04/05/08

पता नही कोन किस रुप मे मिल जाये 2

मां ने कहा गर्मी बहुत हे जल्दी से नहालो फ़िर खाना खा लेना, मेने सोचा मां ने मेरे नये कपडे प्रेस कर के रखा दिये होगे, ओर मे नहाने चला गया, ओर फ़िर मां को आवाज दी की मेरे कपडे दो,अब थोडी देर मे मां की आवाज आई अरे कहा रखे हे कपडे, ओर मे जलता भुनाता तोलिया लपेट कर बाहिर आ गया, ओर बोला मां जल्दी से कपडे दो,लेकिन मां को भी नही पता था कपडो का फ़िर मेने पुछा पापा तो नही आये थे, क्यो की कई बार पापा ही मेरे नये कपडे पहन कर चले जाते थे, ओर उन्हे खुशी होती थी कि बेटा बराबर का हो गया हे,मां ने कहा नही वो दिल्ली से क्या तेरे कपडे पहनाने के लिये आयेगे ? फ़िर मेने सारा घर छान मारा आस पास सभी जगह देखा, कहीं भी नही मिले कपडे, फ़िर अडोसी पडोसीयो पर शक करने लगा जो हमारे दुख मे काम आते थे, कभी सोचु किसी ने मजाक किया होगा, कभी सोचु मे सोया ही क्यो ? एक सप्ताह तक मेने कपडे ढुढे लेकिन कपडे नही मिले, ओर मां ओर पिता जी ने मुझे उदास देख कर फ़िर से नये कपडे बनबा दिये, लेकिन पहले बाले कपडे मेरे दिमाग से नही गये.


फ़िर एक दिन पडोस वालो के बर्तन चोरी हो गये, दुसरे दिन किसी का कम्बल चोरी हो गया जो कम्बल ले कर सोया था, इसी तरह से काफ़ी चोरिया होनी शुरु हो गई, मेरे कपडे चोरी हुये अब मुझे यकीन हो गया था, ओर अब चोर को पकड कर मे अपने कपडे वापिस लेना चाहता था, कहते हे कोशिश करने से भगवान मिल जाता हे मुझे तो अब उस चोर की खोज थी जो मेरे कपडे ले उडा था.

हमारी कोठी के सामने ही एक परिवार भी नयी कोठी बनबा रहे थे, उस परिवार का मुखिया जिसे सब लाला जी( इज्जत से) कहते थे, सारा दिन रह्ते थे अपने नये मकान के काम पर ध्यान रखते थे, हमारा मकान उन के मकान के विलकुल सामने था, सो पडोसी होने के नाते हम लोगो से उनका हमारे घर मे ज्यादा आना जाना था, कभी पानी के लिये, कभी सिमेण्ट रखने के लिये ओर सभी मिल जुल कर एक दुसरे की मदद करते थे, फ़िर उन की कोठी का लेण्टर ( छत ) पड गई, सो १० १५ दिनो के लिये काम रुक गया,एक दिन वह बुजुर्ग हमारे घर आये ओर बोले मे भी एक सप्ताह के लिये बच्चो के पास जा रहा हु,आप थोडा ध्यान रखे, वह हमारे घर थोडी देर रुके जब जाने वाले थे तो उन के मकान की तरफ़ से कुछ अजीब सी आवाज आई,फ़िर बन्द हो गई थोडी देर बाद फ़िर कुछ वेसी ही आवाज आई, तो वह बुजुर्ग गेट की चाबिया ले कर जाने लगे, उस से पहले ही मे कुद कर उन की चार दिवारी से उस मकान के अन्दर घुस गया, सब पीछे से सावधान करते रहे, मेरे अन्दर कुदते ही एक अन्य प्राणी पिछली दिवार फ़ांद कर दुसरी तरफ़ कुद गया, उस उम्र मे तो बन्दरो से भी ज्यादा चुस्ती थी, हम भी एक ही छलांग मे उस के पीछे कुद गये, ओर उस के पीछे भागे वो आगे आगे हम पीछे पीछे तबी लगा की वो हम से तेज भाग रहा हे, ओर उसे पकड कर हम अपने कपडे बसुल सकते हे, लेकिन पकडे केसे, तभी नजर पडी एक सरदार जी पर( जिन्हे हम चाचा जी ) कहते हे, ओर हम जोर से चिल्लये पकडो चोर कॊ, अब चाचा समझे की बच्चे आपिस मे खेल रहे हे, लेकिन जब मेने उन्हे बार बार कहा तो वो चोर पकडा गया, हम भी वहा पहुच गये सासं काफ़ी चढी थी पता नही कितना भगाया उस गधे ने.



जब सांस मे सांस आया तो सब ने ध्यान से मेरी बात सुनी( वह चोर भी १४,१५ साल का लडका था ) ओर फ़िर सब ने उस लडके से पुरी बात पुछी,लेकिन वह लडका कोई भी जबाब सही नही दे पा रहा था,फ़िर उसे सब घेर कर हमारे घर ले आये,ओर धीरे धीरे भीड बढती जा रही थी,ओर मुझे जल्दी थी अपने कपडो के बारे जानने की,फ़िर पता नही किस ने शुरु किया उसे पीटना, ओर सभी उसे बुरी तरह से पीटने लगे, जिन्होने कभी मच्छर भी नही मारा था, वो भी लगे थे उसे मारने, पहले तो मुझे उस पर बहुत गुस्सा था, लेकिन जब मेने उस की पिटाई देखी तो मेरा गुस्सा पता नही कहां चला गया, अब उसे बचाने की सोचने लगा, ओर मेरी मां भी उसे बचाने की कोशिश कर रही थी, लेकिन भीड उसे बहुत बुरी तरह से मार रही थी,

जब कोई भी रास्ता नही मिला उसे बचाने का तो मे उस लडके के उपर लेट गया,ओर जब लोगो ने मुझे देखा तो मार पीटाई बन्द हो गई, लेकिन सभी चिल्ला रहे थे, इसे छोडो ओर अब तक मेरे साथ मेरी मां, सरदार चाचा, ओर भी दो चार लोग आ कर उसे बचाने लगे, फ़िर उसे हम ने पानी वगेरा पिलाया, ओर एक कमरे मे बन्द कर दिया, थोडी देर बाद मां ओर दुसरे लोगो ने उस के जख्मो पर हल्दी वगेरा लगाई, ओर उस के घर का पता पुछा, ओर थोडी देर मे उस की मां भी आ गई ओर सब को बुरा भला कहने लगी, लडके ने अभी तक कोई भी चोरी की बात कवूल नही की थी,ओर उस की मां हमे पुलिस की धमकी भी देने लगी,लेकिन जब उसे पता लगा कि उस के बेटे को रगे हाथो पकडा हे तो एक दम से बदल गई, ओर फ़िर मिन्न्त करने लगी की इसे छोड दो यह बच्चा हे,उस की मां बाते सभी को गोल मोल लगी, ओर उस की मां ने काफ़ी चोरिया भी मान ली ओर थोडी देर मे काफ़ी समान हमे ला कर दे दिया जो उस लडके ने पिछले दिनो मे चुराया था, लेकिन मेरे कपडे उस मे नही थे, पहले सब बडो ने लडके को छोडने का मन बना लिया था, लेकिन उस की मां की चलाकिया देख कर उसे पुलिस के हवाले करने का मन बना लिया
क्रमश....

9 comments:

रंजू ranju said...

ह्म्म्म पर आगे क्या हुआ ? माँ क्यों साथ देती थी .? और आपका समान कहाँ गया ? जल्दी लिखे आगे की कड़ी भी :)

mehek said...

ye kya phir kramasha,jaldi lekhiye aage ki kahani,badi rochak lag rahi hai,kapde mile ya nahi?

Udan Tashtari said...

फिर सस्पेंन्स. :) आनन्द आ रहा है.

SUNIL DOGRA जालि‍म said...

बहुत खूब.. एक बात है, की आप शुरू से ही भले आदमी थे.. खैर हमें कहानी के अगले भाग का इंतजार है.. लेकिन एक प्राथना है अब कहानी पूरी कर दीजिये... हमें नींद नहीं आती..सारा समय कहानी की तरफ ध्यान रहता है..

कुन्नू सिंह said...

ईस बार फुल लाया हूं अगर अगली बार क्रमस नही लीखेंगे तो अगली बार मीठाई भी लाऊंगा।
अगले भाग का ईंतजार कर रहा हूं।

कुन्नू सिंह said...

ईस बार फुल लाया हूं अगर अगली बार क्रमस नही लीखेंगे तो अगली बार मीठाई भी लाऊंगा।
अगले भाग का ईंतजार कर रहा हूं।

अभिषेक ओझा said...

अगले भाग का इंतज़ार रहेगा... ये सस्पेंस पे छोड़ना अच्छी बात नहीं है :-)

राज भाटिय़ा said...

मेने इसे तीण हिस्सो मे इस लिये दी मे सोच रहा था की ज्यादा लम्बी हो जाये गी , दुसरा आप सब को पसन्द भी आती हे या नही, मुझे बहुत खुशी हुई, कल ५,५,०८ को क्रमश नही होगा. ओर आप सब का बहुत बहुत धन्यवाद.

कुन्नू सिंह said...

अरे ये तो मेरी हि कहानी वाला चोर चंदु लगता है।