19/04/08

चिंतन त्यागी

आज का चिंतन,
हम सभी धन दोलत, पेसा, मान समान सब कुछ बाटोरना चाहते हे,आज के युग मे पेसा केसे भी आये, बस आ जाये,काले पीले काम,पता नही कया कया करते हे इस धन के लिये. लेकिन आज के युग मे भी ऎसे त्यागी हे जिस से हम बहुत कुछ सीख सकते हे, हम अपने लिये आज के लिये कमा ले काफ़ी हे , लेकिन जब पोतो, पड्तोतओ के लिये भी, ओर मान सामान खो कर कमाते हे तो...
आज का विचार
एक साधु बाबा थे,उन्हे अपने त्यागी होने का बहुत ख्याल रहता था,उन के पास एक कमडंल के सिवा अपना कहने को कुछ भी नही था,लोगो को प्र्वचन दिये जो मिला का लिया बाकी मस्त, एक दिन बाबा नदी पर पानी लेने गये, खुद पानी पिया ओर अपना कमडंल भरने लगे, तो देखा एक कुत्ता वहा आया पानी पिया ओर चला गया,बाबा ने कुत्ते को देखा ,ओर विचार किया कि मेरे से बडा तो यह कुता त्यागी हे इसे जितनी जरुरत थी पानी पिया ओर चला गया, बाबा ने वही कमंडल का भी त्याग कर दिया.
यानि जितना हम अपनी मेहनत से अपने गुजारे लायक कमा ले काफ़ी हे बाकी ओरो के लिये छोड दे तो पुरे संसार मे कितनी शांति हो.

9 comments:

mehek said...

sahi sab apne jarurat jitna hi le aur jyada ki umid na karein kitna achha ho.achhi kahani hai.

DR.ANURAG ARYA said...

आपने बहुत बड़ी बात कह दी राज जी .....हम पूरे जीवन सिर्फ़ जोड़ने मे लगे रहते है .....

Gyandutt Pandey said...

गुरू कोई भी हो सकता है - श्वान भी!

SUNIL DOGRA जालि‍म said...

कमंडल का पानी भी तो बाद की जरूरत के लिए था.... जिसे दुसरे शब्दों में दूरदर्शिता खा जा सकता है.. त्याग भी तो दूरदर्शिता ही है

Udan Tashtari said...

उम्दा चिंतन. सुनील बाबू की बात भी जस्टिफाईड है वरना कल क्या करियेगा अगर बीमार पड़ गये तब?

राज भाटिय़ा said...

धन्यवाद आप सब का, जी हम सन्यासी तो नही लेकिन लालची भी नही होना चहिये, हमे उतना ही बचाना चहिये जो आराम से ओर दुसरो का हक मारे बिना बचा सके,

Udan Tashtari said...

अब आप से पूर्णतः सहमत राज भाई.

अतुल said...

बिल्कुल सही बात. लेकिन आदमी कुत्ता जैसा हो जाए तब तो.

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

यही बात तो मुझे अच्छी लगती है आपके ब्लॉग की.. काम की बात फट से मिल जाती है..