04/04/08

स्कूल का पहला दिन

भाई मुझे अपने स्कूल का पहला या फ़िर आखरी दिन भी याद नही,हा अपने दोनो बच्चो के स्कूल का पहला दिन याद हे, ओर वो ही यहां आप मे बाटंने आया हू,अगर लेख लम्बा होगया तो आधा आधा, यानि मिलते हे ब्रेक के बाद वाली बात होगी,तो शुरु करू.....
आज हमारी जिन्दगी का एक ओर सुन्दर दिन था,ओर बच्चो को भी इस दिन का बहुत इन्तजार था,मेने आज छुट्टी की थी, केमरा ओर विडियो केमरा भी रात को तेयार कर लिया था, सुबह सब जल्द उठे,नहा कर बच्चो ने पुजा की, आज ११ सितम्बर १९८९ का दिन था ओर मेरे बच्चो का स्कुल मे पहला दिन,दोनो भाईयो मे १ साल का फ़र्क हे, लेकिन दोनो एक ही क्लास मे गये,हम सब सुबह ७,०० बजे घर से चले ओर पेदल ही थोडी देर मे स्कुल पहुच गये,बच्चो की जानपहचान के ओर भी बहुत से बच्चे थे, लेकिन सभी बच्चे आज थोडा खुशी के साथ साथ डरे हुये भी थे,
स्कुल पहुचने पर स्कुल के पिंसिपल ने हम सब का स्वागत किया, ओर हमे एक बडे हाल की तरफ़ जाने के लिये बताया,ओर हम उन के बतये रास्ते से उस हाल मे पहुचे,वहां बहुत से बच्चे ओर उन के मां वाप पहले से बेठे थे, ओर कुछ लोग अभी आ रहे थे,७,३० तक सब लोग आ गये जिन के बच्चो ने आज स्कुल (पहली कक्षा )मे दाखिला लेना था.
सब से पहले प्रिंसिपल जी ने अपना भाषाण दिया, फ़िर एक एक कर के सभी टीचर्स से परिचाय करवाया, उस के बाद ४, ओर ५ कक्षा के बच्चो ने एक नाटक दिखाया,जिस का शीर्षाक था अगर हम स्कुल मे नही पढे गे तो हमे अनपढाता के कारण कितना नुकसान हो सकता हे, यह नाटक करीब १५, २० मिन्ट चला,फ़िर पहली कक्षा के बच्चे क, ख, ग, के हिसाब से बटें कुल पांच कलास बनी सभी कलासॊ की टीचर्स ने एक एक बच्चे को बुलाया,उस से हाथ मिलाया,ओर उस बच्चे का परिच्य सब से करवाया ,ऎसा करीब १०,३० तक चला,
फ़िर हर टीचर अपने कलास के बच्चो को ले कर कलास की ओर चल पढी, ओर कलास मे टीचर ने पहले से ही सुन्दर ओर रंग बिरंगे गतो पर सब बच्चो के नाम लिखे थे,ओर यह सब टीचर की मेज पर पडे थे. अब एक एक बच्चे को नाम से बुलाये, वो बच्चा जाये,अपने नाम वाला गता उठाये,फ़िर ग्रीन बोर्ड पर अपना नाम लिखे, अपना परिचय करवाये,फ़िर अपनी मंपसद जगह पर बॆठ जाये, थोडी देर मे यह सब हो गया तो प्रिंसिपल जी हर कलास मे आये फ़िर से नये बच्चो का होसाला बडाया, मां वाप से बात की, फ़िर दुसरी कलासो की ओर चल पडे,तभी छुट्टी की घ्ण्टी बजी,जब बाहिर आये तो फ़िर से प्रिंसिपल जी गेट पर सभी नये बच्चो से हाथ मिला कर अलबिदा ले रहे थे.
यहां पर ना तो बच्चे का,ना ही उस के मां बाप का टेस्ट होता हे,स्कुल की कोई फ़ीस भी नही,किताबे भी फ़्रि (मुफ़्त ) हे,अगर बच्चा दुर से आता हे तो बस भी फ़्रि,छुट्टियो मे कोई होम वर्क नही,शनि बार ओर रवि बार के दिन कोई होम वर्क नही,कोई टुशान नही, बच्चे घर आ कर १,२ घण्टे ही पढते हे,बाकी फ़ुल आजादी, कोई टेंशन नही, बच्चे कॊ उस का बच्च्पन पुरा मिलता हे.

5 comments:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

आपका संस्मरण लाजवाब है, बचपन की यादें ताजा हो गयीं। बधाई स्वीकारें।

संजय तिवारी said...

लिखावट और दिखावट दोनों निखर रहे हैं.

DR.ANURAG ARYA said...

किस्मत वाले है यहाँ तो अभी बेटा नर्सरी पास ही की है की अगले साल किस school मे admission ले इसकी जुगाड़ बैठानी पड़ रही है ....

जोशिम said...

क्या बात है - सजीव चित्रण - हमें तो यही याद है कि तब हमारा इंटरव्यू हुआ था दो तीन जगह दिल्ली में - सही में बचपन पूरा मिलता है आपके यहाँ - बच्चों को नहीं पढायेंगे - नहीं तो रहे सहे बाल निकाल ले जाएंगे कि हमें कहाँ ले आए हो [ :-)] - मनीष

राज भाटिय़ा said...

संजय जी धन्यवाद,मे कोई लेखक तो हू नही,बस यु ही मह्फ़िल मे आ कर बेठ गया, रोनक देख कर,अब कुछ ना कुछ तो होगा ही,जाकिर जी,अनुराग जी,ओर मनीष जी आप सब का धन्यवाद होसाला बढाने के लिये.