap . saty bachan hame doosaro se jalan nahi karana chahiye. uttam vichar abhivyakti. dhanyawad.

kmuskan said...

bi;kul sahi kaha hai .irsha se hum kisi or ka nahi khud ka hi nuksaan karte hai

राज भाटिय़ा said...

आप सब के पाधारने का धन्यवाद,